Friday, 11 January 2019

अखिलेश-कमलनाथ की कारस्तानी पर क्या कहते हैं ऊर्जा विशेषज्ञ...


Debate with power experts on 'Akhilesh Kamalnath Karastani', special story on 'Danke ki Chot par'

'इंडिया वाच' न्यूज़ चैनल का विशेष कार्यक्रम 'डंके की चोट पर' अपनी पहली खास-खोजी खबर 'अखिलेश-कमलनाथ की कारस्तानी से यूपी को 25 साल लगता रहेगा साढ़े चार हजार करोड़ रुपए का सालाना झटका' के प्रसारण के साथ शुरू हुआ। यह खबर बड़ी संख्या में देखी गई। अखबार होता तो कहता कि बड़ी संख्या में पाठक मिले। न्यूज़ चैनल है तो अब शब्द बदलता हूं और कहता हूं कि बड़ी संख्या में दर्शक मिले... वैसे, पठनीयता दर्शनीयता के बिना संभव नहीं और दर्शनीयता में पठनीयता निहित है। उस खबर पर इतना अधिक और इतना अच्छा रेस्पॉन्स मिला कि ऊर्जा घोटाले की उसी खबर पर ऊर्जा विशेषज्ञों के साथ विशेष चर्चा आयोजित करने की मांग हुई। पिछले दिनों प्राइम-टाइम में 'इंडिया वाच' के सेंट्रल-डिबेट में इसी विषय पर विशेष चर्चा आयोजित की गई, जिसमें ऊर्जा क्षेत्र के प्रमुख विशेषज्ञ शामिल हुए। आप फिर से 'डंके की चोट पर' की उस विशेष खबर को ध्यान में रखते हुए यह विशेष चर्चा सुनें और अभियान के साथ शरीक हों... प्रभात रंजन दीन

Tuesday, 8 January 2019

‘इंडिया वाच’ का विशेष... ‘डंके की चोट पर’ यूपी की खाते भी हैं, गरियाते भी हैं कमलनाथ

