Tuesday, 16 October 2018

#योगी सरकारः प्रशासन ‘बदतरीन’, अदालत ‘बेहतरीन’..!

#योगी सरकार और प्रशासन का समन्वय पूरी तरह फेल है, जबकि अदालत और सरकार का सामंजस्य परवान चढ़ रहा है. इस ‘फेल’ और ‘पास’, दोनों के अपने अलग-अलग निहितार्थ हैं और स्वार्थ हैं...

प्रशासन और सरकार का ‘बदतरीन’ समन्वय

प्रभात रंजन दीन
चोर ही चोर-चोर चिल्लाता हुआ दौड़ रहा है. जनता अवाक है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस के सिपाही ने एक आम नागरिक की गोली मार कर हत्या कर दी और अब पुलिसकर्मी ही विद्रोह पर भी उतारू हैं. यूपी पुलिस ने चोर के चोर-चोर चिल्लाने की कहानी यथार्थ में बदल दी है. योगी सरकार चुप है. सरकार चुनाव का समय देख रही है. हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी में सरकार को जाट दिखाई दे रहा है. सरकार को चुनाव के समय पुलिस की नाराजगी का खतरा दिख रहा है. आम नागरिक में क्या है! आम नागरिक तो एक गिनती है. इधर-उधर से लेकर पूरी कर ली जाएगी. देश की ‘लोकतांत्रिक’ सरकारों की यही असलियत है. खुलेआम की गई हत्या पर इतनी सीनाजोरी प्रदेश के लोग पहली बार देख रहे हैं. खुलेआम की गई हत्या पर सरकार की इतनी कमजोरी भी प्रदेश के लोग पहली बार देख रहे हैं. एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि इस तरह अगर किसी दलित की हत्या हुई होती तो मुख्यमंत्री बदल गया होता. अगर किसी पिछड़े की हत्या हुई होती तो पुलिस महानिदेशक बदल गया होता और अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति की पुलिस के हाथों हत्या हुई होती सारे विपक्षी दल सड़क पर उतर आए होते. कितनी अजीबोगरीब और दुखद स्थिति है कि अब अपराध की घटना भी जाति के एंगल से देखी-समझी जाती है और उसे उसी मुताबिक ‘हैंडल’ किया जाता है.
लखनऊ में विवेक तिवारी नामक एक आम नागरिक की हत्या करने वाले सिपाही प्रशांत चौधरी के बचाव में यूपी पुलिस काली पट्टी बांध कर अपनी नाराजगी दिखा रही है. यह सरकार के खिलाफ खुले विद्रोह का ऐलान है. पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह समेत पूरी सरकार इसे काबू में करने में फेल है. प्रशासनिक अराजकता की स्थिति बनी हुई है. यूपी पुलिस के सिपाही हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी के प्रति भारी समर्थन जता रहे हैं और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपए का खुला चंदा दे रहे हैं. खुलेआम कहा जा रहा है कि हत्यारोपी प्रशांत चौधरी का मुकदमा लड़ने के लिए कम से कम पांच करोड़ रुपए का चंदा जमा किया जाएगा. पुलिसकर्मियों ने सोशल-मीडिया पर खुलेआम अभियान चला रखा है. हत्यारोपी के समर्थन में पुलिस वालों का इस तरह विद्रोह पर उतरना कानून व्यवस्था के अप्रासंगिक होने की सांकेतिक घोषणा है. उत्तर प्रदेश पुलिस ने ‘पुलिस-एक्ट’ की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं. कानून को ताक पर रखने वाले आम नागरिकों को कानून का पाठ पढ़ाएंगे तो लोग उसे कैसे और क्यों मानेंगे, इसकी गंभीरता सत्ता अलमबरदारों को समझ में नहीं आ रही है. सरकार की चुप्पी, सरकार के आत्मसमर्पण की सनद है.
एक आला पुलिस अधिकारी ने इसे बेहद चिंताजनक स्थिति बताते हुए कहा कि पुलिस का यह विद्रोही रवैया आने वाले दिनों में आपसी मारा-मारी और अधिकारी पर गोली चलाने तक की स्थितियों का संकेत दे रहा है. इसे समय रहते नहीं निपटा गया तो हालात बेकाबू होते चले जाएंगे. उक्त अधिकारी ने स्पष्ट कहा कि इसे हैंडल करने में सरकार की अकुशलता साफ तौर पर साबित हो चुकी है. जबकि इस मसले को अत्यंत सरलतापूर्वक किंतु दृढ़तापूर्वक संभाला जा सकता था. सिपाही प्रशांत चौधरी के हाथों जिन विवेक तिवारी की हत्या हुई, उनका परिवार भी सदमे में है. परिवार के सदस्य कहीं बाहर निकलने से भी डर रहे हैं. उन्हें इस बात का डर है कि रास्ते में पुलिस का गुस्सा कहीं उन्हीं पर न बरप जाए. पुलिस प्रशासन की अराजकता का ही उदाहरण है कि विवेक तिवारी की हत्या के बाद एक तरफ लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक यह बयान दे रहा था कि हत्यारोपी सिपाही को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि दूसरी तरफ हत्यारोपी सिपाही गोमती नगर थाने में अलग एफआईआर लिखवाने के लिए हंगामा खड़ा किए था. वह मीडिया के सामने भी मूंछें तानकर खुद को बेकसूर बता रहा था और कह रहा था कि उसने अपनी जान बचाने के लिए हत्या की है.
पुलिस के बगावती तेवर अख्तियार करने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत योगी मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों ने इस मसले से खुद को अलग कर लिया. मुख्यमंत्री ने शुरुआती दौर में मामला संभालने की कोशिश की, लेकिन फिर वे अचानक नेपथ्य में चले गए. सत्ता गलियारे के जानकारों का कहना है कि पार्टी आलाकमान ने मुख्यमंत्री को मौन साधे रखने को कहा. पूरा प्रकरण पुलिस के मत्थे छोड़ दिया गया. पुलिस की पूरी तैयारी मामले की लीपापोती करने की थी, लेकिन मामले के मीडिया में तूल पकड़ने के कारण पुलिस अपनी कारगुजारी में कामयाब नहीं हो पाई. लेकिन विद्रोह पर उतारू होकर यूपी पुलिस ने दिखा दिया कि हत्या जैसे संज्ञेय अपराध को लेकर भी यूपी पुलिस कितनी संवेदनहीन है. एक पुलिस अधिकारी ने ही कहा कि मुठभेड़ की अराजक-आजादी दिए जाने का यह नतीजा है.
हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी के समर्थन में सिपाहियों ने यहां तक धमकी दे रखी है कि अगर उसके खिलाफ दर्ज केस वापस नहीं लिए जाते हैं सारे पुलिसकर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. इसे सोशल-साइट्स पर भी खूब वायरल किया गया. सोशल साइट्स से अलग रहने की डीजीपी की हिदायत को भी ठेंगा दिखा दिया गया. विद्रोही तेवर अख्तियार करने वाले पुलिसकर्मियों के समर्थन में अराजपत्रित कर्मचारी सेवा एसोसिएशन भी उतर आया, लेकिन सरकार चुप्पी ही साधे रही. सबसे खतरनाक स्थिति यह है कि पुलिसकर्मियों के इस अभियान के समर्थन में प्रॉविन्शियल आर्म्ड कांसटेबलरी (पीएसी) भी सामने आ गई है. कानपुर स्थित पीएसी की 37वीं बटालियन में तैनात सिपाही प्रकाश पाठक ने खुलेआम कहा कि सिपाही प्रशांत चौधरी ने आत्मरक्षा में गोली चलाई. पीएसी के उक्त सिपाही ने सीधे आरोप लगाया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बिना जांच के ही प्रशांत चौधरी के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं. हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी और घटना के समय उसके साथ रहे सिपाही संदीप कुमार के पक्ष में सोशल-साइट्स पर सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी लिखने वाले एटा के सिपाही सर्वेश चौधरी को निलंबित तो कर दिया गया, लेकिन इससे उसका बयान नहीं रुक पाया. धीरे-धीरे इस मामले को जाट भावना से भी जोड़ा जा रहा है. पुलिस मुख्यालय से लेकर कानून व्यवस्था के आला पुलिस अफसर तक यही कहते रहे कि काली पट्टी बांध कर विरोध जताने वाले सिपाहियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. इस प्रसंग में तीन सिपाहियों को निलंबित भी किया गया और तीन थानों के प्रभारियों का तबादला भी हुआ, लेकिन इन कार्रवाइयों से पुलिस का विद्रोह नहीं थमा. मिर्जापुर में एक बर्खास्त सिपाही अविनाश गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन न तो विरोध रुक रहा और न चंदा जमा करने के अभियान पर कोई अंकुश लग पा रहा.
पुलिसकर्मियों के तेवर से बने माहौल पर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओपी सिंह कहते हैं कि सिपाहियों में विरोध जैसी कोई स्थिति नहीं है. उन्हें अपने सिपाहियों पर पूरा भरोसा है. डीजीपी ने यह भी कहा कि किसी भी तरह का गैरकानूनी या अनुशासनहीनता का काम करने वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. डीजीपी ने कहा कि आला पुलिस अधिकारी लगातार जवानों से बातचीत कर रहे हैं और स्थिति को सामान्य करने की कोशिश की जा रही है. डीजीपी के इस बयान के बाद भी सिपाहियों ने अपना अभियान जारी रखा है.

प्रमोशन देकर बगावत थामने की कोशिश
पुलिस के बगावती तेवर पर ठंडा पानी डालने की रणनीति के तहत पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने पुलिसकर्मियों को प्रमोशन देने का ताबड़तोड़ सिलसिला शुरू कर दिया. यूपी पुलिस में पहली बार एक साथ 25091 कांस्टेबल को हेड कांस्टेबल के पद पर प्रोन्नत कर दिया गया. प्रमोशन पाने वालों में वर्ष 1975 से वर्ष 2004 बैच तक के कांस्टेबल शामिल हैं. विवेक तिवारी हत्याकांड के बाद से पुलिस की गतिविधियों पर नजर रख रहे पुलिस-विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिसकर्मियों को प्रमोशन देने के फैसले से सरकार के बैकफुट पर चले जाने का संकेत मिल रहा है. सिपाहियों को तरक्की देने की पहल डीजीपी की तरफ से की गई. यह प्रमोशन पुलिसकर्मियों का अब तक का सबसे बड़ा प्रमोशन है. इससे पहले वर्ष 2016 में 15 हजार 803 पुलिसकर्मियों को तरक्की मिली थी. पुलिस मुख्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि सिपाहियों के हेड कांस्टेबल के पद पर प्रोन्नत होने के बाद भी हेड कांस्टेबल के करीब 12 हजार पद खाली हैं. प्रमोशन के लिए 29 हजार सिपाहियों के नाम पर विचार हुआ था, लेकिन उनमें से चार हजार सिपाहियों को प्रमोशन के योग्य नहीं पाया गया.

डीजीपी की चेतावनी बेअसर, विरोध जारी
डीजीपी ओपी सिंह की कोशिशों और हिदायतों के बाद भी यूपी पुलिस के सिपाहियों का काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन जारी है. सिपाहियों के विरोध प्रदर्शन में दारोगा स्तर के अधिकारी भी शामिल हो गए हैं. 10 अक्टूबर को सिपाहियों और दारोगा ने चेहरे छिपाकर और हाथ में काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल की गईं. फैजाबाद में तैनात बागपत के दो सिपाहियों राहुल पांचाल और मोहित कुमार के इस्तीफे वाली चिट्ठी भी वायरल की गई. हत्यारोपी सिपाही के समर्थन में चल रहे विरोध अभियान में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले सिपाही और दारोगा बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं.

कहीं पीएसी विद्रोह जैसी दुर्भाग्यपूर्ण हालत न हो जाए!
पुलिस के आला अधिकारी पुलिसकर्मियों के विद्रोही तेवर को देखते हुए इस बात के लिए आशंकित हैं कि कहीं 45 साल पहले हुए पीएसी विद्रोह जैसी हालत न हो जाए. पीएसी विद्रोह पर सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा था और सेना के साथ हथियारबंद संघर्ष में पीएसी के कम से कम 30 जवानों को जान गंवानी पड़ी थी. सेना के भी 13 जवान शहीद हुए थे. उस घटना के बाद ही उत्तर प्रदेश में पुलिस संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. 1973 के मई महीने में भड़का पुलिस विद्रोह उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे को तबाह कर देता, अगर सेना बुलाने में देरी की गई होती.
सेना ने आते ही उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में पीएसी के उन सारे ठिकानों को अपने कब्जे में ले लिया था, जहां पीएसी के हथियार रखे जाते थे. पीएसी विद्रोह के अलग-अलग 65 मामलों में 795 पुलिस वालों पर मुकदमे चलाए गए थे. उनमें से 148 पुलिसकर्मियों को दो साल की जेल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हुई थी. पांच सौ पुलिसकर्मियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी. सेना के जवानों पर गोलियां चलाने के आरोप में 500 पुलिसकर्मियों को नौकरी से निकाल दिया गया था. इसके अलावा हजारों अन्य पुलिसकर्मियों को भी नौकरी से निकाले जाने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन संविधान विशेषज्ञों की राय पर यह कार्रवाई नहीं हुई.
पीएसी विद्रोह के चश्मदीद रहे बुजुर्ग पुलिसकर्मी बताते हैं कि पीएसी विद्रोह के कारण ही कमलापति त्रिपाठी जैसे नेता की मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन गई थी. आजाद भारत में 1973 का पीएसी विद्रोह सशस्त्र बल का सबसे बड़ा विद्रोह माना जाता है. पीएसी की 12वीं बटालियन का विद्रोह अपनी ही सरकार के खिलाफ था. इस बटालियन ने मई 1973 में विद्रोह कर दिया. खराब सर्विस कंडीशन, गलत अफसरों के हाथ में कमान, अफसरों द्वारा जवानों का उत्पीड़न, अफसरों के घर पर जवानों से नौकरों की तरह काम कराना और उनकी जानवरों से भी बदतर स्थिति विद्रोह का मुख्य कारण बनी. इस विद्रोह के बाद यूपी का पुलिस सिस्टम ध्वस्त होने की स्थिति में आ गया. आखिरकार सेना बुलानी पड़ी. पांच दिन के ऑपरेशन के बाद आर्मी ने पीएसी विद्रोह को नियंत्रण में कर लिया. इसमें 30 पुलिसवाले मारे गए.
उस समय के गृह राज्य मंत्री केसी पंत ने 30 मई 1973 को राज्यसभा में सूचना दी कि 22 से 25 मई 1973 तक चले पीएसी विद्रोह को दबाने के लिए की गई सैन्य कार्रवाई में सेना ने भी अपने 13 जवान खो दिए और 45 सैनिक घायल हो गए थे. इस विद्रोह का राजनीतिक असर इतना जबरदस्त हुआ कि 425 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में 280 सीटों वाली कांग्रेस की कमलापति त्रिपाठी सरकार को 12 जून 1973 को सत्ता से बेदखल होना पड़ा. इसके बाद यूपी में राष्ट्रपति शासन लग गया. प्रदेश में डेढ़ सौ दिनों तक राष्ट्रपति शासन रहा. इसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए थे.


