Friday, 8 November 2013

मंगल आह्वान...

प्रभात रंजन दीन
शास्त्रों में मंगल को शिव का पुत्र कहा गया, जिसे धरती ने पाला पोसा। इसीलिए मंगल को भूमि पुत्र या भौम भी कहते हैं। धरती के आश्रितों ने एक यंत्र रवाना कर यह सोच लिया कि वे भौम जीत लेंगे। अंगारक भौम युद्ध का देवता है। यह बात शास्त्रोक्त है जिसे आधुनिक विज्ञान खारिज कर देता है। अंतरिक्ष विज्ञानियों को परा की त्वरा समझ में नहीं आती। ईश्वर ने मनुष्य की रचना ही इसीलिए की कि वह जिज्ञासु बने, खोजे, अनुसंधान करे और अपने जीवन की सार्थकता साबित करे। उसकी सकारात्मक ऊर्जा प्रकृति की गति को बनाए रखने में योगदान दे सके। जो खोज रहे हैं वह प्रकृति में तो है ही, तभी तो हम खोज पाते हैं। प्रकृति को हमारे सद्प्रयासों से मतलब है। लेकिन चंद्रमा या मंगल पर यंत्र भेजना क्या सद्प्रयास है? इस पर जरा सोचिए। हम परमाणविक संयंत्र स्थापित कर रहे हैं, हम परमाणु बम बना रहे हैं, हम खनिजों के लिए धरती खोद-खोद कर उसे जर्जर बना रहे हैं। निर्धारित मानकों का उल्लंघन कर उसे हम खोदे चले जा रहे हैं। जंगल काटे चले जा रहे हैं। पानी से बिजली बनाने में या उद्योगपतियों के हाथों बेच डालने में अपने जल भंडार नष्ट करते चले जा रहे हैं। विज्ञान की पूरी ऊर्जा इसी में लगी हुई है। क्या यह हमारा सद्प्रयास है? आप ध्यान से देखें। विज्ञान की पूरी ऊर्जा जीवन और पर्यावरण को नष्ट करने के हथियार बनाने या सुविधा के सामान बनाने में लगी हुई है। पूरा विज्ञान संहार और सुविधा में जुटा पड़ा है। जीवन की स्थापना के बारे में विज्ञान की रत्ती भर भी रुचि नहीं है और न ही प्रयास है। कैंसर का इलाज नहीं खोज पाए। एड्स का इलाज नहीं खोज पाए। ...और बड़े-बड़े तुर्रम खां बनते फिर रहे हैं। विज्ञान की सारी पहुंच कैंसर रोगी के कैंसर ग्रस्त हिस्से को जला डालने और काट डालने तक है। कैंसर और बढ़ा तो और काटो, और जलाओ। जलता-झुलसता, कटता-कुटता कैंसर रोगी आखिरकार खुद ही धरती से कट लेता है। एड्स के रोगियों की तो और भी बुरी और वीभत्स दशा है। हमने 450 करोड़ रुपए खर्च करके एक यंत्र हवा में उछाल दिया और अपनी ही पीठ ठोकने लगे। लेकिन ऐसा करने की हरी झंडी देते हुए हमारे सत्ताधीशों ने यह क्यों नहीं सोचा कि भारत के नागरिकों के स्वास्थ्य पर भारत सरकार हर साल आठ प्रतिशत धन ही क्यों खर्च करती है? चीन अपने देशवासियों के स्वास्थ्य पर साढ़े बारह प्रतिशत धन क्यों खर्च करता है? हर साल पूर्वी उत्तर प्रदेश में अनजाने ज्वर से हजारों हजार बच्चे क्यों मर जाते हैं? इन बच्चों में जीवन फूंक देते तो क्या ये इसी धरती पर सुंदर तारों की तरह टिमटिमाते नहीं दिखते? अपने देश की धरा पर हमने जीवन को त्रासद बना दिया और चले अंतरिक्ष में जीवन की सम्भावनाएं तलाशने। क्या यही विज्ञान है? विज्ञान कुछ भी सार्थक नहीं कर रहा। और हम मीडिया वाले ढोल बजाते हैं। हम ढोलबज्जे हैं। दुर्गापूजा में जैसे कोलकाता के ढाक बजाने वालों की बूकिंग होती है, वैसे ही मीडिया वालों की भी होती है। रॉकेट लॉन्च हो रहा है तो ढोलबज्जों को बुला लो। कुछ भी प्रयोजित आयोजन हो, ढोलबज्जे बिना बुलाए भी बिना सोचे-समझे ढोल-ढाक पीटने में लग जाते हैं। जिनके पास पैसे हैं, जिनके पास समृद्धि है, जिनके पास समय है, वे चंद्रमा और मंगल खेलते रहें। जिनके पास पैसे नहीं। जिनके भ्रष्टाचार से पूरा अंतरिक्ष शरमाया हुआ है। जिनकी करतूतों से नागरिकों को खाना नहीं मिल पा रहा है। जिन्हें पानी नहीं मिल रहा। जिन्हें दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। जहां बेरोजगारी खुद ही रॉकेट बनी हुई है। वहां हमें मंगल और चंद्रमा दिख रहा हो तो यह वाकई शर्म की बात है। यह भोले-भाले आम नागरिकों के साथ सरासर धोखेबाजी है। मंगल पर फलां खनिज मिलने की सम्भावना है, मंगल पर गैस मिलने की सम्भावना है, पानी मिलने की सम्भावना है, मंगल पर जीवन मिलने की सम्भावना है। सम्भावना की खोज करने के लिए अरबों रुपए फूंक दिए गए। ढोलबज्जों ने ढोल बजा दिया ताकि हम प्रसन्न होकर चुनाव के माया-जगत में प्रवेश कर जाएं और रॉकेट-विकास पर वोट डाल दें। इन खरबों रुपए से भूखों को खाना खिलाते, प्याज-सब्जी ही ले आते तो कुछ सार्थक होता। ...और मंगल ग्रह पर अगर जीवन मिल भी गया तो क्या सोचते हैं कि धरती के लोगों को अपने यहां वे टिकने देंगे? और वह भी भारत के लोगों को? भ्रष्टाचार-झूठ-अनैतिकता की बदबू लेकर दूसरे ग्रहों को भी गंधाने जाएंगे तो वे भारत के नागरिक थोड़े ही हैं कि 'टॉलरेट' कर लेंगे? वे उस ग्रह के सम्भावित जीव होंगे जो शारीरिक ऊर्जा, आत्मविश्वास, शक्ति, क्रोध, आवेग, वीरता और साहसिकता का प्रतिनिधित्व करता है। तो ऐसी ऊर्जावान धरती के वासियों को 'टोपी-चरित्र' के लोग कैसे पसंद आएंगे? खर्चीले यंत्रों को ऐसी यात्राओं पर भेजने के पहले यह तो विचार कर लिया होता कि चंद्रमा पर जाकर अमेरिका ने क्या हासिल कर लिया? रूस तो पहले से ही इस अंतरिक्षी दौड़ में आगे था, क्या मिला उसे? विखंडन और संताप के सिवा सोवियत यूनियन को क्या मिला? सर्वशक्तिमान रूस आज अकेला टूटा हुआ अलग-थलग क्यों पड़ा है? अंतरिक्ष में अपने-अपने उपग्रह स्थापित करने की मारामारी दरअसल संहार की क्षमता बढ़ाने के लिए है। ये जितनी भी बैलिस्टिक गाइडेड मिसाइलें आप देखते-सुनते हैं, अंतरिक्ष में बैठे उपग्रहों से संचालित होने पर इनकी मारक क्षमता अत्यधिक बढ़ जाती है। यानी, ये उम्मीद से अधिक लोगों को मार पाने में सक्षम होंगे। आगे आने वाली मार अंतरिक्ष से ही संचालित होने वाली है। उसमें अधिकाधिक लोगों की हत्या कर पाएं इसी की आपाधापी मची है। तो आप बताएं कि यह विज्ञान संहारक है या सृजनात्मक? हमारा विज्ञान सृजन के लिए क्या कर रहा है? इसके पहले भी हम चंद्रमा-मिशन के सफल होने का दावा कर चुके हैं। क्या पाया हमने उस चंद्र-मिशन के जरिए? चंद्रमा-मिशन में क्या खोया-क्या पाया का हिसाब किसी ने दिया आज तक? मंगल अभियान में चीन पिछड़ गया, जापान पिछड़ गया, हम आगे हो गए। पतंगबाजी का कम्पीटीशन है क्या ये? विकास में, समृद्धि में, शक्ति में, सामर्थ्य में, स्वाभिमान में, ईमानदारी में, नैतिकता में क्या हमने चीन और जापान से प्रतियोगिता की? हमारे एक मित्र अभी हाल ही जापान से अध्ययन-यात्रा कर लौटे हैं। उन्होंने जापानियों को कभी बेमानी बातें करते देखा ही नहीं। ट्रेन में बस में कितनी भी भीड़ हो, कोई एक दूसरे से चपड़-चपड़ नहीं करता। गाड़ियां हॉरन नहीं बजातीं। कोई नेता सड़क-चौराहे भाषण देता नहीं नजर आता। सब लोग काम करते नजर आते हैं। मुंह बंद रख कर जापान के लोग पर्यावरण की रक्षा करते हैं और अपनी ऊर्जा भी बेमतलब बर्बाद नहीं करते। जापानियों का यह मौन-संस्कार भारत के नेताओं में 'इंजेक्ट' हो पाता तो भारत का कितना मंगल होता!