प्रभात रंजन दीन
‘इंडिया वाच’ न्यूज़ चैनल पर खास और खोजी खबरों पर आधारित विशेष कार्यक्रम शुरू हुआ। कार्यक्रम का नाम रखा गया है... ‘डंके की चोट पर’। इस विशेष कार्यक्रम में ऐसी खबरें ली जाएंगी जो हमारे-आपके सरोकार से जुड़ी हों, ऐसी खबरें जो लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए जरूरी हों, ऐसी खबरें जिसे दबाने के लिए भारी दबाव हो और ऐसी खबरें जो दबाव और लुभाव में दबा दी जाती हों। ऐसी ही खबरों को हम ‘इंडिया वाच’ न्यूज़ चैनल पर जिंदा करेंगे, उसका फॉलोअप करेंगे, उस खबर का पीछा करेंगे। हम आपसे भी आग्रह करेंगे कि आप ऐसी किसी स्थिति से गुजर रहे हों जो विशेष खबर बनती हो, या आप किसी गंभीर खबर की जानकारी रखते हों, या किसी गंभीर मसले में आपकी कोई नहीं सुन रहा हो, तो हमारे पास आएं। हमें prabhatranjandeen@gmail.com पर सूचित करें। हम आपकी समस्या को मजबूत आवाज देंगे, हम आपकी समस्याओं को अपनी समस्या मानेंगे और व्यवस्था तंत्र से जवाब मांगेंगे, डंके की चोट पर...
हमने कार्यक्रम की शुरुआत की मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ से... कमलनाथ ने उत्तर प्रदेश के लोगों के आत्मसम्मान पर प्रहार किया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करते ही कमलनाथ ने उत्तर प्रदेश पर हमला बोला कि यूपी के लोग एमपी का रोजगार खा रहे हैं। मध्यप्रदेश का जो नेता उत्तर प्रदेश का हजारों करोड़ रुपया सिलसिलेवार तरीके से डकार रहा है, वह कहता है कि यूपी के लोग एमपी का रोजगार खा रहे हैं। चमकदार शीशे के घर में रहने वाले कमलनाथ ने यूपी के नौजवानों पर पत्थर फेंका है। हमने उस पत्थर का जवाब दिया है। सरकार ऊंचा सुनती है तो सुना करे। आम लोग सुनें... नौजवान सुनें... फिर इतना दबाव बने कि यूपी सरकार का नैतिक बोध जगे और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ यूपी के बेरोजगारों के अपमान का हर्जाना भरने के लिए विवश हो जाएं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके कुछ खास रिश्तेदारों की वजह से उत्तर प्रदेश को हर साल चार हजार करोड़ रुपए का सिलसिलेवार नुकसान हो रहा है। यूपी की पिछली सरकार, यानी अखिलेश यादव की सरकार ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और एमपी के मौजूदा मुख्यमंत्री कमलनाथ को उपकृत करने के लिए उत्तर प्रदेश के सारे हित ताक पर रख दिए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की दरियादिली की वजह से उत्तर प्रदेश को तकरीबन चार हजार करोड़ का सालाना झटका 25 साल तक लगता रहेगा। अखिलेश यादव और कमलनाथ की साठगांठ का यह महज एक पहलू है। इसने उत्तर प्रदेश को कई तरफ से नुकसान पहुंचाया है। इस नुकसान का सिलसिला लगातार जारी है... योगी सरकार भी इस क्रमिक नुकसान की तरफ आंखें मूंदे हुई है।
कांग्रेस नेता कमलनाथ, कमलनाथ की बहन नीता पुरी, बहनोई दीपक पुरी और भांजे रातुल पुरी के आगे अखिलेश यादव की सरकार बिछ गई थी। यह बिछना-बिछौना इतना प्रगाढ़ हुआ कि यूपी को लूटने का दरवाजा खोल दिया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह पहले एक कंपनी यूपी में घुसी। फिर कई कंपनियों ने यहां पैर पसार लिए। यहां तक कि नाम बदल-बदल कर ‘कमलनाथों’ की कंपनियां प्रदेश के खजाने से खेल रही हैं। ...और कमलनाथ समेत उनके रिश्तेदार भारी मुनाफा कमा रहे हैं। इस कमाई का उच्छिष्ट सपाई सत्ता के नेता और नौकरशाह पहले ही चाट चुके हैं।
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री कमलनाथ से प्रभावित होने के बाद यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बिजली खरीदने के लिए उस कम्पनी के साथ 25 सालाना करार किया जिसने निविदा में बिजली की ऊंची दर कोट की थी। निविदा में शामिल सात कम्पनियों में 'मोज़र बेयर' छठे नम्बर पर थी। लेकिन प्रदेश सरकार केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के कारण 'मोज़र बेयर' को उपकृत करने पर आमादा थी। लिहाजा, सरकार ने निविदा में शामिल सातों कम्पनियों से बिजली खरीदने का फैसला कर लिया। छठे नम्बर की कम्पनी को फायदा पहुंचाने के लिए सातवें नम्बर की कम्पनी की भी लॉटरी खुल गई। जिन कम्पनियों ने न्यूनतम दर कोट की थी, उन्हें अखिलेश यादव ने बेवकूफ बना दिया। 'मोज़र बेयर' कम्पनी कांग्रेस नेता कमलनाथ के बहनोई दीपक पुरी की है। 2016-17 से 25 साल के लिए बिजली खरीदने का करार करने की अखिलेश यादव को इतनी छटपटाहट थी कि उन्होंने 2013 में ही इसका वारान्यारा कर दिया।
