Monday, 3 August 2026

दुराग्रह जीता... सत्याग्रह हारा...


देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों जिस तरह हिंसा और अराजकता का सृजन हुआ, उसे ही अगर लोकतंत्र की अभिव्यक्ति कहें, तो इसका मतलब है कि हम वाकई चेतना से ही शून्य और चरित्र से तेलचट्टे हो चुके हैं। कुछ पंक्तियां फौरन ही कौंध गईं... इसे पढ़ भी लें, समझ भी लें और थोड़ा और स्पंदित होना चाहें तो इस विश्लेषण को पढ़ने और यूट्यूब पर वीडियो प्रस्तुति देखने का समय निकालें... https://youtu.be/oYZzIZVc3jg

करम-पथ बन गया शरम-पथ...

थोड़ा कहना अधिक समझना। करम-पथ बन गया शरम पथ,

बेशर्मों की करतूतों पर हंस मत देना, किस दिशा में अपना देश चल पड़ा,

क़सम है तुमको, उस राह पर तुम भी मत चल पड़ना, चिंतन करना।

इस पाती को पढ़ कर अच्छे से सूत मिलाना, फटे देश पर पैबंद लगाना,

थोड़ा कहना अधिक समझना, मेरे शब्दों के सार-असार सब पल्ले रखना।

युगों पुराने सभ्य देश को बना रहे सब द्रोही मिल कर कचरे का चट्टा,

सत्ता का तो लक्ष्य सध रहा, आम आदमी खुशी-खुशी बन रहा तिलचट्टा।   

अगर खुल सकें आंखें तो देख भी लेना, चारों कोने तार-तार हो रहे देश के,

अगर रीढ़ में स्पंदन शेष हो और बाजुओं में बची हो जान,

तो अपने होने का औचित्य तलाशना...

थोड़ा कहना अधिक समझना...

कई विशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शन को लेकर केंद्र सरकार ने जो रुख अभी अपनाया, वही अगर पहले अपनाया होता तो हिंसा फैलने के पहले ही आंदोलन निपट जाता। इस विचार के समानान्तर एक प्रश्न अधिक अर्थ भरा है कि अगर देरी न होती तो तमाम चेहरों से नकाब कैसे हट पाता! लोकतंत्र और संविधान की आड़ लेकर घिनौना हिंसक माहौल सृजित करने में लगे चेहरे कैसे नंगे हो पाते! छात्रों के आक्रोश का फायदा उठा कर देश को अस्थिर करने वाली बदनुमा जमातें कैसे एक्सपोज़ हो पातीं! 

और सबसे जरूरी बात... सत्ता का कायरानापन देश एक बार फिर कैसे देख पाता! तेलचट्टों के आगे सरकार की दंडवती मुद्रा ने मोदी सरकार का लिजलिजापन पूरे देश में प्रदर्शित किया है। तिलचट्टों की मांग पर सरकार ने एक मंत्री का इस्तीफा लेकर अपने असली चरित्र का सार्वजनीकीकरण कर दिया है। पिछले 12 वर्षों में तीसरी बार मोदी सरकार ने भीड़वाद और अराजकतावाद के आगे घुटने टेके हैं। एनआरसी के बाद कृषि कानून और अब तिलचट्टे। मोदी सरकार के इस लिजलिजेपन से देशभर में यह संदेश गया है कि अराजकता फैला कर सरकार को समर्पण की मुद्रा में लाया जा सकता है। खुद मोदी सरकार ने आगे बढ़ कर देश की युवा पीढ़ी को यही संदेश दिया है...  

देर से ही सही, षडयंत्रकारी, देश के सामने एक बार फिर नंगे हुए और 56 इंच के सीने की असली मजबूती भी पता चली। सरकार भले ही यह कहती रहे कि मूल समस्या का समाधान निकला लेकिन यह संदेश तो देश में गया ही कि ऐसे विकृत आंदोलनों से सरकार को दंडवत कराया जा सकता है। जो वास्तविक छात्र थे उन्हें भी मोदी सरकार ने भविष्य के लिए यह दीक्षा दे दी। शांत-शालीन छात्रों का तिलचट्टों से मोहभंग हुआ और रीढ़हीन सत्ताधारियों से भी उनका मोहभंग हो गया। अच्छा हुआ सोनम वांगचुक अपना अनशन खत्म कर नेपथ्य में चले गए और राहुल गांधी हमेशा की तरह देश में आग लगाने की कोशिश कर विदेश रवाना हो गए। 

केंद्र सरकार तेलचट्टों को दुलारने-पुचकारने में लगी रही, जल्दी ही सरकारी लाड, प्यार, उपहार पाकर तिलचट्टे भी गंदी नालियों में घुस जाएंगे। लेकिन यह साबित कर जाएंगे कि एक और शाहीनबागी षडयंत्र कामयाब हुआ। सबसे अलार्मिंग बात क्या है, यह आप समझ ही रहे होंगे... शाहीनबाग और जंतर-मंतर की हरकतों से दुनियाभर में भारत के छात्रों और युवाओं की छवि बांग्लादेश के लुच्चे-लफंगों जैसी हो रही है। भारतवर्ष के युवा समझदार, जागरूक और अहिंसक आंदोलनों से व्यवस्था परिवर्तन के वाहक माने जाते रहे हैं, लेकिन लुच्चे-लफंगों और देशविरोधी तत्वों ने छात्रों और युवकों की भीड़ में घुस कर सड़ांध फैलाने का काम किया। 