हे मंगल! तू तो सूर्य, चंद्र और गुरु बृहस्पति का सखा है... नेताओं के नीच ग्रह में जकड़े भारत देश को सूर्य जैसा तेज, चंद्रमा जैसी विनम्रता, बृहस्पति जैसी बुद्धि और अपने जैसी वीरता दे। बस यही आह्वान है तुमसे...

Sunday, 3 November 2013

कब मनाएंगे हम भारतवर्ष का मुक्ति-पर्व!

इस दीपावली में उतारें सोनिया माता राहुल भ्राता और मनमोहन दाता की आरती
प्रभात रंजन दीन

दीवाली पर क्या लिखें और क्या मनाएं! समाज का, देश का जो हाल है, उसमें पर्व-त्यौहार अपना प्रसंग खो चुके हैं। दीवाली मुक्ति पर्व के रूप में समझी और मनाई जाती थी। राम ने पाप-संकेत रावण से मुक्ति दिलाई तो देश दीपों से सज गया था। भारतवर्ष एक लम्बे समय से मुगलों और अंग्रेजों का हवस-केंद्र बना रहा और अब वह मुगलों-अंग्रेजों की मिश्रित संतानों के पाप में फंसा है। भारतवर्ष का मुक्ति-पर्व कब मनेगा, कब होगी उसकी दीवाली / कब चमकेगी देश-ललाट पर ताजे कुमकुम की लाली! यह सवाल खास तौर पर इन छियासठ वर्षों में रावण से अधिक शैतान नजर आने लगा है। अपनी तथाकथित आजादी के इन छियासठ साल को ही सामने रखें और इन तकरीबन सात दशकों के सत्ता-सरोकारों का जायजा लें तो हमें दिखाई पड़ेगा रौशनी का अंधकार से समझौता करने का बदनुमा दृश्य। तभी तो लिखा गया, 'वक्तआने पर मिला लें हाथ जो अंधियार से, सम्बन्ध कुछ उनका नहीं है सूर्य के परिवार से!' वाकई अभी एक सदी भी नहीं गुजरी और जिंदगी इतनी बेमानी हो गई कि पूरी पीढ़ी को अपनी आजादी जहर की तरह लगने लगी। देश का यह मामला है, घोर काली रात है / कौन जिम्मेवार है, यह सभी को ज्ञात है। भारतवर्ष नेताओं नौकरशाहों दलालों और पूंजी-जीवों का देश होकर रह गया है और रंग-बिरंगे त्यौहारों के इस देश में केवल चुनाव ही एकमात्र उत्सव में तब्दील हो गया है। अब नेता ही गणेश है और नेता ही लक्ष्मी। अब नेता-गणेश केवल अपने लिए शुभ करता है और नेता-लक्ष्मी केवल अपने लिए धन बरसाती है। इन्हें अब आम नागरिकों से क्या लेना-देना! बस सच यही है कि खादी ने मलमल से साठगांठ कर डाली है / टाटा-बिड़लों, नेता-दल्लों की तीसों दिन दीवाली है। अब बहस या चिंता नेताओं की चोरी नहीं। चोरी के कारण आम आदमी पर थोपी गई महंगाई बहस या चिंता का मसला नहीं। देश की सुरक्षा को बाहरी दुश्मनों और घर के भितरघातियों से खतरा बहस और चिंता का मुद्दा नहीं। अब तो बहस केवल धर्मनिरपेक्षता की है। अब तो चिंता केवल धर्मनिरपेक्षता की है। नेताओं का यह छद्म देश-समाज पर आरोपित है। धर्मनिरपेक्षता की नेताऊ-परिभाषा आजादी के बाद से ही देश पर छींट दी गई। यह ऐसे ही है कि, 'धोती बांधने के आग्रह पर केरल के मंदिर में नेहरू जी का आग बबूला हो जाना और निजामुद्दीन की दरगाह पर बड़ी प्रसन्नता से टोपी लगा कर जाना, इसी का नाम है धर्मनिरपेक्षता निभाना...' नेताओं की इसी धोखेबाज-धर्मनिरपेक्षता के कारण लोगों का पर्व-त्यौहार तो छोडि़ए, पूरा जीवन ही कुचक्र में फंस गया है। आप न कुछ खरीद सकते हैं। न आप धार्मिकता का सात्विक उल्लास सार्वजनिक तरीके से अभिव्यक्त कर सकते हैं। आप मूर्तियों का विसर्जन भी पुलिस के घेरे में करने लगे। आप गिरोहबंद हों तो सब कुछ कर सकते हैं। सड़क घेर कर धार्मिकता का भौंडा प्रदर्शन कर सकते हैं। क्योंकि तब आप धर्मनिरपेक्षता की नेताऊ-परिभाषा को संतुष्टि देते हैं। आप दुर्गा पूजा मनाएं तो मरें। आम मोहर्रम मनाएं तो मरें। लेकिन हम सोचते नहीं कि यह कैसी धर्मनिरपेक्षता हम अपने देश में पाल-पोस रहे हैं! दीपावली के मौके पर काफी पुराना एक फिल्मी भजन याद आता है। उस दौरान खूब चला था, 'मैं तो आरती उतारूं रे, संतोषी माता की।' उस समय से इस समय के बीच एक शब्द तेजी से बदल गया, संतोषी माता की जगह 'सोनिया माता' आ गईं। तब का भजन-गायन आज के भांड गायन में रूपान्तरित हो गया। देश का एक दशक जो बर्बाद हुआ, उसने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। इन दस वर्षों को हम खास तौर पर रेखांकित कर सकते हैं, क्योंकि इस दरम्यान सत्ताई भ्रष्टाचार और भांड गायन के प्रायोजित आयोजनों ने सारे प्रतिमान ध्वस्त कर डाले। अनैतिकता और झूठ-लफ्फाजी ने नए सिरे से भारतवर्ष की अंतरराष्ट्रीय छवि बनाई। इसी अवधि में काला धन पूरी सियासत का मुंह काला कर गया। इस दरम्यान राज-सत्ता खीसें निपोरती रही और सत्ता-नेपथ्य कठपुतलियां नचाता रहा और पगडिय़ां उछालता रहा। इसी काल में पौरुष हाशिए पर जाता रहा और नपुंसकता  मुख्यधारा में छाई रही। तो ऐसे नायाब समय में आई इस दीपावली में हम सोनिया माता, राहुल भ्राता और मनमोहन दाता की आरती उतारें, जिन्होंने भारत देश को इतना कुछ दिया। ...कि चोरों-बटमारों का चेहरा खिल गया और हमारा अस्तित्व हिल गया। इतना कि उनकी दीवाली उजास और हमारी दीवाली में कोठरी के कोने में जल रही मोमबत्ती उदास...