2017 से 25 साल के लिए करार। यानी, अखिलेश सरकार ने वर्ष 2042 तक के लिए यह करार किया। इस करार के लिए अखिलेश इतने बेकरार क्यों थे? इसकी वजहें तो हम भी समझते हैं और आप भी समझते हैं। नेताओं की समाजसेवा के यही असली निहितार्थ हैं...
अब हम मामले की तफसील में चलते हैं... अखिलेश सरकार ने छह हजार मेगावाट बिजली खरीदने के लिए निविदा आमंत्रित की थी। इसमें कुल 17 कम्पनियों ने हिस्सा लिया था। इनमें से ऊपर की सात कंपनियां उठा ली गईं, क्योंकि छठे नंबर पर कमलनाथ के बहनोई दीपक पुरी की कंपनी मोज़र बेयर अंटकी थी। सात कंपनियों में एनएसएल पावर ने तीन सौ मेगावाट बिजली देने के लिए सबसे कम 4.48 रुपए प्रति युनिट की कीमत कोट की थी। टीआरएन इनर्जी ने 390 मेगावाट बिजली देने के लिए 4.886 रुपए प्रति युनिट, लैंको-बाबंध ने 390 मेगावाट बिजली देने के लिए 5.074 रुपए प्रति युनिट, आरकेएम पावरग्रीन ने 350 मेगावाट बिजली देने के लिए 5.088 रुपए प्रति युनिट, केएसके इनर्जी ने 1000 मेगावाट बिजली देने के लिए 5.443 रुपए, मोज़र बेयर ने 361 मेगावाट बिजली देने के लिए 5.730 रुपए प्रति युनिट और नवयुग पावर ने 800 मेगावाट बिजली देने के लिए 5.843 रुपए प्रति युनिट कीमत कोट की थी।
न्यूनतम दर कोट करने वाली तीन कंपनियों का हाल कांग्रेस नेता कमलनाथ के प्रभाव और पूंजी के दबाव में भारतीय लोकतंत्र जैसा हो गया। तीनों कंपनियां अपनी जमानत राशि जमा कर फंस गईं। काम छोड़ा तो जमानत जब्त और काम पकड़ा तो घाटे का सौदा...
न्यूनतम दर कोट करने वाली तीन कम्पनियों 'एनएसएल पावर्स', 'टीआरएन इनर्जी' और 'लैंको बाबंध' के साथ सरकार का 'पावर परचेज़ एग्रीमेंट' पूरा भी हो गया था। लेकिन अचानक शीर्ष सत्ता की तरफ सेकेंद्रीय मंत्री कमलनाथ का संदर्भ सामने आया। संकेत पाते ही नौकरशाही ने तिकड़म बुनना शुरू कर दिया। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड की निविदा आकलन समिति (बिड इवैलुएशन कमेटी) ने पांचवें, छठे और सातवें नम्बर की कम्पनी को भी चयनित कम्पनियों की सूची में डाल लिया। 'मोज़र बेयर' छठे नम्बर पर थी। तो उसके एक ऊपर और एक नीचे वाले के भी 'भाग' खुल गए। अखिलेश सरकार ने सबसे ऊंची बोली लगाने वाली तीन कंपनियों को छह हजार में से दो हजार मेगावाट बिजली खरीदने का ठेका दे दिया। ...'सत्यमेव जयते दिवस' के एक दिन पहले एक अक्टूबर 2013 को अखिलेश सरकार ने 'कमलनाथ जयते दिवस' मना लिया। कमलनाथ मोज़र बेयर कंपनी के बड़े शेयरधारक हैं। आप खुद देखिए इस शपथनामे में उनकी यह स्वीकारोक्ति।
कमलनाथ पर इतना उपकार करने के बाद भी अखिलेश का मन नहीं भरा। आप आश्चर्य करेंगे कि अखिलेश यादव ने बिजली की सबसे ऊंची कीमत कोट करने वाली तीनों कंपनियों को दो हजार मेगावाट बिजली खरीदने के अलावा 2160 मेगावाट और अतिरिक्त बिजली खरीदने की परमिट भी दे दी। जिस समय यह करार हुआ उस समय ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव संजय अग्रवाल थे। अग्रवाल योगी सरकार के भी उतने ही चहेते हैं, जितने अखिलेश सरकार के थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही ऊर्जा विभाग के प्रभारी मंत्री भी थे। सत्ता संभालने के बाद अखिलेश यादव यही कहते रहे कि मायावती सरकार 25 हजार करोड़ का बोझ डाल कर गईं। लेकिन अखिलेश यादव खुद 25 साल तक साढ़े चार हजार करोड़ रुपए के सालाना झटके का इंतजाम करके गए। योगी को इसका हिसाब-किताब करने की फुर्सत नहीं है। आपको यह बताने का प्रसंग भी बनता है कि वर्ष 2013 में केंद्रीय मंत्री कमलनाथ अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बहनोई दीपक पुरी की कंपनी को उत्तर प्रदेश में हजारों करोड़ का ठेका दिलाने में लगे थे, उसके दो साल पहले वे अपने प्रभाव के बूते बहनोई को पद्मश्री की उपाधि भी दिला चुके थे।
