Friday, 9 October 2026

किस पर शर्म करें?


प्रभात रंजन दीन 

विधानसभा/विधान परिषद नियुक्ति घोटाला अत्यंत गंभीर मसला है... इस पर कुछ-कुछ कोनों से लगातार आवाज उठ रही है, लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की आवाज के अतिरिक्त कुछ नहीं साबित हो रही। सरकार की खाल पर कोई असर नहीं है। विधानसभा में फर्जी नियुक्तियों का घोटाला समाजवादी पार्टी की सरकार के काल से शुरू हुआ, जब मुलायम-पुत्र अखिलेश यादव विरासती मुख्यमंत्री बन कर सत्ता पर बैठे। विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय और विधानसभा के सचिव प्रदीप दुबे घोटाले में आकंठ लिप्त थे। विधानसभा नियुक्ति घोटाले की खबरें 'चौथी दुनिया' में क्रमवार प्रकाशित हुईं, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। स्पष्ट है कि अखिलेश यादव की सरकार उस घोटाले में लिप्त थी। उसके बाद सरकार बदली। योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। योगी के सत्ता संभालने के तुरंत बाद मैं मुख्यमंत्री से मिलने गया, उन्हें बधाई दी, उन्हें कुछ किताबें भेंट की, उन्हें एक नायाब कलम (उस ऐतिहासिक कलम के बारे में फिर कभी बताऊंगा) भेंट की और उनसे यह आह्वान किया कि न्याय के दस्तावेज पर इस कलम से हस्ताक्षर करिएगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष मैंने विधानसभा में चल रहे नियुक्ति-घोटाले का मसला उठाया और उन्हें  'चौथी दुनिया' की प्रतियां भी दिखाईं। हालांकि, योगी आदित्यनाथ ने उस समय कहा कि यह खबरें उनके संज्ञान में हैं। योगी के शासनकाल में हृदय नारायण दीक्षित विधानसभा अध्यक्ष हो गए थे। दीक्षित जी से यह उम्मीद थी कि वे विधानसभा नियुक्ति-घोटाले की जांच कराएंगे, घोटाला रोकेंगे और घोटालेबाज सचिव प्रदीप दुबे को विधानसभा से बर्खास्त करेंगे। लेकिन यह नैतिक कर्म करने के बजाय हृदय नारायण दीक्षित भी विधानसभा और विधान परिषद में होने वाली नियुक्तियों में मुब्तिला हो गए। आप समझ गए न कि मैं हृदय नारायण दीक्षित के बारे में क्या कह रहा हूं..!

खैर, मैंने भाजपा संगठन के (उस समय के) सर्व-शक्तिमान नेता सुनील बंसल का साक्षात्कार (पूरा पेज) 'चौथी दुनिया' में छापा। मैंने प्रदेश भाजपा के दफ्तर जाकर 'चौथी दुनिया' की प्रति उन्हें भेंट की, जबकि उन्होंने दिल्ली में ही अपना छपा इंटरव्यू पढ़ लिया था। बड़े प्रसन्न थे। मैंने उनसे कहा कि 'चौथी दुनिया' की यह प्रति मैं इस मांग और अपेक्षा के साथ लाया हूं कि आप विधानसभा के नियुक्ति घोटाले पर सरकार को संज्ञान लेने को कहेंगे। तब प्रदेश भाजपा दफ्तर के ऊपर वाले माले पर स्थित सुनील बंसल के कक्ष में केशव प्रसाद मौर्य भी आ गए और वे भी हमलोगों की बातचीत के साक्षी बने। सुनील बंसल ने कहा कि वे अभी ही मुख्यमंत्री से मिलने जा रहे हैं। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया कि वे विधानसभा नियुक्ति-घोटाले के बारे में मुख्यमंत्री से चर्चा करेंगे। लेकिन सत्ता के दो शीर्ष महानुभावों के बीच हुई वार्ता का नतीजा क्या निकला? इसे आगे सुनिए...