Wednesday, 30 October 2013

देश की देह पर द्रोह का दीमक!

प्रभात रंजन दीन
जानते बहुत सारे लोग हैं। लेकिन लिखने में संकोच करते हैं। सच लिखने में या बोलने में भी लोगों को डर लगता है कि उन्हें खेमों में उलझा दिया जाएगा। उनकी प्रगतिशीलता संकट में खड़ी कर दी जाएगी और उनकी धर्मनिरपेक्षता पर उंगली उठने लगेगी। दरअसल, उंगली उठाने वाले लोगों का एक मुकम्मल गिरोह है जो सुनियोजित तरीके से उंगलियां उठाता है और प्रगतिशीलता और धर्मनिरपेक्षता को अपनी बपौती समझता है। ये ही लोग असलियत में धर्मांध हैं और दूसरों को अंधा बताने की साजिश करते रहते हैं। हम यह सब समझते हैं फिर भी सच कहने से चुप रहते हैं। देश की अंदरूनी गतिविधियों पर निगाह रखने वाली केंद्रीय खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी से बात हो रही थी तो उन्होंने कुछ ऐसी बातें बताईं जिनके बारे में पत्रकारीय दृष्टि के कारण पहले से संदेह तो था, लेकिन उनकी बातों से वह संदेह आधिकारिक तौर पर पुष्ट हो गया। देश-समाज को इस बारे में जानना समझना और उसके प्रति सचेत रहना बेहद जरूरी है। समाज सेवा की आड़ में समाज में गहरी पैठ बना रहे गैर सरकारी संगठनों में से कई एनजीओ राष्ट्र विरोधी, समाज विरोधी, संस्कृति विरोधी और विघटनकारी शक्तियों के रूप में बड़ी चुप्पी से काम कर रहे हैं। देश को तबाह करने के लिए देश की पहचान और उसके सांस्कृतिक-पारम्परिक तानेबाने को ध्वस्त करने का काम हो रहा है। केवल विध्वंसक गतिविधियों में ही आईएसआई मुब्तिला नहीं है। आईएसआई के 'साइलेंट मॉड्यूल' केवल बम लगाने या तोडफ़ोड़ की कार्रवाइयों तक ही सीमित नहीं, बल्कि ये तत्व भारतवर्ष की संस्कृति को तोडऩे, पारिवारिक प्रेम को छिन्न-भिन्न करने, परिवारों में कलह का बीज बोने और खास तौर पर लड़कियों को बहकाने-फुसलाने, अपने ही सगे-सम्बन्धियों पर चारित्रिक लांछन लगाने के लिए उकसाने और 'ब्रेन-वॉश' करने से लेकर उन्हें दूसरे धर्म के लड़कों से प्रेम में फंसा कर उनका धर्म परिवर्तन कराने के काम में अधिक तेजी से सक्रिय हैं। इन 'साइलेंट मॉड्यूल्स' को आईएसआई द्वारा विभिन्न फंडिंग एजेंसियों के माध्यम से अनाप-शनाप धन मुहैया कराया जा रहा है। ये अलग-अलग आकर्षक नामों से एनजीओ के बतौर काम कर रहे हैं। ये अपने ही देश के दीमक हैं, जो विदेश से पैसा लेकर देश को खोखला कर रहे हैं। ऐसे राष्ट्र विरोधी एनजीओ के मकड़-जाले और उनमें बसने वाली मकडिय़ों को आप आराम से पहचान सकते हैं। इसके लिए अधिक मशक्कत की जरूरत नहीं। इन्हें आप देशभक्ति के काम में आगे नहीं पाएंगे। देश के खिलाफ जो भी गतिविधियां होंगी, उसमें इन्हें आप अत्यधिक सक्रिय पाएंगे। अपने देश-समाज की इन्हें फिक्र नहीं लेकिन बांग्लादेशियों के लिए सड़कों पर आंसू बहाते ये नजर आ जाएंगे। पाकिस्तानियों के लिए अमन की आशा और भारतवर्ष के लिए विष-वमन की भाषा, इनके मुंह से सुनें। अपराधियों-आतंकियों के लिए इनके हृदय में मानवाधिकार की लहरें ठाठें मारती हैं। लेकिन किसी शहीद के लिए होने वाली सम्मान सभाओं से ये बिल्कुल ही नदारद मिलेंगे। आतंकी हादसों की ये निन्दा नहीं करते और न ऐसे हादसों में मरने वाले लोगों के लिए शोक ही जताते हैं।