अखिलेश यादव ने कमलनाथ के बहनोई दीपक पुरी को तो फायदा पहुंचाया ही, कमलनाथ के भांजे रातुल पुरी के लिए भी सरकारी खजाना खोल दिया। कमलनाथ के भांजे को फायदा पहुंचाने के लिए नियम कानून और सरकारी प्रावधानों के साथ खुली धोखाधड़ी की गई। इस धोखाधड़ी पर कार्रवाई करने के बजाय अखिलेश सरकार ने इस धोखाधड़ी पर मुहर लगा दी। सरकार ने यूपी इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन यानी उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के जरिए इस धोखाधड़ी पर आधिकारिक मुहर लगवाई। इस कुचक्र में आयोग के तत्कालीन चेयरमैन देशदीपक वर्मा, सदस्य इंदुभूषण पांडेय और संजय अग्रवाल शामिल थे।
अखिलेश सरकार ने सौर ऊर्जा के नाम पर भी कमलनाथ के बहनोई दीपक पुरी की कंपनी मोज़र बेयर के साथ 25 वर्षीय करार किया। 130 मेगावाट बिजली के उत्पादन के लिए जिन सात कंपनियों के साथ ‘पावर परचेज़ एग्रीमेंट’ किया गया था उनमें कमलनाथ के बहनोई की कंपनी मोज़र बेयर शामिल थी, जिसे 20 मेगावाट प्रोजेक्ट की मंजूरी मिली थी। प्रोजेक्ट शुरू करने की मियाद 13 महीने तय थी। लेकिन अखिलेश सरकार करार पर हस्ताक्षर कर तारीख भूल गई। जनवरी 2015 में करार हुआ और 13 महीने क्या, 39 महीने बीत गए। अब तक प्रोजेक्ट गति नहीं पकड़ सका। हर गांव में बिजली पहुंचाने का खोखला दावा करने वाली योगी सरकार को भी इससे कोई मतलब नहीं है कि कौन प्रोजेक्ट शुरू हुआ, कौन नहीं। पर सवाल सामने है कि ऐसा क्यों हुआ? सरकार के साथ मिलीभगत करके किस तरह हुई धोखाधड़ी... इसे जानना जरूरी है...
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि अचानक स्पिनेल इनर्जी एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और हिंदुस्तान क्लीन-इनर्जी लिमिटेड नामकी दो कंपनियोंने मोज़र बेयर के साथ हुए करार पर अपना दावा ठोक दिया। दावा ठोकने वाली दोनों कंपनियों ने कहा कि कि वे ही मोज़र बेयर कंपनी हैं। यह सब पूर्व प्रायोजित था। दो कंपनियों का दावा याचिका (Petition No. 1029 of 2015) की शक्ल में उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत नियामक आयोग के समक्ष पहुंचा। याचिका में मांग की गई कि सोलर पावर प्रोजेक्ट का काम उन्हें ही दिया जाए। सौर ऊर्जा वाला विभाग यूपी-नेडा कहता रहा कि प्रोजेक्ट का करार मोज़र बेयर के साथ हुआ है, दूसरी कंपनी का दावा गैर कानूनी है। मोज़र बेयर होने का दावा करने वाली दोनों कंपनियों के मालिक कमलनाथ के भांजे रातुल पुरी निकले। फिर नियम-कानून कहां चलने वाला था। यूपी का खजाना लूटने के लिए सियासी हस्तियों के रिश्तेदारों ने धोखा-फरेब की इंतिहा कर दी।
सत्ता और पूंजी के दबाव के आगे नेडा की क्या चलती। कमलनाथ के बहनोई को ऑबलाइज़ करने के बाद बारी कमलनाथ के भांजे को उपकृत करने की थी.राज्य विद्युत नियामक आयोग सरकारी दस्तावेजों पर तारीख दर तारीख का रायता फैलाता रहा और आखिरकार एक दिन इस धोखाधड़ी पर स्वीकृति की आधिकारिक मुहर लगा दी... यह मंजूरी वर्ष 2016 में अखिलेश सरकार के जाने और योगी सरकार के आने के पहले ऐन मौके पर दी गई। बुंदेलखंड के उन ग्रामीणों की भी सुनिए जिनकी जमीनें स्पिनेल कंपनी ने लीज़ पर लीं, हर साल साढ़े सात फीसदी बढ़ा कर किराया देने का वादा किया, लेकिन वादा भूल गई। सरकारी करार मोज़र बेयर के नाम पर और जमीन लीज़ पर लेकर काम कर रही है स्पिनेल इनर्जी... है न यह दुख, आश्चर्य और हास्य देने वाला अपना मजाकिया सिस्टम..!
बुंदेलखंड के महोबा जिले में चरखारी तहसील के सूपा गांव में स्पिनेल इनर्जी एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और हिन्दुस्तान ईपीसी कम्पनी की संयुक्त ईकाई ने 20 मेगावाट सोलर पावर प्रोजेक्ट के लिए वर्ष 2015 में लगभग एक दर्जन किसानों की करीब सौ एकड़ भूमि 29 साल के लिए लीज़ पर ली है। किसानों को 16 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से भुगतान किया जा रहा है। किसान ठगा सा महसूस करते हैं, क्योंकि उनसे कहा गया था कि हर साल 7.50 प्रतिशत बढ़ाकर पैसा मिलेगा। लेकिन कंपनी ने यह वादा नहीं निभाया। यह भी विचित्र है कि कमलनाथ के बहनोई दीपक पुरी की मोज़र बेयर कंपनी को बुंदेलखंड के महोबा जिले में कुलपहाड़ तहसील में सोलर पावर प्रोजेक्ट लगाने का करार हुआ था। लेकिन दीपक पुरी के बेटे रातुल पुरी यानी कमलनाथ के भांजे की कंपनी स्पिनेल इनर्जी ने चरखारी तहसील के सूपा गांव में प्रोजेक्ट लगाया है। 