अदालत और सरकार का ‘बेहतरीन’ समन्वय

उत्तर प्रदेश सरकार का प्रशासन के साथ सामंजस्य भले ही ठीक नहीं चल रहा हो, लेकिन योगी सरकार का न्यायपालिका के साथ सामंजस्य सही और सटीक चल रहा है. भाजपा के सांसदों और विधायकों की बात तो छोड़िए, प्रदेश सरकार के मंत्री तक नौकरशाही की बदमिजाजी और अराजकता की सरेआम शिकायत करते नजर आते हैं, पुलिस की अराजकता के नमूने तो आप देख ही रहे हैं. पुलिस आम नागरिक की सरेआम हत्या भी कर देती है और काली पट्टी लगा कर विद्रोह पर उतारू भी हो जाती है. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस की ऐसी अनुशासनहीनता पहले कभी नहीं देखी गई. लेकिन सरकार न्यायपालिका के साथ समन्वय और सामंजस्य स्थापित करने का हर जतन कर रही है.
इसी समन्वय और सामंजस्य का नतीजा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलीप बाबा साहेब भोसले भाजपा के साल भर के कार्यकाल में लगातार कई बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने उनके सरकारी आवास पर आते रहे और सामंजस्य स्थापित करते रहे. परस्पर समन्वय और सामंजस्य स्थापित करने की यह प्रक्रिया हाल के दिनों में अधिक तेजी से बढ़ी. यह इतनी प्रगाढ़ हुई कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने सरकारी आवास पर मुख्य न्यायाधीश का सम्मान समारोह आयोजित कर दिया और सम्मान समारोह के बाद आलीशान रात्रि-भोज देकर परस्पर सामंजस्य की नायाब परम्परा स्थापित कर दी. जानकार बताते हैं कि प्रदेश में किसी भी मुख्यमंत्री ने कभी भी किसी मुख्य न्यायाधीश के सम्मान में अपने सरकारी आवास पर रात्रि-भोज नहीं दिया.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलीप बाबा साहेब भोसले का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा भी कि ऐसा अवसर बहुत कम देखने को मिलता है, जब लोकतंत्र की त्रिवेणी; विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक समारोह और एक मंच पर एक साथ उपस्थित हो. योगी ने कहा, ‘इसके पीछे हम सबका उद्देश्य एक ही है, लोक-कल्याण. लोक-कल्याण के भाव को अगर परस्पर एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए हम आगे बढ़ाते हैं तो कहीं भी न कोई मतभेद होगा, न कोई मनभेद होगा, और न कहीं टकराहट की कोई नौबत आएगी. और मुझे लगता है कि इस आदर्श स्थिति और व्यवस्था को माननीय मुख्य न्यायाधीश के माध्यम से उत्तर प्रदेश के अंदर प्रस्तुत करने की जो सकारात्मक पहल की गई, आज उसके सकारात्मक परिणामस्वरूप देखे जा सकते हैं.’ वाकई, आलीशान सम्मान और भव्य रात्रि-भोजों के जरिए मतभेद और मनभेद खत्म किया जा सकता है और सरकार बनाम न्यायपालिका के टकराव को टाला जा सकता है.
योगी सरकार ने मुख्य न्यायाधीश के लिए आयोजित सम्मान समारोह और रात्रि-भोज में मीडिया से सख्त परहेज रखा. कार्यक्रम में केवल जजों, खास मंत्रियों और खास नौकरशाहों को ही आमंत्रित किया गया था. आमंत्रण पत्र के वितरण पर भी खास निगरानी रखी जा रही थी. जानकार बताते हैं कि आमंत्रण पत्र का वितरण विधि परामर्शी (एलआर) महकमे से कराया गया था. जबकि आमंत्रण पत्र पर उत्तरापेक्षी में प्रदेश के मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडेय का नाम टंकित है. खबर लीक न हो इसलिए कार्ड वितरण मुख्य सचिव कार्यालय से नहीं कराया गया. हाईकोर्ट के कुछ न्यायाधीशों ने योगी के इस कार्यक्रम से परहेज रखा. सरकार की अपेक्षा के अनुसार सम्मान समारोह का कक्ष नहीं भरा, आधे से अधिक खाली ही रहा. कई जज इस कार्यक्रम में नहीं आए. जो नहीं आए, उनके नाम ‘चौथी दुनिया’ के पास हैं, लेकिन उसका प्रकाशन नहीं किया जा रहा है, ताकि न्यायालय और सरकार के परस्पर सामंजस्य में कोई खलल न पड़े.
सम्मान से आह्लादित मुख्य न्यायाधीश दिलीप बाबा साहेब भोसले ने कहा कि उन्हें योगी आदित्यनाथ से प्रेरणा मिलती है. उनकी सरकार की तरफ से कभी भी कोई दबाव नहीं आया. जबकि उत्तर प्रदेश के पहले अन्य राज्यों के उनके अनुभव ऐसे नहीं हैं. मुख्य न्यायाधीश ने समारोह में मौजूद राज्यपाल राम नाईक के प्रति सम्मान जताया और कहा कि जब उनकी उत्तर प्रदेश में तैनाती हुई तो वे बहुत घबराए हुए थे, लेकिन उन्हें जब-जब परेशानी हुई, राज्यपाल राम नाईक ने पिता की तरह उनका मार्ग-दर्शन किया और उन्हें सही रास्ता दिखाया. न्यायपालिका और विधायका के बीच समझदारी और सामंजस्य का ही परिणाम है कि राष्ट्रपति के चुनाव के समय मुख्यमंत्री द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में दिए गए राजनीतिक रात्रि-भोज में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलीप बाबा साहेब भोसले मौजूद थे.

सामंजस्य अपरंपार: सरकारी वकीलों में जजों के सगों की भरमार
योगी सरकार ने न्यायपालिका से समन्वय और सामंजस्य स्थापित करने के लिए बड़े जतन किए हैं. अभी हाल ही में सरकार ने विभिन्न स्तर पर जो सरकारी वकीलों की नियुक्ति की, उसमें अच्छी-खासी संख्या में न्यायाधीशों के रिश्तेदारों को उपकृत किया गया. न्यायपालिका के साथ योगी सरकार ने सामंजस्य स्थापित करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलीप बाबा साहेब भोसले के बेटे करन दिलीप भोसले को सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार का स्पेशल काउंसिल नियुक्त कर रखा है. स्पेशल काउंसिल का ‘पैकेज’ काफी भारी और आकर्षक होता है. इसके पहले अखिलेश सरकार ने मुख्य न्यायाधीश के बेटे को सुप्रीम कोर्ट में स्टैंडिंग काउंसिल (सरकारी वकील) नियुक्त किया था. लेकिन योगी सरकार ने अतिरिक्त सामंजस्य-भाव दिखाते हुए उन्हें स्पेशल काउंसिल नियुक्त कर दिया.
इसी तरह योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अशोक भूषण के भाई विनय भूषण को मुख्य स्थाई अधिवक्ता (द्वितीय) बनाया. विनय भूषण समाजवादी पार्टी के शासनकाल में अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता थे. न्यायाधीश बीके नारायण के बेटे एनके सिन्हा नारायण और बहू आनंदी के नारायण दोनों को सरकारी वकील नियुक्त किया. न्यायाधीश केडी शाही के बेटे विनोद कुमार शाही को अपर महाधिवक्ता बनाया. न्यायाधीश आरडी शुक्ला के बेटे राहुल शुक्ला अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता, स्व. न्यायाधीश एएन त्रिवेदी के बेटे अभिनव त्रिवेदी अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता, न्यायाधीश रंगनाथ पांडेय के रिश्तेदार देवेश चंद्र पाठक अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता, न्यायाधीश शबीहुल हसनैन के रिश्तेदार कमर हसन रिजवी अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता, न्यायाधीश एसएन शुक्ला के रिश्तेदार विवेक कुमार शुक्ला अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता, न्यायाधीश रितुराज अवस्थी के रिश्तेदार प्रत्युष त्रिपाठी स्थाई अधिवक्ता और न्यायाधीश राघवेंद्र कुमार के पुत्र कुमार आयुष वाद-धारक नियुक्त किए गए. योगी सरकार ने न्यायाधीश यूके धवन के बेटे सिद्धार्थ धवन और न्यायाधीश एसएस चौहान के बेटे राजीव सिंह चौहान को एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल बनाया. योगी सरकार ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बेटे नीरज त्रिपाठी को इलाहाबाद हाईकोर्ट का अपर महाधिवक्ता बनाया.

जब नेता खुद फंसे हों मुकदमों में तो अदालतें क्यों न करें मनमानी
सरकारी अलमबरदारों की पृष्ठभूमि खुद ही इतनी कानूनी दलदल में फंसी रहती है कि न्यायपालिका के आगे दंडवत होने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता. इस कारण ही फैसलों से लेकर नियुक्तियों तक अदालतें अपनी मनमानी करती रही हैं. इसी वजह से अदालतें जजों के नाते-रिश्तेदार जजों और उनके रिश्तेदार फैसलाकुन-वकीलों से भर गई हैं. यह इतनी अति तक पहुंच गई कि आखिरकार केंद्र सरकार को इस पर अंकुश लगाना पड़ा. ‘चौथी दुनिया’ ने जजों के उन नाते-रिश्तेदारों की पूरी लिस्ट छाप दी थी, जिन्हें जज बनाने की सिफारिश की गई थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के हस्ताक्षर से वह लिस्ट कॉलेजियम को भेजी गई थी. केंद्र ने उसका संज्ञान लिया और जजों की नियुक्ति रोक दी गई. हालांकि जानकार बताते हैं कि धीमी गति से कुछ-कुछ रिश्तेदारों की नियुक्तियां हो रही हैं.
बहरहाल, एक बार फिर उस लिस्ट को आप अपने ध्यान में रखते चलें. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर समेत ऐसे दर्जनों नाम हैं, जिन्हें जज बनाने के लिए सिफारिश की गई थी. इनके अलावा संगीता चंद्रा, रजनीश कुमार, अब्दुल मोईन, उपेंद्र मिश्र, शिशिर जैन, मनीष मेहरोत्रा, आरएन तिलहरी, सीडी सिंह, राजीव मिश्र, अजय भनोट, अशोक गुप्ता, राजीव गुप्ता, बीके सिंह जैसे नाम भी उल्लेखनीय हैं. इनमें से अधिकांश लोग विभिन्न जजों के रिश्तेदार और सरकारी पदों पर विराजमान वकील हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन, पूर्व जज ओपी श्रीवास्तव के बेटे रजनीश कुमार, पूर्व जज टीएस मिश्रा और पूर्व जज केएन मिश्रा के भतीजे उपेंद्र मिश्रा, पूर्व जज एचएन तिलहरी के बेटे आरएन तिलहरी, पूर्व जज एसपी मेहरोत्रा के बेटे मनीष मेहरोत्रा, पूर्व जज जगदीश भल्ला के भांजे अजय भनोट, पूर्व जज रामप्रकाश मिश्र के बेटे राजीव मिश्र, पूर्व जज पीएस गुप्ता के बेटे अशोक गुप्ता और भांजे राजीव गुप्ता के साथ-साथ मौजूदा जज एपी शाही के साले बीके सिंह के नाम जज बनाने की सिफारिशी लिस्ट में शामिल थे.
वर्ष 2000 में भी जजों की नियुक्ति में धांधली का मामला उठा था. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने देशभर के हाईकोर्टों से भेजी गई लिस्ट की जांच का आदेश दिया. जांच में पाया गया कि 159 सिफारिशों में से 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या रिश्तेदारों के लिए की गई थीं. इसके बाद कानून मंत्रालय ने वह सूची खारिज कर दी थी. जजों की नियुक्ति में जजों द्वारा ही धांधली किए जाने का मामला सपा नेता जनेश्वर मिश्र ने राज्यसभा में भी उठाया था. इसके जवाब में तब कानून मंत्री का पद संभाल चुके अरुण जेटली ने आधिकारिक तौर पर बताया था कि लिस्ट खारिज कर दी गई है. लेकिन उस खारिज लिस्ट में शुमार कई लोग बाद में जज बन गए और अब वे अपने रिश्तेदारों को जज बनाने में लगे हैं. इनमें न्यायाधीश अब्दुल मतीन और न्यायाधीश इम्तियाज मुर्तजा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. इम्तियाज मुर्तजा के पिता मुर्तजा हुसैन भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे. विडंबना यह रही कि जजों की नियुक्ति में धांधली और भाई-भतीजावाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी गई थी और अशोक पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था. जबकि अशोक पांडेय द्वारा अदालत को दी गई लिस्ट के आधार पर ही कानून मंत्रालय ने जांच कराई थी और जजों की नियुक्तियां खारिज कर दी थीं.

न्यायपालिका से सामंजस्य की एक और विचित्र तैयारी
उस अपर न्यायाधीश को स्थायी न्यायाधीश बनाने की तैयारी है, जिन्होंने कानून विभाग के प्रमुख सचिव रहते हुए न्यायाधीशों के रिश्तेदारों को सरकारी वकील बनाने की लिस्ट को औपचारिक जामा पहनाया था और पुरस्कार में खुद हाईकोर्ट के जज बन गए. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के अधिवक्ता सत्येंद्रनाथ श्रीवास्तव ने इसका कच्चा चिट्ठा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री को भेजा था. प्रधानमंत्री कार्यालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस मामले की गहराई से जांच कराने के लिए कहा था, लेकिन कुछ नहीं हुआ. अधिवक्ता सत्येंद्रनाथ श्रीवास्तव की शिकायत है कि विधि विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव रंगनाथ पांडेय पद का दुरुपयोग कर और विधाई संस्थाओं को अनुचित लाभ देकर हाईकोर्ट के जज बने. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ बेंच में सरकारी वकीलों की नियुक्ति को अपनी तरक्की का जरिया बनाया. नियुक्ति प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मानकों की पूरी तरह अनदेखी की और खुद जज बनने के लिए सारी सीमाएं लांघीं. उन्होंने जानते-समझते हुए करीब 50 ऐसे वकीलों को सरकारी वकील की नियुक्ति लिस्ट में रखा जिनका नाम एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (एओआर) में ही दर्ज नहीं था और वे हाईकोर्ट में वकालत करने के योग्य नहीं थे. उन्होंने सरकारी वकीलों की लिस्ट में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के रिश्तेदारों को शामिल किया और उसके एवज में लाभ प्राप्त कर लिया. उन्होंने विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से जुड़े वकीलों और पदाधिकारियों को भी सरकारी वकील बनवा दिया. सरकारी वकीलों की लिस्ट में ऐसे भी कई वकील हैं जो प्रैक्टिसिंग वकील नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस मामले में सीधा हस्तक्षेप कर सरकारी वकीलों की विवादास्पद नियुक्ति प्रक्रिया को रोकने की अपील की गई, लेकिन कार्रवाई होने के बजाय शिकायतकर्ता को ही धमकियां मिलने लगीं. शिकायतकर्ता अधिवक्ता का कहना है कि उन जजों के बारे में भी छानबीन जरूरी है, जिन जजों ने रंगनाथ पांडेय को जज बनाने की अनुशंसा की. सत्येंद्रनाथ श्रीवास्तव कहते हैं कि छानबीन हो तो पता चलेगा कि जिन जजों ने रंगनाथ पांडेय को जज बनाने की अनुशंसा की थी उनके आश्रित सरकारी वकील नियुक्त किए गए थे.