अब आपको कुछ खास दस्तावेजी बात बताएं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ऐसे 77 गैर सरकारी संगठनों की शिनाख्त की है जो विदेशों से धन लेकर अलग-अलग तरीके से भारतवर्ष को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन संगठनों की फंडिंग कैसे हो और किस रास्ते से हो, इसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई तय करती है और 'कोऑर्डिनेट' करती है। आईएसआई इनके लिए खाड़ी देशों के माध्यम से धन की सप्लाई करा रही है। भारतवर्ष को किस तरह अलग-अलग आयामों से खोखला किया जाए इस पर आईएसआई का 'थिंक टैंक' बाकायदा शोध करता है और सिक्कों की हड्डी फेंक कर भारतीयों से ही भारत का सत्यानाश करा रहा है। अभी तो मात्र 77 ऐसे एनजीओ की ही पहचान हुई है। इन पर पाबंदी लगाने का फैसला वोट की हड्डी  के लोलुप नेताओं के कारण सम्भव नहीं हो पा रहा है। आप सोचिए कितनी अराजक स्थिति है कि देश में करीब 70 हजार पंजीकृत एनजीओ ऐसे हैं जो विदेशी धन पर पलते और चलते हैं, लेकिन इनकी गतिविधियों पर नजर रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। इस पर अब नागरिकों को ही नजर रखनी होगी और उनका धंधा बंद कराना होगा। इनके खिलाफ समाज एकजुट हुआ तो ये दुम दबा कर भागते नजर आएंगे। इन तत्वों की मीडिया में भी घुसपैठ है। मीडिया में साफ-साफ तौर पर तीन किस्म के लोग काम करते हैं। एक किस्म तटस्थ लोगों का है, जो मृतप्राय हैं। दूसरा किस्म निहायत बेवकूफों का है, जिनमें कोई समझदारी नहीं है, जो एनजीओ-आधुनिकता के फैशन में मूर्खतापूर्ण काम करता है। और तीसरा किस्म शातिरों का है जो महामूर्धन्यों के कंधे पर बंदूक रख कर अपने हित साधता है, अखबार में खबरें छपवाता है, टीवी चैनेलों पर खबरें दिखवाता है और समाज को वीभत्स बनाता जा रहा है। इनके खिलाफ समवेत प्रतिरोध की जरूरत है... 

Saturday, 26 October 2013

जब झूठ हृदय में बस जाए!

प्रभात रंजन दीन

एक सर्वेक्षण आया था कुछ अरसा पहले। बड़ा रोचक सर्वेक्षण था। उसमें बताया गया था कि 32 फीसदी लोग दफ्तरों से 'बंक' मारने के लिए झूठ बोलते हैं। इस सर्वे से यह उम्मीद बढ़ी कि चलो कम से कम 68 प्रतिशत लोग तो ऐसा आचरण नहीं करते। लेकिन यह उम्मीद अधिक दिन तक उम्मीद बंधाए नहीं रह सकी। कुछ ही दिन में उस सर्वे के प्रसंग में यह खबर आई कि उस सर्वेक्षण की समीक्षा रिपोर्ट में 32 फीसदी वाला तथ्य गलती से 68 फीसदी वाले खाने में लिख गया था। यानी सर्वेक्षण का सच यह था कि 68 प्रतिशत लोग अपने-अपने कार्यालयों में झूठ बोलते हैं और 32 फीसदी लोग ईमानदारी से अपना कर्म करते हैं और बेमतल का झूठ नहीं बोलते। यह कुछ वर्ष पहले की बात है। यानी हर बात-बेबात झूठ बोलने वाले लोगों का प्रतिशत इतने दिन में निश्चित तौर पर 75 फीसदी के करीब पहुंच गया होगा। आप भी कहेंगे कि सम्पादकीय में यह कैसा राग ले बैठे। किसी खबर की समीक्षा नहीं। किसी खबर पर विचार नहीं। खबर की समीक्षा और खबर पर विचार तो हम आप रोज पढ़ते हैं। लेकिन हम-आप जो रोजाना झूठ गढ़ते हैं, झूठ बोलते हैं, झूठ परोसते हैं, उसे हम क्यों नहीं पढ़ते! केवल नेता ही झूठ थोड़े ही बोलते हैं! हम झूठे तो खबरें भी झूठी, विचार भी झूठे, सरोकार भी झूठे, सारे सम्बन्ध भी झूठे। तो इस झूठ पर ही क्यों नहीं हम एक दिन विचार करें! सच की तरह स्थापित होते जा रहे झूठ के साम्राज्य पर हम एक दिन तो नजर डालें, विचार करें। समाज की जो दिशा है, उसमें वह बात बेमानी हो गई है कि खुद को या किसी अन्य को खतरे से बचाने के लिए ही झूठ बोलें। अब तो झूठ बोलना समाज का स्वभाव ही हो गया है। किसी भी विषय पर झूठ बोला जा रहा है। जिस जगह साफगोई से काम चल जाए वहां भी झूठ। अभी हम लोगों ने महात्मा गांधी की जयंती पर 'कैनविज टाइम्स' के साप्ताहिक वाले हिस्से में आमुख कथा बनाई थी जिसका शीर्षक ही था 'असत्यमेव जयते'। जिस युग में सत्य कठघरे में खड़ा हो और खुद को सच साबित करने की जद्दोजहद करता हो और झूठ बहुमत में हो, उसका वर्चस्व स्थापित हो, उस युग के लिए तो कहा ही जाएगा न 'असत्यमेव जयते'। भारतीय समाज की भी इसमें क्या गलती है! इस देश को चलाने वालों ने ही झूठ और फरेब को नीति बनाई और 66 साल में नस्लों की नसों में झूठ का संस्कार पिरो दिया। बचपन में गीत सुनता था, 'सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है'... इसी गीत में एक और पंक्ति आती थी, 'भला कीजै भला होगा, बुरा कीजै बुरा होगा...। ' बाद में जाना कि यह गीत शैलेंद्र ने लिखा था और फिल्म 'तीसरी कसम' में राजकपूर के लिए गायक मुकेश ने गाया था। ...और बाद में यह भी जाना कि अब तो कोई भी कसम खिला लो, झूठ तो बोलेंगे ही। अब शैलेंद्र का जमाना तो है नहीं और न उस गीत को जीवन का गीत बना कर चलने वाले लोगों लिए ही यह जमाना रह गया है। अब जमाना बदल गया है, अब लोग बदल गए हैं, अब शब्द बदल गए हैं, अब अर्थ बदल गए हैं। तब जो सीधा लगता था, आज वह उल्टा हो गया है। अब तो साफ-साफ दिखता है कि तब, तब था। अब, अब है। तब सच और संकोच। अब झूठ और बेहयाई। तब सच का बोलबाला और झूठ का मुंह काला का जमाना था। अब तो झूठ की सत्ता, झूठ का जोर और सच का मुंह काला, सच हो गया मुंहचोर। सारे धर्मग्रंथों में लिखा है कि जब तक जान जाने का खतरा न हो, तब तक झूठ नहीं बोलना चाहिए! लेकिन इसे यह युग स्वीकार करने के लिए कतई तैयार नहीं। अब नई दुनिया नया धर्मशास्त्र गढऩे में लगी है, जिसका आधार वाक्य है, 'सच तभी बोलो, जब जान जाती हो'। अब तो नवगढ़ंत धर्मशास्त्रों में लिखा जा रहा है, 'झूठ बराबर तप नहीं, सांच बराबर पाप। जाके हिरदय झूठ है, ताके हिरदय आप।' सजन को खुदा से मतलब नहीं, सजन का झूठ से है रिश्ता। अब भला करने से बुरा होता है और बुरा करने वालों की मौज ही मौज। ...तब लगता था कि आईने तो कम से कम सच दिखाते हैं। लेकिन अब तो दर्पण भी झूठ का ही प्रतिबिंब है। वाकई, ...मुझे शिकायत है इन आईनों से / झूठ दिखाता है ये आईना / हर तरफ है झूठ पर झूठ / बदनुमा झूठ / पर हर वक्त सुंदर दिखाता है ये आईना / अब झूठ पर कोई लगाम नहीं / अब सच का कोई मुकाम नहीं...