Sunday, 6 January 2019

‘प्लाएबल’ और ‘प्रेस्टिट्यूट’ में फंसी पत्रकारिता

प्रभात रंजन दीन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू करने वाली पत्रकारा के सम्बन्ध में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘प्लाएबल’ शब्द का इस्तेमाल कर दिया तो देशभर में शोर मच गया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह किसी भी पत्रकार को कहीं भी डाट देते हैं और हेयता से भरा बर्ताव करते हैं तो शोर नहीं मचता। कांग्रेस नेता ‘प्लाएबल’ कहता है, ‘अपना-पत्रकार’ कहता है। भाजपा नेता ‘प्रेस्टिट्यूट’ कहता है... पत्रकारों ने अपना चरित्र और कृतित्व ही ऐसा बना लिया है, कि उसे इस तरह की अपमानजनक संज्ञाएं दी जा रही हैं। अपमान पर भी पत्रकार इस समझ-बूझ के साथ चिहुंकता है कि यह अपमान फलां पार्टी ने किया तो आपत्तिजनक और फलां पार्टी ने किया तो स्वीकार्य।

नेताओं ने पत्रकारों को भ्रष्ट करने के सिवा किया क्या आज तक..! पत्रकार नैतिक जमीन पर मजबूती से खड़े हों, तो नेताओं का उससे नुकसान होगा। सो, उन्होंने बड़े नियोजित तरीके से पत्रकारों को चुन-चुन कर भ्रष्ट बनाने का काम किया। कोई अखबार का मालिक बन गया तो कोई चैनल चलाने लगा। किसी को राज्यसभा का सदस्य बना दिया तो किसी को पद्मश्री पकड़ा दिया। फिर ‘प्लाएबल’ कह ही दिया तो केंचुआनुकूलित पत्रकारों पर क्या फर्क पड़ता है... या ‘प्रेस्टिट्यूट’ ही कह दिया तो उससे वेश्यानुकूलित पत्रकारों पर क्या फर्क पड़ता है..! ‘ट्रेंड्स जरनल’ के प्रकाशक गेराल्ड सेलेंटे ने दरअसल सबसे पहले ‘प्रेस्टिट्यूट’ शब्द का इस्तेमाल किया। खबरों के साथ बेईमानी और सौदेबाजी करने वाले पत्रकारों के लिए सेलेंटे ने ‘प्रेस’ और ‘प्रॉस्टिट्यूट’ को मिला कर ‘प्रेस्टिट्यूट’ शब्द रच दिया था।