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक दिन अचानक हुई मुलाकात में मैंने उनसे फिर विधानसभा नियुक्ति घोटाले के बारे में पूछा। सीएम योगी ने कहा, मैंने विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जांच का आदेश दे दिया है। ऐसा कहते हुए वे आगे निकल गए। मुझे भी संतोष मिला और उम्मीद बढ़ी कि घोटालेबाजों पर कानूनी कार्रवाई हो पाएगी। लेकिन क्या हुआ जानते हैं? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जांच उसी अधिकारी को दे दी जो घोटाले में लिप्त था। सीएम योगी ने चोर को ही कोतवाल बना दिया। यह था भ्रष्टाचार के खिलाफ योगी सरकार के ज़ीरो-टॉलरेंस के बहु-प्रचारित ग्रंथ का पहला अध्याय। घोटालेबाज जांच अधिकारी प्रदीप दुबे ने जांच की लीपापोती कर दी और इस लीपापोती के एवज में योगी सरकार ने उसे तरक्की भी दी और उसे नौकरी में लगातार एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन भी मिलता जा रहा है। इस आपराधिक गठजोड़ में भाजपाई विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित भी शामिल रहे। प्रदीप दुबे का कार्यकाल अर्सा पहले ही समाप्त हो जाता, लेकिन योगी सरकार उसी भ्रष्ट, घोटालेबाज और अनैतिक व्यक्ति पर अपना आशीर्वाद बनाए हुई है और उसे संरक्षण दे रही है।

...इस घोटाले पर अदालतों ने क्या किया? सरकार और विधायिका की दो-नंबरी कार्यप्रणाली तो आपने देख ली... न्यायपालिका की कार्यप्रणाली वो सभी युवक भुगत रहे हैं, जो अदालतों का दरवाजा खटखटाते-खटखटाते थक गए और बुजुर्ग हो गए। ये है लोकतंत्र के तीन स्तम्भों का कमाल। अब आते हैं चौथे स्तम्भ यानि पत्रकारिता पर... विधानसभा/विधान परिषद में हुआ और हो रहा नियुक्ति घोटाला प्रकाशित करना क्या कुछ अखबारों के लिए ही नैतिक दायित्व था? क्या बाकी अखबारों, समाचार चैनलों और अन्य मीडिया संस्थानों के लिए यह विषय महत्वपूर्ण नहीं था? क्या सम्पूर्ण मीडिया द्वारा इस अत्यंत महत्वपूर्ण मसले को मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए था? इस मसले को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने का प्राथमिक पत्रकारीय दायित्व क्या समग्रता और सामूहिकता से नहीं निभाना चाहिए था? किस पर शर्म करें? सरकार पर? विधायिका पर? न्यायपालिका पर? या पत्रकारिता पर?

Sunday, 27 September 2026

दलाई लामा के बाद.. क्या आपस में ही टकराएंगे तिब्बती बौद्ध और अंबेडकरवादी बौद्ध?


भारत में तिब्बती बौद्धों और अंबेडकरवादी बौद्धों के बीच वर्चस्व को लेकर खींचतान बढ़ती जा रही है। इसे भारत सरकार भी बढ़ावा दे रही है। भारत सरकार के बढ़ावा देने के पीछे सियासत भी है और कूटनीति भी है। तिब्बती बौद्ध भारत के मतदाता नहीं हैं, लेकिन अंबेडकरवादी बौद्ध भारत के नागरिक हैं, मतदाता हैं और दलित जाति से धर्मांतरित हैं। उनकी आस्था बाबा साहेब अंबेडकर में है। गौतम बुद्ध को मानने वाले तिब्बती बौद्धों के धर्मगुरु दलाई लामा (तेनज़िन ग्यात्सो) में अंबेडकरवादी बौद्धों की आस्था नहीं है। अभी हाल ही में दिल्ली में ब्रिक्स देशों का जो सम्मेलन हुआ, उसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच भारत-चीन सम्बन्धों को लेकर विषद वार्ता हुई। भारत और चीन के बीच शीर्ष प्रतिनिधिमंडल स्तर की भी बातचीत हुई। मोदी-जिनपिंग के बीच हुई ‘क्लोज़-डोर-मीटिंग’ की जो थोड़ी बहुत सूचनाएं विदेश मंत्रालय से जुड़े कुछ अधिकारियों से छन कर आईं, वह तिब्बदी बौद्धों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ाने वाली सूचनाएं हैं।