Wednesday, 10 October 2018

यूपी में फेल है… भाषण-शासन-प्रशासन

अलीगढ़ मुठभेड़, लखनऊ में पुलिस के सिपाही द्वारा की गई हत्या और भाजपा नेता के संरक्षण में चलने वाले ड्रग सिंडिकेट को पकड़ने वाली मोहनलालगंज की पुलिस उपाधीक्षक (सीओ) का 24 घंटे के अंदर तबादला... हाल में घटी घटनाओं के ये तीन टेस्ट-केस हैं जो भाषण, शासन और प्रशासन के अंतरविरोधों का कड़वा उदाहरण हैं. अपराधी, नेता और पुलिस का अंतरसम्बन्ध यह है कि ड्रग-सिंडिकेट भाजपा के नेता और योगी सरकार के एक राज्य मंत्री के संरक्षण में चलता है. मुख्य अभियुक्त दावा करता है कि 24 घंटे के अंदर सीओ का तबादला हो जाएगा और तबादला हो जाता है. मुख्य अभियुक्त पकड़ा नहीं जाता और सीओ को पुलिस मुख्यालय में ‘डंप’ किए जाने का डीजीपी का आदेश जारी हो जाता है. 
ड्रग सिंडिकेट उजागर करने के 24 घंटे के अंदर महिला पुलिस उपाधीक्षक के तबादले की घटना से बात शुरू करते हैं. खबर आई कि मोहनलालगंज की पुलिस उपाधीक्षक (सीओ) बीनू सिंह ने खुफिया सूचनाओं के आधार पर गोसाईगंज के जौखंडी गांव में ड्रग सिंडिकेट के एक ठिकाने पर छापा मार कर भारी मात्रा में स्मैक और अन्य नशीले पदार्थ बरामद किए. पुलिस को जिस शातिर ड्रग तस्कर मोहित शुक्ला की तलाश थी, वह तो भागने में कामयाब हो गया, लेकिन उसका भाई अंकुर शुक्ला रंगे हाथों पकड़ लिया गया. असली घटनाक्रम उसके बाद शुरू हुआ. मुख्य अभियुक्त मोहित शुक्ला ने पहले तो सीओ को भारी रिश्वत देकर मामला रफा-दफा करने की पेशकश की, फिर योगी सरकार के दो-तीन मंत्रियों से सीओ को फोन कराया, लेकिन सीओ द्वारा इन्कार कर देने पर उन्हीं मंत्रियों के जरिए उसने 24 घंटे के अंदर सीओ का तबादला करा देने की धमकी दिलवाई. इलाके के लोग ड्रग तस्कर और भाजपा नेता के सम्बन्ध जानते हैं, इसलिए वे तबादले को लेकर पहले से मुतमईन थे. लखनऊ पुलिस के एसएसपी या प्रदेश के पुलिस महानिदेशक की तरफ से महिला सीओ को प्रशंसा मिलने की जगह तबादले का आदेश प्राप्त हो गया. सीओ बीनू सिंह को मोहनलालगंज के सीओ पद से हटा कर उन्हें डीजीपी मुख्यालय से अटैच कर दिया गया.
तीन महीने के अंदर सीओ का तबादला करने से मोहनलालगंज क्षेत्र के लोग नाराज हो गए और पूरे इलाके में सीओ की फिर से बहाली की मांग होने लगी. तबादले की वजह के बारे में जानकारी मिलने पर मोहनलालगंज के भाजपा सांसद कौशल किशोर ने फौरन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और उन्हें ड्रग सिंडिकेट से जुड़े तथ्यों और राज्य मंत्री स्तर के भाजपा नेता द्वारा दिए जा रहे संरक्षण के बारे में बताया. मुख्यमंत्री ने सीओ का तबादला रोकने का आदेश दिया, लेकिन इसके बावजूद पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने सीओ को मोहनलालगंज सीओ की पूर्व तैनाती पर नहीं भेजा. डीजीपी ने बस इतना किया कि पुलिस उपाधीक्षक को मुख्यालय में नहीं अटैच कर उन्हें ट्रैफिक पुलिस में स्थानान्तरित करने का फरमान सुना दिया. सांसद कौशल किशोर ने डीजीपी से बात की और उन्हें इस बात के लिए आड़े हाथों लिया कि ड्रग तस्करों का साथ देकर पुलिस स्थानीय लोगों को सरकार के प्रति नाराज कर रही है. मीडिया ने भी इस पर तूल मचाया. इस संवाददाता ने भी ड्रग तस्करों के खिलाफ छापेमारी से लेकर सीओ के तबादले के बेजा आदेश को लेकर डीजीपी से सवाल पूछे, लेकिन डीजीपी ने उन सवालों का जवाब देने की जरूरत नहीं समझी. डीजीपी ने सीओ के ट्रांसफर का आदेश एक बार फिर बदला और उन्हें बख्शी का तालाब इलाके का सीओ बना कर भेज दिया.
मोहनलालगंज के भाजपा सांसद कौशल किशोर कहते हैं कि वे इस संसदीय क्षेत्र के सांसद हैं, लिहाजा अपने संसदीय क्षेत्र के नागरिकों का ध्यान रखना उनका प्राथमिक दायित्व है. ड्रग तस्करों के फैलते धंधे और उन्हें राज्य मंत्री स्तर के भाजपा नेता द्वारा मिल रहे संरक्षण और पुलिस की मिलीभगत के कारण इलाके के लोगों में काफी गुस्सा है. ड्रग के कारण नई पीढ़ी बर्बाद हो रही है. ड्रग तस्करों को पकड़ने वाली डिप्टी एसपी बीनू सिंह का 24 घंटे के अंदर तबादला पुलिस प्रशासन के आला अधिकारियों का असली चरित्र उजागर करता है. कौशल कहते हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिल कर सारी स्थिति बताई और यह भी बताया कि पुलिस का आचरण सरकार विरोधी और भाजपा विरोधी साबित हो रहा है, आने वाले चुनाव में इसका खामियाजा कौन भुगतेगा! विडंबना यह है कि सांसद को आश्वासन देने और सीओ का तबादला रोकने का आदेश देने के बावजूद डीजीपी ने मुख्यमंत्री की नहीं सुनी और उन्हें वापस पूर्व तैनाती पर नहीं भेजा. उल्लेखनीय है कि फरार ड्रग तस्कर मोहित शुक्ला और योगी सरकार के राज्य मंत्री (चेयरमैन पैक्सफेड) वीरेंद्र तिवारी की अंतरंग तस्वीर सोशल नेटवर्क पर भी खूब वायरल हुई. इसके बावजूद शासन प्रशासन की खाल पर कोई असर नहीं पड़ा.
सीओ के तबादले के पीछे वजह कुछ और भी है
मोहनलालगंज में कॉलोनियां विकसित कर रहे मशहूर एमआई बिल्डर्स को क्लीन-चिट नहीं देने के कारण भी आला पुलिस अधिकारी सीओ बीनू सिंह से नाराज हैं. सीओ कानूनी तौर पर उस दलित परिवार के साथ खड़ी हैं, जिनकी जमीन पर बिल्डर अपना कब्जा चाहता है. पुलिस मुख्यालय के ही एक अधिकारी ने कहा कि प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उस बिल्डर कंपनी में बड़ा धन निवेश कर रखा है, लिहाजा उनकी नाराजगी स्वाभाविक है. इस रियल इस्टेट कंपनी में कुछ पूर्व पुलिस महानिदेशक, मौजूदा अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक समेत कई पुलिस अधिकारियों का पैसा लगा है. हास्यास्पद विडंबना यह भी है कि रियल इस्टेट कंपनी में पैसा लगवाने का काम दो रिटायर्ड पुलिस अधिकारी बिचौलियों के रूप में करते हैं.

लखनऊः हिफाजत के बजाय हत्या कर रही है पुलिस
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस के सिपाही प्रशांत चौधरी द्वारा एप्पल कम्पनी के एरिया सेल्स मैनेजर (नॉर्थ) विवेक तिवारी की गोली मार कर हत्या कर दिए जाने की घटना ने केवल लखनऊ क्या पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी. प्रोडक्ट लॉन्चिंग समारोह के काफी देर रात तक चलने के कारण विवेक तिवारी अपनी महिला सहकर्मी सना खान को उसके घर छोड़ने जा रहे थे. सिपाही प्रशांत चौधरी और संदीप ने उनकी गाड़ी रोकने की कोशिश की और नहीं मानने पर आगे से घेर कर सीधे सिर पर निशाना लेकर विवेक को गोली मार दी. विवेक की मौके पर ही मौत हो गई. इस घटना के बाद लखनऊ पुलिस ने हत्यारे सिपाही को पकड़ने के बजाय तमाम नौटंकियां दिखानी शुरू कर दीं. घटना की चश्मदीद सना खान से मनमानी तहरीर लिखवाई और सिपाही को पहचानने के बावजूद अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. बाद में तूल मचने पर प्रशासन को नामजद एफआईआर दर्ज करने और अभियुक्त सिपाहियों को गिरफ्तार करने पर विवश होना पड़ा. सरकार ने मरहूम विवेक के परिजनों को मुआवजा और विधवा को नगर निगम में नौकरी तो दी, लेकिन पुलिस की हरकत थमी नहीं. लखनऊ पुलिस के एसएसपी कलानिधि नैथानी यही कहते रहे कि यह नहीं पता चल रहा कि विवेक तिवारी की मौत गोली लगने से हुई या गाड़ी के दुर्घटनाग्रस्त होने से. जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने विवेक के गोली से मरने की आधिकारिक पुष्टि कर दी तब जाकर पुलिस अधिकारियों का बड़बोलापन थमा, लेकिन मामले को उलझाने का सिलसिला थमा नहीं है.
हत्या करने के बाद हत्यारे सिपाही प्रशांत चौधरी ने गोमती नगर थाने में जाकर जो बवाल किया, वह भी लोगों के लिए हैरत करने वाली घटना है. प्रशांत चौधरी की पत्नी राखी चौधरी भी पुलिस में कॉन्सटेबल है. हत्यारोपी सिपाही की पत्नी के बैंक खाते में अचानक साढ़े पांच लाख रुपए का जमा होना भी संदेहास्पद है. राखी चौधरी मेरठ की रहने वाली है. उसका बैंक खाता किनौनी शुगर मिल स्थित भारतीय स्टेट बैंक में है. उसके खाते में पिछले दिनों साढ़े पांच लाख रुपए जमा हुए. उससे पहले राखी के खाते में महज 447.26 रुपए थे. बैंक का कहना है कि राखी के खाते में पैसा जमा होने का क्रम जारी है. राखी का लखनऊ से बलिया तबादला कर दिया गया है. अन्य मुद्दों पर लखनऊ पुलिस के अधिकारी चुप्पी साधे हैं. सरकार ने इतना हंगामा खड़ा होने के बावजूद विवेक तिवारी हत्याकांड की सीबीआई जांच का आदेश क्यों नहीं दिया, इस पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं.

अलीगढ़ ‘लाइव’ मुठभेड़ की असलीयत कुछ और
अलीगढ़ में पिछले दिनों मुठभेड़ में दो अपराधियों के मारे जाने की खबर इस बात के लिए सुर्खियों में रही कि पुलिस ने मुठभेड़ दिखाने के लिए पहले से मीडिया वालों को जमा करके रखा था. सारे चैनेलों पर लाइव मुठभेड़ दिखाया गया. ‘लाइव’ मुठभेड़ की वीडियो रिकॉर्डिंग देखें तो उसमें गोलियां चलाते जांबाज पुलिसकर्मी फोटो के लिए ‘पोज़’ देते दिखेंगे और आपको समझ में आ जाएगा कि पहले से ही मारे जा चुके अपराधियों की लाशें रख कर मौके पर मुठभेड़ की ऐक्टिंग हो रही है. पुलिस की कहानी यह थी कि अलीगढ़ जिले के हरदुआगंज में पुलिस के साथ मुठभेड़ में दो कुख्यात बदमाश मारे गए. गोली लगने से एक पुलिस अधिकारी भी जख्मी हुआ. हास्यास्पद तथ्य यह भी है कि पुलिस अपराधियों को मारने के इरादे से गोली चला रही थी, लेकिन अपराधी पुलिस अधिकारी के पैर पर निशाना ले रहे थे. पुलिस कहती है कि पीछा करने पर अपराधी हरदुआगंज के मछुआ नहर के पास बनी सिंचाई विभाग की कोठरी में घुस गए. दोनों तरफ से एक घंटे मुठभेड़ चली, जिसमें नौशाद और मुस्तकीम मारे गए. वे दो साधुओं समेत छह लोगों की हत्या में वांछित अपराधी थे.
इस ‘लाइव’ मुठभेड़ का सच यह है कि 18 सितम्बर को प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए पुलिस ने अपराधियों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी थी. यह प्रेस कॉन्फ्रेंस हड़बड़ी में बुलाई गई थी क्योंकि 16 सितम्बर को अतरौली से छह लड़कों को पुलिस द्वारा उठाए जाने के बाद से उनके परिजन परेशान थे और उन्हें तलाश रहे थे. पकड़े गए युवकों में शामिल इरफान को उसकी पत्नी समीरा ने डॉक्टर यासीन के साथ अलीगढ़ एसएसपी कार्यालय में देख लिया. इरफान की ओर वह बढ़ी, लेकिन पुलिस ने उसे रोक लिया. इरफान की पत्नी को भी पकड़ कर महिला पुलिस के हवाले कर दिया गया. इसके बाद ही प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर पांच लड़कों को गिरफ्तार दिखाया गया, जिनमें इरफान और यासीन शामिल थे. पुलिस ने मुस्तकीम, नौशाद और अफसर को भगोड़ा करार देते हुए प्रत्येक पर 25 हजार रुपए के ईनाम की घोषणा की. मुस्तकीम नौशाद का रिश्ते में बहनोई था. दूसरी तरफ मुस्तकीम और नौशाद के परिजनों को पुलिस ने उनके घरों से बाहर नहीं निकलने दिया. इस पर सवाल उठाने पर ‘यूनाईटेड अगेन्स्ट हेट’ की टीम पर अतरौली थाने में हमला हुआ. रिहाई मंच का कहना है कि हाजी इमरान नामक शख्स की इस मामले में संदेहास्पद भूमिका है. उसने ही इरफान को पुलिस के हवाले कराया और उसी ने मुस्तकीम और नौशाद को भी पुलिस से पकड़वाया. बाद में मुस्तकीम और नौशाद दोनों ही फर्जी ‘लाइव’ मुठभेड़ में मारे गए. नौशाद की उम्र 17 वर्ष थी और मुस्तकीम 22 साल का था. लाशों को बिना धार्मिक रीति रिवाज के दफना दिया गया और उनके परिजनों को एफआईआर की कॉपी और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तक नहीं दी गई. नौशाद और मुस्तकीम दोनों का पुलिस रिकॉर्ड में कहीं किसी अपराध में नाम नहीं है. मुस्तकीम का 17 साल का भाई सलमान भी पुलिस की गिरफ्त में ही है. इसके अलावा दिमागी तौर पर विक्षिप्त 23 साल के नफीस को भी पुलिस ने पकड़ रखा है. लड़कों के संदेहास्पद तरीके से उठाए जाने की सूचना डॉक्टर यासीन की पत्नी निहानाज ने फैक्स के जरिए मुख्यमंत्री, आईजी लखनऊ, डीआईजी अलीगढ़ परिक्षेत्र, अलीगढ़ के एसएसपी, अतरौली के थानाध्यक्ष और हरदुआगंज के थानाध्यक्ष को भेज दी थी, लेकिन उस पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया. अलीगढ़ का ‘लाइव’ मुठभेड़ अतरौली और हरदुआगंज थाने के प्रभारी और अलीगढ़ के एसएसपी अजय साहनी समेत हाजी इमरान की साजिशों का परिणाम है. मुठभेड़ में मारे गए नौशाद की मां शाहीन का कहना है कि उसका बेटा मजदूरी करता था. पुलिस ने नौशाद और मुस्तकीम को अतरौली थाना क्षेत्र से कई लोगों के सामने जबरन उठा लिया था. इससे ही मुठभेड़ की कहानी फर्जी साबित होती है. 