अलग-अलग मुद्दों पर सोनम वांग्चुक का आंदोलन-अनशन लंबे अर्से से जारी था। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग से शुरू हुआ वांग्चुक का आंदोलन नीट परीक्षा लीक मामले से भी जुड़ गया। वांग्चुक आंदोलन के छात्र आंदोलन में परिवर्तन की अंतरकथा दिलचस्प भी है और दुखद भी। जिस तरह अन्ना हजारे जैसे सीधे-सादे व्यक्तित्व को बेवकूफ बना कर अरविंद केजरीवाल ने ईमानदारी और नैतिकता के साथ-साथ आम आदमी को भी झाड़ू से झाड़ दिया। ठीक उसी तर्ज पर पहाड़ के सरलबुद्धि इंसान सोनम वांग्चुक को बेवकूफ बना कर तेलचट्टे अभिजित दिपके गिरोह ने लोकतंत्र को चाटने की कोशिश की, लेकिन बीच में ही उसका भांडा फूट गया। सोनम वांग्चुक के अनशन समाप्त करने की घोषणा के बाद इन्हीं तेलचट्टों और कीट-जमात ने सोनम वांग्चुक को ही गरियाना शुरू कर दिया। वांग्चुक ने आंदोलन के बहाने फैलाई जा रही सुनियोजित हिंसा को भी अपना अनशन खत्म करने का बड़ा कारण बताया। इस पर आपराधिक मनोवृत्ति की जमातों ने वांग्चुक के विरोध का मुहाना खोल दिया। यहां तक कहने लगे कि राम मंदिर में हुई चढ़ावा-चोरी और एथेनॉल घोटाले से लोगों का ध्यान हटाने के लिए केंद्र सरकार ने सोनम वांग्चुक को प्लांटकिया था। एक मीडिया संस्थान के तेलचट्टावादी पत्रकार ने सोनम वांगचुक को बेकारबताया और कहा कि अब उनकी जरूरत नहीं रही। वैचारिक और संस्कारिक दोगलेपन की हद हो गई।

अब यह तथाकथित छात्र आंदोलन आतंकी फंडिंग, बिरयानी फंडिंग, तेलचट्टों के बर्गर और कचौड़ी पर केंद्रित होने के बाद सरकारी कृपा-फंडिंग पर शिफ्ट हो गया है। जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और टीएमसी के नेता शामिल हुए, उससे साफ हो गया था कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा बल्कि स्खलित सियासत का जरिया बन गया। छात्रों के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी भीड़ दरअसल सपाइयों, आपियों, वामियों, जेएनयूआईयों, जामियाईयों, टुकड़े-टुकड़े गैंग के शोहदों, शाहीनबागियों, तेलचट्टों, दंगाइयों और अराजकतावादियों की भीड़ थी। नीट पेपर लीक मामले में किसानवेशधारी नेता, पाकिस्तान परस्त दुर्बुद्धिजीवी, एकपक्षीय मानवतावादी फिल्मी चेहरे और स्खलित समाज के पोषक विचारक-समाजसेवी भी अपनी-अपनी दुकान खोलने जंतर-मंतर पहुंच गए और लगे विद्वत वक्तव्य जारी करने। आंदोलन में कुछ वास्तविक (जिनयुइन) छात्र, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर दिल्ली जुटे थे लेकिन वे असली मुद्दे के बजाय हिंसा और अराजकता का कुचक्र रचे जाने से निराश होकर वापस हो लिए।

और जब खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने तेलचट्टों को आंदोलन के लिए 10 लाख डॉलर यानि साढ़े नौ करोड़ रुपए से अधिक की मदद देने की सार्वजनिक घोषणा की... फिर तो आंदोलन की इतिश्री होनी ही थी। पन्नू ने बाकायदा सोशल मीडिया फोरम पर मदद की घोषणा करते हुए कहा कि भारत के छोटे-छोटे टुकड़े करने ही होंगे। पन्नू ने तेलचट्टों से 15 अगस्त के लालकिला संबोधन को भी बाधित करने का आह्वान कर डाला।

असरदार अहिंसक जनांदोलनों के लिए मशहूर कौशल किशोर के विचार देश के छात्रों और युवकों को जरूर सुनना चाहिए... मैंने उनके सामने कुछ सवाल रखे... दो बार सांसद, केंद्र सरकार में मंत्री, कई बार विधायक और यूपी सरकार में मंत्री रहे कौशल किशोर ने उन सवालों का जवाब भी दिया और लोकतंत्र की मर्यादा एवं लोकतांत्रिक अधिकार की मांग की शालीनता बनाए रखने पर जोर दिया... 

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, गुरु नानक जैसे ईश्वरीय महापुरुषों और संतों की लंबी कतार वाले देश में विकृत चित्त और चरित्र का वर्चस्व स्थापित होने लगे एवं शालीनता और सदाशयता विलुप्त होने लगे तो यह भारतवर्ष के लिए शर्म की बात तो है ही... आज के लिए इतना ही... नमस्कार... जयहिंद...