Saturday 24 March 2012

फुरसत तो मुझे भी थी बहुत देश के लिए

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को नमन। इसके साथ ही देश के लिए मर मिटे उन तमाम शहीदों के लिए भी श्रद्धा के भाव जो अनाम रह गए। जो आजादी के पहले शहीद हुए और जो आजादी के बाद शहीद हुए, सबके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बात शुरू करते हैं कि इन शहादतों के मायने क्या हैं? शहादत दिवसों पर नमन और जयंतियों पर स्मरण क्या शहादत के यही मायने हैं और  यही औचित्य है? जो लोग शहीदों की प्रतिमाओं पर फूल चढ़ाते हैं, जो नेता शहीदों के लिए बड़े-बड़े कशीदे पढ़ते हैं, वे ऐसा करते समय अंतरमन में झांकते हैं कि नहीं? खुद क्या करते रहे और वे क्या करके चले गए, इसका फर्क उन्हें समझ में आता है कि नहीं? अगर आता तो वे ऐसा क्यों बनते और अगर नहीं आता तो क्यों करते हैं ये शहादतों की भी मार्केटिंग? और हम क्यों लगा देते हैं मदारियों के चारो तरफ भीड़? शहादत दिवसों के प्रायोजनों को देख कर यह तकलीफ तो होती ही है। जिस बात के लिए भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु फांसी पर लटक गए। जिस बात के लिए चंद्रशेखर आजाद ने खुद को गोली मार ली। जिस बात के लिए ऊधम सिंह ने लंदन जाकर ऊधम काट दी। जिस बात के लिए जाने कितने बेटों ने अपनी कुर्बानी दे दी। उस बात के लिए हम कितने पल देते हैं? ...कि शहादत दिवसों के आयोजनों में जाकर रोते हैं और माला पहना कर मुस्कुरा कर चल देते हैं! देश और समाज के लिए हम अगर कुछ भी सार्थक करें जिसपर हमें खुद पर संतोष हो तो ऐसे प्रायोजनों की जरूरत ही नहीं पड़े! तब हम आत्मविश्वास से शहीदों की आत्माओं को यह कह सकें कि तुम चले गए, हम भी कुछ करके आते हैं। ऐसा सोचा होता तो ऐसा ही किया होता... तब भगत सिंह की आत्मा सुकुन में होती और तथाकथित आजादी के 65 साल यूं ही बेमानी नहीं बीत गए होते। हमने कुछ भी ऐसा नहीं किया, जिस पर देश के लिए शहीद हुई आत्माओं को गौरवबोध हो। हमने देश को गर्त में धकेल दिया। समाज वह नहीं जिसके लिए हम पक्षपात करते हैं, नैतिकता-निष्पक्षता को ताक पर रख कर वोट डालते हैं, रिश्ते गांठते हैं। अपनी जाति और अपने धर्म को समाज कहना तो हम भूले नहीं, व्यापक समाज और व्यापक देशहित के बारे में हम सोच भी कैसे सकते हैं। हम कुएं के मेढक हैं जो अपनी जाति और अपने धर्म से उबरते नहीं, देश को तीसरे या चौथे दर्जे पर या उस स्तर की प्राथमिकता पर भी नहीं रखते। शहादत दिवसों पर ही हम कम से कम यह सोचें कि क्या देश हमारी प्राथमिकता पर है? ईमानदारी से सोचें। लेकिन ईमानदारी से हम सोच नहीं सकते क्योंकि ईमानदार होते तो देश प्राथमिकता पर होता और हम विश्व के धरातल पर अपना सिर ऊंचा कर चल रहे होते। हमारे घरों के वे नौनीहाल जिन्होंने सीमा की रक्षा करते हुए या बेमानी हिंसा से लड़ते हुए अपनी जान दे दी, आज हमारे बीच होते और देश को अपने जिंदा होने का सबूत दे रहे होते। वे शहीद हुए पर हम जिंदा रहते हुए भी मर चुके हैं। हमारा देश घोटालेबाजों, झूठे, लुच्चों और इनके सरगना नेताओं की पहचान से नहीं जाना जाता। हम जगत में लालू यादवों, राजाओं, कनिमोझियों और मायावतियों सरीखी हस्तियों से नहीं जाने जाते। हम मर ही तो चुके हैं कि यह सब बर्दाश्त करते हैं! और अगर जिंदा हैं तो हम अब भी शर्म करें और ऐसा करें कि हमारा देश शहीदों के नाम से और हमारा देश हमारे योगदान के नाम से जाना जाए। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि... फुरसत तो मुझे भी थी बहुत देश के लिए
        पर पेट भर गया तो मुझे नींद आ गई...

Sunday 18 March 2012

अब भी समझने के लिए कुछ बाकी है?


भ्रष्टाचार और महंगाई की कारगुजारियां छिपाने के लिए केंद्र की कांग्रेस सरकार जिन हरकतों में लगी है, वह घोर अलोकतांत्रिक और घनघोर अमानवीय है। यह भी भेद खुल चुका है कि टैक्स से वसूली जाने वाली रकम ठीक उतनी ही है जितनी राशि टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में मंत्रियों, पूंजी घरानों, दलालों और नौकरशाहों ने लूटी। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जिस तरह का जन विरोधी बजट पेश किया है अगर वैसा ही बजट आने वाले कुछ और वर्षों तक पेश होता रहा और कारगुजारियां ढंकने का ऐसा बेजा जतन किया जाता रहा तो आप मान लें कि आम आदमी को सड़क पर उतरना ही होगा। और कोई विकल्प नहीं। अन्ना और बाबा से कुछ नहीं होने वाला। मोमबत्तियां जलाने बुझाने का फैशन चलाने से कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि जो समय दिख रहा है वह आम आदमी की मोमबत्तियां बुझाने वाला है। आप क्या खाएंगे इस बारे में सोचें। आप कैसे पकाएंगे इस बारे में सोचें। क्या-क्या महंगा हुआ, अब इस बारे में बात करना, उसकी समीक्षा करना और उस पर सारगर्भित टिप्पणियां जारी करने का अब वक्त नहीं रहा। अब घंटों लाइन में खड़े होकर वोट देकर खुद को सत्ता निर्माता मानने की खुशफहमी पालने का भी वक्त नहीं रहा। अब तो दो टूक फैसला कर लेने का वक्त है। अब वक्त है कि सत्ता पर बैठ कर अपनी मनमानी करने वाले निकृष्ट सियासतदानों को ऐसी हरकतें करने में भय होने लगे। हिंसा ही उपाय नहीं है। भय हिंसा से ही हो, यह जरूरी नहीं है। इसके और रास्ते हैं। केंद्र सरकार की ओर से पेश बजट को देख कर एक सहकर्मी ने बिल्कुल सटीक कहा कि आम आदमी घर से जैसे ही बाहर निकलेगा, उस पर टैक्स का बोझ लद जाएगा। अपने सहकर्मी के वक्तव्य में मध्यवर्गीय विवशताओं से भरा अहसास है। जो नई पीढ़ी का है वह यही समझता है कि इस देश में वह केवल टैक्स देने के लिए पैदा हुआ है। आम आदमी घर में अभाव में है और बाहर तनाव में। भ्रष्टाचार वे करें, तनाव हम झेलें। सरकारी धन वे लूटें, अभाव में हम रहें। भ्रष्टाचार से पैदा संकट पाटने के लिए टैक्स वे लादें और हम उनके पाप का जुर्माना भरें। आम आदमी से सरकार टैक्स ऐसे वसूल रही है जैसे गुंडे वसूलते हैं। इसके खिलाफ हम खड़े होंगे कि नहीं? या कि इंतजार करेंगे कि कोई मसीहा आए और हमें उबारे! अब समाज के छद्मी मसीहाओं को भी सबक सिखाने का समय है। गुंडों का जिस तरह ऐक्यबद्ध प्रतिरोध किया जाता है और सामूहिकता के आगे जिस तरह गुंडे रंगदारी टैक्स वसूलना भूल जाते हैं, उसी तरह से नेताओं से निबटना होगा। नहीं तो हमसे आपसे टैक्स वसूल कर नेता विदेशी बैंकों में रखी अपनी-अपनी झोलियां भरते रहेंगे और हम बजट के पहाड़ के नीचे दबते कुचलते और दम तोड़ते रहेंगे। गुंडों की व्यवस्था जब हमने बनाई है तो इसे उखाड़ेंगे भी हम ही न! तो कब उखाड़ेंगे? सियासतदां मेरे इस कथन पर असंसदीय जैसी फर्जी शब्दावलियों का साबुन इस्तेमाल कर अपने गंदे चेहरे धोने का कुछ देर का प्रहसन कर सकते हैं, बिगाड़ कुछ नहीं सकते। अखबार के इस हिस्से में यह लिखा जो आप पढ़ रहे हैं, यह कोई विद्वत लेख नहीं है, यह आम आदमी का गुस्सा है, जो इन आम शब्दों से अभिव्यक्त हो रहा है।
इस अखबार को आप अपना मंच मानें, अगर आपको कहीं लगे कि हम आम आदमी के हित की बात नहीं कर रहे तो हमें टोकें, विरोध जताएं और अपनी बात लिख कर हमें सतर्क कर दें। अगर आप सहमत हों, तब भी लिखें। साथ आएं। केवल विचार-विचार न खेलें। सेमिनार और गोष्ठियों से बाज आएं। आलीशान होटलों में पंचसितारा पंच-प्रकारों का स्वाद और बिसलरी का घूंट लेते हुए भुखमरी और प्यास पर होने वाले विचार-आयोजनों को हम सार्वजनिक तौर पर धिक्कारें, उनके आयोजकों को दौड़ा लें। हम समाज में विचार को सार्थक और निर्णायक दिशा की तरफ ले जाने का प्रयास करें। जूझें। समाज को भी परिवर्तनकारी व्यवस्था के लिए जूझने को तैयार करें।

जब यह बजट आ रहा था तो बाबा नागार्जुन की एक कविता याद आ रही थी। उसका कुछ हिस्सा थोड़े संशोधन की धृष्टता के साथ आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। आप पढ़ें और मनन करें कि ये सियासतदां हमारे समाज को किस भयावह दिशा की तरफ ले जा
रहे हैं। ...किसकी है जनवरी किसका अगस्त है/ कौन यहां सुखी है कौन यहां मस्त है/ जैसे भी टिकट मिला जहां भी टिकट मिला/ शासन के घोड़े पर वह ही सवार है/ उसी की जनवरी छब्बीस उसी का पन्द्रह अगस्त है/ कौन है बुलंद आज कौन आज मस्त है/ लखनऊ है दिल्ली है वहीं सब जुगाड़ है/ मेला है ठेला है भारी भीड़-भाड़ है/ फ्रिज है सोफा है बिजली का झाड़ है/ फैशन की ओट है सबकुछ उघाड़ है/ पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है/ गिन लो जी गिन लो, गिन लो जी गिन लो/ मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है/ गिन लो जी गिन लो, गिन लो जी गिन लो/ मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है/ गिन लो जी गिन लो, गिन लो जी गिन लो/ घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है/ गिन लो जी गिन लो, गिन लो जी गिन लो/ बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है/ देख लो जी देख लो, देख लो जी देख लो/ पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है/ महल आबाद है झोपड़ी उजाड़ है/ गरीबों की बस्ती में उखाड़ है पछाड़ है/ ताड़ का तिल है तिल का ताड़ है/ ताड़ के पत्ते हैं पत्तों के पंखे हैं/ पंखों की ओट है पंखों की आड़ है/ पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है/ किसकी है जनवरी किसका अगस्त है/ कौन यहां सुखी है कौन यहां मस्त है/ नेता ही सुखी है सेठ ही मस्त है/ मंत्री ही सुखी है मंत्री ही मस्त है/ उसी की है जनवरी उसी का अगस्त है।
आपने कुछ समझा या अब भी समझने के लिए कुछ बाकी है...