तिब्बती बौद्धों के धर्मगुरु दलाई लामा 91 वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं। दलाई लामा की विरासत संभालने के लिए चुने जाने वाले उत्तराधिकारी पर चीन की निगाह लगी है। चीन चाहता है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी तिब्बत यानि चीन में चुना जाए, जबकि दलाई लामा चाहते हैं कि उनका उत्तराधिकारी भारत में चुना जाए। तिब्बती बौद्धों के धर्मगुरु का चयन पुनर्जन्म के पराभौतिकीय विचार के आधार पर होता है। चीन भारत पर दबाव डाल रहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकार चयन की भारत में होने वाली प्रक्रिया को मान्यता न दे, ताकि दलाई लामा के उत्तराधिकारी चीन के अधिकारक्षेत्र में रहें और तिब्बत का विवाद खत्म हो। भारत सरकार इसी दुविधा में है। चीन के दोमुंहेपन का बार-बार अनुभव ले चुकी भारत सरकार संशय में है कि चीन के अधिकारक्षेत्र वाले उत्तराधिकारी दलाई लामा के बाद भारत-चीन सीमा विवाद स्थायी रूप से सुलझेगा या अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख पर चीन का दबाव और बढ़ जाएगा। मामला यहीं फंसा है। शी जिनपिंग के राजकीय रात्रिभोज में शरीक न होने और मुंह फुलाने की असली वजह इसे ही माना जा रहा है... इसके बाद ही शी जिनपिंग ‘डगरे का बैगन’ स्वभाव के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से गलबहियां करने चले गए और उनके राजकीय भोज में शरीक होकर भारत को मुंह चिढ़ाया।
बहरहाल, दलाई लामा के बाद तिब्बती बौद्धों का धर्मगुरु चीन के अधिकारक्षेत्र वाला हुआ तो भारत में तिब्बती बौद्ध प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण, आधिपत्य और वर्चस्व को लेकर तिब्बती बौद्धों और अंबेडकरवादी बौद्धों के बीच टकराव बढ़ेगा। जो तनातनी फिलहाल सैद्धांतिक दावे-प्रतिदावे की शक्ल में है, वह ताल ठोकने की स्थिति में आ जाएगा। इस पर राजनीतिक प्रलोभनों की मारी भारत सरकार अंबेडकरवादी बौद्धों का साथ देगी, क्योंकि वे भारत के अच्छी-खासी संख्या वाले वोटर हैं। भारत के दलित समुदाय के हिंदू, ईसाई और सिख भी अंबेडकरवादी बौद्धों के साथ ही खड़े नजर आएंगे... इसलिए भारत सरकार इन्हें नाराज नहीं कर पाएगी, भले ही मानवीय सिद्धांतों, धार्मिक निष्पक्षता और शरणागत तिब्बती समुदाय के हितों को ताक पर क्यों न रख देना पड़े। लेकिन इसके लिए अब अधिक समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी...