Tuesday, 2 October 2018

मायावती बुआ, अखिलेश का जुआ...

प्रभात रंजन दीन
भारत की राजनीति यूनान की मिथकीय कहानी की खूबसूरत महिला पात्र पैंडोरा की तरह है जिसके हाथ में शिल्प कौशल के देवता एक बॉक्स देकर हिदायत देते हैं, इसे कभी खोलना नहीं. लेकिन जिज्ञासु पैंडोरा उस बॉक्स को खोल देती है और बॉक्स में बंद सारी बुराइयां दुनिया को प्रदूषित करने के लिए आजाद हो जाती हैं. भारत में जब भी चुनाव आता है, पैंडोरा की तरह ‘राजनीति-देवी’ घोटालों-भ्रष्टाचारों का बक्सा खोल देती हैं और लोकतंत्र का पर्व हर बार बदबू से भर जाता है. इस बुराई-बक्से का इस्तेमाल सभी करते हैं, विपक्षी दल से लेकर सत्ताधारी दल तक. लेकिन चुनाव खत्म होते ही बुराई-बक्सा अगले चुनाव के लिए ताक पर रख दिया जाता है. अभी कांग्रेस बुराई-बक्से से सत्ताधारी भाजपा का राफेल-सौदा निकाल कर चमका रही है तो भाजपा लंबे समय तक सत्ता सुख भोगती रही कांग्रेस के घोटालों की लंबी फेहरिस्त निकाल कर दिखाने में लगी है.
इसी बुराई-बक्से से उत्तर प्रदेश का पत्थर घोटाला भी सामने निकल आया है. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा के भ्रष्टाचार का बुराई-बक्सा खोल कर समाजवादी पार्टी सत्ता में आई थी. लेकिन सत्ता में आते ही समाजवादी पार्टी ने बसपा का भ्रष्टाचार दबा दिया. बाद में उसी भ्रष्टाचार की प्रणेता पार्टी बसपा से समाजवादी पार्टी ने गठबंधन रिश्ता भी बना लिया. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्मारक (पत्थर) घोटाले की जांच (स्टेटस) रिपोर्ट मांग कर भाजपा को बुराई-बक्सा खोलने का चुनावी-मौका दे दिया है. अब तक भाजपा सरकार भी इस घोटाले को लेकर मौन साधे थी, लेकिन चुनाव आया तो डराने, धमकाने और औकात दिखाने में पत्थर घोटाला अब उनके काम आने वाला है. जब देश-प्रदेश में लोकसभा चुनाव का माहौल गरमाया, तभी ऐन मौके पर मायावती-काल के स्मारक घोटाले की सीबीआई जांच के लिए किसी शशिकांत उर्फ भावेश पांडेय की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हो जाती है. इस याचिका पर त्वरित सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीबी भोसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा उत्तर प्रदेश सरकार से इस मामले में विजिलेंस जांच की प्रगति रिपोर्ट मांग लेते हैं. याचिका पर हाईकोर्ट के रुख से सनसनी फैल गई. बसपा भी सनसना गई और उससे गठबंधन करने पर उतारू सपा भी सनसनाहट से भर गई.
सपा की सनसनाहट थोड़ी अधिक इसलिए भी है क्योंकि मायावती-काल के घोटालों की फाइल अखिलेश सरकार ने ही दबा रखी थी. कार्रवाई करने की लोकायुक्त की सिफारिश को ताक पर रख कर तत्कालीन मुख्यमंत्री बसपाई भ्रष्टाचार की गैर-वाजिब अनदेखी कर रहे थे. स्मारक घोटाले पर तत्कालीन अखिलेश सरकार की चुप्पी इस बार बड़ा कानूनी जवाब मांगेगी. हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़े ही सख्त लहजे में कहा है कि स्मारक घोटाले का कोई आरोपी बचना नहीं चाहिए. घोटाले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार की आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) और सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) कर रहा था. इस प्रकरण में एक जनवरी 2014 को ही लखनऊ के गोमतीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी. तब यूपी में अखिलेश यादव की सरकार थी.
मायावती के मुख्यमंत्रित्व-काल में राजधानी लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में अम्बेडकर स्मारकों और पार्कों के निर्माण में 14 अरब रुपए से भी अधिक का घोटाला हुआ था. तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा की रिपोर्ट और कार्रवाई की सिफारिश पर अखिलेश यादव सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की थी. लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने मई 2013 में ही अखिलेश सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी. स्मारक घोटाले में तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा समेत 199 व्यक्ति और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मालिकान जिम्मेदार ठहराए गए थे. आरोपियों में दो मंत्रियों, एक दर्जन विधायकों, दो वकीलों, खनन विभाग के पांच अधिकारियों, राजकीय निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक सीपी सिंह समेत 59 अधिकारियों और पांच महाप्रबंधकों, लखनऊ विकास प्राधिकरण के पांच अधिकारियों, 20 कंसॉर्टियम प्रमुखों, 60 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों (फर्म्स) के मालिक और राजकीय निर्माण निगम के 35 लेखाधिकारियों के नाम शामिल हैं. आरोपियों की लिस्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती या मुख्यमंत्री सचिवालय के उनके खास नौकरशाहों के नाम शामिल नहीं हैं. लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, राजकीय निर्माण निगम के तत्कालीन प्रबंधन निदेशक (एमडी) सीपी सिंह, खनन विभाग के तत्कालीन संयुक्त निदेशक सुहैल अहमद फारूकी और 15 इंजीनियरों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराकर मामले की सीबीआई से जांच कराने और घोटाले की रकम वसूलने की सिफारिश की थी. लोकायुक्त ने यह भी सिफारिश की थी कि आरोपियों की आय से अधिक पाई जाने वाली चल-अचल सम्पत्ति जब्त कर ली जाए और स्मारकों के लिए पत्थर की आपूर्ति करने वाली 60 फर्मों और 20 कंसॉर्टियम से भी वसूली की कार्रवाई की जाए. लोकायुक्त की रिपोर्ट मिलने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्रवाई की बात तो कही, लेकिन सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश करने के बजाय सतर्कता अधिष्ठान को जांच सौंपी दी. मामले को घालमेल करने के इरादे से तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्रवाई के लिए लोकायुक्त की रिपोर्ट के कुछ हिस्से अलग कर उसे गृह विभाग को सौंप दिए. उसी रिपोर्ट के कुछ हिस्से लोक निर्माण विभाग को सौंप दिए गए और कुछ हिस्से भूतत्व और खनन विभाग के सुपुर्द कर दिए गए. यानि, गृह विभाग छोड़ कर, पत्थर घोटाले में जो विभाग शामिल थे, उन्हें ही कार्रवाई करने की अखिलेश सरकार ने जिम्मेदारी दे दी.
विडंबना है कि अखिलेश यादव सरकार ने लोकायुक्त की रिपोर्ट को क्षतविक्षत करने की गैर-कानूनी हरकत की. जबकि लोकायुक्त ने पत्थरों की खरीद में घोटाला कर सरकार को 14.10 अरब रुपए नुकसान पहुंचाने के आपराधिक-कृत्य के खिलाफ ‘क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस-1944’ की धारा 3 के तहत सभी आरोपियों की सम्पत्ति कुर्क करके घोटाले की राशि वसूलने की सिफारिश की थी. लोकायुक्त ने अपनी सिफारिश में सरकार को यह भी सुझाया था कि तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा से कुल धनराशि का प्रत्येक से 30 प्रतिशत, राजकीय निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक सीपी सिंह से 15 प्रतिशत, खनन विभाग के तत्कालीन संयुक्त निदेशक सुहैल अहमद फारूकी से पांच प्रतिशत और निर्माण निगम के 15 इंजीनियरों से 15 प्रतिशत धनराशि वसूली जाए. लोकायुक्त ने यह भी सिफारिश की थी कि निर्माण निगम के लेखाधिकारियों की आय से अधिक सम्पत्ति पाए जाने पर उनसे सरकारी खजाने को पहुंचे नुकसान की शेष राशि यानि पांच प्रतिशत की वसूली की जाए. लेकिन अखिलेश सरकार इस फाइल पर ही आसन टिका कर बैठ गई.
तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा द्वारा आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) से कराई गई जांच में आधिकारिक तौर पर पुष्टि हुई कि पत्थर (स्मारक) घोटाले के जरिए 14.10 अरब रुपए, यानि, सवा चौदह हजार करोड़ रुपए हड़प लिए गए. स्मारकों और पार्कों के निर्माण के लिए मायावती सरकार ने कुल 42 अरब 76 करोड़ 83 लाख 43 हजार रुपए जारी किए थे. इसमें से 41 अरब 48 करोड़ 54 लाख 80 हजार रुपए खर्च किए गए. शेष एक अरब 28 करोड़ 28 लाख 59 हजार रुपए सरकारी खजाने में वापस कर दिए गए. स्मारकों के निर्माण पर खर्च की गई कुल धनराशि का लगभग 34  प्रतिशत अधिक खर्च करके सरकार को 14 अरब 10 करोड़ 50 लाख 63 हजार 200 रुपए का सीधा नुकसान पहुंचाया गया. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2007 से लेकर 2012 के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के आदेश पर लखनऊ और नोएडा में अम्बेडकर और कांशीराम के नाम पर कई पार्क और स्मारक बनवाए गए थे. स्मारकों और पार्कों के निर्माण कार्य में प्रमुख रूप से राजकीय निर्माण निगम, आवास एवं शहरी नियोजन विभाग, लोक निर्माण विभाग, नोएडा अथॉरिटी, लखनऊ विकास प्राधिकरण और संस्कृति एवं सिंचाई विभाग को लगाया गया था.
स्मारकों और पार्कों के निर्माण में लगाए गए गुलाबी पत्थर मिर्जापुर की खदानों के थे. उन पत्थरों को राजस्थान (भरतपुर) भेज कर वहां कटाई (कटिंग एंड कार्विंग) कराई जाती थी. फिर जयपुर भेज कर उन पत्थरों पर नक्काशियां होती थीं. इसके बाद उन पत्थरों को ट्रकों से वापस लखनऊ और नोएडा भेजा जाता था. कागजों पर जितने ट्रक मिर्जापुर से राजस्थान गए और वहां से वापस नोएडा और लखनऊ आए, वे असलियत में उतने नहीं थे. पत्थर ढुलाई में भी सरकार का अनाप-शनाप धन हड़पा गया. भुगतान भी तय रकम से दस गुना ज्यादा मनमाने तरीके से किया जाता रहा. आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा की जांच रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2007 से लेकर 2011 के बीच कुल 15 हजार 749 ट्रक पत्थर कटाई और कशीदाकारी के लिए राजस्थान भेजे गए. इनमें से मात्र 7,141 ट्रक पत्थर लखनऊ आए और 322 ट्रक नोएडा पहुंचे. बाकी के 7,286 ट्रक और उन पर लदे पत्थर कहां लापता हो गए? जबकि इनके भुगतान ऊंची कीमतों पर हो गए. घोटाले की जांच रिपोर्ट में इस तरह की अजीबोगरीब बानगियां भरी पड़ी हैं.
जांच में यह भी पाया गया था कि आठ जुलाई 2008 को बैठक कर कंसॉर्टियम बनाया गया और कंसॉर्टियम से पत्थरों की सप्लाई का अनुबंध किया गया. इस बैठक ने उत्तर प्रदेश उप खनिज (परिहार) नियमावली 1963 का सीधा-सीधा उल्लंघन किया. पत्थरों की खरीद के लिए बनी संयुक्त क्रय समिति की बैठक में सारे नियम-प्रावधान दरकिनार कर बिना टेंडर के बाजार से ऊंचे रेट पर मिर्जापुर सैंड स्टोन के ब्लॉक खरीदने और सप्लाई कराने का फैसला ले लिया गया. फैसलाकारों ने मनमानी दरें तय कर करोड़ों का घपला किया. दाम ज्यादा दिखाने के लिए पत्थरों की खरीद कहीं से हुई, कटान कहीं और हुई, पत्थरों पर नक्काशी कहीं और से कराई गई और सप्लाई कहीं और से दिखाई गई. स्मारकों और पार्कों के निर्माण में लगे योजनाकारों ने पहले यह तय किया था कि पत्थर की कटिंग और कार्विंग मिर्जापुर में ही हो और इसके लिए मिर्जापुर में ही मशीनें लगाई जाएं. लेकिन बाद में अचानक यह फैसला बदल गया. पत्थर को ट्रकों पर लाद कर राजस्थान भेजने और कटिंग-कार्विंग के बाद उसे फिर ट्रकों पर लाद कर लखनऊ और नोएडा वापस मंगाने का फैसला बड़े पैमाने पर घोटाला करने के इरादे से ही किया गया था. हजारों ट्रक माल मिर्जापुर से राजस्थान भेजे गए, लेकिन वे वापस लौटे ही नहीं. उसका भुगतान भी हो गया. यह भ्रष्टाचार की सोची-समझी रणनीति का ही परिणाम था. ईओडब्लू की जांच में ये सारी करतूतें प्रामाणिक तौर पर साबित हो चुकी हैं. आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और सोनभद्र के पत्थर कटाई वाले क्षेत्र के साथ-साथ राजस्थान के बयाना (भरतपुर) और जयपुर को भी अपनी जांच के दायरे में रखा था. ईओडब्लू ने लखनऊ और नोएडा के उन स्थानों का भी भौतिक सत्यापन किया जहां पत्थर लगाए गए थे. रेखांकित करने वाला तथ्य यह भी है कि पत्थरों की खरीद के लिए कीमत तय करने वाली सरकार की उच्चस्तरीय संयुक्त क्रय समिति ने बाजार भाव का पता लगाए बगैर कमरे में बैठे-बैठे ही 150 रुपए प्रति घन फुट कीमत तय कर दी थी और उस पर 20 रुपए प्रति घन फुट की दर पर लदान की कीमत भी निर्धारित कर दी.
पहले खदान के पट्टाधारकों से सीधे पत्थर खरीदा जाना तय हुआ था, लेकिन अचानक यह फैसला भी बदल दिया गया. अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश उप खनिज (परिहार) नियमावली 1963 के नियम 19 के प्रावधानों को ताक पर रख कर खनन पट्टाधारकों का एक ‘गिरोह’ बना दिया और उसे कंसॉर्टियम नाम दे दिया. पट्टाधारकों को सीधे भुगतान न देकर कंसॉर्टियम के जरिए भुगतान किया जाता था. जांच में यह तथ्य खुल कर सामने आ गया कि कंसॉर्टियम के जरिए पट्टाधारकों को 75 रुपए प्रति घन फुट की दर से पेमेंट होता था, जबकि निर्माण निगम डेढ़ सौ रुपए प्रति घन फुट की दर से सरकार से पेमेंट लेता था. स्मारक निर्माण की पूरी प्रक्रिया घनघोर अराजकता में फंसी थी. बैठकें होती थीं, निर्णय लिए जाते थे, भुगतान होता था, लेकिन ईओडब्लू ने जब जांच पड़ताल की तो बैठकों का कहीं कोई आधिकारिक ब्यौरा ही नहीं मिला. बैठकों का कोई रिकार्ड किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज नहीं पाया गया. भूतत्व एवं खनिकर्म महकमे के निदेशक सुहैल अहमद फारूकी के रिटायर होने के बाद भी मायावती सरकार ने उन्हें ‘पत्थर-धंधे’ में लगाए रखा. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने फारूकी को सलाहकार नियुक्त कर दिया और मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और सलाहकार सुहैल अहमद फारूकी मुख्यमंत्री की तरह ही फैसले लेते रहे. जांच में यह बात सामने आई कि निर्माणाधीन स्मारक स्थलों और पार्कों का मायावती ने कभी 'ऑन-रिकॉर्ड' निरीक्षण नहीं किया. निर्माण कार्य देखने के लिए मायावती कभी मौके पर आईं भी तो वह सरकारी दस्तावेजों पर दर्ज नहीं है. मायावती की तरफ से नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही मॉनीटरिंग करते थे और यह तथ्य सरकारी दस्तावेज पर दर्ज भी है. लोकायुक्त की रिपोर्ट पर एक जनवरी 2014 को लखनऊ के गोमतीनगर थाने में सतर्कता अधिष्ठान ने भारतीय दंड विधान की धारा 409, 120-बी, 13 (1) डी और 13 (2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया था. लेकिन चार्जशीट आज तक दाखिल नहीं हो सकी.