Sunday 11 March 2012

यह महज उत्तराधिकार का हस्तांतरण नहीं...

अखिलेश का चयन कर समाजवादी पार्टी ने देश को दिया परिवर्तनकारी फैसले का संदेश
अखिलेश यादव को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर न चौसर की कोई बिसात बिछी और न कोई सियासी तिकड़म रचा गया। समाजवादी पार्टी के पास और कोई विकल्प ही नहीं था। पार्टी को बृहत्तर विरोध या विद्रोह से बचाने के लिए लघुतर असंतोष को स्वीकार कर लिया गया। अखिलेश के नेतृत्व की पुकार के आगे समाजवादी पार्टी नेतृत्व ने घुटने टेक दिए।
समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव की झंडाबरदारी में लोकसभा चुनाव में अपना परचम लहराता देख रही है। पार्टी संगठन में दो असंतोषी व्यक्तित्वों के धुर हैं, एक शिवपाल सिंह यादव और दूसरे आजम खान। दोनों के चेहरे पर असंतोष के बावजूद स्वीकार्यता की बेबसी का भाव दरअसल संक्रमण की पीड़ा का भाव है, जब संगठन पके-पकाए, घुटे-घुटाए और थके-थकाए लोगों से उबर रही हो और ताजा तरीन लोगों की ऊर्जावान टीम नेतृत्व का अधिग्रहण कर रही हो... यह बात दर्शक नहीं सुन पाए, क्योंकि यह आवाज टीवी चैनल के लाइव-शो में ‘एयर’ ही नहीं हो पाई। यह स्वाभाविक तकनीकी दोष था या अस्वाभाविक, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह बात तब बोली गई थी, जब दिल्ली के एक राष्ट्रीय चैनल के राष्ट्रीय एंकर ने इस क्षेत्रीय संपादक से यह सवाल पूछा था कि शिवपाल सिंह या आजम खान जैसे वरिष्ठ नेताओं के होते हुए अखिलेश को नेता चुना जाना क्या उचित है? इस सवाल पर दिल्ली स्टूडियो में बैठे एक सज्जन पहले ही अपना विद्वत वक्तव्य जारी कर चुके थे कि अखिलेश को मुख्यमंत्री चुनना भारी भूल है। ऐसे पारंपरिक सवाल और ऐसे पारंपरिक उत्तर के बीच परंपरा से हट कर आने वाले मेरे प्रतिउत्तर का स्वर तो घुट ही जाएगा या घोंट ही दिया जाएगा।
अखिलेश को मुख्यमंत्री के रूप में चुन कर समाजवादी पार्टी ने देशभर में एक परिवर्तनकारी संदेश दिया है कि संभावनाओं की ऊर्जा से भरे और भ्रष्टाचार को खारिज कर नई लीक गढऩे वालों के लिए अब नेतृत्व लेने का समय आ गया है। समाजवादी पार्टी के इस फैसले को इस कोण से देखे जाने की जरूरत है।
समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री चुने जाने के फैसले पर अपनी मुहर लगाते समय पार्टी के दीर्घजीवी होने का पूर्वानुमान लगा लिया होगा, क्योंकि मुलायम जैसे अगरधत्त नेता के जेहन में बाल ठाकरे जैसे नेता की वह जीवनकालिक-भूल जरूर याद रही होगी जो भाजपा-शिवसेना के शक्तिकाल में उन्होंने उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री न बना कर की थी। बाल ठाकरे की प्रभावशाली छत्रछाया में उद्धव ठाकरे उस समय मुख्यमंत्री हो गए होते तो आज न राज ठाकरे होते और न नारायण राणे जैसे विरोधी छत्रप अस्तित्व में होते।
अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाना आम लोगों को उत्तराधिकार का हस्तांतरण भले ही दिखता हो, लेकिन यह समाजवादी पार्टी के हित के लिए मुलायम द्वारा लिया गया दूरगामी और दूरंदेशी फैसला है। इस फैसले का संकेत-संदेश आजम खान या शिवपाल सिंह यादव जैसे नेता तो समझ ही रहे होंगे। अखिलेश यादव के सामने चुनौतियां कम नहीं होंगी, और इसे वे अच्छी तरह भांप ही रहे होंगे। जब मुख्यमंत्री बनाए जाने की आधिकारिक घोषणा होने के बाद वे अपने पिता मुलायम सिंह यादव के साथ-साथ आजम खान और शिवपाल सिंह यादव के पैर छू रहे थे और उसे अपने माथे पर लगा रहे थे, तो वे चुनौतियों का विनम्रभाव से सामना करने का संदेश ही तो दे रहे थे। अखिलेश की यह दृढ़ विनम्रता देख कर मुलायम के चेहरे पर जो संतोष अभिव्यक्त हो रहा था, उसे कोई भी पढ़ सकता था।
कोई जब यह कहता है कि अखिलेश को 224 विधायकों को साथ लेकर चलने का जोखिम उठाना है, तो यह बात प्रदेश के इस युवा मुख्यमंत्री को मिले करोड़ों मतदाताओं के जनादेश की अनदेखी जैसी लगती है, क्योंकि जनादेश जन को साथ लेकर चलने के लिए है। लोकतांत्रिक मर्यादा यही कहती है कि आमजन की प्राथमिकता को सामने रख कर चलने पर सारी टेढ़ी चुनौतियां खुद ब खुद सीधी नियंत्रित और अनुशासित होकर काबू में आने लगती हैं। कानून व्यवस्था का मसला बड़ा नहीं है। बड़ा है विकास का मसला। बड़ा है भ्रष्टाचार से आक्रांत होती राजनीति, नौकरशाही और समाज को मुक्त कराने का मसला... कानून व्यवस्था अपने आप मुट्ठी में आ जाएगी। और अगर यह नया नेतृत्व भी चुनौतियों का मुकाबला नहीं कर पाया, तो उसके बाद नई और पुरानी के फर्क पर बात बंद हो जाएगी। फिर परिवारवाद जैसी बातों से उबर कर नई दिशा में सोचने की जो जनधारा बनी है, उससे लोग विमुख हो जाएंगे और उन शक्तियों को फिर से मौका मिलेगा, जो संक्रमणकाल के पार उतरने के बजाय लोकतंत्र को गंदा तालाब बना कर उसी में डूबते उतराते रहना चाहते हैं... लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए...

अखिलेश होंगे यूपी के मुख्यमंत्री

मुलायम परिवार में एक राय से फैसला, मुखिया ने लगाई मुहर, शाम तक सारी अड़चनें दूर
शनि नहीं शुक्र रहा निर्णायक, आजम और शिवपाल दोनों माने

राजनीति में कभी भी परिदृश्य बदल जाता है, लिहाजा निश्चित बात भी निश्चयपूर्वक कहने में लोग संकोच करते हैं। लेकिन हम यह निश्चयपूर्वक कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हो रहे हैं। अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के बारे में पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व फैसला ले चुका है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव फैसला ले चुके हैं। अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव यह फैसला ले चुके हैं। ...और मुलायम सिंह यादव के संयुक्त बृहत्तर परिवार में यह निर्णय हो चुका है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का सेहरा अखिलेश यादव के सिर पर ही बांधा जाए। विधानसभा चुनाव में अभिभूत करने वाली जीत का सेहरा अखिलेश के सिर बंध ही चुका है।
अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला पारिवारिक भी है और राजनीतिक भी। परिवार के सभी सदस्यों ने आपस में गहन विचार-विमर्श कर यह तय किया है कि अखिलेश को ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए। इस पर पिता मुलायम सिंह यादव ने भी अपनी मुहर लगा दी। शनिवार को विधायक दल की बैठक में औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव आएगा और अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने पर मुहर लग जाएगी। जनादेश से स्वीकृत अखिलेश की विजेता-छवि का समाजवादी पार्टी लाभ उठाना चाहती है और अभी मिले जनमत को संजोए रख कर 2014 के लोकसभा चुनाव में उतरना चाहती है। मुलायम का लक्ष्य अब दिल्ली है और पार्टी का भी। समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्वकारी संसदीय बोर्ड अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने पर सहमत है और उस बारे में सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव संकेत दे भी चुके हैं। संसदीय बोर्ड के अधिकतर सदस्य अखिलेश के प्रदेश में और मुलायम के राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका पर हामी दे रहे हैं। सपा नेताओं का मानना है कि विधानसभा चुनाव में मिले जनादेश ने समाजवादी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर उभर कर आने का सुनहरा अवसर दिया है, इसे चूकना नहीं चाहिए। 224 विधायकों की असरकारी ताकत और प्रभावकारी जूझारू छवि स्थापित करने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बूते लोकसभा चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन करने की तैयारियां शुरू करने का यह एक ठोस संकेत है।
शनिवार को विधायक दल की बैठक में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव उस नेता के जरिए पेश कराया जाएगा, जिसकी महत्वाकांक्षा के भविष्य में हिलोरे मारने की संभावना और आशंका दोनों है। और उन नेताओं को सम्माननीय पद देकर महत्वाकांक्षा का शमन किया जा सकता है। मसलन, आजम खान को विधानसभा अध्यक्ष बना दिया जाए या उत्तर प्रदेश में गृह विभाग को केंद्र की तर्ज पर गृह मंत्रालय का स्वरूप देकर चाचा शिवपाल सिंह यादव को सौंप दिया जाए। आज देर शाम मुलायम सिंह यादव की शिवपाल सिंह यादव और आजम खान के साथ जो बैठक हुई, वह अहम है। इस बैठक में अखिलेश यादव भी शामिल थे। उनकी मौजूदगी शाम की बैठक की अखिलेश कोण से अहमियत बढ़ाती है।
लब्लोलुबाव यह है कि अब यह वक्त नहीं कि चुनाव परिणाम आने के बाद से अखिलेश को ही क्यों लगातार मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाता रहा और कानून व्यवस्था से लेकर राजनीतिक मसलों तक अखिलेश ही बयान देने के लिए क्यों आगे आते रहे और राज्यपाल से मिलने के लिए मुलायम अखिलेश को ही लेकर क्यों गए और ऐसा करके मुलायम क्या संदेश प्रसारित करना चाहते थे या विधायक दल की बैठक के एक दिन पहले शुक्रवार को प्रदेश के डीजीपी अतुल से मुलाकात कर निर्णायक तेवर के साथ अखिलेश ही मीडिया के समक्ष क्यों मुखातिब हुए...! इसकी समीक्षा की न अब जरूरत है और न समय। जन-जन तक यह संदेश प्रसारित करने में मुलायम कामयाब रहे कि अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हो रहे हैं...

Wednesday 7 March 2012

प्रतिमा नहीं, प्रतिमान स्थापित करना होगा...

