Saturday, 8 August 2026
न्यायाधिपति..! कृपया देश को डूबने से बचाएं...
अपना देश भीषण सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। आर या पार की स्थिति है। अच्छा है कि अधर की कोई स्थिति नहीं है, जिसमें वर्षों से भारतवर्ष फंसा पड़ा रहा। बीच की स्थिति कभी अच्छी नहीं होती, यह भारतवर्ष का लंबा अनुभव है। दुर्भाग्य यह है कि जातियों-फिरकों-पंथों में बंटा देश खुद को शौर्यवान कह कर अघाता रहा और लुटेरों और आतंकियों का शिकार बनता रहा। हम इतने कायर और क्लीव थे कि हमने अपना धर्म, अपना वजूद और अपना आत्मसम्मान सबकुछ आतंकवादियों के चरणों पर रख दिया और उनका धर्म और उनका चरित्र खुद पर ओढ़ लिया। अंग्रेज लुटेरों ने भी भारत की संस्कृति और परंपरा नष्ट करने का सिलसिला नहीं छोड़ा। लेकिन वे मुगलों की तरह फूहड़, बर्बर और अहमक नहीं थे। मुगलों ने मंदिर तोड़ कर और शिक्षा-पीठों में आग लगा कर सोचा कि इससे भारतीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी, लेकिन वे गलत थे। इसे चालाक अंग्रेजों ने समझा। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति की जड़ों में मट्ठा डाला... हम बोलचाल की भाषा में मट्ठा कहते हैं, जबकि अग्रेजों ने भारतीय शिक्षा-संस्कृति और संस्कार की जड़ों में तेजाब डाला... उसी तेजाब के विकृत उत्पाद शाहीनबाग या जंतर मंतर जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। उसे आंदोलन का नाम देकर कभी नागरिकों के मत्थे ठोकते हैं तो कभी किसानों तो कभी छात्रों के मत्थे। इन विकृत जमातों में छिछोरे युवक-युवतियां, गुंडे-मवाली और विदेशी षडयंत्रकारियों के देसी मोहरे हैं। इन्हें छिछोरेबाजी से लेकर पत्थरबाजी तक का उकसावा और संरक्षण नेता और नेताओं के दलाल दुर्बुद्धिजीवी दे रहे हैं, जिनकी पूरी कोशिश है कि भारत वह भारत न रहे जिसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक उपलब्धियों के आगे दुनिया हतप्रभ और हताश होती रही है। उस भारतवर्ष को अक्षुण्ण रखने में देश का सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही नाकाम साबित हुआ है। लिहाजा, अब आखिरी उम्मीद सर्वोच्च न्यायपालिका के विद्वान न्यायाधीशों पर अवलंबित है। मैंने अपने नजरिए से देश की स्थिति का जो आकलन किया है, उसे इस प्रस्तुति के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति यानि मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत के समक्ष रखा है और उनसे आग्रह किया है कि मेरी इस प्रस्तुति को जनहित याचिका हेतु आवेदन समझें। पूरे देश को कुसंस्कृति, अराजकता, अश्लीलता, फूहड़ता, हिंसकता से बचाने के लिए सख्त कानूनी पहल की आवश्यकता है, जिसे न्यायाधिपति चाहें तो अपना अभिभावकत्व स्थापित कर दीर्घकाल के लिए लागू कर सकते हैं... यही सटीक समय है। मेरी इस याचिका के आप भी साक्षी हैं, इसलिए इस प्रस्तुति https://youtu.be/lBDLntcJj6k को देखना आपकी नैतिक जिम्मेदारी भी है... धन्यवाद
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