निर्माण निगम के अफसरों ने यूं ही झाड़ लिए 10 करोड़
ईओडब्लू की जांच में यह तथ्य सामने आया कि निर्माण निगम ने कुल 19,17,870.609 घन फुट मिर्जापुर सैंड स्टोन 150 रुपए प्रति घन फुट की दर से खरीदा था, जिस पर 28 करोड़ 76 लाख 80 हजार 591 रुपए का भुगतान हुआ. विचित्र किन्तु सत्य यह है कि जो पत्थर 150 रुपए प्रति घन फुट की दर पर खरीदा दिखाया गया, वह महज 50 से 75 रुपए प्रति घन फुट की दर पर खरीदा गया था. लिहाजा,  19,17,870.609 घन फुट सैंड स्टोन पर अगर 50 रुपए प्रति घन फुट भी अधिक लिया गया तो चुराई गई राशि 9 करोड़ 58 लाख 93 हजार 530 रुपए होती है. इस तरह निर्माण निगम के अफसरों ने सरकार के 10 करोड़ रुपए यूं ही झाड़ लिए.

अपवित्र तौर-तरीकों से होता रहा मायावती का ‘पवित्र-कार्य’... वे मौन देखती रहीं
स्मारक घोटाला कहें या पत्थर घोटाला, इसमें हुई कानूनी औपचारिकताओं में कहीं भी तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का जिक्र नहीं है. जैसा आपको ऊपर बताया कि इस घोटाला प्रकरण में लोकायुक्त की रिपोर्ट पर सतर्कता अधिष्ठान ने जो एफआईआर दर्ज कराई उसमें भी मायावती सरकार के दो मंत्री और एक दर्जन विधायक समेत करीब दो सौ लोग अभियुक्त बनाए गए, लेकिन मायावती को अभियुक्त नहीं बनाया गया. लोकायुक्त ने पत्थर घोटाले की विस्तृत जांच आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) से कराई थी. ईओडब्लू की पूरी जांच रिपोर्ट ‘चौथी दुनिया’ के पास है. ईओडब्लू की जांच रिपोर्ट अम्बेडकर और कांशीराम के नाम पर बने स्मारकों और पार्कों को मायावती द्वारा ‘पवित्र-कार्य’ बताए जाने पर गंभीर कटाक्ष करती है. जांच रिपोर्ट कहती है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने ‘पवित्र-कार्य’ के लिए 42 अरब 76 करोड़ 83 लाख 43 हजार रुपए का बजट दिया लेकिन उन्हीं की सरकार के दो मंत्रियों और उनके मातहती विभागों व निगमों के अधिकारियों ने ‘पवित्र-कार्य’ के लिए खर्च हुई धनराशि का 34 प्रतिशत हिस्सा गड़प कर जाने का अपवित्र काम किया. कुल धनराशि का 34 प्रतिशत हिस्सा भ्रष्टाचार करके खा जाने के काम में मायावती सरकार के दो मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा सीधे तौर पर लिप्त बताए गए, जिनके संरक्षण और निर्देशन में निर्माण निगम और खनन विभाग के अधिकारियों ने जमकर भ्रष्टाचार किया और सरकारी धन हड़पा.

सवा चौदह हजार करोड़ के घोटाले पर खड़ा महापुरुषों का स्मारक
भ्रष्टाचारियों ने महापुरुषों के नाम पर बन रहे स्मारकों और पार्कों को भी नहीं बख्शा. हालांकि ईओडब्लू के एक आला अधिकारी कहते हैं कि भ्रष्टाचार करने के लिए ही महापुरुषों के नाम का इस्तेमाल किया गया था. स्मारक और पार्क श्रद्धा के लिए नहीं, बल्कि सरकारी धन लूटने के लिए बनवाए गए थे. स्मारकों और पार्कों के निर्माण कार्य के लिए मायावती सरकार ने 42 अरब 76 करोड़ 83 लाख 43 हजार रुपए दिए थे. इस धनराशि में से 41 अरब 48 करोड़ 54 लाख 80 हजार रुपए खर्च किए गए. सरकारी खजाने में केवल एक अरब 28 करोड़ 28 लाख 59 हजार रुपए ही वापस जमा किए गए. यानि, कुल खर्च की गई राशि में से 14 अरब 10 करोड़ 50 लाख 63 हजार 200 रुपए हड़प लिए गए. स्मारकों के निर्माण कार्य में राजकीय निर्माण निगम के अलावा आवास एवं शहरी नियोजन विभाग, लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी), संस्कृति विभाग, सिंचाई विभाग, लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) और नोएडा प्राधिकरण वगैरह शामिल थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के तत्कालीन करीबी नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा ही इन विभागों के मंत्री थे. बाबू सिंह कुशवाहा खनन विभाग के मंत्री हुआ करते थे, जबकि नसीमुद्दीन सिद्दीकी स्मारकों और पार्कों के निर्माण के ‘पवित्र-कार्य’ से सम्बद्ध अन्य सभी विभागों के मंत्री हुआ करते थे. ‘अज्ञात’ वजहों से तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की नजरों से गिरे कुशवाहा एनआरएचएम घोटाले में जेल चले गए, लेकिन मायावती जब तक सत्ता में रहीं, नसीमुद्दीन उनकी आंखों का तारा बने रहे और आखेट करते रहे. सत्ता जाने के बाद मायावती और नसीमुद्दीन में धन के लेन-देन को लेकर ही विवाद हुआ, खूब तू-तू-मैं-मैं हुई, आरोप-प्रत्यारोप हुए और बसपा से नसीमुद्दीन का निष्कासन हुआ. मायावती अब अखिलेश के साथ हैं और नसीमुद्दीन अब अखिलेश के दोस्त राहुल के साथ हैं. प्रत्यक्ष या परोक्ष, अब भी सब साथ हैं... उन पर ‘राजनीति-देवी’ की कृपा बनी रहे.

महागठबंधन पर असर डालेगा पत्थर घोटाला
मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में हुए पत्थर घोटाले पर मिट्टी डालने की अखिलेश यादव सरकार की कारगुजारी सपा और बसपा दोनों पर भारी पड़ने वाली है. हाईकोर्ट के तेवर को सियासी नजरिए से देखें तो यह महागठबंधन की कोशिशों पर पानी फेरेगा. मायावती दबाव में हैं, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को दुत्कार कर अजित जोगी की जनता कांग्रेस से हाथ मिलाने के मायावती के फैसले ने यह जताया कि मायावती दबाव में हैं. उन्होंने न तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस से हाथ मिलाया और न ही राजस्थान में. राजनीतिक प्रेक्षकों का आकलन है कि उत्तर प्रदेश में भी लोकसभा चुनाव के पहले ऐसा ही होने वाला है. अखिलेश यादव के लिए भी स्मारक घोटाला परेशानी का सबब बनने वाला है. वर्ष 2012 में सत्ता पर बैठने से पहले समाजवादी पार्टी बसपाई घोटाले का पाई-पाई वसूलने का चुनावी जुमला उछाल रही थी, वही पार्टी सत्ता पाते ही स्मारक घोटाले को पचा गई. लोकायुक्त की रिपोर्ट और विजिलेंस की तरफ से दर्ज एफआईआर भी किसी कानूनी अंजाम तक नहीं पहुंच पाई. सरकारी दबाव में विजिलेंस अधिष्ठान चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर सका.

बसपा के स्मारक घोटाले के बाद खुलेगी सपा के कुंभमेला घोटाले की फाइल!
सत्ता गलियारे के उच्च पदस्थ अधिकारी बसपाकाल के स्मारक घोटाले के बाद सपाकाल के कुंभमेला घोटाले की फाइल के खुलने की भी संभावना जताते हैं. सपा सरकार के कार्यकाल में हुए कुंभ मेला घोटाले की भी सीबीआई से जांच कराने की मांग होती रही है. महालेखाकार (कैग) की रिपोर्ट में भी कुंभ मेला घोटाले की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है. कुंभ मेले के कर्ताधर्ता तत्कालीन मंत्री आजम खान थे. सपा सरकार के कार्यकाल में 14 जनवरी 2013 से 10 मार्च 2013 तक इलाहाबाद के प्रयाग में महाकुंभ हुआ था. कुंभ मेले के लिए अखिलेश सरकार ने 1,152.20 करोड़ दिए थे. कुंभ मेले पर 1,017.37 करोड़ रुपए खर्च हुए. यानि, 1,34.83 करोड़ रुपए बच गए. अखिलेश सरकार ने इसमें से करीब हजार करोड़ (969.17 करोड़) रुपए का कोई हिसाब (उपयोग प्रमाण पत्र) ही नहीं दिया. अखिलेश सरकार ने कुंभ मेले के लिए मिली धनराशि में केंद्रांश और राज्यांश का घपला करके भी करोड़ों रुपए इधर-उधर कर दिए.
मायावती काल के स्मारक घोटाले के बारे में भी कैग ने इसी तरह के सवाल उठाए थे. बसपा के स्मारक निर्माण की मूल योजना 943.73 करोड़ रुपए की थी, जबकि 4558.01 करोड़ रुपए में योजना पूरी हुई. योजना में 3614.28 करोड़ रुपए की भीषण बढ़त हुई. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती द्वारा बार-बार डिजाइन में बदलाव कराने और पक्के निर्माण को बार-बार तोड़े जाने के कारण भी खर्च काफी बढ़ा. कैग ने इस पर भी सवाल उठाया था कि स्मारक स्थल पर लगाए गए पेड़ सामान्य से काफी अधिक दर पर खरीदे गए थे. इसके अलावा पर्यावरण नियमों के विपरीत 44.23 प्रतिशत भू-भाग पर पत्थर का काम किया गया था. दलितों और कमजोर वर्ग के प्रति कागजी समर्पण दिखाने वाली मायावती ने इन स्मारकों के शिलान्यास पर ही 4.25 करोड़ रुपए फूंक डाले थे. स्मारक घोटाले में अहम भूमिका निभाने वाली सरकारी निर्माण एजेंसी उत्तर प्रदेश निर्माण निगम पर मायावती सरकार की इतनी कृपादृष्टि थी कि 4558.01 करोड़ रुपए की वित्तीय स्वीकृति की औपचारिकता के पहले ही निर्माण निगम को 98.61 प्रतिशत धन आवंटित कर दिया गया था. 