प्रतिमा नहीं, प्रतिमान स्थापित करना होगा... समाजवादी पार्टी की ऐतिहासिक जीत का सेहरा बंधने के बाद जब अखिलेश यादव टीवी पर यह कह रहे थे कि सपा की सरकार कोई प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई नहीं करेगी, मूर्तियां नहीं तोड़ेगी... तो अखिलेश से आह्वान का यह संदेश मन में गूंज रहा था। एक आम नागरिक की उम्मीदों और उसके भरोसे से जुड़ा आह्वान। पांच साल तक लखनऊ समेत प्रदेशभर में गली-मोहल्लों और चौराहों के सीने पर जिस तरह पत्थर के दुर्ग और पत्थर की प्रतिमाएं ठोकी गईं, उखाड़ी गईं और फिर ठोकी गईं, वह उसी पल धराशाई हो गईं जब जनादेश ने पूरा सत्ता-साम्राज्य ही उखाड़ फेंकने की मुनादी कर दी। अब प्रतिमाओं को तोडऩे की जरूरत ही क्या है!
2007 में उत्तर प्रदेश के लोगों ने जब बहुजन समाज पार्टी को अपना प्रतिनिधि दल चुना था तो यह सोचा नहीं था कि जन-प्रतिनिधित्व पर पत्थर पड़ जाएगा। पांच साल की जन-यंत्रणा का असर यह हुआ कि 2012 आते-आते बसपा पर ही पत्थर पड़ गया। आजादी के बाद के 65 साल में कभी सत्ता पक्ष में रहते हुए तो कभी विपक्ष में रह कर सत्ता के लिए घिसटते हुए नेताओं के कृत्य देख समझ कर ही हम बड़े हुए और बाद की नस्लें बड़ी हो रही हैं। 65 साल से भ्रष्टाचार, महंगाई, चोरी, झूठ, मक्कारी, अनैतिकता, अपराध हर साल लगता है कि चरम पर है और आने वाले हर साल में यह पुष्ट होता है कि स्खलन-यात्रा जारी है। यह सब हमें भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति के निकृष्ट प्रतिउत्पाद के रूप में नेताओं ने गिफ्ट दिया है। यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुभव-जनित वक्तव्य है। अभी प्रसंग उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव का है, इसलिए हम देश नहीं प्रदेश की बात करते हैं। इस अर्ध-दशक में सत्ता से आम आदमी को क्या मिला, यह सामने है। पूर्वांचल में हर साल हजारों बच्चे किसी अनजाने रोग से मरते रहे। अनजान इसलिए कि इन मौतों पर रोक कैसे लगे, इस बारे में मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक अनजान बने रहे और इसलिए शासन प्रशासन ने कोई परिणामात्मक उपाय नहीं किए। अब तक हजारों बच्चे पूर्वांचल में मारे जा चुके हैं। हजारों लोग सूखे बुंदेलखंड में भूखे मर चुके। पूर्वांचल हो या बुंदेलखंड, ये वही इलाके हैं जिसे राजनीति के केंद्र में रख कर बेचा गया और वहां के लोगों को ‘आजाद-प्रदेश’ का सपना देकर दोबारा सत्ता पाने की कोशिश की गई। जिस प्रदेश में साक्षरता दर, विकास दर, नागरिकों की जिंदगी का दर... सब दरिद्र है, जहां छह करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे मरने के लिए जी रहे हैं, जहां महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी के बोझ से आदमी दोहरा हुआ जा रहा हो, वहां तन कर खड़ी पत्थर की मूर्तियां निर्धन आत्मसम्मान को चिढ़ाती ही तो हैं...! प्रदेश को पत्थरों से पाटने में कितने हजार करोड़ रुपए नष्ट हुए, कुछ खास माफियाओं और पूंजी घरानों के हाथों प्रदेश को गिरवी रखने में सरकारी धन का कितना विनाश किया गया, पूरे प्रदेश में अवैध खदानों के जरिए कितना धन हड़पा गया और उन खदानों में कितनी जानें दफ्न कर दी गईं...? मूर्तियां भले ही न तोड़ें अखिलेश जी, स्मारक भले ही आप पर्यटन विभाग को सौंप दें, लेकिन खोखले हुए सरकारी खजाने का जायजा लिया जाएगा कि नहीं? उसका कोई दायित्व तय होगा कि नहीं? पूर्ण बहुमत की ताकत का इस्तेमाल हरियाली नष्ट करने, नदियों का अपहरण करने, पत्थरों से प्रदेश को चुनवा देने और लोकतंत्र को ताक पर रख कर चलने की फासिस्ट बसपाई हरकतों के समानान्तर समाजवादी पार्टी को मिले सम्पूर्ण बहुमत का इस्तेमाल लोकतांत्रिक नैतिकता की बहाली के प्रति पूर्ण समर्पण में होगा कि नहीं? सत्ता संभालने आ रही आपकी समाजवादी पार्टी को इसका जवाब देने के बजाय जवाबदेह होने के बारे में दृढ़ निश्चय करना होगा... अन्यथा, पांच साल बीतते अधिक देर नहीं लगती। प्रतिमाओं के बरक्स प्रतिमान स्थापित करना होगा... इसका दायित्व नई पीढ़ी का है... अखिलेश आपका है। जिस लोकतंत्र का पांच साल गला घोंटा गया और
सिर जूतों से कुचला गया, उसे स्वस्थ बनाने और आत्मसम्मान से जमीन पर खड़ा करने का दायित्व अखिलेश आपका है। जिस सभ्य समाज में नौकरशाह असभ्य और नेता अराजक हो, उसे बाड़े में बांधने और अनुशासित करने की जिम्मेदारी आपकी है। युवकों का साथ समाज बदलने के लिए हो, विकास के लिए हो, महज चुनावी न हो... इसे देखना और संभाल कर रखना तो आप ही को है। ...ताकि धूमिल की तरह कोई यह न कहे कि ‘मेरे देश का समाजवाद मालगोदाम में लटकती हुई उन बाल्टियों की तरह है जिस पर लिखा तो ‘आग’ है, पर उनमें बालू और पानी भरा है!’ ...बल्कि दुष्यंत की तरह सूरत बदलने का मकसद चाहिए... आग हो चाहे कहीं भी, आग जलनी चाहिए...

Friday 2 March 2012

बुतों का सूबा मौतों पर बुत!

तड़के ही लौटा था दफ्तर से और सुबह ही हड़बड़ा कर उठ गया। जल्दी-जल्दी अखबार देखे। अपना नहीं, दूसरे सारे अखबार। सोनभद्र में पहाड़ धंसने से अनगिनत मजदूरों के मारे जाने की खबर कहीं नहीं थी, थी भी तो अंदर। कल भी तो वैसे ही छपी थी बहुत दब कर। तब से परेशान हूं। समझ में नहीं आ रहा कि पचासों मजदूरों के इस तरह मरने की खबर अपने अखबार के पहले पन्ने पर लीड छाप कर और अगले दिन रिपोर्टर की ओर से मौके से भेजी गई वीभत्स मौत की जिंदा तस्वीरें पहले पन्ने पर पसार कर हमने गलती की या उन लोगों ने, जिन्होंने खबर दबा दी? एक कद्दावर मंत्री का भांजा और सत्ताधारी पार्टी के नेताओं पर हत्या का मुकदमा दर्ज होने की खबर किसी भी अखबार में सुर्खियां नहीं बनी... उसे पहले पन्ने पर छाप कर हमने गलती की, या नहीं छाप कर उन लोगों ने? इसी सही-गलत पर चल रहे मानसिक संवाद में खलल डालते हुए कुछ अखबारनवीसों के फोन आए और यह नसीहत दी गई कि ‘सेंसेशनल’ नहीं होना चाहिए था। ...इस सीख के साथ ही सुबह से चल रहे मंथन का जैसे एकबारगी समाधान मिल गया। अमानुषों के काले धंधों के कारण खोखले हो रहे पहाड़ों के गिरने से बहुतेरे मजदूरों का मर जाना उनमें ‘सेंसेशन’ क्यों नहीं पैदा करता, नसों में सनसनी क्यों नहीं बनती... क्यों वे खबरों को ‘सेंसेशनल’ नहीं बनाते! उनकी नसों में उपकार का इतना काला द्रव्य भरा है कि नेता मारे तो उनके लिए सनसनी नहीं और नेता मरे तो उनके लिए सनसनी! पहाड़ से दब कर निरीह मजदूरों की मौत और अखबारों में दब कर खबर की मौत, दोनों एक हैं। दोनों अलग-अलग दिखने वाली घटनाएं हैं, पर हैं अंदर-अंदर मिली हुई। मजदूरों की हत्या में सब शामिल हैं। प्राकृतिक वजहों से होने वाले भूस्खलन से होने वाली मौतें पहले पेज की खबर बनती हैं, लेकिन काले धंधों के कारण जर्जर होते पहाड़ के गिरने से अनगिनत लोगों का मर जाना खबर नहीं बनता। और ऐसा करने वाले पत्रकार या अखबार, नेताओं के सफेद वस्त्रों पर पड़े खून के छींटे साफ करने वाले ड्राइ-क्लीनर बने रहते हैं। भ्रष्टाचार के जहरीले नाग से डंसे इस दौर में सही वही लोग हैं जो नेताओं-नौकरशाहों-दलालों के पाप दबाते हैं, धोते हैं, बदले में पाते हैं और ढोल बजाते हैं। गलतियां तो वे करते हैं जो आजीविका की तलाश में पत्थर खोदते हैं और उसी में दब कर मर जाते हैं। दुर्घटनास्थल का दृश्य देखें तो आप कांप जाएंगे... विशाल बियाबान मरघट जैसे क्षेत्र में धंसे हुए पहाड़ की बिखरी चट्टानों में झांक-झांक कर सीता अपने पति रामपदारथ को खोज रही है। कोई कमली अपने भाई नगीने को तलाश रही है। कोई लालबहादुर अपनी पत्नी लछमी खोज रहा है। तो बुढिय़ा रामसखी एक चट्टान पर खड़ी उचक-उचक कर जेसीबी मशीन से मलबे की तरह उठाई गई लाशों में अपने बेटे का चेहरा ढूंढ़ रही है... धूल गर्द से भरे इलाके में टूटे बिखरे पत्थरों के बीच बदहवासी भरी निगाहों से अपनों को तलाशती ऐसी कई सीता, कमली, रामसखी मिल जाएंगी। उन्हें यह भी होश नहीं कि अपनों को तलाशने में उनके पैर कहां पड़ रहे हैं, कहां फूट रहे हैं। ...ऐसी मासूम निरीह जमात के लिए कोई कंट्रोल रूम नहीं है, कोई आपदा प्रबंधन नहीं, लाशों को घर ले जाने के लिए कोई सरकारी इंतजाम नहीं, घायलों के इलाज के लिए कोई प्रशासनिक बंदोबस्त नहीं है, इनके लिए नहीं है नोटिस बोर्ड पर मृतकों और घायलों की चस्पा कोई लिस्ट। ...और इनके लिए नहीं है सत्ताई-संवेदना के दो शब्द। बुतों का सूबा निरीह मौतों पर बुत! आप यह सब देख कर सनसनाहट से भर जाएंगे और ‘सेंसेशनल’ बता कर आपकी संवेदना को कठघरे में डालने की कोशिश करने वाले साजिशी अमानवीय दुष्ट शब्द-संबोधनों के प्रति आपका मन घृणा से भर जाएगा। कितनी सटीक पंक्तियां हैं कवि चंडीदत्त शुक्ल की ...‘चुप हो जाओ रामरती की अम्मा/ धूल भरे कस्बे में रात हो गई है/ और जेसीबी मशीन भी कितनी देर तक रामप्रताप की लाश टांगे रहेगी/ उसे शहर लौटना है/ सुना है मंत्री जी के घर के आगे सड़क बन रही है... एक सौ बीस किलोमीटर दूर बनारस के लहरतारा में जब कबीर चुपचाप हैं/ तब तुम ही रोकर क्या कर लोगी रामकली की अम्मा?’
...तो ऐसे रामप्रतापों और ऐसी रामरतियों के लिए है कौन? पूरी सत्ता पूरी संसद मौन...