इसी मसले पर जम्मू-कश्मीर से प्रकाशित एवं जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पंजाब और दिल्ली तक प्रसारित अंग्रेजी अखबार ‘डेली एक्सेलसियर’ (जिसका मैं स्टाफर भी हूं), में मेरा यह शोध-लेख प्रकाशित हुआ है। मैंने अपने विचार के साथ यह शोध-लेख सोशल-मीडिया पर आपके समक्ष इसलिए डाला कि यह विषय गंभीर चर्चा के उपयुक्त है। विमर्श में आए विचारों से देश के प्रधानमंत्री को भी अवगत कराना उतना ही आवश्यक है। ...तो आएं इस विषय पर अपने तार्किक और तथ्यात्मक विचारों के साथ हमलोग बातचीत शुरू करें और इसके पूर्णता पर पहुंचने के उपरांत एक स्मार-पत्र तैयार कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संज्ञानार्थ प्रेषित कर दें... शुभकामनाएं 🙏 प्रभात रंजन दीन Note: आपलोग मूल लेख पढ़ना चाहें तो इस लिंक के जरिए 'डेली एक्सेलसियर' तक जा सकते हैं... https://www.google.com/url?rct=j&sa=t&url=https://www.dailyexcelsior.com/uncertainty-over-the-future-of-tibetan-buddhism-after-the-dalai-lama/&ct=ga&cd=CAEYACoTNTg2MDYxODI3ODMzNDc0NDk3MjIaN2I0ZmYwY2Y5NzEyODU3YTpjb206ZW46VVM&usg=AOvVaw116JXswEBIyK30eTk1JidZ

Thursday, 10 September 2026

भाजपा कर रही दलित नेता का अपमान : आत्म-सम्मान रैली से बौखलाई भाजपा


दलितों और आदिवासियों की रहनुमा होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी की असलियत कुछ और है। भाजपा के नेता अपनी ही पार्टी के दलित नेता का लगातार अपमान कर रहे हैं। भाजपा के दो-दो बार सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे दलित नेता कौशल किशोर को जनप्रिय होने का खामियाजा अपनी ही पार्टी के नेताओं से भुगतना पड़ रहा है और लगातार अपमानित होना पड़ रहा है। भाजपा नेताओं की सिद्धांत-विरोधी हरकतों से आजिज दलित नेता को स्वाभिमान बचाओ रैली और आत्म-सम्मान रैली का आयोजन करना पड़े तो भाजपा नेतृत्व के लिए इससे अधिक शर्मनाक बात और क्या होगी। दलित नेता का किया जा रहा अपमान अब व्यापक विरोध की शक्ल लेने लगा है। 13 सितंबर को लखनऊ में प्रेरणा स्थल पर हजारों लोग आत्म-सम्मान की हुंकार करेंगे। एक दलित नेता के अपमान का विरोध आजादी के बाद से लेकर अब तक आम जनता और देश को आजाद कराने के लिए शहादत देने वाले क्रांतिकारियों के अपमान को जोड़ेगा और सिस्टम के समेकित सुधार के अगले आंदोलन की घोषणा में परिवर्तित होगा। आत्म-सम्मान रैली के मंच से उसी दिन एक और जोरदार आंदोलन की घोषणा होगी। इस रैली को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर से विस्तार से बात हुई। आप भी सुनें इस कद्दावर दलित नेता के खिलाफ भाजपा के नेताओं द्वारा की जा रही शर्मनाक हरकतों के बारे में और समझें भाजपा के सैद्धांतिक चोले के अंदर कितना घिनौना चरित्र छुपा है... वाकई, इस देश में न कोई शासन है, न कोई तंत्र... यह है आम के खिलाफ खास का षडयंत्र...