Wednesday, 23 October 2013

कैसी घड़ी है! सबको सोने की पड़ी है...


प्रभात रंजन दीन
कई मित्रों ने कहा कि स्वर्ण भंडार से सम्पन्न स्वप्न के बारे में कुछ क्यों नहीं लिखते! अब क्या लिखें और क्या कहें... इस संत-स्वप्न ने शब्द और अभिव्यक्ति की दिशा ही भटका दी है। संतों के स्वप्न में भी सोने के सिक्के दिखने लगें तो युग की दिशा दिखने लगती है। फिर सत्य का दिव्यस्वरूप किसे दिखे! फिर माया के प्रति निस्पृह भाव कैसे जगे! फिर लोभ-लिप्सा से मन कैसे डिगे! खैर, हम तो गृहस्थ हैं। वह भी माटी के मोल वाले। फिर हम क्यों सोचें संतों के सपनों के स्वर्ण-स्तर के बारे में! जब संत स्वप्न और सत्य में फर्क न कर पाए। जब स्विस और स्वप्न में देश का हित विलय कर जाए, जब काला धन और गड़ा धन का सत्य एक दूसरे पर चढ़ बैठे, जब अध्यात्म भौतिक-भ्रांतियों का प्रवक्ता बन बैठे, तब आप समझ लें कि यह संतों और फंतों के मेलमिलाप और साठगांठ का युग है। गड़ा सोना खोदने की सरकारी जल्दीबाजी और 'स्वर्ण-स्वप्न-द्रष्टा' की बयानबाजी का मेल समझने में कहां है कोई झमेल! इतनी ही जल्दीबाजी में नेता विकास का काम करता तो सोना ही सोना दिखता सब तरफ। 66 साल नुकसान नहीं होता। इतने लम्बे त्रासद साल में न कोई संत आया और न कोई स्वप्न। बस, सब नेता मिल कर हमें ही कोड़-कोड़ कर, हमें ही फोड़-फोड़ कर हमारा सोना लूटते रहे और हम अपना भाग कूटते रहे...  

सच कहूं, सपनों में उनके जब से सोना आने लगा है, तबसे मेरा सोना मुझसे जाने लगा है। मन में झुंझलाहट भी होती है कि सोना क्यों नहीं आता मेरे सपने में! ख्वाबों की जमीन कोड़ कर सोना उगा लेने का जज्बा तो है, लेकिन सोना हमारे जज्बे की अब जरूरत नहीं है। हमारे ख्वाबों में आता तो फावड़ा चलाने वाली किसी एजेंसी को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे जैसे जिद्दी फाकाकशों की टोली ऐसे जाने कितने गहरे सपने खोद डालती और सोना निकाल लेती। इसे निकलना नहीं है इसीलिए तो ये उनका सपना है। सोना सपने में भी देख-समझ कर ही आता है। सामंती सौंदर्य वाला सोना सर्वहारा जमात के सपने में भी क्यों दिखे? हमारा तो लोहा भी नहीं, हम तो ठहरे लोहे को धार देने वाले लोग, शब्द को तलवार देने वाले लोग। हम तो धार धारण करने वाले साधारण हैं। ...और सोना बुर्जुआ। तभी तो वह स्वप्न में भी पूंजीपतियों और सुख-सेवा-सम्पन्न संतों के सोने में आता है। और पूरी दुनिया की नींद हर लेता है। जबसे सोना वाला सपना सुर्खियों में आया है, उसने तो मेरा सोना छीन लिया है। अब मेरे सड़कछाप सपने मुझे सोने नहीं दे रहे। कभी चोरी गए मां और बीवी के गहनों की याद दिला कर कील की तरह चुभते हैं मेरे ख्वाब। तो कभी एहसास कराते हैं कि सोना चोरों को ही शोभा देता है। देर रात आने वाली नींद का सपना जलती धूप सा बरसने लगता है। तो अक्सर रात में ही उठ कर दिमाग में दुपहरी को जगाना पड़ता है। न रात होती है, न नींद होती है, न सुबह होती है... सब कुछ एक स्वांग की तरह बीतता जाता है। और जीवन का सोना भी इसी तरह रीतता जाता है। सोना का सपना दिखता है तो सपना खुद भोंपू बन जाता है। असलियत वाला दर्द सपना समझ कर मौन सहना पड़ता है, कोई जान भी नहीं पाता। न संत जान पाता है न फंत... सबको तो सोने की पड़ी है। पता नहीं यह कैसी घड़ी है...