बहरहाल, राजनीतिक दलों द्वारा पत्रकारों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ऐसी ही शब्दावलियों को लेकर ‘इंडिया वाच’ समाचार चैनल ने एक खास बहस आयोजित की। इस बहस में केवल दो राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया गया, एक कांग्रेस और दूसरी भाजपा। दोनों ही पार्टियां इस मसले में पक्षकार हैं। बहस में निष्पक्ष समाजसेवी को शामिल किया गया जो राजनीतिक दलों और पत्रकारों दोनों को आईना दिखा सके। बहस में शामिल होने वालों पत्रकारों के लिए यह खास तौर पर ध्यान रखा गया कि ऐसे पत्रकार बहस के जरिए आत्ममंथन की प्रक्रिया में शरीक हों, जो सत्ता और पूंजी की दहलीज पर कभी मत्था नहीं टेकते...

Sunday, 30 December 2018

योगी सीएम हैं या जज..?

प्रभात रंजन दीन
‘पुलिस वीक’ समारोह में आला पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अपराधियों का कोई मानवाधिकार नहीं होता। मुख्यमंत्री का यह बयान सुर्खियों में आया। अपराधी जिसे निशाना बनाता है उसका मानवाधिकार नहीं देखता तो अपराधी का मानवाधिकार क्यों देखा जाए? मुख्यमंत्री का आशय यही था। लेकिन क्या कोई अपराधी अपराध करते समय ऐन मौके पर पुलिस की गोली से ढेर होता है कभी? ऐसा कभी नहीं होता। फिर पुलिस-इन्काउंटर की ‘नीति’ पर सार्वजनिक मुहर लगाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह कैसे कह सकते हैं कि अपराधी का कोई मानवाधिकार नहीं हो सकता। जब पुलिस घटनास्थल पर होती ही नहीं तो यह कौन तय करेगा कि कौन अपराधी है और कौन नहीं? किसी व्यक्ति को गोली मार कर ढेर कर रही पुलिस यह कैसे तय करेगी कि वह अपराधी है कि नहीं? मुख्यमंत्री ने यह कैसे तय कर लिया कि वे न्यायाधीश भी हैं? मीडिया-ट्रायल की दुहाई देकर पत्रकारों को जज न बनने की सलाह देने वाले योगी या इन जैसे नेता, खुद न्यायाधीश बन कर यह कैसे तय कर देते हैं कि कोई अपराधी है या साधु? पुलिस अगर अपराध होते समय घटनास्थल पर पहुंचने का चरित्र निभाए तो अपराध होगा ही नहीं। अधिकतर समय पुलिस इन्काउंटर ‘मैनेज्ड’ होता है, यानि फर्जी होता है। तभी साढ़े बारह सौ फर्जी मुठभेड़ के मामलों में से साढ़े चार सौ से अधिक मामले उत्तर प्रदेश के पाए जाते हैं। जिस देश में आजादी के बाद अंग्रेजों का मध्यकालिक कानून लागू कर दिया जाता है। जिस देश में हत्यारा भी 302 का मुजरिम होता है और सेल्फ-डिफेंस में गोली चलाने वाला व्यक्ति भी 302 का मुजरिम होकर जेल जाता है, उस देश के एक राज्य का मुख्यमंत्री यह कैसे कह सकता है कि अपराधी कौन है? ...और किसका मानवाधिकार है और किसका नहीं है? फिर क्यों नहीं सरकारें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या राज्य मानवाधिकार आयोग भंग कर देतीं? जजों की कुर्सियों पर नेता ही बैठ कर सब क्यों नहीं तय कर देते? इस ज्वलंत विषय पर ‘इंडिया वाच’ न्यूज़ चैनल ने चर्चा आयोजित की। आप भी सुनें, विचार करें, उद्वेलित हों और अपना विचार भेजें...

Tuesday, 25 December 2018

सपा-बसपा के बंधन में कांग्रेस की 'गांठ'..!