Monday, 31 August 2026

जंतर-मंतर कांड : सांस्कृतिक एवं चारित्रिक हादसा

                               https://youtu.be/moJuzOlgAgQ

कानून विशेषज्ञ ने कहा :  जेन-जी भाजपा का उत्पाद

नेपाल में हुई घटना प्राकृतिक हादसा है, लेकिन पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर हुई अशोभनीय घटना सांस्कृतिक और चारित्रिक हादसा थी। छात्र आंदोलन के नाम पर जिस तरह अ-छात्र हरकतें हुईं, जिस तरह अश्लीलता, गाली-गलौज, अभद्रता और उद्दंडता का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ और अशालीन हरकतों को जिस तरह दुर्बुद्धिजीवियों ने उकसाया और संरक्षण दिया, उसने देश-समाज को भीषण अंधकार से भरे भविष्य की ओर धकेलने का काम किया है। जंतर-मंतर की घटना तथाकथित सभ्य और बौद्धिक समाज के चारित्रिक, नैतिक और संस्कारिक स्खलन की दुर्भाग्यपूर्ण तारीख के रूप में दर्ज हुई है। इस घटना ने इस विमर्श का रास्ता खोला है कि यह देश क्या नस्लदूषित चरित्रदूषित दुर्बुद्धिजीवियों, दुर्गतिगामी प्रगतिशीलों, सोलह कलाओं में माहिर कलाकारों, अराजकता और अश्लीलता से भरे अशिक्षित अ-छात्र समुदाय का देश बन जाएगा? जंतर-मंतर की घटना जिसे हम हादसा कह सकते हैं, उसने हमारे समक्ष असली और नकली का भेद साफ-साफ तौर पर उजागर किया है। इस गंभीर मसले पर हम देश के ‘असली’ बुद्धिजीवियों, ‘असली’ पत्रकारों, ‘असली’ समाजसेवियों और ‘असली’ कलाकारों से सार्थक विमर्श का सिलसिला शुरू कर रहे हैं... यह विचार-अभियान की तरह चलेगा... अपने देश भारतवर्ष की उत्कृष्ट संस्कृति और उन्नत परंपरा को सुरक्षित-संरक्षित रखते हुए विकास-यात्रा के हामी समझदार और जागरूक नागरिकों से आग्रह है कि वे भी इस विमर्श में शामिल हों और इसे विचार आंदोलन की तरह आगे बढ़ाएं... आप सबने जंतर-मंतर की घटना के बाद प्रस्तुत कार्यक्रम देखे। पहला कार्यक्रम दुराग्रह के जीतने और सत्याग्रह के पराजित होने के दुखद प्रसंग पर था। दूसरा कार्यक्रम सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति सूर्यकांत के त्वरित संज्ञान के लिए प्रेषित किया गया और उनसे आग्रह किया गया कि वे इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकृत करें और उचित विधिक कार्रवाई सुनिश्चित करें। तीसरी प्रस्तुति देश के प्रख्यात पत्रकार और लेखक विकास कुमार झा से हुए विमर्श पर आधारित थी। चौथे कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार एवं पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की अध्यक्षा प्रोफेसर डॉ. मंगला रानी से हुई बातचीत आपके समक्ष प्रस्तुत की गई। इस विचार अभियान में आगे बढ़ते हुए आप सुनेंगे वरिष्ठ अधिवक्ता एवं विधि विशेषज्ञ अशोक पांडेय के विचार। अशोक पांडेय के साथ हुआ विमर्श काफी दिलचस्प है, आप भी सुनें और अपनी प्रतिक्रिया से जरूर अवगत कराएं... नमस्कार

Saturday, 29 August 2026

जारी है जंतर-मंतर ‘षडयंतर’..!

                                              