Friday 24 February 2012

जब बसपा के पक्ष में जज खरीदने गए थे खुर्शीद!

चुनाव क्या, किसी भी आचार संहिता से है कांग्रेसियों को परहेज
देश के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की आदत में शुमार है कानून का उल्लंघन करना और संवैधानिक मर्यादा की दहलीज लांघना। उनकी नकल पर कांग्रेस आलाकमान का खास बनने के भौंडे प्रयास में केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा इस उम्र में भी नाबालिग हरकतें कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मतदाता कल जब अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने जा रहे होंगे, उनके सामने होगा कानून की अवहेलना करने वाले कानून मंत्री और संवैधानिक अवमानना के दोषी व्यक्ति को भारतीय लोकतंत्र पर थोपे रहने की असंवैधानिक जिद रखने वाली कांग्रेस पार्टी का अनैतिक अलोकतांत्रिक दंभ। चुनाव आयोग के 15 पेज के फैसले और राष्ट्रपति को भेजी गई आयोग की चिट्ठी देखें तो कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के अलोकतांत्रिक चरित्र का अहसास हो जाएगा। आपको यह भी अहसास हो जाएगा कि वोट के लिए ये किसी भी स्तर पर उतर सकते हैं, फिर देश, कानून और संविधान क्या बला है।
आपको थोड़ा फ्लैश-बैक में लिए चलते हैं। बहुजन समाज पार्टी के 40 विधायकों के पार्टी छोड़ कर निकल जाने और समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने के मामले में बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने दलबदलू विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने की याचिका दाखिल की थी। इस पर दो साल की बहस के बाद 2005 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फैसला तो किया लेकिन दिया नहीं था। फैसला रिजर्व कर लिया गया था। उस समय सलमान खुर्शीद उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे। खुर्शीद को पता चल चुका था कि बेंच के दूसरे जज एमए खान अपने फैसले में विधायकों को योग्य करार देने जा रहे हैं। जबकि कांग्रेस चाहती थी विधायकों को अयोग्य करार दिया जाए ताकि समाजवादी पार्टी की सरकार गिर जाए। सलमान खुर्शीद सोनिया गांधी के दूत के रूप में न्यायाधीश एमए खान से मिले और न्यायिक प्रक्रिया में आपराधिक बाधा डालने की कोशिश की। खुर्शीद ने एमए खान को फैसला बदलने और बदले में राज्यपाल का पद लेने के लिए मनाने का प्रयास किया। जज जगदीश भल्ला ने भी एमए खान को मनाने की कोशिश की। उस समय के केंद्रीय कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज भी लखनऊ आए, उन्होंने भी एड़ी चोटी का जोर लगाया लेकिन बात नहीं बनी। वरिष्ठ जज होने के नाते जगदीश भल्ला ने फैसले की घोषणा की तारीख मुकर्रर नहीं की और फैसले को सीलबंद कर दिया। दलबदल करने वाले विधायकों के मामले में फिर से सुनवाई किए जाने की एक याचिका पर भल्ला को एक दिन के लिए पीठ का गठन करना पड़ा और इसी एक दिन का फायदा उठाते हुए न्यायाधीश एमए खान ने अपना फैसला सार्वजनिक कर दिया। ...और उनका फैसला था कि बसपा छोड़ गए 40 विधायकों पर दलबदल कानून लागू नहीं होता, लिहाजा वे योग्य ठहराए जाते हैं। एमए खान द्वारा फैसला सार्वजनिक किए जाने के बावजूद न्यायाधीश जगदीश भल्ला ने न्याय को ‘सील’ रखा। इस मामले में फिर तीन जजों की पीठ गठित हुई। उस पीठ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एएन रे खुद शामिल थे। उनके अलावा पीठ में जगदीश भल्ला और प्रदीपकांत थे। इस बार जगदीश भल्ला और प्रदीपकांत ने बसपा छोडऩे वाले विधायकों को अयोग्य और मुख्य न्यायाधीश एएन रे ने उन्हें योग्य करार दिया। मामला सुप्रीमकोर्ट की संविधान पीठ पहुंचा, जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के फैसले पर सुप्रीमकोर्ट की संविधान पीठ ने अपनी सहमति जताई। 40 विधायकों को दलबदल कानून से अलग बताया और उन्हें योग्य करार दे दिया।
इससे दो बातें साफ होती हैं। एक न्यायिक है और दूसरी राजनीतिक। कांग्रेस हो या कांग्रेसी, न्यायिक प्रक्रिया से उसे कोई लेना-देना नहीं। दूसरे यह कि कांग्रेस और बसपा आपस में समझदारी से काम करती रही है। तभी, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार गिराने के इरादे से कांग्रेस ने बसपा की याचिका के पक्ष में न्याय को प्रभावित करने की कोशिश की और कानून की ऐसी-तैसी कर रख दी। जज को रिश्वत देने और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की आपराधिक साजिश की गई। आज भी देखिए कांग्रेस के नेता वही कर रहे हैं। देश के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के आचरण और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के रवैये ने चुनाव आचार संहिता के औचित्य पर ही गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। कानून मंत्री के खिलाफ चुनाव आयोग का निर्णय लिया जाना और उसके अनुपालन के लिए राष्ट्रपति को विवशताओं से भरा पत्र लिखा जाना वाकई दुखद है... और इससे भी त्रासद है पंगु राष्ट्रपति द्वारा एक डाकिये की तरह आयोग के उस पत्र को प्रधानमंत्री के पास भेज देना। कांग्रेस का तर्क है कि सलमान खुर्शीद ने माफी तो मांग ही ली... इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता अशोक पांडेय ने अदालत से पूछा कि माफी मांगने से खुर्शीद के अपराध की पुष्टि हो जाती है, फिर उन पर आपराधिक मुकदमा और न्यायालय की अवमानना का मामला क्यों नहीं चलाया जाए? जज को लालच देने और न्याय खरीदने की कोशिश करने के मामले में सलमान खुर्शीद, तत्कालीन कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? और क्यों नहीं सलमान खुर्शीद को मंत्री पद से हटाया जाए? न्यायालय ने फिर अपना फैसला रिजर्व कर लिया है... लोकतंत्र इसी तरह जल्दी ही सीलबंद हो जाने वाला है...

पर्दे के पीछे कौन? सीबीआई मौन...

अरबों रुपए का राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाला उत्तर प्रदेश के मार्फत दिल्ली या अन्य राज्यों से जुड़ा है या घोटाला यूपी में वाया दिल्ली पहुंचा है? दिल्ली की कौन-कौन सी शख्सियत घोटाले से लिंक्ड है? सीबीआई यूपी के अलावा भी कहीं कुछ कर रही है या नहीं? दिल्ली में दर्ज हुई कुछ प्राथमिकियां दिल्ली-लिंक्ड हैं या यूपी-लिंक्ड? एनआरएचएम घोटाला कहीं राजनीतिक हित साधने का जरिया तो नहीं बन रहा, जिसमें हत्याएं हो रही हैं, राजनीतिक हस्तियां निबटाई जा रही हैं या चुनाव के बाद इसी के जरिए सियासी हित साधे जाएंगे? सीबीआई ने एनआरएचएम के जो दिल्ली-यूपी-उत्तराखंड लिंक तलाशे हैं, उसके बारे में चुप्पी क्यों है? उत्तराखंड में जो हस्तियां इस घोटाले में लिप्त हैं, उन्हें बचाने के लिए चुप्पी है या फंसाने के लिए? डॉ. वाइएस सचान की हत्या का सुराग देने वाले जिस इकलौते दस्तावेज को सत्ता गलियारे में श्रेडर मशीन में डाल कर नष्ट कर दिया गया था, उसके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की पहल के बजाय सीबीआई की चुप्पी क्यों? ये सवाल भी हैं और स्वयं में जवाब भी...
 एनआरएचएम घोटाले के तार केवल यूपी से ही नहीं बल्कि दिल्ली और उत्तराखंड से भी जुड़े हैं। सीबीआई को ऐसे कई सबूत हासिल हुए हैं। आपके सामने हम एक बानगी पेश करेंगे। एनआरएचएम के ब्लैंक चेकबुक्स बड़ी तादाद में उत्तराखंड के लिए भी भेजे गए, जिन पर केवल राशि भरी गई और पैसे निकाल लिए गए। ऐसा ही एक ब्लैंक चेकबुक हम आपको दिखाते हैं जो ‘प्राइवेट एंड कंफिडेंशियल’ लिफाफे में बीएनपीएल दिल्ली कोड -901407 से उत्तराखंड भेजा गया था। यह एकाउंट नंबर- 30430179697 (आईएफएससी- एसबीआईएल0002523) का चेकबुक है। सीबीआई सूत्रों का कहना है कि एनआरएचएम घोटाले के सुर्खियों में आने के बाद पकड़े जाने की हड़बड़ाहट में ऐसे कई ब्लैंक चेकबुक्स और दस्तावेज बरामद हो रहे हैं, जिनसे कई महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगे हैं। लेकिन जिन कोड नंबरों और जिन एकाउंट नंबरों से चेकबुक्स भेजे गए, वहां से कितने रुपए निकाले गए, इस बारे में पूछने पर सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि निकाले गए रुपए का भी हिसाब-किताब किया जा रहा है, इस बारे में अभी बताना मुमकिन नहीं है। लेकिन दिल्ली और उत्तराखंड के लिंक में कौन लोग हैं, यह पूछे जाने पर सीबीआई के अधिकारी दिल्ली-यूपी-उत्तराखंड के कई नेताओं नौकरशाहों के नाम तो बताते हैं, लेकिन इन नामों को आधिकारिक शक्ल देने में हिचकते हैं। सीबीआई के पास सुराग तो हैं, लेकिन दिमाग नहीं। क्योंकि दिमाग कहीं और से संचालित हो रहा है, सीबीआई की चुप्पी या डर इसी वजह से है।
अब आते हैं फिर से अहम सुराग देने वाले दस्तावेज के ‘श्रेडर’ (कागजात को बुरादे में तब्दील करने वाली मशीन) में डाल कर नष्ट करने की घटना पर। डॉक्टर वाइएस सचान की जेल में हत्या की गई थी या वह आत्महत्या का ही मामला था, इसका खुलासा करने वाला दस्तावेज जेल विभाग के आईजी एके गुप्ता के हाथ लग चुका था। यह डॉ. सचान का खुद का लिखा बयान था, जिसमें उन्होंने हत्या की आशंका जताई थी और जेल में टॉर्चर किए जाने के बारे में तफसील से लिखा था। यह दस्तावेज गृह विभाग के कद्दावर स्वनामधन्य अधिकारी पास पहुंचा लेकिन उन्होंने उसे तत्काल श्रेडर मशीन में डाल कर नष्ट कर डाला। सत्ता गलियारे के खास होने का उन्होंने सबूत दिया। सीबीआई को इस बारे में पूरा पता है। जेल आईजी एके गुप्ता के यहां सीबीआई की छापामारी भी हुई, लेकिन ‘श्रेडर-कृत्य’ करने वाले अधिकारी को सीबीआई कानूनी घेरे में नहीं ले पाई, लिहाजा नाम भी उजागर नहीं किया जा सकता। डॉ. वाइएस सचान के लिखे हुए कागज की जेलर ने फोटोस्टैट करा ली थी। वह कॉपी सीबीआई के पास है। लेकिन अदालत में ओरिजिनल कॉपी की मांग और मान्यता होगी... पर वह श्रेडर मशीन से वापस नहीं आ सकती।