Monday, 21 October 2013

हिंडाल्को कर रहा यूपी में जमीनों पर कब्जा


कोयला घोटाले की चपेट में उत्तर प्रदेश भी
प्रभात रंजन दीन
नवीन जिंदल फिलहाल छाया-क्षेत्र में हैं। अभी सीबीआई की कोप-दृष्टि उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला और कोयला मंत्रालय के पूर्व सचिव वरिष्ठ नौकरशाह पीसी पारिख पर है। अभी कुछ ही दिन पहले 'कैनविज टाइम्स' ने आपको बताया था कि सीबीआई के निदेशकों को रिटायरमेंट के बाद जिंदल के विभिन्न प्रतिष्ठानों में शीर्ष सुविधासम्पन्न पदों पर नौकरी दी जाती रही है। जिंदल से उपकृत करीब आधा दर्जन निदेशकों और लगभग इतने ही अन्य बड़े नौकरशाहों के बारे में उनकी सुंदर फोटो के साथ खबर प्रकाशित हुई थी। जिंदल पर फिलहाल सधी हुई चुप्पी की सीधी और साफ वजह है। प्रधानमंत्री भी नहीं चाहते कि जिंदल पर कोई आंच आए और सीबीआई भी नहीं चाहती। लिहाजा, बिड़ला और पारिख पर ध्यान केंद्रित किया गया है। अब कुछ दिन बिड़ला-पारिख चलेगा। होना-जाना किसी का कुछ भी नहीं है, बस लोगों में यह भ्रम बना रहे कि कुछ हो रहा है। प्रधानमंत्री ने कह ही दिया है कि जो हुआ वह सही हुआ है। तो भारतीय लोकतंत्र के ऐसे सत्ताधीशों के राज में हम आम लोग कुछ कर तो नहीं सकते, पर यह जानते जरूर चलें कि इन कुलीन चेहरों की कितनी-कितनी काली करतूतें हैं। जानकारी और जागरूकता बनाए रखने की धारा के क्रम में हम यह जानते चलें कि कोयला घोटाले से हमारा उत्तर प्रदेश भी अछूता नहीं है। कोयला घोटाले में लिप्त आदित्य बिड़ला समूह का प्रतिष्ठान 'हिंडाल्को' (हिंदुस्तान अल्युमिनियम कॉरपोरेशन लिमिटेड) भूमाफिया की तरह उत्तर प्रदेश में जमीनें हड़प रहा है। उत्तर प्रदेश के किसानों की जमीनें कोयले की अकूत कमाई के साम्राज्य के नीचे दबती जा रही हैं, लेकिन यूपी सरकार इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है। केंद्र सरकार के सीधे संरक्षण में यह अवैध कृत्य हो रहा है इसलिए भी उत्तर प्रदेश सरकार कुछ बोल नहीं रही। नियम कानून ताक पर रख कर हिंडाल्को को उत्तर प्रदेश में जमीनें दिलाने और कब्जा कराने में केंद्र सरकार के अधिकारी और केंद्र सरकार के उपक्रम तो शामिल हैं ही, प्रधानमंत्री भी जानकारी के बावजूद आंखें मूंदे रहे हैं। कोयला घोटाला केवल कोयले के अवैध खनन-आवंटन से ही नहीं बल्कि कोयला साम्राज्य के अवैध विस्तार से भी सम्बद्ध है। हालत यह है कि कब्जे की जमीन पर भी बोर्ड लगवा कर हिंडाल्को उसे अपनी निजी सम्पत्ति बता रहा है।
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में ककरी कोल परियोजना के रोप-वे के लिए दस किलोमीटर का क्षेत्र हिंडाल्को को लीज़ पर दिए जाने का औपचारिक फैसला 21 फरवरी 2009 को हुआ। लेकिन गैरकानूनी तरीके से इतना बड़ा क्षेत्र 1997 में ही हिंडाल्को को दे दिया गया था। शासनिक-प्रशासनिक अंधेरगर्दी का हाल यह है कि इस पर सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया। अवैध तरीके से ली गई इस जमीन पर हिंडाल्को बाकायदा अपना रोप-वे बना कर सोनभद्र को प्रदूषित करने का धंधा करता रहा, कोयले की राख फेंकता रहा और सरकारी अधिकारी उपकृत होते रहे। 11 साल बाद जब इसकी जानकारी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) को मिली और सीवीसी सक्रिय हुए तो आनन-फानन कोयला मंत्रालय के उपक्रम नॉरदर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) ने हिंडाल्को को एक महीने के अंदर जमीन खाली करने की नोटिस दे दी। सत्ता को अपनी पकड़ में रखने वाले बिड़ला एनसीएल की नोटिस पर जवाब दें या जमीन खाली कर दें, ऐसा कहां सम्भव था! हिंडाल्को सीधे कोयला मंत्रालय के सचिव के पास पहुंच गया। ...और अब केंद्र सरकार के आला नौकरशाह बिड़ला के नौकर में तब्दील हो गए। सात मई 2008 को हिंडाल्को की चिट्ठी मंत्रालय पहुंचती है और आठ मई 2008 को ही फाइल भी खुल जाती है और कार्रवाई के लिए तीव्र गति से चल भी पड़ती है। बीच में थोड़ा 'ब्रेक' लेते हुए हम इसे रेखांकित करते चलें कि सरकारी कार्रवाइयों में इतनी ही तीव्रता आम लोगों के लिए होती तो अब तक देश दूसरी ही काया में होता। बहरहाल, आप वह फाइल देखेंगे तो हैरत में पड़ जाएंगे। उसमें केंद्र सरकार की यह चिंता दिखाई देती है कि हिंडाल्को को दी गई जमीन उससे छिन न जाए। उसी फाइल में एक कोने में यह भी स्वीकारोक्ति है कि एनसीएल ने हिंडाल्को को जमीन देने के लिए केंद्र से कोई मंजूरी नहीं ली। कोई सूचना भी नहीं दी। आपराधिक दुस्साहस यह है कि एनसीएल ने 'कोल वियरिंग एक्वीजिशन ऐक्ट' को ताक पर रख दिया और हिंडाल्को को एक लाख 79 हजार 32 रुपए के सालाना लीज़ पर जमीन दे दी। तब कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के हाथ में ही था। ...और मंत्रालय इतना पूंजी-प्रमाद में मत्त था कि एक दशक से अधिक समय तक ऐसे गम्भीर अपराध पर चुप्पी साधे बैठा रहा। एनसीएल और मंत्रालय का अपराध साबित मानते हुए भी केंद्र ने दोषी अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टा कोयला मंत्रालय में बैठे शीर्ष नौकरशाह शरद गोडके हिंडाल्को की चिट्ठी मिलने के छह दिन बाद ही जमीन खाली करने वाली नोटिस रोकने का फैक्स आदेश तैयार किए बैठे थे। 21 दिन बाद 29 जुलाई 2008 को फैक्स आदेश भेज कर जमीन खाली कराने की कार्रवाई औपचारिक तौर पर रोक दी गई। जमीनी तौर पर कार्रवाई हो भी नहीं रही थी।
केंद्र सरकार ने गैर-कानूनी लीज़ की स्वीकारोक्ति, एनसीएल और केंद्र सरकार के अधिकारियों की मिलीभगत की पुष्टि और सरकारी राजस्व की हानि की आधिकारिक स्थापना के बाद 21 फरवरी 2009 को हिंडाल्को के साथ लीज़ का औपचारिक करार किया। यह केंद्र सरकार का ऐतिहासिक कुकृत्य है। इस लीज़ करार ने खुद ही यह साबित कर दिया कि पिछले 12 साल से बना हिंडाल्को का कब्जा अवैध था। यह कब्जा अब भी अवैध है। क्योंकि ऐक्ट में किसी गैर सरकारी संस्थान को जमीन लीज़ पर देने की स्पष्ट मनाही है। 'कोल वियरिंग एक्वीजिशन ऐक्ट' में कोई संशोधन भी नहीं किया जा सकता। लीज़ करार आठ लाख 32 हजार 430 रुपए का हुआ। और इस तरह केंद्र ने मान लिया कि पिछले 12 साल में 78 लाख 40 हजार 776 रुपए का राजस्व नुकसान हुआ। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है! जहां लाखों करोड़ रुपए लूटे जा रहे हैं, वहां 78 लाख क्या है! पर, सफेदपोश चेहरों पर कालिख पोतने का क्रम हम जारी रखेंगे...