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर छात्र आंदोलन के नाम पर जिस तरह अ-छात्र हरकतें हुईं, जिस तरह अश्लीलता, गाली-गलौज, अभद्रता और उद्दंडता का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ और अशालीन हरकतों को जिस तरह दुर्बुद्धिजीवियों ने उकसाया और संरक्षण दिया, उसने देश-समाज को भीषण अंधकार से भरे भविष्य की ओर धकेलने का काम किया है। जंतर-मंतर की घटना तथाकथित सभ्य और बौद्धिक समाज के चारित्रिक, नैतिक और संस्कारिक स्खलन की दुर्भाग्यपूर्ण तारीख के रूप में दर्ज हुई है। इस घटना ने इस विमर्श का रास्ता खोला है कि यह देश क्या नस्लदूषित चरित्रदूषित दुर्बुद्धिजीवियों, दुर्गतिगामी प्रगतिशीलों, सोलह कलाओं में माहिर कलाकारों, अराजकता और अश्लीलता से भरे अशिक्षित अ-छात्र समुदाय का देश बन जाएगा? जंतर-मंतर की घटना जिसे हम हादसा कह सकते हैं, उसने हमारे समक्ष असली और नकली का भेद साफ-साफ तौर पर उजागर किया है। इस गंभीर मसले पर हम देश के ‘असली’ बुद्धिजीवियों, ‘असली’ पत्रकारों, ‘असली’ समाजसेवियों और ‘असली’ कलाकारों से सार्थक विमर्श का सिलसिला शुरू कर रहे हैं... यह विचार-अभियान की तरह चलेगा... अपने देश भारतवर्ष की उत्कृष्ट संस्कृति और उन्नत परंपरा को सुरक्षित-संरक्षित रखते हुए विकास-यात्रा के हामी समझदार और जागरूक नागरिकों से आग्रह है कि वे भी इस विमर्श में शामिल हों और इसे विचार आंदोलन की तरह आगे बढ़ाएं... आप सबने जंतर-मंतर की घटना के बाद प्रस्तुत दो कार्यक्रम देखे। पहला कार्यक्रम दुराग्रह के जीतने और सत्याग्रह के पराजित होने के दुखद प्रसंग पर था। दूसरा कार्यक्रम सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति सूर्यकांत के त्वरित संज्ञान के लिए प्रेषित किया गया और उनसे आग्रह किया गया कि वे इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकृत करें और उचित विधिक कार्रवाई सुनिश्चित करें। तीसरी प्रस्तुति देश के प्रख्यात पत्रकार और लेखक विकास कुमार झा से हुए विमर्श पर आधारित थी। इस विचार अभियान को आगे बढ़ाते हुए चौथे कार्यक्रम में आपके समक्ष प्रस्तुत है प्रसिद्ध साहित्यकार एवं पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की अध्यक्षा प्रोफेसर डॉ. मंगला रानी से हुई बातचीत... आप सब इसे सुनें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं। आपकी प्रतिक्रिया अगले विमर्श में शामिल हो सकती है... नमस्कार

Tuesday, 25 August 2026

शर्म-हया सब छू-मंतर... शोक में डूबा जंतर-मंतर..!

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर छात्र आंदोलन के नाम पर जिस तरह अ-छात्र हरकतें हुईं, जिस तरह अश्लीलता, गाली-गलौज, अभद्रता और उद्दंडता का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ और इन अशालीन हरकतों को जिस तरह दुर्बुद्धिजीवियों ने उकसाया और संरक्षण दिया, उसने देश-समाज को भीषण अंधकार से भरे भविष्य की ओर धकेलने का काम किया है। जंतर-मंतर की घटना तथाकथित सभ्य और बौद्धिक समाज के चारित्रिक, नैतिक और संस्कारिक स्खलन की दुर्भाग्यपूर्ण तारीख के रूप में दर्ज हुई है। इस घटना ने इस विमर्श का रास्ता खोला है कि यह देश क्या नस्लदूषित चरित्रदूषित दुर्बुद्धिजीवियों, दुर्गतिगामी प्रगतिशीलों, सोलह कलाओं में माहिर कलाकारों, अराजकता और अश्लीलता से भरे अशिक्षित अ-छात्र समुदाय का देश बन जाएगा? जंतर-मंतर की घटना जिसे हम हादसा कह सकते हैं, उसने हमारे समक्ष असली और नकली का भेद साफ-साफ तौर पर उजागर किया है। इस गंभीर मसले पर हम देश के ‘असली’ बुद्धिजीवियों, ‘असली’ पत्रकारों, ‘असली’ समाजसेवियों और ‘असली’ कलाकारों से सार्थक विमर्श का सिलसिला शुरू कर रहे हैं... यह विचार-अभियान की तरह चलेगा... अपने देश भारतवर्ष की उत्कृष्ट संस्कृति और उन्नत परंपरा को सुरक्षित-संरक्षित रखते हुए विकास-यात्रा के हामी समझदार और जागरूक नागरिकों से आग्रह है कि वे भी इस विमर्श में शामिल हों और इसे विचार आंदोलन की तरह आगे बढ़ाएं... आप सबने जंतर-मंतर की घटना के बाद प्रस्तुत दो कार्यक्रम देखे। देश के प्रख्यात पत्रकार और लेखक विकास कुमार झा से हुई बातचीत आज आपके समक्ष प्रस्तुत हैं... आप सब इसे सुनें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं। आपकी प्रतिक्रिया अगले विमर्श में शामिल हो सकती है... नमस्कार।

Saturday, 8 August 2026

न्यायाधिपति..! कृपया देश को डूबने से बचाएं...