Friday, 24 August 2018

जंग की मुनादीः अब संसद घेरेंगे किसान

प्रभात रंजन दीन
‘किसानों की आय दोगुनी कर देंगे’... ऐसा बोल-बोल कर केंद्र सरकार और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपने ही जाल में फंस गई है. अब तक स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग करने वाले किसानों ने किसानों की न्यूनतम आय घोषित करने की मांग शुरू कर दी है. किसानों का कहना है कि जब किसानों की आय ही घोषित नहीं है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी देखा-देखी अन्य नेता यह कैसे कहते फिरते हैं कि वे किसानों की आय दोगुनी कर देंगे? देशभर के किसान नवम्बर महीने में जब संसद घेरेंगे तब प्रधानमंत्री से पूछेंगे कि किसानों की आय कितनी है? इसके बाद ही उसका दोगुना या तिगुना होना तय हो सकता है. न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर ठगे गए किसान 2019 चुनाव के पहले केंद्र सरकार से दो-दो हाथ कर लेना चाहते हैं. न्यूनतम आय के निर्धारण की मांग के साथ-साथ किसानों के लिए संसदीय और विधानसभा सीटें आरक्षित किए जाने की मांग भी शामिल है. किसान मानते हैं कि उनके वोट से जीत कर संसद पहुंचने वाले सांसद या विधानसभाओं में पहुंचने वाले विधायक सदन में किसान-हित की आवाज नहीं उठाते. लिहाजा, किसानों का अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद और विधानसभाओं में जाना चाहिए. अनुसूचित जाति, जनजाति और शिक्षक समुदाय की तरह किसानों की सीटें भी आरक्षित होनी चाहिए.
दरअसल, केंद्र सरकार की बेजा बयानबाजियों और प्रदेश सरकार के बेजा निर्णयों के कारण खास तौर पर उत्तर प्रदेश के किसान बौखला उठे हैं. सिंचाई के लिए इस्तेमाल आने वाले मोटर पंपों पर पड़ोसी राज्य हरियाणा में बिजली का शुल्क अत्यंत कम है और पंजाब में मुफ्त है, बिहार में सब्सिडी है तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी भारी रियायत है, ऐसे में यूपी सरकार बिजली का दर बढ़ाती चली जा रही है. एक हॉर्स पावर की मोटर पर बिजली शुल्क दो सौ रुपए है. सिंचाई के लिए किसानों को कम से कम पांच हॉर्स पावर की मोटर लगानी पड़ती है, लिहाजा किसानों का बिजली बिल भारी बोझ की तरह उनके सिर पर आ पड़ा है. किसानों के प्रति संजीदगी का प्रदर्शन करने वाली भाजपा सरकार में बिजली दर और बढ़ा दी गई है. किसानों का बकाया बिजली बिल वसूलने के लिए अलग से थाने निर्धारित कर दिए गए हैं, जो किसानों से पैसे वसूलते हैं और भुगतान में देरी होने पर एफआईआर दर्ज कर किसानों को गिरफ्तार कर लेते हैं. दूसरी तरफ चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के जो करोड़ों रुपए बकाया हैं, उसके भुगतान को लेकर सरकार सरासर झूठ बोलती है और चीनी मिलों के मालिक किसानों के गन्ने पर अपनी समृद्धि की फसल काट रहे हैं. हर बार पेराई सत्र में सरकार झूठ परोसती है कि गन्ना बकाये का भुगतान हो रहा है. आंशिक भुगतान को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है और सियासी फायदा उठाने की कोशिश की जाती है. स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश में केवल सरकारी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का चार हजार 176 करोड़ रुपए बकाया हैं. प्राइवेट चीनी मिलों पर किसानों का बकाया 11 हजार पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक है. विडंबना यह है कि गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान करने के लिए केंद्र सरकार ने चीनी मिलों के लिए जो 85 सौ करोड़ रुपए मंजूर किए, उसमें तीन हजार करोड़ रुपए अवमुक्त (रिलीज) भी हो गए, लेकिन किसानों के बकाये का भुगतान नहीं किया गया. यह रेखांकित करने वाला तथ्य है कि चीनी मिलों को केंद्र सरकार से मिलने वाला राहत पैकेज ब्याज मुक्त होता है.
लेकिन किसानों का कर्ज या बिजली बिल का बकाया ब्याज सहित वसूला जाता है. किसानों से वसूली बर्बर तरीके से की जा रही है. किसानों के कर्ज का बकाया तहसील में सार्वजनिक नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिया जाता है. जबकि उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के बकाये का ब्यौरा गोपनीय रखा जाता है. किसान पूछते हैं कि यह किस तरह का न्यायिक संतुलन है? पूंजीपति और उद्योगपति भी बैंक से कर्ज लेते हैं और किसान भी बैंक से ही कर्ज लेते हैं. पूंजीपतियों का कर्ज विशाल होता है जबकि किसानों का कर्ज अत्यंत लघु होता है. फिर ऐसा भेदभाव क्यों? कर्ज बकाया होने पर किसानों को तहसील के लॉकअप में बंद कर प्रताड़ित और अपमानित किया जाता है. जबकि बड़े बकायेदार पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के साथ ऐसा नहीं होता, बल्कि उन्हें विदेश भाग जाने का मौका दिया जाता है. किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष शिवाजी राय कहते हैं कि देश के सामने अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि बड़ा कर्जखोर कौन है? किसान या उद्योगपति? किसानों को भी यह प्रतीत होना चाहिए कि सरकार उनकी भी है, सरकार केवल पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का हित देखने के लिए नहीं है. देश के तकरीबन सारे उद्योगपतियों का मुनाफा लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि किसान लगातार बदहाल होता चला जा रहा है, ऐसा क्यों?
केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार और सत्ताधारी पार्टी लगातार कहती रहती है कि किसानों की आय दोगुनी की जाएगी. शिवाजी राय पूछते हैं कि क्या सरकार बताएगी कि किसान की आधिकारिक न्यूनतम आय क्या है? फिर आय दोगुनी करने की दोगली बात क्यों करती है? जब किसानों की आय ही सुनिश्चित नहीं है तो सरकार या पार्टी उसे दोगुनी कैसे कर देगी? सरकार पहले यह तो बताए कि किसानों की आय दरअसल है कितनी? किसान अर्से से 22500 रुपए प्रति परिवार आय सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन सरकार इस पर कोई ध्यान ही नहीं देती. केंद्र सरकार क्या केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए है? प्रदेश सरकार क्या केवल राज्य कर्मचारियों के लिए है? सरकार क्या केवल सांसदों और विधायकों की सुख-सुविधा देखने के लिए है? क्या उन्हें महज इसलिए वोट दिया जाता है कि वे अपने लिए मौज का इंतजाम करते रहें और आम नागरिक मरता रहे? केंद्र सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि किसान परिवारों के लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित हो और प्रत्येक महीने उसका भुगतान किसान परिवार के खाते में चला जाए. किसानों की फसल पर पूंजीपति धनाढ्य होता चला जा रहा है. किसानों की फसल पर सरकार बीपीएल और अंत्योदय योजनाओं में मुफ्त राशन बांट कर वाह-वाही लूटती है और किसानों को उसका श्रेय (अर्थ के रूप में) देने के बजाय बोझ लादती जाती है.
सरकार जब कारपोरेट और उद्योगपति घरानों को अपने उत्पाद की कीमत तय करने के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करती तो किसानों को उनके उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार क्यों नहीं देती? किसानों पर अत्याचार क्यों? अगर सरकार किसानों को उनके उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार नहीं दे सकती तो उसका उत्पाद पूरा का पूरा खरीद ले. किसानों का सम्पूर्ण उत्पाद सरकार खरीदे और उसके विपणन की व्यवस्था करे तभी देश का किसान तनावमुक्त होकर देश को भोजन दे पाएगा. नेता, नौकरशाह, पूंजीपति, धन्ना सेठ और दलालों से लेकर आम नौकरीपेशा और सड़क पर जीवन घसीटता आम आदमी सब वही रोटी-दाल और सब्जी खाते हैं जिसे किसान उपजाता है. फिर किसानों को सम्मानजनक हैसीयत क्यों नहीं दी जाती? बीपीएल के नाम पर न्यूनतम सांकेतिक मूल्य पर बांटा जाने वाला अनाज हो या अंत्योदय के नाम पर मुफ्त में बांटा जाने वाला अनाज, परोक्ष रूप से उसकी कीमत किसानों से ही वसूली जा रही है. किसानों की सब्सिडी रोकी जा रही है और पूंजीपतियों के लिए सरकार का खजाना खुला हुआ है. प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सब उनकी खुशामद कर रहे हैं. देश को राजनीतिक लोग चला रहे हैं या पूंजीपति? देश के लोगों को यही प्रतीत हो रहा है.
इन्हीं मसलों पर देशभर के किसान गंभीरता से विचार कर रहे हैं. 14 जून को दिल्ली के गांधी प्रतिष्ठान में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की बैठक हुई थी. इस बैठक में देशभर के दो सौ से अधिक किसान नेता शरीक हुए. बैठक में तय हुआ कि किसानों की सम्पूर्ण कर्ज माफी, सुब्रमण्यम समिति की सिफारिशों के सी-2 फार्मूले के मुताबिक किसानों की लागत का मूल्य निर्धारण करने और किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने की मांग को लेकर 30 नवम्बर को देशभर के किसान संसद घेरेंगे. उसके पहले व्यापक तौर पर किसानों से बातचीत करने और तैयारी करने का सिलसिला शुरू कर दिया गया है.
उत्तर प्रदेश के बागपत के नगवां कुटी में पिछले दिनों किसानों की बैठक हुई. किसान पंचायत के रूप में हुई बैठक में 10 हजार से अधिक किसान त्वरित सूचना पर जुटे. स्थानीय लोग कहते हैं कि 20 साल के बाद उन्होंने एक साथ इतने किसानों का सम्मेलन देखा. जबकि इस सभा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महज तीन-चार जिले शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत और मेरठ के किसान पहुंचे थे. बैठक में शामिल किसान नेताओं में किसान अधिकार समन्वय मंच के संयोजक नरेंद्र राणा, भारतीय किसान संगठन के अध्यक्ष ठाकुर पूरन सिंह, किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष शिवाजी राय, किसान नेता गुलाम मोहम्मद जौला, महेश सिंह समेत कई किसान नेता शामिल थे.
इस बैठक के बाद किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल लखनऊ आकर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा से मिला. किसानों ने सरकार द्वारा बढ़ाए गए बिजली दर को वापस लेने की मांग की लेकिन सरकार ने कोई भी सकारात्मक रुख नहीं दिखाया और वार्ता असफल रही. इसके बाद प्रदेश के किसानों ने सरकार से सीधे-सीधे भिड़ने का मन बना लिया है. 17 सितम्बर को बागपत के भड़ल गांव में किसानों की विशाल पंचायत बुलाई जा रही है, जिसमें यह रणनीति तय की जाएगी कि किसान बिजली बिल का बहिष्कार-आंदोलन शुरू कर जेल भरो आंदोलन के लिए तैयार रहें. किसान संगठनों की मांग है कि प्रदेश सरकार किसानों को बिजली और पानी मुफ्त में दे. ट्रैक्टर समेत अन्य कृषि उपकरणों पर लगने वाला टैक्स हटाए. खाद की कीमत कम करे और पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के बजाय किसानों को ही बीज पैदा करने की आर्थिक-सहूलियत प्रदान करे.
किसान यह भी मांग कर रहे हैं कि संसद और विधानसभाओं में वर्गीय प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लागू हो. जिस तरह अनुसूचित जाति जनजाति के लिए संसदीय और विधानसभा क्षेत्र आरक्षित होते हैं, उसी तरह किसानों के लिए भी लोकसभा और विधानसभा सीटें आरक्षित होनी चाहिए. विधान परिषदों के लिए जिस तरह शिक्षकों के लिए सीटें आरक्षित हैं, उसी तरह किसानों के लिए भी होनी चाहिए, ताकि किसान अपनी बात संसद और विधानसभाओं में रख सकें. संवर्गीय प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लागू होने पर केवल किसान क्या, पत्रकार, मजदूर और अन्य संवर्ग के लोग भी अपनी आवाज विधायी तौर पर उठा सकेंगे. अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर लोकतंत्र और मतदान का कोई औचित्य नहीं रह जाता.
किसान नेता शिवाजी राय कहते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों के साथ धोखा है. किसानों के पास कोई ऐसा मंच नहीं जहां से वे पूरे देश को इस धोखे के बारे में बता सकें. किसानों की पीड़ा यह भी है कि देश का मीडिया भी किसानों की बात सही तरीके से नहीं उठाता. स्वामीनाथन कमेटी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की प्रक्रिया में पूर्ण लागत यानि सी-2 फार्मूले को आधार बनाने की सिफारिश करती है, लेकिन केंद्र सरकार आंशिक लागत के फार्मूले (2+एफएल) को आधार बनाकर मनमाने तरीके से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय कर देती है. स्वामीनाथन आयोग ने सी-2 फार्मूले के तहत कृषि उत्पादन में इस्तेमाल आने वाले उपकरणों का खर्च, ऋण पर लगने वाला ब्याज, जमीन का किराया, किसान परिवार की मजदूरी, खाद, बीज, सिंचाई, बिजली, वाहन किराया समेत सम्पूर्ण लागत जोड़कर एमएसपी तय करने की सिफारिश कर रखी है. लेकिन केंद्र सरकार ने इसे नहीं माना. केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य में 14 खाद्यानों को शामिल किया गया है, जिसमें धान, ज्वार, हाइब्रिड बाजरा, रागी, मक्का, अरहर, मूंग, ऊड़द, मूंगफली, सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन, तिल, नाइजर सीड और कपास है. केंद्र ने धान की उपज के लिए आंशिक लागत 1166 रुपए प्रति क्विंटल तय कर 1750 रुपए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया. जबकि सी-2 फार्मूले से धान की फसल पर लागत 1560 तय होती और उसमें 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य 2340 रुपए होता. किसान नेता कहते हैं कि सरकार मात्र छह प्रतिशत किसानों का फसली उत्पाद खरीदती है. वह भी किसानों से न खरीदकर बड़े व्यापारियों और बिचौलियों के माध्यम से खरीदा जाता है. इसमें व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है. इससे किसान समर्थन मूल्य से काफी कम दर पर क्षे़त्रीय व्यापारियों या बिचौलियों को अपना माल बेचने पर विवश हो जाता है. सरकार के क्रय केंद्र घपलेबाजी का केंद्र बने रहते हैं. सरकार द्वारा बनाए गए नियम और कटौती की आधा दर्जन शर्तें किसानों के उत्पीड़न का जरिया बनती हैं और किसान अपना उत्पाद मंडी में लाकर फंस जाता है. आखिरकार किसान बिचौलियों और दलालों की शर्तों पर माल बेच कर चला जाता है.