Monday, 7 October 2013

सीबीआई के निदेशकों को जिंदल देता है नौकरियां

सीबीआई जांचों के फेल होने की वजहों का भयानक सच
प्रभात रंजन दीन
सीबीआई के निदेशक रहे अश्वनी कुमार सीबीआई से रिटायर होने के बाद और नगालैंड के राज्यपाल बनाए जाने के पहले नवीन जिंदल के प्रतिष्ठान में नौकरी कर रहे थे। सीबीआई के कई पूर्व निदेशक व वरिष्ठ नौकरशाह जिंदल संगठन में अभी भी नौकरी कर रहे हैं। सीबीआई के निदेशकों को रिटायर होते ही जिंदल के यहां नौकरी कैसे मिल जाती है? सत्ता के गलियारे में पैठ रखने वाले वरिष्ठ नौकरशाहों को जिंदल से जुड़े प्रतिष्ठानों में प्रभावशाली ओहदों पर क्यों बिठाया जाता है? ताकतवर नौकरशाह जिंदल के संस्थानों से महिमामंडित और उपकृत क्यों होते रहे हैं? और उन पर केंद्र सरकार ध्यान क्यों नहीं दे रही? कोयला घोटाले में जिंदल समूह की संलिप्तता और घोटाले की सीबीआई जांच से जुड़ी फाइलों की रहस्यमय गुमशुदगी को देखते हुए इन सवालों को सामने रखना जरूरी हो गया है। उद्योगपति व ताकतवर कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल की कोयला घोटाले में भूमिका जगजाहिर है। सत्ता से उनकी नजदीकियां और उन नजदीकियों के कारण कोयला घोटाले की हो रही लीपापोती भी उजागर है। घोटाले में लिप्त हस्तियों की साजिशी पहुंच कितनी गहरी है, यह घोटाले से जुड़ी फाइलें गायब होने के बाद देश को पता चल रहा है। लेकिन अब आप इस खबर के जरिए देखेंगे कि पर्दे के पीछे पटकथाएं कैसे लिखी जाती हैं और कौन लोग लिखते हैं!
कोयला घोटाले में प्रमुख भूमिका निभाने वाले जिंदल समूह के जरिए केंद्र सरकार के वरिष्ठ नौकरशाहों को उपकृत कराने का सिलसिला लंबे अरसे से चल रहा है। आप तथ्यों को खंगालें तो आप पाएंगे कि सत्ता के अंतरंग जिन नौकरशाहों को केंद्र सरकार खुद उपकृत नहीं कर पाई, उन्हें जिंदल के यहां शीर्ष पदों पर नौकरी मिल गई। ऐसा भी हुआ कि नौकरी करते हुए भी कई नौकरशाहों को जिंदल के मंच से महिमामंडन का 'सुअवसर' प्रदान किया जाता रहा।
कांग्रेस के बेहद करीबी रहे अश्वनी कुमार उस समय सीबीआई के निदेशक थे, जब कोयला घोटाला पूरे परवान पर था। दो साल की निर्धारित सेवा अवधि में चार महीनों का विस्तार अश्वनी कुमार की सत्ता-अंतरंगता का ही प्रमाण है। कुमार दो अगस्त 2008 को सीबीआई के निदेशक बनाए गए थे और उन्हें दो अगस्त 2010 को रिटायर हो जाना चाहिए था, लेकिन उन्हें एक्सटेंशन दिया गया और सत्ता की मंशा पूरी होने के बाद कुमार नवम्बर 2010 को सीबीआई के निदेशक पद से रिटायर हुए। ...और अश्वनी कुमार जैसे ही सीबीआई के निदेशक पद से रिटायर हुए, उन्हें जिंदल समूह ने लपक लिया। सीबीआई के पूर्व निदेशक अश्वनी कुमार को जिंदल समूह के ओपी जिंदल ग्लोबल बिजनेस स्कूल का प्रोफेसर नियुक्त कर दिया गया। केंद्र सरकार ने अश्वनी कुमार को ओपी जिंदल ग्लोबल बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर के रूप में महिमामंडित कराने के बाद मार्च 2013 में उन्हें नगालैंड का राज्यपाल मनोनीत कर दिया। कोयला घोटाला, घोटाले की लीपापोती, जिंदल की भूमिका और जिंदल समूह में सीबीआई निदेशकों की नियुक्ति के सूत्र आपस में मिलते हैं कि नहीं, इसकी पड़ताल का काम तो जांच एजेंसियों का है। हमारा दायित्व तो उन सिरों को रौशनी में लाने भर का है।
अश्वनी कुमार को सीबीआई का निदेशक बनाए जाने के पीछे की अंतरकथा भी कम रोचक नहीं है। 17 साल से अधिक समय से सीबीआई को अपनी सेवा दे रहे खांटी ईमानदार 1972 बैच के राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी एमएल शर्मा का निदेशक बनना तय हो गया था। चयनित निदेशक को प्रधानमंत्री के साथ चाय पर बुलाने की परम्परा के तहत शर्मा को पीएमओ में आमंत्रित भी कर लिया गया। उधर, सीबीआई कार्यालय तक इसकी सूचना पहुंच गई और वहां लड्डू भी बंट गए। लेकिन अचानक केंद्र सरकार ने एमएल शर्मा का नाम हटा कर हिमाचल प्रदेश के डीजीपी व 1973 बैच के आईपीएस अधिकारी अश्वनी कुमार को सीबीआई का निदेशक बना दिया। जबकि शर्मा उनसे सीनियर थे। शर्मा ने प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड और उपहार सिनेमा हादसा जैसे कई महत्वपूर्ण मामले निपटाए थे। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें आखिरी वक्त पर सीबीआई का निदेशक बनने लायक नहीं समझा, क्योंकि शर्मा वह नहीं कर सकते थे जो केंद्र सरकार सीबीआई से कराना चाहती थी। आपको मालूम है कि सीबीआई की नियुक्ति को देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त, कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय के सचिव और केंद्रीय गृह सचिव हरी झंडी देते हैं। शर्मा के लिए यह तीन सदस्यीय समिति अपनी सहमति दे चुकी थी। प्रधानमंत्री भी इसकी मंजूरी दे चुके थे आखिरी वक्त में प्रधानमंत्री ने अपनी मर्जी या किसी पर्दानशीन-मर्जी के दबाव में शर्मा का नाम ड्रॉप कर अश्वनी कुमार को सीबीआई का निदेशक बना दिया। अचानक एमएल शर्मा को हटा कर अश्वनी कुमार को सीबीआई का निदेशक कैसे और क्यों बनाया गया, यह देश के सामने आए बाद के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है। अश्वनी कुमार ऐसे पहले सीबीआई निदेशक हैं जो राज्यपाल बने। आरुषि हत्याकांड की लीपापोती करने और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में अमित शाह को घेरे में लाने वाली सीबीआई को अश्वनी कुमार ही नेतृत्व दे रहे थे। लिहाजा, कोयला घोटाले में उनका रोल क्या रहा होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है।