अपना देश भीषण सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। आर या पार की स्थिति है। अच्छा है कि अधर की कोई स्थिति नहीं है, जिसमें वर्षों से भारतवर्ष फंसा पड़ा रहा। बीच की स्थिति कभी अच्छी नहीं होती, यह भारतवर्ष का लंबा अनुभव है। दुर्भाग्य यह है कि जातियों-फिरकों-पंथों में बंटा देश खुद को शौर्यवान कह कर अघाता रहा और लुटेरों और आतंकियों का शिकार बनता रहा। हम इतने कायर और क्लीव थे कि हमने अपना धर्म, अपना वजूद और अपना आत्मसम्मान सबकुछ आतंकवादियों के चरणों पर रख दिया और उनका धर्म और उनका चरित्र खुद पर ओढ़ लिया। अंग्रेज लुटेरों ने भी भारत की संस्कृति और परंपरा नष्ट करने का सिलसिला नहीं छोड़ा। लेकिन वे मुगलों की तरह फूहड़, बर्बर और अहमक नहीं थे। मुगलों ने मंदिर तोड़ कर और शिक्षा-पीठों में आग लगा कर सोचा कि इससे भारतीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी, लेकिन वे गलत थे। इसे चालाक अंग्रेजों ने समझा। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति की जड़ों में मट्ठा डाला... हम बोलचाल की भाषा में मट्ठा कहते हैं, जबकि अग्रेजों ने भारतीय शिक्षा-संस्कृति और संस्कार की जड़ों में तेजाब डाला... उसी तेजाब के विकृत उत्पाद शाहीनबाग या जंतर मंतर जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। उसे आंदोलन का नाम देकर कभी नागरिकों के मत्थे ठोकते हैं तो कभी किसानों तो कभी छात्रों के मत्थे। इन विकृत जमातों में छिछोरे युवक-युवतियां, गुंडे-मवाली और विदेशी षडयंत्रकारियों के देसी मोहरे हैं। इन्हें छिछोरेबाजी से लेकर पत्थरबाजी तक का उकसावा और संरक्षण नेता और नेताओं के दलाल दुर्बुद्धिजीवी दे रहे हैं, जिनकी पूरी कोशिश है कि भारत वह भारत न रहे जिसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक उपलब्धियों के आगे दुनिया हतप्रभ और हताश होती रही है। उस भारतवर्ष को अक्षुण्ण रखने में देश का सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही नाकाम साबित हुआ है। लिहाजा, अब आखिरी उम्मीद सर्वोच्च न्यायपालिका के विद्वान न्यायाधीशों पर अवलंबित है। मैंने अपने नजरिए से देश की स्थिति का जो आकलन किया है, उसे इस प्रस्तुति के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति यानि मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत के समक्ष रखा है और उनसे आग्रह किया है कि मेरी इस प्रस्तुति को जनहित याचिका हेतु आवेदन समझें। पूरे देश को कुसंस्कृति, अराजकता, अश्लीलता, फूहड़ता, हिंसकता से बचाने के लिए सख्त कानूनी पहल की आवश्यकता है, जिसे न्यायाधिपति चाहें तो अपना अभिभावकत्व स्थापित कर दीर्घकाल के लिए लागू कर सकते हैं... यही सटीक समय है। मेरी इस याचिका के आप भी साक्षी हैं, इसलिए इस प्रस्तुति https://youtu.be/lBDLntcJj6k को देखना आपकी नैतिक जिम्मेदारी भी है... धन्यवाद