गन्ना बकाये पर सरकार परोस रही झूठ, किसानों के हाथ में ठूंठ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा बार-बार सार्वजनिक मंचों से भी गन्ना बकाये के भुगतान को लेकर भ्रामक वक्तव्य जारी करने से नहीं हिचकते. जैसा ऊपर बताया कि चीनी मिलों पर प्रदेश के गन्ना किसानों का करीब 16 हजार (15, 676) करोड़ रुपए बकाया है. राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी कहते हैं कि इस वर्ष 18 मई तक निजी और सरकारी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 13367 करोड़ रुपए बकाया था. बकाये की यह राशि बढ़ कर 16 हजार करोड़ पर पहुंच गई.
अभी पिछले ही दिनों गन्ना बेल्ट सहारनपुर में चीनी मिलों द्वारा बकाये के भुगतान में की जा रही हीलाहवाली के खिलाफ किसानों की नाराजगी देख कर प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा. सहारनपुर के कमिश्नर सीपी त्रिपाठी ने बकाया भुगतान पर चीनी मिलों की हठधर्मिता देखते हुए 16 चीनी मिलों के खिलाफ नोटिस जारी कर भुगतान करने की हिदायत दी है. बकाये के भुगतान में शासन-प्रशासन की रुचि इससे ही जाहिर होती है कि सहारनपुर की 16 चीनी मिलों के खिलाफ पहली बार नोटिस जारी हुई है. अकेले सहारनपुर की चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 1766 करोड़ बकाया है. इसमें 1670 करोड़ रुपए मूल और 96 करोड़ रुपए ब्याज के हैं. देवबंद, खतौली और टिकौला चीनी मिलों पर बकाया कुल बकाये का 80 प्रतिशत से ऊपर है. सहारनपुर मंडल की 17 में से नौ चीनी मिलों पर सौ करोड़ रुपए से अधिक बकाया है. बुढ़ाना चीनी मिल पर सबसे अधिक बकाया 217 करोड़ रुपए का है. बकायेदारों में सरकारी कोऑपरेटिव चीनी मिल नानौता और सरसावां मिल भी शामिल है. बकाये का जिलेवार ब्यौरा देखें तो आपको सत्ता अलमबरदारों के झूठ का पोर-पोर दिखाई पड़ेगा. सहारनपुर जिले की छह चीनी मिलों पर 534 करोड़ रुपए बकाया हैं. मुजफ्फरनगर की आठ चीनी मिलों पर 772 करोड़ रुपए बकाया हैं. शामली की तीन चीनी मिलों पर 461 करोड़ से ज्यादा का बकाया है. देवबंद चीनी मिल पर 95 करोड़ बकाया, गांगनौली चीनी मिल पर 158 करोड़ बकाया, शेरमऊ चीनी मिल पर 83 करोड़ बकाया, गागलहेड़ी चीनी मिल पर 27 करोड़ बकाया, नानौता कोऑपरेटिव चीनी मिल पर 114 करोड़ बकाया और सरसावां कोऑपरेटिव चीनी मिल पर 56 करोड़ रुपए बकाया हैं. इसी तरह खतौली चीनी मिल पर 144 करोड़ का बकाया, तितावी चीनी मिल पर 140 करोड़ का बकाया, बुढ़ाना चीनी मिल पर 217 करोड़ का बकाया, मंसूरपुर चीनी मिल पर 110 करोड़ का बकाया, टिकौला चीनी मिल पर 27 करोड़ का बकाया, खाईखेड़ी चीनी मिल पर 76 करोड़ का बकाया, रोहाना चीनी मिल पर 24 करोड़ का बकाया, मोरना कोऑपरेटिव चीनी मिल पर 34 करोड़ का बकाया, शामली चीनी मिल पर 187 करोड़ का बकाया, ऊन चीनी मिल पर 117 करोड़ का बकाया और खुद प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा के विधानसभा क्षेत्र स्थित थानाभवन चीनी मिल पर 157 करोड़ का बकाया लंबित है. किसान कहते हैं कि गन्ना मंत्री अपने विधानसभा क्षेत्र की चीनी मिल से बकाये का भुगतान नहीं करा पा रहे तो फिर वे बड़े-बड़े बोल क्यों ‘फेंकते’ रहते हैं!
चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के बकाये के भुगतान का कमोबेश यही हाल पूरे उत्तर प्रदेश में है. मुरादाबाद में भी गन्ना भुगतान नहीं होने के कारण किसानों का गुस्सा अब उफान ले रहा है. जिले के गन्ना किसान भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं. इस सिलसिले में पिछले दिनों किसानों की बैठक में गन्ना भुगतान में अप्रत्याशित देरी का मुद्दा जोरदारी से उठा. ब्लॉक अध्यक्ष काले सिंह ने कहा कि एक तरफ गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान नहीं हो रहा और दूसरी तरफ किसानों को खसरा खतौनी के नाम पर परेशान किया जा रहा है. इन किसानों ने तय किया है कि वे 23 सितम्बर को पैदल ही दिल्ली के लिए कूच करेंगे.
उधर संभल जिले में भी गन्ना बकाये का मामला भीषण गर्म हो रहा है. किसानों का उग्र तेवर देखते हुए वहां भी जिला प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा. संभल के जिलाधिकारी ने चीनी मिलों को बकाये का भुगतान करने को कहा है. चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के बकाये का ब्यौरा देते हुए प्रशासन ने बताया कि मझावली वीनस चीनी मिल पर 96.16 करोड़ रुपए बकाया हैं. हालांकि प्रशासन ने यह भी कहा कि इसमें 57.26 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है. बताया गया कि असमोली शुगर मिल पर 509.40 करोड़ के बकाये में से 396.19 करोड़ का भुगतान कर दिया गया है. अब उस पर 113.21 करोड़ रुपए बकाया हैं. इसी तरह रजपुरा शुगर मिल ने 432.58 करोड़ के बकाये में से 342.11 करोड़ भुगतान किया है, अब उस पर 90.47 करोड़ रुपए बकाया हैं.

एक तो भुगतान नहीं दूसरे शिकंजे में कसने की तैयारी
एक तरफ उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान नहीं हो रहा, दूसरी तरफ राज्य सरकार गन्ना किसानों से घोषणा-पत्र दाखिल करने का दबाव बना रही है. जो किसान सरकार की तरफ से निर्धारित प्रपत्र पर घोषणा-पत्र दाखिल नहीं करेंगे, उनका गन्ना चीनी मिलों द्वारा नहीं खरीदा जाएगा. गन्ना किसानों को अपने शिकंजे में कसने के लिए सरकार ने घोषणा-पत्र का फितूर निकाला है. सरकार ने ऐलान किया है कि जिन गन्ना किसानों ने निर्धारित प्रारूप में घोषणा पत्र भरकर प्रस्तुत नहीं किया है उन किसानों का सट्टा संचालित नहीं होगा और पेराई सत्र 2018-19 में उन्हें गन्ना आपूर्ति की इजाजत नहीं दी जाएगी. इसके अलावा गन्ना किसानों को अपने खेत की खतौनी के दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे. किसानों को घोषणा पत्र के साथ खतौनी के दस्तावेज, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, बैंक पासबुक की फोटो कॉपी भी जमा करनी होगी, तभी उनका गन्ना खरीदा जाएगा.

नेता-रचित भ्रांति में उलझ गई हरित-क्रांति के जनक की रिपोर्ट
सत्ता में आने के पहले भारतीय जनता पार्टी किसानों के लिए स्वमीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने के वादे करती रही, लेकिन सत्ता पर आरूढ़ होते ही भाजपा नेताओं ने तीव्र गति से अपना रंग बदल दिया. अब भाजपा स्वामीनाथ आयोग के नाम से ही बिदकती है. किसानों के लिए जो न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की गई वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के विपरीत है. आप यह जानते हैं कि देश में हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले डॉ. एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में वर्ष 2004 के नवम्बर महीने में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था. आयोग ने अक्टूबर 2006 में अपनी रिपोर्ट दे दी. लेकिन इसे अब तक किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया. स्वामीनाथन आयोग ने किसानों की हालत सुधारने से लेकर कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई सिफारिशें की थीं. सरकार यह दावा करती है कि आयोग की कई सिफारिशें लागू कर दी गईं, लेकिन यह अर्धसत्य है. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है, 1. फसल उत्पादन की कीमत से 50 प्रतिशत ज्यादा दाम किसानों को मिले. 2. किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दाम में मुहैया कराए जाएं. 3. गांवों में किसानों की मदद के लिए ‘विलेज नॉलेज सेंटर’ यानि ज्ञान चौपाल बनाए जाएं. 4. महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं. 5. किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके. 6. अतिरिक्त और इस्तेमाल नहीं होने वाली जमीन के टुकड़ों का वितरण किया जाए. 7. खेतिहर जमीन और वनभूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए कारपोरेट घरानों को कतई न दिया जाए. 8. फसल बीमा की सुविधा पूरे देश में हर फसल के लिए मिले. 9. खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था हर गरीब और जरूरतमंद किसान तक पहुंचे. 10. सरकार की मदद से किसानों को दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दर कम करके चार प्रतिशत किया जाए. 11. कर्ज की वसूली में राहत, प्राकृतिक आपदा या संकट से जूझ रहे इलाकों में ब्याज से राहत सामान्य हालत बहाल होने तक जारी रहे. 12. लगातार प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में किसान को मदद पहुंचाने के लिए ‘एग्रीकल्चर रिस्क फंड’ का गठन किया जाए.

किसानों से बर्बर वसूली, नेताओं पर अरबों बकाया
किसानों के बिजली बिल या ऋण के बकाये की मामूली रकम की वसूली गैर मामूली और अमानवीय तरीके से होती है. जबकि नेताओं पर बिजली बिल के अरबों रुपए बकाया है, लेकिन उसकी वसूली नहीं होता. सत्ता का यही दोगला चरित्र भारतीय लोकतंत्र की कठोर सच्चाई है. आप हैरत करेंगे कि उत्तर प्रदेश के मंत्रियों और विधायकों पर 10 हजार करोड़ रुपए का बिजली बिल बाकी है. इसके अलावा नेताओं के आरामगाहों यानि वीआईपी गेस्ट हाउस पर भी दो करोड़ 65 लाख रुपए का बिजली बिल बकाया है. और तो और विधानसभा में मंत्रियों विधायकों को आचार विचार की सीख देने वाले विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित पर भी 12 लाख 64 हजार का बिजली बिल बकाया है.
बिजली बिल बकाये का ब्यौरा देखेंगे तो आपको सियासत की असलियत का एहसास होगा. बहुखंडी मंत्री आवास पर एक करोड़ 47 लाख, प्रदेश के खेल मंत्री चेतन चौहान पर 17 लाख 72 हजार, खुद बिजली मंत्री श्रीकांत शर्मा पर 6 लाख 51 हजार, कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही पर 9 लाख 28 हजार, उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या पर 10 लाख 80 हजार, शहरी विकास मंत्री सुरेश खन्ना पर 9 लाख 20 हजार, औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना पर 7 लाख 83 हजार और वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल पर करीब 9 लाख रुपए का बिजली का बिल बाकी है. कर्मचारियों का आरोप है कि निजीकरण पूंजीपतियों को फयदा पहुंचाने के लिए हो रहा है. प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा जब यह कहते हैं कि बिजली विभाग 72 हजार करोड़ के घाटे में है तो खुद पर उंगली उठाने का नैतिक साहस नहीं कर पाते.

आजादी के 71 साल बाद निर्णायक शक्ल लेने लगा है किसान आंदोलन
वर्ष 2017 से 2018 के बीच देश के लोगों ने किसान आंदोलन को भाषाई और सीमाई बॉर्डर पार कर देशव्यापी शक्ल लेते हुए देखा है. आजादी के बाद से लेकर अब तक कई प्रमुख और कई क्षेत्रीय स्तर के किसान आंदोलन हुए, लेकिन राजनीति ने इन किसान आंदोलनों को निर्णायक शक्ल तक नहीं पहुंचने दिया. किसान आंदोलनों से जुड़े नेताओं को प्रलोभन के जरिए स्खलित किया और किसान आंदोलनों को फेल कराने का काम किया.
आप याद करें पिछले साल 13 मार्च 2017 को तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू किया था. तमिलनाडु के किसानों का वह आंदोलन तकरीबन 40 दिन चला और 23 अप्रैल 2017 को खत्म हुआ. इसके बाद एक जून 2017 से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसानों ने आंदोलन शुरू किया. मध्य प्रदेश के किसानों का आंदोलन नियोजित हिंसा की भेंट चढ़ा और पांच किसानों की मौत हुई और सैकड़ों वाहन आग के हवाले कर दिए गए. हिंसा की चपेट में आकर बिखर गया मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन सियासी षडयंत्रों का शिकार बना. राजनीतिक दलों ने एक दूसरे पर आरोप लगाए, लेकिन यथार्थ यही है कि किसानों के आंदोलन को हिंसक रूप देने के लिए असामाजिक और अराजक तत्वों का सहारा लिया गया. राजस्थान में भी किसानों का आंदोलन असरकारक रहा, लेकिन महाराष्ट्र और राजस्थान दोनों राज्यों के किसान आंदोलन व्यापक परिणाम हासिल करने के बजाय क्षेत्रीय हित पर संतोष कर समाप्त हो गए. किसानों की मूल भूत समस्या वहीं की वहीं रह गई. इस वर्ष एक से 10 जून तक 130 किसान संगठनों ने विभिन्न शहरों में सांकेतिक आंदोलन चलाया और कृषि उत्पाद खास तौर पर फल, सब्जियां और दूध आदि की पूर्ति बंद रखी. देश के 30 विभिन्न नेशनल हाईवे पर किसानों के धरना प्रदर्शन से भी देशभर में संदेश गया. मध्य प्रदेश के 10 स्थानों पर किसानों का क्रमिक धरना प्रदर्शन आयोजित होता रहा. महाराष्ट्र के आठ, हरियाणा के चार, राजस्थान के तीन, कर्नाटक के दो, केरल और जम्मू कश्मीर के एक एक स्थान पर किसानों ने अपना डेरा जमाया. इस आंदोलन का रेखांकित करने वाला पहलू जम्मू कश्मीर के किसानों का आंदोलन में साथ आना है. किसानों की इस एकजुटता से जागरूकता भी बनी है. इसी का नतीजा है कि हर एक घंटे में दर्ज होने वाली एक किसान की आत्महत्या कम होने लगी है. हालांकि उसका श्रेय लेने के लिए सत्ताधारी दल अवांछित हरकतों से लेकर बयान तक जारी करते रहे. एकजुटता और आंदोलन से देशभर के किसानों में यह जागरूकता प्रगाढ़ हुई है कि सत्ता सियासतदानों के साथ मिल कर कारपोरेट घराने किसानों को खेती छोड़ देने के लिए विवश करने का षडयंत्र कर रहे हैं. कारपोरेट घराने किसानों की खेती पर कब्जा करना चाहते हैं. लिहाजा, किसानों को अब यह बात समझ में आ रही है कि उन्हें अपना मूल काम किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना है. जबकि इसके पहले किसान खेती छोड़ कर दूसरा धंधा अपनाने का मन बना रहे थे. पूर्वी उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट के किसानों ने तो कृषि कार्य छोड़ कर दूसरे प्रदेशों में दिहाड़ी मजदूर तक बनना मंजूर कर लिया. जागरूकता के कारण देश के 60 से अधिक किसान संगठनों का किसान एकता मंच शक्ल में आया और एक बार फिर आंदोलनों का दौर शुरू हुआ. भट्टा परसौल, बेतुल, मंदसौर के आंदोलन भले ही समय के पहले बिखर गए, लेकिन इन आंदोलनों ने व्यापक पैमाने पर किसानों को एकजुट होने का संदेश दिया.
किसानों के आंदोलन को एकजुट शक्ल में आता देख कर आर्थिक विश्लेषक कहते हैं कि भारत का बाजार ग्रामीण केंद्रित होने वाला है इसीलिए कारपोरेट घराने किसी भी कीमत पर किसानों को आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होने देना चाहते. किसान आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होगा तो भविष्य में ग्रामीण सेक्टर में विकसित होने वाले कृषि आधारित मझोले, लघु और सूक्ष्म उद्योग-धंधों पर किसानों का मालिकाना हक नहीं हो पाएगा और उस ग्रामीण बाजार को भी कारपोरेट घराने ही कंट्रोल कर पाएंगे. इस षडयंत्र में सत्ता भी कारपोरेट घरानों का ही साथ दे रही है, क्योंकि राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए पैसा भी कारपोरेट घरानों से ही मिलता है. देश के 650 जिलों में से 500 जिलों के बाजार ग्रामीण आधारित हैं. कारपोरेट घराने इस बाजार पर अपना नियंत्रण चाहते हैं. देश में अनाज का उत्पादन करीब तीन सौ मिलियन टन है और करीब ढाई सौ मिलियन टन अन्य फसलों का उत्पादन है. दूध का उत्पादन 150 मिलियन टन है, जो देश की अर्थव्यवस्था को 30 से 40 लाख करोड़ का व्यापार देता है. अगर किसान एकजुट हुए तो इतने बड़े ग्राम्य आधारित बाजार का नियंत्रक किसान समुदाय ही होगा. लड़ाई का मूल बिंदु यहां है.