सीबीआई के होठ सिले हुए हैं... सब मिले हुए हैं

 ‘कैनविज टाइम्स’ ने कल एक सवाल सामने रखा था कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले के तार दिल्ली से जुड़े हैं तो सीबीआई उन दिल्लीवासी हस्तियों के नाम उजागर करने से क्यों हिचक रही है? सीबीआई ने अरबों रुपए चुरा कर विदेशी बैंकों में जमा किए जाने की बात आज आधिकारिक तौर पर कबूल की... देश का धन लूट कर बाहर पहुंचाने वाले वही नेता नौकरशाह और दलाल हैं जो कभी एनआरएचएम जैसी योजनाओं का पैसा लूटते हैं तो कभी देश के संसाधनों का धन चुरा कर विदेशी बैंकों में जमा कराते हैं। जाहिर है कि विदेशों में पैसा भी चोर रास्ते से ही जाता है। सीबीआई को ऐसे चोरों का नाम भी प्रकाश में लाना होगा। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित एनआरएचएम घोटाले में कई मध्यम दर्जे के नेताओं के नाम आए लेकिन उच्च दर्जे के नेताओं का नाम उजागर होना बाकी है। मध्यम दर्जे के नौकरशाहों और दलालों के नाम आए, पर शीर्ष नौकरशाहों में प्रदीप शुक्ला को छोड़ कर अन्य बाबू अभी पर्दे के पीछे हैं। प्रदीप शुक्ला को बचाने में सियासत किस तरह बेचैन है, वह आपने देख ही लिया कि प्रधानमंत्री दफ्तर तक छाता लिए खड़ा है। सीबीआई प्रदीप शुक्ला का क्या करेगी, यह चुनाव परिणाम आने के बाद ‘ऊंट की करवट’ से ही पता चलेगा। लेकिन एनआरएचएम घोटाले की परतों के अंदर जाएं तो कई और घपले जुड़े हुए मिलेंगे। एनआरएचएम घोटाले में जो अरबों रुपए चुराए गए, वे विदेशी बैंकों में भी जमा किए गए होंगे। हम एक नाम और आपके समक्ष लेते हैं। यह नाम है केंद्र सरकार में खनन मंत्रालय के सचिव विश्वपति त्रिवेदी का। मध्यप्रदेश कैडर के वरिष्ठ आईएएस विश्वपति त्रिवेदी इसके पहले एयर इंडिया के संयुक्त प्रबंध निदेशक थे
और बाद में दोनों एयरलाइनों के विलय के बाद बने नेशनल एविएशन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड के भी संयुक्त प्रबंध निदेशक थे। विश्वपति त्रिवेदी यूपी के वरिष्ठ आईएएस एवं एनआरएचएम घोटाले के मुख्य आरोपियों में से एक प्रदीप शुक्ला के सगे साले हैं। दिल्ली से प्रदीप शुक्ला को मिल रहे संरक्षण की एक और वजह आपके सामने है।
‘कैनविज टाइम्स’ ने घोटाले या घोटालेबाजों के संरक्षण में केंद्र की कांग्रेस सरकार और यूपी की बसपा सरकार के बीच ‘आपसी समझ’ के बारे में संकेत दिया था। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री दफ्तर के तहत कैबिनेट सेक्रेटेरियट में बैठने वाले वरिष्ठ सलाहकार प्रजापति त्रिवेदी का जिक्र आया था। अब विश्वपति त्रिवेदी का जिक्र आया। विश्वपति त्रिवेदी और प्रजापति त्रिवेदी, दोनों सगे भाई हैं और प्रदीप शुक्ल के सगे साले हैं। त्रिवेदी बंधुओं के कांग्रेस से गहरे सम्बन्ध हैं। मध्यप्रदेश में भी और उत्तर प्रदेश में भी। मध्यप्रदेश में विद्याचरण शुक्ल और उत्तर प्रदेश में राजेंद्र कुमारी वाजपेयी। सनद रहे, सीबीआई ने पिछले दिनों वरिष्ठ कांग्रेस नेता राजेंद्र कुमारी वाजपेयी के बेटे अशोक वाजपेयी के माल एवेन्यु और लॉरेन्स टिरेस के ठिकानों पर छापामारी की थी। सीबीआई का कहना है कि छापे में कुछ नहीं मिला। लेकिन छापे की कोई वजह तो रही ही होगी। इस सिलसिले में सीबीआई को प्रदीप शुक्ला के एक बटलर की तलाश है। कभी प्रदीप शुक्ला के इस्तेमाल में आने वाली फिएट गाड़ी (यूएचएफ-2) विश्वपति त्रिवेदी के नाम पर है और वह गाड़ी बटलर पैलेस में प्रदीप शुक्ला के सरकारी आवास पर न होकर एक अन्य आईएएस के गैरज में खड़ी है। यही गाड़ी कुछ अर्सा पहले कैंट में थिमैया रोड स्थित एक आलीशान कोठी में खड़ी थी। यह कोठी बसपा सरकार के एक कद्दावर मंत्री ने अपनी पत्नी के नाम पर खरीद रखी है। अब आप सिरा तलाशते रहें कि कहां कौन मिला हुआ है।
जब विश्वपति त्रिवेदी एयर इंडिया में थे तो उन्होंने 16 महीने में एक्जेक्यूटिव क्लास के 116 कम्प्लिमेंट्री टिकट अपने रिश्तेदारों में बांट दिए थे। इन कम्प्लिमेंट्री टिकटों के जरिए देश-विदेश की खूब यात्राएं हुईं। सीबीआई को पता यह लगाना है कि कम्प्लिमेंट्री टिकटों पर हुई विदेश यात्राओं के जरिए घपले-घोटालों के धन विदेश तो नहीं पहुंचाए गए? एक्जेक्यूटिव क्लास के जो 116 कम्प्लिमेंट्री टिकट रिश्तेदारों में बांटे गए थे, वे सब के सब जाने-आने दोनों के थे। चलिए हम इन कम्प्लिमेंट्री टिकटों का ब्यौरा भी दे देते हैं। श्री त्रिवेदी ने अपनी बहन आराधना शुक्ला को 11 टिकट दिए। पिता इन्कम टैक्स के पूर्व कमिश्नर धरनीधर त्रिवेदी को 14 टिकट दिए। पत्नी मोना त्रिवेदी को 24 टिकट दिए। बेटा एवी त्रिवेदी को 25 टिकट दिए। बिटिया ईशान तिवारी को 7 टिकट दिए। बिटिया ईरा तिवारी को 17 टिकट दिए। बिटिया अंजनी त्रिवेदी को छह टिकट दिए। दामाद विकास तिवारी को 3 टिकट दिए। भाई प्रजापति त्रिवेदी को दो टिकट और मां क्रांति त्रिवेदी को 7 टिकट दिए। इन कम्प्लिमेंट्री टिकटों पर घरेलू उड़ानों के साथ दुबई, माले, सिंगापुर, बैंकाक, कुआलालम्पुर समेत कई देशों की यात्राएं की गईं। केवल दिल्ली-दुबई रिटर्न टिकट पर 19 खेप में यात्राएं की गईं। इसके अलावा दिल्ली-मुम्बई की 23 यात्राएं हुईं और लखनऊ से मुम्बई की 29 यात्राएं की गईं।
यह मामला बाकायदा केंद्र की जानकारी में था, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस सरकार ने श्री त्रिवेदी को खनन मंत्रालय का सचिव बना दिया। खनन के अकूत घोटाले सुर्खियों में हैं ही, अभी कनाडा की खुफिया एजेंसी ने सीबीआई से सम्पर्क कर तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को कनाडा की एक फर्म की तरफ से सुरक्षा उपकरण लगाने का ठेका पाने के लिए करोड़ों रुपए की रिश्वत दिए जाने के मामले में कार्रवाई का औपचारिक आग्रह किया है। जिस समय प्रफुल्ल पटेल उड्डयन मंत्री थे, उस समय विश्वपति त्रिवेदी नेशनल एविएशन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड के संयुक्त प्रबंध निदेशक थे।

सीएम के खास नौकरशाह को बचा रहे पीएम!