सीबीआई के पूर्व निदेशक डीआर कार्तिकेयन जिंदल समूह के ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की एकेडेमिक काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य हैं। कार्तिकेयन 1998 में सीबीआई के निदेशक रह चुके हैं। सीबीआई के अलावा सीआरपीएफ के विशेष डीजी और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बाद कार्तिकेयन अभी जिंदल की सेवा कर रहे हैं। इसी तरह चार जनवरी 1999 से लेकर 30 अप्रैल 2001 तक सीबीआई के निदेशक रहे आरके राघवन भी जिंदल समूह की सेवा में हैं। जिंदल समूह ने राघवन को ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट का वरिष्ठ सदस्य बना रखा है।
जैसा ऊपर भी बताया कि सीबीआई के जिन निदेशकों को जिंदल अपने समूह में नियुक्त नहीं कर पाया उन्हें अपने शैक्षणिक प्रतिष्ठान से महिमामंडित कराता रहा। 30 नम्बर 2010 से 30 नवम्बर 2012 तक सीबीआई के निदेशक रहे और टूजी स्पेक्ट्रम जैसे बड़े घोटाले की जांच से जुड़े रहे अमर प्रताप सिंह को रिटायर होने के महज महीने डेढ़ महीने के अंदर केंद्र सरकार ने लोक सेवा आयोग का सदस्य मनोनीत कर दिया। उधर जिंदल अपने संस्थान के जरिए इनके भी प्रतिष्ठायन में पीछे नहीं रहा। ओपी जिंदल ग्लोबल विश्वविद्यालय के कई शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रमों में एपी सिंह शरीक रहे हैं। यहां तक कि राष्ट्रीय पुलिस अकादमी तक में अपनी घुसपैठ बना चुका जिंदल वहां भी सैकड़ों वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के विशेषज्ञीय प्रशिक्षण का प्रायोजन कराता रहता है और उसी माध्यम से शीर्ष नौकरशाही को उपकृत करता रहता है। ऐसा ही सीबीआई के पूर्व निदेशक पीसी शर्मा के साथ भी हुआ। 30 अप्रैल 2001 से लेकर छह दिसम्बर 2003 तक सीबीआई के निदेशक रहे पीसी शर्मा भी अपने रिटायरमेंट के महीने भर के अंदर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य मनोनीत कर दिए गए। जिंदल ने पीसी शर्मा को भी अपने समूह से जोड़े रखा और शैक्षणिक प्रतिष्ठानों; ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी व जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के जरिए उनका महिमामंडन करता रहा।
सत्ता से जुड़े रहे वरिष्ठ नौकरशाहों के जिंदल से नजदीकियां वाकई रेखांकित करने लायक हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व सदस्य, भारत सरकार की नीति बनाने और उसे कार्यान्वित कराने की समिति के पूर्व निदेशक, प्रधानमंत्री, कैबिनेट सचिवालय और राष्ट्रपति तक के मीडिया एवं संचार मामलों के निदेशक रह चुके वाईएसआर मूर्ति को जिंदल ने ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी का रजिस्ट्रार बना रखा है। मूर्ति न केवल विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार हैं बल्कि वे मैनेजमेंट बोर्ड और एकेडेमिक काउंसिल के भी सदस्य हैं। वर्ष 2002 से 2007 तक देश के ऊर्जा सचिव रहे राम विनय शाही और भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन रहे अरुण कुमार पुरवार जिंदल स्टील्स प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं। जिंदल देश का अकेला ऐसा पूंजी प्रतिष्ठान है जिसने सत्ता से जुड़े शीर्ष नौकरशाहों को अपने समूह में सेवा में रखा। खास तौर पर सीबीआई के पूर्व निदेशकों को अपनी सेवा में रखने में जिंदल का कोई सानी नहीं है।
आपको याद होगा कि कोयला घोटाले की जांच से जुड़े एक सामान्य अधिकारी विवेक दत्त को कुछ महीने पहले 15 लाख रुपए घूस लेते हुए पकड़ा गया था। विवेक दत्त को तत्काल प्रभाव से निलम्बित भी कर दिया गया और उसका पूरा करियर दागदार भी कर दिया गया। ऐसे जिन भी दागी अफसरों पर आपकी निगाह जाए, वे सभी मामूली अफसर ही होंगे। इनमें कोई भी आईपीएस अधिकारी नहीं होगा। जिंदल से उपकृत सीबीआई के पूर्व निदेशकों या वरिष्ठ नौकरशाह हस्तियों पर किसी की निगाह नहीं जाती। अगर वह अधिकारी सत्ता का करीबी, खास तौर पर सोनिया-राहुल-प्रियंका का अंतरंग रहा हो तो ऐसे अधिकारी पर कोई हाथ नहीं रख पाएगा। ऐसा अफसर जिंदल जैसे घोटालेबाज पूंजीपति सियासतदानों के यहां नौकरी भी पा जाएगा, आयोगों में पीठासीन भी हो जाएगा और राज्यपाल भी बना दिया जाएगा। ट्रान्सपैरेंसी इंटरनेशनल ने 2010 में कहा था कि भारत में 100 में से 54 लोग भ्रष्ट हैं। यह 2010 में कहा था। तीन साल में 54 की संख्या अब 94 हो चुकी होगी। बहरहाल, हम आंकड़ों पर न जाएं। नेता-नौकरशाह इन आंकड़ों से कहीं ऊपर खड़े हैं और कुकृत्यों के गंदे दलदल में कहीं गहरे धंसे हैं।