प्रभात रंजन दीन
मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जीत ने फिर से महागठबंधन के गठन और उसके औचित्य पर बहस तेज कर दी। इन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत के साथ जीत दर्ज कर प्रामाणिक तौर पर यह दिखा दिया कि बिना किसी तालमेल और गठबंधन किए भी मतदाताओं का विश्वास जीता जा सकता है। इससे महागठबंधन को आतुर कई प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं में बेचैनी बढ़ गई। सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को इससे सबसे अधिक झटका लगा। कांग्रेस ने तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा दोनों को तालमेल से बाहर झटक दिया। इस झटके का असर यह हुआ कि परिणाम आने के बाद तीनों राज्यों में बनी कांग्रेस की सरकार के शपथग्रहण समारोह में सपा और बसपा के नेता शरीक नहीं हुए। अब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी सपा-बसपा को झटकने की तैयारी में है। सपा-बसपा कांग्रेस को लेकर बेखौफ दिखने का उपक्रम जरूर करती है, लेकिन अंदर अंदर खौफ, आशंका और परेशानी घर कर रही है। यह डर सता रहा है कि अगर गठबंधन नहीं हुआ तो लोकसभा चुनाव में बेड़ा पार कैसे होगा।
सपा-बसपा की बेचैनी इस कदर बढ़ी कि सीटों को लेकर आपसी सहमति और इसमें राष्ट्रीय लोक दल और भाजपा के सहयोगी दल भारतीय समाज पार्टी (सुहेलदेव) को भी शरीक करने की खबर कुछ अखबारों में निरूपित (प्लांट) करा दी गई। खबर प्रकाशित-प्रसारित होने पर जब सरगर्मी फैली तब दोनों पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं की तरफ से इसका खंडन भी जारी हुआ। एक तरफ सपा नेता प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने इस खबर को गलत बताया तो दूसरी तरफ बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्र ने सीटों को लेकर सपा-बसपा में ऐसी किसी भी सहमति की खबर का खंडन किया। खंडन-मंडन के बावजूद बहस तो चल निकली... गठबंधन की संभावनाओं और उसके तमाम पहलुओं पर विचार करने के लिए ‘इंडिया वाच’ न्यूज़ चैनल ने भी खास चर्चा आयोजित की। आप भी सुनें...

Sunday, 23 December 2018

नसीरुद्दीन शाह की अभिव्यक्ति की आजादी तमीजी है या बदतमीजी..!

प्रभात रंजन दीन
फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कह दिया कि उन्हें अब अपने देश में डर लगता है। नसीरुद्दीन शाह ने यह नहीं कहा कि उन्हें किस देश में डर नहीं लगता है। लेकिन उत्तर प्रदेश नव निर्माण सेना के अध्यक्ष अमित जानी ने उन्हें पाकिस्तान जाने का हवाई टिकट भेज दिया। अमित जानी ने नसीरुद्दीन शाह को 14 अगस्त का हवाई टिकट भेजा है, जिस दिन पाकिस्तान की आजादी का दिवस होता है।
भारतवर्ष में अभिव्यक्ति की आजादी है, इसलिए जिसे जो मन होता है, बोलता है। लेकिन नसीरुद्दीन शाह जैसे महत्वपूर्ण लोगों को क्या बोलना है और कैसे बोलना है कि देश का सामाजिक समरसता और व्यवहारगत संतुलन न बिगड़े, इसका ध्यान तो रखना ही चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में गलत तरीके से आउट किए जाने पर विराट कोहली जब अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया जताते हैं तो मुम्बई में बैठे नसीरुद्दीन शाह विराट कोहली को बदतमीज कहते हैं, लेकिन अपनी बोली में तमीज का ख्याल नहीं रखते। अगर विरोध हो तो नसीर अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला भी देने लगते हैं। उन्हें विराट कोहली की अभिव्यक्ति की आजादी नहीं समझ में आती, केवल अपनी ही समझ में आती है। मशहूर पूर्व क्रिकेटर सैयद किरमानी ने कहा भी कि विराट कोहली को बदतमीज कहने का नसीरुद्दीन शाह को कोई हक नहीं है। कोहली की प्रतिक्रिया उसका नैसर्गिक अधिकार है। नसीरुद्दीन शाह की बोली से देशभर में प्रतिरोध के स्वर उठने लगे। इस प्रतिरोध में तर्क भी हैं और कुतर्क भी। नसीरुद्दीन शाह ने राजनीतिकों को भी मौका दिया। बहरहाल, अभिव्यक्ति की आजादी की इसी तमीजी और बदतमीजी पर ‘इंडिया वाच’ न्यूज़ चैनल ने चर्चा आयोजित की... आप भी देखें, सुनें और विचार दें।

Friday, 21 December 2018

मुस्लिम महिलाओं के चेहरे पर खुशी और आत्मविश्वास हम क्यों नहीं देखना चाहते..?