प्रदीप शुक्ला ने सीबीआई को दिखाई औकात
राजनीतिक संरक्षण है या सुनियोजित साठगांठ
बहुचर्चित एनआरएचएम घोटाले के अभियुक्त प्रदेश के आला नौकरशाह प्रदीप शुक्ला कहां हैं? सीबीआई के अधिकारी भी परेशान हैं कि स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव वरिष्ठ आईएएस अफसर प्रदीप शुक्ला आखिर गए कहां! सीबीआई अधिकारियों को भी यह समझ में नहीं आ रहा कि कहां तो तय था कि प्रदीप शुक्ला गिरफ्तार कर लिए जाएंगे, पर अचानक ऐसा कौन सा जादू चल गया कि सीबीआई के शीर्षस्थ अधिकारी ही चुप्पी साध कर बैठ गए।
पहले कहावत चलती थी कि प्रेम में और युद्ध में सब जायज है... अब यह बात बदल गई है। अब चलन में यह है कि राजनीति में और घोटाले में सब जायज है। यह बसपा और कांग्रेस में राजनीतिक मित्रता है या घोटालीय दोस्ती, विवशता है या भविष्य का झप्पी-संकेत कि उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार के शीर्ष नौकरशाह प्रदीप शुक्ल को केंद्र की कांग्रेस सरकार का शीर्ष सत्ता-केंद्र हिफाजत दे रहा है! प्रधानमंत्री दफ्तर प्रदीप शुक्ला में आखिर क्यों रुचि ले रहा है? यह सवाल सीबीआई के उन सूत्रों का है, जो मध्यम पदाधिकारी वर्ग के हैं, जिन्हें शीर्ष गलियारे की हरकतों की भनक तो रहती है लेकिन सूत्रधारों के बारे में पता नहीं रहता। उन्हें इतना जरूर आभास और संकेत दोनों है कि अब जो कुछ भी होगा चुनाव के बाद ही होगा। यानी, अगर पीएमओ बीच में ही कोई अप्रत्याशित करवट न ले ले तो चुनाव परिणाम आने तक प्रदीप शुक्ला का कुछ नहीं बिगडऩे वाला। सीबीआई के अधिकारी भले ही लखनऊ में शिविर डाले रहें, प्रदीप शुक्ला तो राजधानी में राजछत्र के नीचे हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद देश और प्रदेश की सियासत कौन सा शक्ल लेगी और फिर एनआरएचएम घोटाला और प्रदीप शुक्ला जैसे आरोपियों का क्या होगा, इसके बारे में अभी कैसे और क्यों कहा जाए! समझा जरूर जा सकता है। 
एनआरएचएम घोटाले के आरोपी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रदीप शुक्ला और प्रधानमंत्री के खास सलाहकार प्रजापति त्रिवेदी के अंतरंग रिश्ते हैं। अर्थ मामलों  के विशेषज्ञ प्रजापति त्रिवेदी को प्रधानमंत्री सचिवालय में खास स्थान देकर विदेश से लाया गया था। इन अर्थ विशेषज्ञ का प्रदीप शुक्ला के अनर्थ से लेना-देना भले ही नहीं हो, लेकिन रिश्ते को बचाने का अर्थ तो है ही। आप फिर से याद करते चलें कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव और सत्ता के खास रहे प्रदीप शुक्ला एनआरएचएम घोटाले की जांच के क्रम में आरोपी बनाए जाने के लिए फिट पाए गए थे और सीबीआई उन्हें पूछताछ के लिए बुलाने का लगातार सम्मन भी जारी करती रही, लेकिन न वे सीबीआई के समक्ष गए और न कोई जवाब ही दिया। शीर्ष खुफिया एजेंसी की उपेक्षा कोई भी व्यक्ति बिना किसी शक्तिशाली छाया के थोड़े ही कर सकता है। सीबीआई ने 19 जनवरी को लखनऊ के कई ठिकानों पर छापामारी की, लेकिन प्रदीप शुक्ला कहीं नहीं मिले। न बटलर पैलेस कॉलोनी में और न कैंट के हजरत महल मार्ग स्थित 12 नंबर कोठी में। पोर्टिको की शान बढ़ाने वाली काली चमचमाती विदेशी लक्जरी ‘बीटल’ कार भी वहां खड़ी नहीं मिली। हां, सीबीआई के अधिकारी घर के भीतर की आलीशान साज-सज्जा और दिल्ली की मशहूर फर्म ‘एकेजी’ से खरीदे गए बेशकीमती प्रसाधन उपकरण और कीमती लकड़ी की बेहतरीन फर्श देखकर चमत्कृत जरूर हुए। सीबीआई ने उस समय आधिकारिक तौर पर यह कहा था कि प्रदीप शुक्ला को शीघ्र सम्मन किया जाएगा। इससे यह स्पष्ट हुआ था कि इस बार प्रदीप शुक्ला ने सीबीआई के सम्मन का सम्मान नहीं रखा तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। लेकिन न तो फिर से सम्मन जारी हो सका और न गिरफ्तारी की संभावना ही बनी।
सीबीआई के एक आला अधिकारी ने कहा कि अच्छा है एनआरएचएम घोटाले की जांच के लिए सीबीआई को कुछ और समय मिल गया। प्रदीप शुक्ला को गिरफ्तार कर लिया गया तो चार्जशीट भी दाखिल करनी होगी। घोटाला इतना बड़ा और विस्तृत है कि जांच में ही पसीने आ रहे हैं। फिर डॉ. वाईएस सचान की हत्या को आत्महत्या करार देने वाले ‘सर्टिफिकेट’ की तरह प्रदीप शुक्ला को भी क्लीन चिट क्यों नहीं दे देते? इस सवाल पर उक्त अधिकारी ने स्पष्ट कहा, ऐसा भी हो सकता है। दो-दो सीएमओ की हत्या के बाद गिरफ्तार किए गए डीप्टी सीएमओ डॉ. वाइएस सचान जेल में ही किस तरह मारे गए थे, यह सब लोग जानते हैं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से लेकर तमाम विशेषज्ञों ने साफ तौर पर यह माना था कि डॉ. सचान को जेल में नियोजित तरीके से मारा गया। लेकिन इन सब तथ्यों से अलग जाकर सीबीआई को यह कहते न देर लगी और न झिझक हुई कि डॉ. सचान ने जेल में आत्महत्या की थी, उनकी हत्या नहीं हुई थी। वजहें आईने की तरह साफ हैं...

नैतिकता का क्षय हो... नेता तेरी जय हो...

भारतीय लोकतंत्र की यही खासियत है कि सियासत के आगे सबकुछ धराशाई है। संविधान कानून नीति और नैतिकता सब राजनीतिपरक है, सत्ता-परक है। यह भारत की विशेषता है कि आजादी के बाद से आज तक बाहरी और आंतरिक प्रतिष्ठा बचाने में सेना अपनी कुर्बानी देती रही और नेता नौकरशाह उसका मान मर्दन करता रहा। यह भारत में ही होता है कि सेना अपमानित कर रखी जाती है। योद्धा का मनोबल कुचल कर रखना राजनीतिकों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए जरूरी होता है। सेना का मनोबल देश का मनोबल बढ़ाता है... यह बात अपने देश के लिए बेमानी है।
भारतीय सेना के मौजूदा अध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने अपनी जन्मतिथि का मसला अब क्यों उठाया और केंद्र सरकार ने 1951 के बजाय 1950 पर ही अपना अडिय़ल रवैया क्यों अख्तियार किया, जनरल सिंह न्याय पाने के हकदार ही नहीं थे या उनके इस अधिकार को तिकड़मों में जकड़ दिया गया, इस पर अब बहस की कोई जरूरत नहीं। ...और सुप्रीम कोर्ट के न्यायप्रिय रुख को देखते हुए इस पर कोई बात करने का औचित्य भी नहीं। आखिर सुप्रीमकोर्ट के ऊपर तो कुछ नहीं... तो न्याय-व्याय की बातों को यहीं पूर्णविराम दे दें!
बहस के बजाय वजह पर विचार करें तो तस्वीर साफ साफ साफ दिखती है। पूरे देश में हाई स्कूल का प्रमाणपत्र किसी भी व्यक्ति की जन्मतिथि का आखिरी निर्णायक दस्तावेज माना जाता है। यह मानक संवैधानिक है और इसी पर सम्पूर्ण कार्मिक प्रक्रिया चल रही है। सेना का मिलिट्री सेक्रेट्री ब्रांच भी इसे ही मानता है और इसीलिए जनरल वीके सिंह के मामले में वह 10 मई 1951 को ही उनकी असली जन्मतिथि मान कर चल रहा था। चलिए एक खास केस में केंद्र सरकार इसे नहीं मानती... तो सुप्रीमकोर्ट भी नहीं मानती...! जनरल सिंह को छोड़ कर बाकी दस लाख से अधिक फौजियों की जन्मतिथि का आधार तो वही हाईस्कूल सर्टिफिकेट ही होगा...! ठीक है, जनरल सिंह की जन्मतिथि पर वह मान्य नहीं होगा। क्योंकि थलसेना की पूर्वी कमान के जीओसी इन सी लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह को इसी बीच थलसेना का अध्यक्ष बनना है। लेफ्टिनेंट जनरल सरदार बिक्रम सिंह देश के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह की पसंद हैं। वजह यहां है, जिस पर बहस हो नहीं रही।
सत्ता-परक पसंद पर तो इसके पहले भी तमाम योद्धाओं की बलि ली जाती रही है। भारतीय सेना के अंग्रेज सेनाध्यक्ष जनरल रॉय बूचर से कमांडर इन चीफ का पद लेकर सेना को अपना नेतृत्व देने वाले जनरल केएम करियप्पा के योगदानों को भुलाकर उन्हें सेना के तीनों अंगों के कमांडर इन चीफ से हटा कर चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बना दिया गया था। ये वही जनरल करियप्पा थे, जिनके बेटे फ्लाइट लेफ्टिनेंट केसी नंदा को 1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने युद्धबंदी बना लिया था और पाकिस्तानी सेना के चीफ जनरल अय्यूब खान ने जनरल करियप्पा को फोन करके उनके बेटे को रिहा कर देने की पेशकश की थी। जनरल अय्यूब खान जनरल करियप्पा के जूनियर के रूप में काम कर चुके थे। जनरल करियप्पा ने अय्यूब खान की इस पेशकश को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि ‘वह मेरा नहीं देश का बच्चा है, अन्य युद्धबंदियों के साथ ही वह भी छूट कर आएगा अन्यथा नहीं आएगा।’ उस शख्सियत को कमांडर इन चीफ के पद से हटा कर चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बना दिया गया था और उन्हीं के सामने सेना को तीन टुकड़ों में तोड़ कर जवाहर लाल नेहरू ने उनकी मंशा पर आघात करने वाला बड़ा सवाल उछाल दिया था। 1986 में जनरल करियप्पा को फील्ड मार्शल का मानद पद देकर सत्ता पर बैठी कांग्रेस ने अपने कृत्यों पर पर्दा डालने की कोशिश की, लेकिन भारत के सीने पर लगा घाव कहीं अधिक गहरा है।
भारतीय सेना के अध्यक्ष जनरल केएस थिमैया के साथ भी तो ऐसा ही हुआ था। सेना में उनके गौरवशाली योगदान को नजरअंदाज करते हुए जवाहर लाल नेहरू की सरकार के रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन ने जनरल थिमैया के चीन से मुकाबले के ‘वार प्लान’ को खारिज कर दिया था। इससे आहत जनरल थिमैया ने सेनाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया। नेहरू ने पहले तो उनका मनोबल तोड़ा फिर कूटनीतिक तरीके से उनका इस्तीफा वापस कराया। नतीजा यही हुआ कि हम चीन से बुरी तरह हारे... लेकिन फिर भी नहीं सुधरे। याद रखें कि नेहरू सरकार के रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ही सेना की जीप खरीद के घोटाले में लिप्त थे।
अमृतसर में सिखों के पवित्र स्वर्ण मंदिर साहिब पर हमला करने की रणनीति बनाने से मना करने पर लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा सेनाध्यक्ष नहीं बनाए गए थे। सिखों के पवित्र स्वर्ण मंदिर पर हमला करने की योजना बनाने से मना करने और ऐसा करने से आगाह किए जाने की सजा उपसेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा को मिली और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके जूनियर अधिकारी को उनके ऊपर सेनाध्यक्ष के रूप में स्थापित करने की घोषणा कर दी। इस पर लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा ने बड़े विनम्र और मर्यादित तरीके से इस्तीफा दे दिया था। धर्म निरपेक्षता के राजनीतिक नारे पीटने वाली कांग्रेस ने उस समय भी एक संजीदा धर्म निरपेक्ष व्यक्ति की बलि ली थी।
भारतीय सेना ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है... जहां घोटालेबाज ऊंचा ओहदा पाते रहे, ओछी हरकतें करते रहे और सत्ता गलियारे में प्रतिष्ठा पाते रहे। करगिल के थोपे युद्ध के दोषी और अंडे बेचने के आरोपी दीपक कपूर को सेनाध्यक्ष बना दिया जाता है। श्रीलंका में भारतीय सेना को तमिल चीतों के हाथों पिटवाने वाले व्यक्ति डीएस चौहान को मध्य कमान का जीओसी इन सी बना दिया जाता है। ...और सैन्य आयुधों की आपराधिक हेराफेरी करने वाले आला अफसरानों   को उजागर करने वाले मेजर आनंद को हथकडिय़ों में जकड़कर जेल में ठूंस दिया जाता है। जनरल दीपक कपूर के घोटालों का भंडाफोड़ करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग को लखनऊ स्थानान्तरित कर सेनाध्यक्ष बनने से वंचित कर दिया जाता है। सुकना भूमि घोटाला और आदर्श अपार्टमेंट घोटाले को निर्णायक स्थितियों तक ला पहुंचाने वाले जनरल वीके सिंह को जन्मतिथि विवाद का तिकड़म रच कर नियोजित तरीके से निबटा दिया जाता है... यह भारत है और यही है हमारे देश की राजनीतिक-प्रशासनिक-न्यायिक व्यवस्था... हमें अब यही कहना चाहिए, नैतिकता का क्षय हो... नेता तेरी जय हो...

अब मंत्री जी ही देंगे डील की तफसील!

राज्य के कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की अकूत अनधिकृत सम्पत्ति की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश करने वाले लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा  को राजधानी लखनऊ के महंगे इलाके में हाल ही हुई दो-दो बड़ी डील के बारे में जानकारी है कि नहीं? इंडस्ट्रियल एरिया के विशाल भूखंडों को आनन-फानन रिहाइशी जमीन में तब्दील किए जाने और नौ सौ फ्लैटों वाले आलीशान अपार्टमेंट बनाने की मंजूरी दिए जाने की उन्हें जानकारी है कि नहीं? सैन्य क्षेत्र में आलीशान कोठी को गैरकानूनी तरीके से खरीदे जाने की उन्हें जानकारी है कि नहीं? तो उसकी विस्तृत जानकारी प्रस्तुत है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास अकूत सम्पत्ति है, इतनी ज्यादा कि जांच कराने में लोकायुक्त बेबस हैं। सम्पत्ति अर्जन में सिद्दीकी दम्पति दोनों बड़े मेधावी हैं। लोकायुक्त ने जैसे ही मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश की, वैसे ही सिद्दीकी की सम्पत्ति का आधिकारिक ब्यौरा जो उन्होंने विधान परिषद चुनाव के दौरान 2009 में दाखिल किया था वह फिर से सामने आया और तमाम उन सम्पत्तियों का लेखा-जोखा लिया जाने लगा जिनका जिक्र उनके चुनावी शपथ पत्र में नहीं है। लेकिन यह बात सामने नहीं आई कि राजधानी लखनऊ के महंगे इलाके में दो-दो कारखानों के विशाल भूखंड किन ताकतवर लोगों ने खरीदे और किनके प्रभाव से वहां का भूमि-उपयोग (लैंड यूज़) रातो-रात बदल डाला गया और उनमें से एक विशाल भूखंड पर 900 घरों का आलीशान अपार्टमेंट किनका बनने जा रहा है? आनन-फानन नक्शा भी कैसे पास हो गया? करोड़ों के लेन-देन में दो-दो कारखानों के विशाल भूखंड पर बनी बृहद संरचनाओं को तेज गति से ढहा दिया गया। प्रसंग इतने प्रभावशाली लोगों का है कि मोहम्मद मतीन नामके ठेकेदार को केवल मलबा हटाने का ठेका 27 लाख रुपए का मिला।
लखनऊ के ऐशबाग इंडस्ट्रियल एरिया में ‘नसीमुद्दीन सिद्दीकी एंड टीम’ की अभी हाल ही दो बड़ी डील्स हुईं। पहली जोरदार डील हुई ऐशबाग के सिंघल पेंट्स परिसर के विशाल भूखंड की। ऐशबाग पुल पार करते ही बाएं हाथ पर काफी पुराना सिंघल पेंट्स का कारखाना और उसका विशाल परिसर है। पिछले दिनों बड़े ही गोपनीय तरीके से इसकी खरीद-बिक्री हो गई। ऐशबाग पुल से उतर कर थोड़ा और आगे बढ़ें तो हरियाणा ऑयल मिल से लगा एक बड़ा कैंपस है... वह कैंपस भी खरीद लिया गया और वहां भी अपार्टमेंट बनने की तैयारी है। बेहद महंगे इलाके में बेहद गोपनीय तरीके से हुई खरीद-बिक्री के बाद आनन-फानन सिंघल पेंट्स परिसर को ढहाने का काम शुरू हो गया। लोगों को समझ में ही नहीं आया कि रातो-रात क्या हो गया। हरियाणा ऑयल मिल से लगे कैंपस में भी तोड़ाई शुरू हो गई। तभी ‘कैनविज टाइम्स’ ने फोटो भी करा ली और खोजबीन में उस विशाल भूखंड का ‘लैंड-यूज़’ बदल कर रिहाइशी किए जाने और 900 घरों का अपार्टमेंट बनाने की तैयारी का पता भी लगा लिया। किनके नाम पर खरीदी दिखाई गई ये सम्पत्तियां? यह नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही बताएंगे। या बताएंगे महानगर इलाके में मंदिर मार्ग पर रहने वाले सिंघल पेंट्स के स्वामी और हरियाणा ऑयल मिल्स के मालिक भसीन ब्रदर्स, जिन्होंने अपनी बेशकीमती सम्पत्तियां नसीमुद्दीन सिद्दीकी के हाथों बेचीं। जिस मतीन ठेकेदार को मलबे हटाने का ठेका मिला, उनके नसीमुद्दीन सिद्दीकी से पुराने सम्बन्ध हैं। लखनऊ से लेकर बांदा तक बेशकीमती लकडिय़ों की सप्लाई मतीन ने ही की हैं।
 बहरहाल, उस आलीशान कोठी के बारे में भी बात हो, जो लखनऊ छावनी के थिमैया रोड पर 12 नंबर कोठी या बिश्नोई कोठी के नाम से जानी जाती है। इस कोठी को नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी पत्नी हुस्ना सिद्दीकी के नाम से खरीदा। कहते हैं कि किन्हीं मीरा चौहान ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को 50 लाख रुपए में कोठी बेच दी। मीरा चौहान जब उस कोठी की मालकीन ही नहीं हैं तो वे उसे बेच कैसे सकती हैं? ये मीरा चौहान सेना की मध्य कमान के जीओसी इन सी रहे लेफ्टिनेंट जनरल डीएस चौहान की पत्नी हैं। चौहान परिवार ने सेना के बल पर 12 थिमैया रोड की उस बिश्नोई कोठी पर जबरन कब्जा कर लिया था और पहली बार किसी सेना कमांडर की पत्नी और दो-दो ब्रिगेडियरों के खिलाफ डकैती करने और जबरन घर पर कब्जा करने का मुकदमा दर्ज हुआ था। बाद में अदालती हस्तक्षेप के बाद उस कोठी पर बिश्नोई परिवार को दोबारा कब्जा हासिल हुआ। फिर मीरा चौहान ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी या उनकी पत्नी हुस्ना सिद्दीकी को वह कोठी कैसे और किस कानूनी अधिकार से बेच दी?
‘डिफेंस इस्टेट’ के आधिकारिक दस्तावेजों में कोठी की मालकीन के बतौर अब भी विमला बिश्नोई का नाम दर्ज है, जो स्वर्गवासी हैं। इस कोठी की ताजा फोटो देखिए... आपको साफ-साफ दिखेगा कि कोठी पर संदेह का साया है और भीतर कुछ चल रहा है...

Tuesday 21 February 2012

आपकी बंदूक और मेरा कंधा...