प्रभात रंजन दीन
तीन तलाक के मसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने केंद्र सरकार को यह चेतावनी दी कि अगर तीन तलाक को रोकने के लिए केंद्र ने कानून बनाया तो बोर्ड सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा। इस चेतावनी के बरक्स ऑल इंडिया महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक रोकने के लिए सख्त कानून लाने की हिमायत की और तमाम राजनीतिक दलों से यह अपील की कि विधेयक को राज्यसभा से पारित होने और मुस्लिम महिलाओं के हित-संरक्षण का कानून बनने में वे सहयोग दें।
कांग्रेस इस मसले पर चुप है, या यह भी कह सकते हैं कि मुखर नहीं है, लेकिन वह इस मसले पर भाजपा को बढ़त लेते नहीं देखना चाहती। अन्य प्रमुख विपक्षी दल भी चुप्पी ही साधे हैं। तीन तलाक के चलन को सुप्रीम कोर्ट ने भी असंवैधानिक करार दिया है और केंद्र सरकार से कहा है कि अगर वह इस असंवैधानिक चलन को रोकना चाहती है तो कानून बना सकती है। केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई, लेकिन अध्यादेश मानने को कोई तैयार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के मंतव्य और केंद्र सरकार के अध्यादेश के बावजूद तीन तलाक जारी है।
शाहबानो प्रकरण में कांग्रेस सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत जाकर तलाक संरक्षण कानून बनाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदा भाजपा सरकार मुस्लिम महिलाओं के विवाह अधिकार को संरक्षण देने वाला कानून बनाने का प्रयास कर रही है। इन दोनों कानून के फर्क को देखना होगा। मानवीयता कहां है और तुष्टिवादिता कहां हैं, इसे रेखांकित करना होगा। हमारे राजनीतिक दल किसे संरक्षण देने की अधिक फिक्र करते हैं, इसे स्पष्ट तौर पर समझना होगा। कौन सा फैसला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर लिया गया और कौन सा फैसला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप लिया गया, इसे संवैधानिक कसौटी पर कस कर सही या गलत के फर्क को तय करना ही होगा...
हम राजनीतिक सहमतियां और असहमतियां रख सकते हैं। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है। लेकिन हम इतने भी राजनीतिक न हो जाएं कि हम सामाजिक और मानवीय संवेदनशीलता के भाव से दूर हो जाएं। मुस्लिम महिलाओं के लिए विवाह अधिकार संरक्षण कानून बनाने की पहल मानवीय पहल है। इसमें हम राजनीति क्यों तलाशते हैं? मानवीय दृष्टिकोण क्यों नहीं तलाशते? किसी नासमझ पति के तीन तलाक के अहमकी ऐलान से कोई महिला किन दुरूह परिस्थितियों का सामना करती है, उसे हम महसूस करेंगे कि नहीं? नासमझ शौहर को तलाक का पश्चाताप होने पर उस निरीह महिला को हलाला जैसी किन वीभत्स दुर्गतियों से गुजरना होता है, वह उसका मन और उसका शरीर ही जानता है और भुगतता है। किसी मर्द को यह कैसे स्वीकार होता है? ऐसे चलन को अगर बद-चलन कहा जाए तो इसमें कौन सा राजनीतिक विचार आड़े आता है? जरा बताइये? कट्टरता और अहमकपने से समाज नहीं चलता। समाज मानवीयता और सदाशयता से चलता है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जब हिंदू कोड बिल ला रहे थे, तब इसी तरह कट्टर हिंदूवादी अहमक चिल्लपों मचाए हुए थे। लेकिन इन विरोधों के बावजूद हिंदू कोड बिल पास हुआ और उसका फायदा हिंदू महिलाओं के संरक्षित अधिकार और उनके आत्मविश्वास से झलकता है। ऐसा ही आत्मविश्वास मुस्लिम महिलाओं के चेहरे पर भी तो दिखना चाहिए। इसमें किसी को आपत्ति क्यों हो? ...और अगर आपत्ति होगी तो उसे गैर-मानवीय और गैर-कानूनी माना ही जाना चाहिए। इसी मसले पर ‘इंडिया वाच’ समाचार चैनल ने चर्चा आयोजित की, आप भी देखें, सुनें, विचार करें और विचार दें...