‘कैनविज टाइम्स’ का प्रकाशन 28 जनवरी से शुरू हुआ। लॉन्चिंग अखबार का पहला संपादकीय अग्रलेख...
फिर एक अखबार निकल रहा है। फिर एक संपादक विशेष संपादकीय लिख रहा है। लेकिन इस अग्रलेख को आप संपादकीय मत मानें और इसे लिखने वाले को न संपादक। भारी-भारी संज्ञाओं-शब्दावलियों-संबोधनों के कारण ही संपादकों का दिमाग सातवें आसमान पर उडऩे लगा है और आम आदमी उसकी निगाह में बहुत नीचे सतह पर कीड़े-मकोड़े की तरह दिखने लगा है। इस लेख में आपको फिर से... और फिर से दोहराई जाने वाली किस्म किस्म की सैद्धांतिक कलाबाजियां नहीं दिखेंगी, इसमें विरुदावलियां नहीं सुनाई देंगी आपको। फिर से बेमानी बौद्धेय का प्रदर्शन नहीं दिखेगा। फिर से घिसे पिटे थके रास्तों को रंग-रोगन से पोत कर नई लीक बनाने का मुगालता नहीं परोसा जाएगा। फिर से अखबार पढ़वाने के लिए आपके सामने शाब्दिक-पदार्थिक मायाबाजी का धोखाजाल नहीं बिछाया जाएगा। इस लिखे को आप अपनी बंदूक से दगी गोली का धमाका और मेरे कंधे का इस्तेमाल मानिएगा। संपादकों-पत्रकारों-नेताओं-नौकरशाहों-दलालों की साठगांठ ने समाज को दिग्भ्रमित करके रख दिया है, भटका दिया है... इसलिए पाठको, हम अपने अंदर उबलते-खौलते मौन को उड़ेलने के लिए कुछ साफ-सपाट शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, आप इसे दोहराए हुए शब्द मत मानिएगा, महसूस कीजिएगा कि हमारे शब्द हमारी आपकी आत्मा की तरह बिल्कुल मौलिक हैं, बिंदास हैं... घिसे-पिटे दोहराए-तिहराए नहीं।
‘कैनविज टाइम्स’ दैनिक अखबार के रूप में आपके सामने है... लेकिन आप इसे क्यों पढ़ें? आपके सामने कई और अखबार आते हैं, आ चुके हैं और आते रहेंगे, लेकिन आप इसे क्यों पढ़ते हैं? पढ़ते हैं या लेते हैं? कभी सोचा है आपने? यह बड़ा सवाल है, आप मंथन तो करें... इसका जवाब तो ढूंढें! देखिए, असलियत से नजरें बचाए बगैर अगर हम सही उत्तर का सामना करें तो हमारे मन से साफ आवाज आएगी कि हम कोई भी उपहार पा जाने के लिए अखबार खरीदते हैं और रद्दी में बेचने के लिए उसे संजो कर रख देते हैं, हम अखबार को उसके आत्मिक वजन के बजाय उसके भौतिकवजन से पहचानते हैं, यह सोचे बगैर कि हमारा सम्पूर्ण नागरिकीय अस्तित्व अखबार के बदले गिफ्ट और अखबार की कबाड़ से मिलने वाली कीमत के निहायत ही घटिया से तोलमोल में फंस कर रह गया है। हम अखबार पढ़ते नहीं, उस पर घिसटते हैं... चेतनाहीन चलन को चालू रखते हैं, नस्ल दर नस्ल। हम खुद को तो नष्ट कर ही चुके, भावी पीढिय़ों को भी सौदा-संस्कार के संसार में धकेल रहे हैं। कभी दो पेज का सादा अखबार हमारी नसों में अंगारे भर देता था, हमारे दिल-दिमाग को झंकृत कर रखता था और देश-समाज के सकारात्मक परिवर्तन में हमारी भूमिकाएं अदा करा लेता था, लेकिन आज रंगीन पेजों से भरपूर अखबार हमें बर्फ बना रहे हैं, हमारे दिल-दिमाग को काठ मार रहे हैं, समाज हमारे आपके होते हुए गर्त की तरफ जा रहा है, पर हम कुछ कर नहीं पा रहे... क्यों? कभी सोचते हैं आप इस फर्क के बारे में? यदि नहीं सोचते तो आप यह लेख मत पढ़ें... और यदि सोचते हैं तो केवल सोचें नहीं...
अखबार ऐसा जो सटीक लक्ष्य साध सके। पत्रकार और संपादक ऐसा जो आपका मित्र भी हो और आपकी सुरक्षा में उठा हथियार भी। अखबार ऐसा जो आपको भेड़ों की भीड़ का हिस्सा बनने से रोके। अखबार ऐसा जो सुबह जीता-जागता आपके हाथों तक पहुंचे और आपको जाग्रत कर दे, जीवंत बना दे। अखबार ऐसा जो आपकी मूर्छा तोड़े और अनैतिकता के खोखले तिलस्म से खींच कर यथार्थ की कठोर जमीन पर ला पटके। अखबार ऐसा जो आपके पूरे व्यक्तित्व में, समाज में, सरोकारों में सत्य और साहस की प्राकृतिक सुगंध भर दे... लेकिन ऐसा अखबार बनाएगा कौन? यह सवाल सामने है। आपने देश बनाया, तो देश का हाल सामने है। आपने समाज बनाया, तो उसकी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं। आपने सियासतदानों को बनाया, तो उन्होंने देश-समाज को नाबदान बना डाला और पूरा लोकतंत्र, सम्पूर्ण तंत्र और समग्र मीडिया उस गंदे नाबदान में जाकर घुस गया, उसी में बस गया... तो कौन बनाएगा हमें खबरदार करने वाला अखबार? ...और समझेगा कौन कि कौन कर रहा हमें खबरदार और कौन बना रहा हमें खरीदार? 
विज्ञान के विकास ने सूचनाओं का रास्ता सुगम कर दिया है। खबरें घटना के साथ ही आपका दरवाजा खटखटाने लगती हैं। सुबह अखबार में आपको सारी खबरें जानी-सुनी-देखी लगती हैं। लेकिन क्या आपको लगता है कि खबरें जो आपने जानी-सुनी-देखीं उससे काम चल गया? क्या शाम को टीवी पर दिखी और सुबह अखबार में छपी खबरें आपके दिमाग का सांकल खडख़ड़ाने में सक्षम होती हैं? भ्रष्टाचार पर बहस आयोजित कराते या करातीं दागदार-शानदार पत्रकार/पत्रकारा और उसमें बात-बहादुरी करते भ्रष्टधन्य चेहरे क्या आपकी विचार-धारा को सुगबुगाते हैं? नैतिकधन में दो कौड़ी के लोगों के अखबारों में छपे लेख क्या आपको असली आजादी के रास्ते की तरफ ले जाते हुए दिखते हैं? फिल्म अभिनेत्रियों के गर्भवती होने की सुर्खियां और आम गर्भवती महिलाओं की सड़क छाप मौतों के प्रति शातिराना उपेक्षा, बार गर्ल की हत्या पर चिल्लपों और न्याय के लिए कानून के दरवाजे पर जिंदगी घिस देती महिलाओं के प्रति आपराधिक मौन, मॉडल के वस्त्र खिसक जाने पर उसे और उघारने का मीडियाई जतन, घपले-घोटालों के सबूत मिटाए जाने की तसल्लीदार मुहलत बख्श दिए जाने के बाद होने वाले प्रायोजित खुलासे, घूस लेकर बड़े-बड़े आकार में छापी जाने वाली खबरों से टुच्चे नेताओं का महिमामंडन, बुंदेलखंड की राजनीति पर खबरों की भरमार लेकिन बुंदेलखंड की भुखमरी पर पाखंड, प्रदेश को खंडित किए जाने के तिकड़मों को तरजीह लेकिन समाज को जोडऩे की पहल पर शून्य... आम आदमी की घनघोर उपेक्षा भी और आम आदमी से ही फरेब! यदि इसे ही आप अखबार मानते हैं और ऐसा करने वालों को ही पत्रकार... तो हम ऐसे पत्रकार और ऐसा अखबार होने से इन्कार करते हैं।
हम तो मानते हैं कि शब्द में इतनी ताकत है कि समाज के किसी भी बदनुमा चेहरे को भौतिक तौर पर तमाचा मारने की जरूरत नहीं। शब्द बिगुल की तरह बजते हैं और महाभारत रच देते हैं। पर इसके लिए जरूरी है कि शब्द कृत्रिम न हों, प्रायोजित न हों, भ्रष्ट न हों, नकारात्मक न हों... शब्द तब ब्रह्म है... 
कोई अखबार चलो ऐसा भी बनाया जाए
शब्द को ब्रह्म की तरह उसमें बसाया जाए...

Sunday 19 February 2012

कैसा अनुष्ठान? किनके लिए मतदान?

...ख्वाबों के खुले आसमान पर
उड़ते थे जो चाहत के अबाबील
बिंधे परिंदे के मानिंद गिरा तडफ़ड़ाया लगता है
जनपथ पर दिखते हैं
हर जगह जो खून के धब्बे
लोकतंत्र का हर खंभा
तेजाब में नहाया लगता है
ये उजले कपड़ों में लिपटा झुंड
जो यहां वहां हर तरफ नुमाया होता है
बाअदब बोलिए जंगल के इस राज का ये सरमाया लगता है
पत्थरों में सजता कोई और है
भट्ठियों में भुनता कोई और है
मरता है खेतों में बोकर वो पसीने की बूंदों के बीजख्वाबों के खुले आसमान पर, कूटता कोई और, लूटता कोई और, चुगता कोई और है...ये अजीब सा दौर है
बिंधे परिंदे के मानिंद गिरा तडफ़ड़ाया लगता है, हर शख्स भरमाया लगता है...

...मतदान को पवित्र कर्म बताने और ज्यादा से ज्यादा वोट डालने के आह्वान का जो लगातार अभियान चल रहा है, उससे सतर्क रहें। यह धोखेबाजी का प्रायोजित प्रहसन है। ज्यादा से ज्यादा मतदान वे करें जो महंगाई से टूट रहे हैं, जो नेताओं के घोटालों से त्रस्त हैं, जिनके पास सम्पत्ति की सुरक्षा का कोई औचित्य नहीं, जिनके पास जान की हिफाजत का कोई अधिकार नहीं, जो नेता से पुलिस से और गुंडों आक्रांत हैं! ज्यादा से ज्यादा मतदान करने के आह्वान वाला अभियान उन करोड़ों बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए भी है, जो इन्हीं नेताओं और व्यवस्थापकों की कृपा से भारत के पक्के नागरिक बने बैठे हैं, जितने पक्के हम आप भी नहीं। तो किनका मतदान? किनके लिए मतदान? आचार संहिता का डंडा भांजने वाले चुनाव आयोग के अधिकारियों से कभी पूछा आपने? मतदान के लिए अपील करने वाली फंडेडसंस्थाओं से कभी पूछा आपने? दरवाजे-दरवाजे वोट मांगने वाले नेताओं से कभी पूछा, कभी मांगा इसका जवाब? नेताओं को नागरिकों से मतलब नहीं
आपने कभी यह जानने की कोशिश की कि उन्हें केवल गिनती से मतलब है। आप इस मुगालते में न रहें कि आप नागरिक हैं... आप बस केवल एक संख्या हैं, अंग्रेजी में काउंट हैं। भारत की जनसंख्या को भोंदू भीड़ में तब्दील करने की साजिश है, जो एक फर्जी मशीन का बटन दबाएगी और सत्ता बनवाने का सुखद भ्रम लेकर अपनी बोझिल जिंदगी काट लेगी। वह हर बार बटन दबाएगी और हर बार घपले-घोटाले का रास्ता खोलेगी, हर बार चोरों के हाथों सरकारी खजाने की चाभियां देगी और हर बार चोर-हजरतों को हसरतों से देखेगी... फिर चुनाव आने तक। आप गिनिए कितने चुनाव आपने देख लिए, कितने चुनावों में आपने अपने पवित्र मताधिकार का प्रयोग किया और कितनी पवित्रता से नेताओं ने देश को, लोकतंत्र को, संसद को, विधानसभाओं को अपवित्र किया। आप मतदाता हैं तो कुछ बातों पर गंभीरता से सोचते हैं कि नहीं? क्या आप सोचने लायक रह गए हैं? जबसे देश में काले धन को वापस लाने की मांग ने देशव्यापी मानस बनाना शुरू किया और यह पूरे देश में सड़कों पर विद्रोह की शक्ल में दिखने लगा... वोट के बूते सत्ता में आने वाले परजीवियों को अपना भविष्य खतरे में दिखने लगा। मतदान और मताधिकार के औचित्य पर ही सवाल गहराने लगा तो साजिशें शुरू हो गईं। नेताओं के कुकृत्यों से वोट के प्रति सृजित हुए नफरत को मतदान-प्रेम में बदलने का प्रायोजन शुरू हो गया। चुनाव आयोग हो या नौकरशाही, सब देश की सडिय़ल सियासत का ही तो प्रतिउत्पाद हैं... सब एक साथ हुआं-हुआं में शामिल हो गए। क्योंकि इसी हुआं-हुआं से पूंजी सिडिकेटों का धंधा चलता है और उनके जूठन से नेताओं का पेट पलता है। पवित्र मतदानके पवित्र उपकरणइलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (इवीएम) को तकनीकी तौर पर धोखाधड़ी की मशीन साबित करने वाले मेधावी इंजीनियर हरिकृष्ण प्रसाद को गिरफ्तार क्यों किया गया था? वह आज किस हाल में है? जिंदा भी है कि नहीं? हैदराबाद के उस इंजीनियर ने अपने दो अन्य विदेशी इंजीनियरों की मदद से यह साबित कर दिया था कि इवीएम में मर्जी का परिणाम फीड किया जा सकता है। उसकी प्रोग्रामिंग में फेरबदल की जा सकती है। आप किसी भी बटन को दबाएं, प्रोग्रामिंग के मुताबिक निर्धारित प्रत्याशी के खाते में ही वोट जाएगा। यह भी साबित हुआ कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का कंट्रोल कहीं से हैक किया जा सकता है या रिमोट से संचालित किया जा सकता है। नौकरशाही और चुनाव आयोग के अधिकारियों ने मिल कर इंजीनियर हरिकृष्ण प्रसाद की गिरफ्तारी का कारण एक मशीन की चोरी बताया। लेकिन इंजीनियर ने जो खुलासा किया था, उस पर किसी की जुबान नहीं खुली... न नेता बोला, न नौकरशाह... विडंबना देखिए कि हैदराबाद के सॉफ्टवेयर इंजीनियर हरिकृष्ण प्रसाद ने अमेरिका के मिशीगन विश्वविद्यालय के कम्प्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर अलेक्स हाल्डरमैन और हॉलैंड के सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ रॉबर्ट वी. गौंगरिप के साथ मिल कर भारत की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की सार्थकता और सत्यता की तकनीकी जांच-परख की थी और उसे फर्जी साबित किया था। ऐसे इंजीनियर को चोर साबित कर दिया गया। आप समझ ही रहे हैं कि कौन चोर है। आप इन सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की फाइंडिंग रिपोर्ट पढ़ें तो हैरत करेंगे, आप समझेंगे कि वोट लूटने की बस पद्धति ही बदली है और यह अहसास भी होगा कि हम आप किस किस तरह और कितने कितने तरीके से बेवकूफ बनते रहे हैं...