आम लोग भी समझ रहे हैं किसानों की मूलभूत समस्याएं
दो वर्षों में घनीभूत हुए किसान आंदोलनों ने किसानों की मूलभूत समस्याओं के बारे में देश के आम लोगों को जानने समझने का मौका दिया है. किसानों की इन समस्याओं को पिछले 71 साल से सियासतदानों ने दबा-छुपा कर रखा और उस पर राजनीति की रोटियां सेंकते रहे. आजादी के सात दशक बाद भी देश में खेतों के बंटवारे का कोई संतुलित नियम नहीं बनाया गया. आज भी देश में कृषि भूमि के मालिकाना हक को लेकर होने वाले विवाद सबसे अधिक हैं. असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन सरकारें साहूकारों और सामंतों के पक्ष में ही खड़ी रही हैं. जमीनों का बड़ा हिस्सा बड़े धनपतियों,  नेता और नौकरशाहों के रूप में नव-सामंतों, दलालों और साहूकारों के पास है. भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े फार्म हाउस हैं, जहां कृषक मजदूर काम करते हैं. छोटे और मझोले किसानों की दुर्दशा है. फसल अच्छी नहीं हुई तो बर्बाद हुए, मौसम की मार हुई तो मारे गए और कर्ज डूबा तो फांसी लगा ली.
छोटे रकबे में फसल उगाने की जद्दोजहद करने के बाद भी किसानों को उनकी फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिलता. यह इस कृषि प्रधान देश का ‘कैंसर’ है, जिसे नेताओं ने पाल कर रखा है. सरकार हर फसल के मौसम में किसानों का अनाज खरीदने की घोषणा करती है, क्रय केंद्र खोलती है और उन क्रय केंद्रों में नौकरशाह, कर्मचारी और दलाल मिल कर भ्रष्टाचार की दुकान खोल लेते हैं. किसानों का अनाज क्वालिटी के आधार पर रिजेक्ट कर देने का डर दिखा कर मनमानी कीमत पर खरीदा जाता है और उसी अनाज से भ्रष्टाचारी अपना धन साम्राज्य खड़ा करते हैं. किसान औने-पौने दाम पर अपना माल बेच कर घर लौट जाता है. गेहूं और धान की सरकारी खरीद में भीषण घोटाला होता है, लेकिन वह सरकार को नहीं दिखता. आलू, टमाटर और दूसरी सब्जियों को लेकर भी किसान मरता रहा है. आपने अभी देखा ही कैसे किसानों ने अपना आलू टमाटर सड़क पर फेंक दिया. उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ से लेकर फर्रुखाबाद तक का पूरा बेल्ट आलू उत्पादन के लिए न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है. लेकिन किसानों को आलू की लागत का मूल्य भी नहीं मिल पाता. बाजार में आलतू-फालतू दाम पर आलू बेच कर किसान को लौटना पड़ता है या सड़क पर आलू फेंक कर किसान घर लौट जाता है. आजादी के 71 साल बाद भी सरकार ने आलू के भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की और कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के लिए व्यापारी मनमाना किराया वसूल करते हैं. किसान इतना दबाव में आ जाता है कि वह कोल्ड स्टोरेज में ही अपना आलू छोड़ देता है. गन्ना किसानों की स्थिति के बारे में आपने ऊपर जाना ही. धन्ना सेठों की चीनी मिलों पर किसानों के अरबों रुपए बकाया हैं, लेकिन सरकार को झूठ बोलने से ही फुर्सत नहीं.
यह भी अजीब विडंबना है कि फसल किसान बोते हैं, लेकिन बीज पैदा करने का अधिकार कारपोरेट और व्यापारिक घरानों के पास है. बीज उत्पादन के लिए सरकार सारी सुविधाएं व्यापारिक घरानों को ही देती है. यही सुविधा किसानों को मिले तो किसान अपने लिए बीज का उत्पादन खुद करने लगें. किसानों को बाजार से महंगा बीज खरीदना पड़ता है. किसान लगातार यह मांग कर रहे हैं कि बीज पैदा करने का अधिकार और सुविधाएं उन्हें दी जाएं, लेकिन सरकार ऐसा क्यों करे? बीजों की वितरण व्यवस्था भी ठीक नहीं है. बीज महंगा होने के बावजूद अच्छी क्वालिटी का नहीं होता, जिसका असर कृषि उत्पाद पर पड़ता है. उच्च स्तरीय बीज और हाइब्रीड बीज के नाम पर किसानों को खूब ठगा भी जाता है. किसानों का दुर्भाग्य ही है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश में सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई है. किसान खुद अपना मोटर पंप लगा कर सिंचाई करते हैं तो सरकार बिजली शुल्क बढ़ा कर इन्हें लूटती है और उत्पीड़न करती है. किसान बारिश के भरोसे ही खेती करता है. केवल उत्तर प्रदेश ही क्या देश के तमाम दूसरे राज्यों में भी सिंचाई व्यवस्था पर सरकारों का कोई ध्यान नहीं है. नहरें, रजबहे सब सूख गए हैं. नहरें रजबहे मलबों से पट गए, लेकिन सफाई नहीं हुई. कागज पर सफाई हो जाती है और सरकारी धन मंत्री से लेकर अफसर और कर्मचारी के जेबाय नमः हो जाता है. पंजाब और हरियाणा ही ऐसा राज्य है, जहां सिंचाई व्यवस्था पर सरकारों ने ध्यान दिया.
फसलों को बाजार तक पहुंचाने की भारी दिक्कत का सामना किसानों को हर फसली मौसम के बाद करना पड़ता है. कृषि उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने के लिए समुचित ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था आज तक नहीं की गई. किसान खुद अपना प्रोडक्ट किसी तरह ऊंचा किराया देकर बाजार तक लाता है और वहां उसे अपने उत्पाद की उचित कीमत नहीं मिल पाती. जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों को लेकर किसान और मार खाते हैं. किसानों के लिए आफत यह है कि एक बार किसी तरह अनाज या सब्जियां बाजार तक पहुंचा दीं तो वापस नहीं लाई जा सकतीं. इससे पार पाने के लिए किसान हर बार अपना माल औने-पौने दाम पर बेच कर वापस लौट आता है. बाजार में किसानों के रुकने के लिए कहीं भी कोई विश्रामगृह आज तक नहीं बनाया गया. किसानों पर हावी साहूकारी और महाजनी की समानान्तर व्यवस्था खून चूसने का काम कर रही है. इसमें बैंक भी नव-साहूकार के रूप में आ गए हैं और प्रशासन की मदद से वे किसानों पर जुल्म ढा रहे हैं. महंगे बीज, महंगी खाद, महंगी सिचाई और महंगी तकनीकी जरूरतों ने किसान को कर्जखोर बना कर रख दिया है. कर्ज देने में बैंक किसानों से घूस वसूलते हैं तो सूदखोर, साहूकार और महाजन किसानों से ऊंचा ब्याज वसूलते हैं. किसानों की बेतहाशा हुई आत्महत्याओं की मूल वजह यही है.

पर किसानों के रहनुमा भी उतने ही बड़े ‘अपराधी’...
देश में किसानों की दुर्दशा के लिए किसानों के रहनुमा भी कम दोषी नहीं रहे हैं. बिना नाम छापे आप समझ लेंगे कि इस देश में कौन कौन से स्वनामधन्य नेता सियासत की दुकान में किसानों के मसले बेच-बेच कर प्रभावशाली, समृद्धशाली, बलशाली और भूशाली होते गए. किसानों के रहनुमा बनने वाले लोग बड़े बड़े नेता और मंत्री बने, लेकिन ‘बड़ा’ बनने के बाद उन नेताओं ने किसानों के मसले छोटे कर दिए. आप सुनते और बोलते हैं कि नक्सली संगठनों के नेता (कमांडर) कैसे धनाढ्य होते गए. उनके बच्चे पश्चिमी देशों में आलीशान स्कूल-कॉलेजों में पढ़ते हैं या बेहतरीन नौकरी करते हैं. कश्मीर के अलगाववादी नेतों का भी यही हाल है. किसानों के रहनुमा नेताओं की लंबी जमात को भी आप उन्हीं नक्सलियों और अलगाववादियों की फेहरिस्त में शामिल कर सकते हैं. आंदोलनों के फेल होने की सबसे बड़ी वजह यही है. आप झांक कर देखें तो किसानों के रहनुमा नेताओं की आज की समृद्धियां उनकी चारित्रिक-दुष्यात्रा की कहानियां कहती मिलेंगी. इनकी हजारों एकड़ जमीनें और करोड़ों-अरबों रुपए की आर्थिक औकात यह बताने के लिए काफी है कि इस देश में किसान एकजुट क्यों नहीं हो पाए, किसानों की समस्या का समाधान आज तक क्यों नहीं निकला और किसान आंदोलन आज तक फेल क्यों होते रहे..! 

Thursday, 23 August 2018

राजनीतिक इतिहास का अटल व्यक्तित्व...

प्रभात रंजन दीन
सत्य का संघर्ष सत्ता से / न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती है / किरण अंतिम अस्त होती है…
अटल जी की कविता की ये चार पंक्तियां देश की वास्तविकता का परिचय देने के लिए काफी हैं. वाकई, अटल बिहारी वाजपेयी के जाने से भारतवर्ष में नैतिक, ईमानदार, मानवीय, दंभहीन, विनम्र और विद्वान राजनीतिक शख्सियत की आखिरी किरण भी अस्त हो गई. संत कबीर कहते हैं कि वे हद और अनहद के बीच खड़े हैं... अटल जी के व्यक्तित्व पर समग्र दृष्टि डालें तो आपको साफ-साफ दिखेगा कि अटल भी हद और अनहद के बीच ही खड़े रहे! अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस तरह विराट हृदय वाली राजनीति की धारा चलाई, उस पर चलना या उसका अनुकरण करना बड़ी तपस्या और अटल की कवित्व-भाषा में दधीचि की हड्डियां गलाने जैसे त्याग से ही संभव है. कहने से थोड़े ही होता है कि ‘मैं अटल जी के रास्ते पर चल रहा हूं’, उस तरह बनने का योग और जतन करना पड़ता है.
देखिए, शब्द-ब्रह्म और शब्द-व्यायाम में मौलिक फर्क है, जिसे अटल जी का व्यक्तित्व रेखांकित करता है. मेधा, ज्ञान और तपस्या के सुंदर समन्वय से ही शब्द-ब्रह्म प्रकट होता है. यह प्रकृति का उपहार है. शब्द-व्यायाम तो भौतिक कसरत है, उसमें आत्मा नहीं होती. अटल जी के शब्दों में ब्रह्म की झलक प्रकृति के उसी अनमोल उपहार की अभिव्यक्ति थी. दो विपरीत छोर वाली राजनीतिक धारा के बीच अटल जी संतुलन-सेतु की तरह काम करते थे. दोनों के बीच ‘बैलेंसिंग-बीम’ बनने में स्वार्थ नहीं बल्कि सौहार्द समाहित था. दक्षिणपंथी और वामपंथी राजनीतिक विचारधाराओं के बीच समझदार सेतु के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी अटल खड़े रहे, ठीक वैसे ही जैसे संत कबीर हद और अनहद के बीच निर्लिप्त और निस्पृह भाव से खड़े रहते हैं. ऐसे ही व्यक्तित्व के लिए दुश्मन देश का प्रधानमंत्री भी कह उठता है, ‘अटल जी पाकिस्तान में भी इतने पसंद किए जाते हैं कि वे यहां भी चुनाव लड़ें तो जीत जाएं.’ शांति का संदेश लेकर 19 फरवरी 1999 को बस से लाहौर गए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पाकिस्तान में हुए अभूतपूर्व स्वागत और अटल जी के प्रति पाकिस्तानियों का प्रेम देख कर तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था, 'वाजपेयी साहब, आप पाकिस्‍तान में भी चुनाव जीत सकते हैं.'
आपने देखा ही है कि कश्मीर के आम लोग, नेता और यहां तक कि अलगाववादी विचारधारा रखने वाले लोग भी अटल जी को कितना पसंद करते हैं. यह दुर्लभ बात है कि भारतीय जनता पार्टी के धुर (एक्सट्रीम) विरोधी भी अटल जी के प्रशंसक थे और उनसे जुड़ा महसूस करते थे. कोई तो हो जो आलोचना करे! ऐसा कोई नहीं मिलता... न राजनीतिक जीवन में रहते हुए और न जीवन से मुक्त होने के बाद. हिंदूवादी राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की कट्टर मुस्लिम जमातें हों या धुर वामपंथी या विपक्षी दल, सब में अटल जी की स्वीकार्यता अटल जी को महापुरुषों की श्रेणी में खड़ा करती है.
खुर्राट वामपंथी ईएमएस नम्बूदरीपाद रहे हों या वामपंथी पुरोधा ज्योति बसु या ईके नयनार, सब अटल बिहारी वाजपेयी के प्रशंसक थे. वामपंथी नेताओं से अटल जी की निकटता को अखबार वाले कभी-कभार संदेहास्पद भी बना देते थे. एक बार तो बंगाल में अखबार वालों ने यह भी लिख डाला कि ज्योति बसु अटल बिहारी वाजपेयी से ‘गुपचुप’ मिलते रहते हैं. विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाले ‘जन मोर्चा’ का विजयोत्सव जब वामराज वाले पश्चिम बंगाल में मनाया गया तो अटल जी उसमें शरीक हुए थे. कलकत्ता के शहीद मिनार मैदान में आयोजित उस विजयोत्सव में वीपी सिंह, ज्योति बसु के साथ बैठे अटल जी की वह पुरानी तस्वीर आप भी देखें और यह जानते चलें कि इसी तस्वीर को लेकर कांग्रेस और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा और वाम दलों के बीच ‘खिचड़ी पकने’ का आरोप लगा कर सतही सियासत की थी. वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब ‘माई लाइफ, माई कंट्री’ में लिखा है कि वाम दलों और भाजपा के सहयोग से केंद्र में बनी नेशनल फ्रंट की सरकार के दौरान अटल जी और ज्योति बसु की गोपनीय मीटिंग हुई थी, जिसमें आडवाणी खुद भी शामिल थे. यह बैठक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने बीरेन साहा के आवास पर हुई थी. ज्योति बसु ने भी ऐसी दो गोपनीय बैठकों के बारे में स्वीकारोक्ति दी थी, इसमें एक बैठक लालकृष्ण आडवाणी के घर पर हुई थी. ज्योति बसु ने कहा था कि आडवाणी की रथ-यात्रा रोकने के लिए वह बैठक हुई थी. गोपनीय बैठक राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए नहीं थी. वाजपेयी जी की केरल के धुरंधर कम्युनिस्ट नेता ईके नयनार से भी खूब अंतरंगता थी. निकटता का यह आलम था कि एक बार केरल हवाई अड्डे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों ने मजाक में अटल जी से पूछ दिया था कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में क्या ईके नयनार भी शामिल होंगे? अटल हंसने लगे थे और नयनार किनारे बैठे केरल भाजपा के अध्यक्ष ओ राजगोपाला की तरफ उंगली से इशारा कर रहे थे, जैसे कह रहे हों, ‘मैं नहीं, वो बनेंगे...’
अटल का ज्ञान और उनकी भाषण-शैली में झलकने वाली ओजस्विता उन्हें विश्व के पटल पर शीर्ष स्थान देती है. 80 के दशक में ही ‘टाइम’ मैगजिन ने आचार्य रजनीश और अटल बिहारी वाजपेयी को सबसे प्रभावशाली वक्ताओं में शुमार किया था. उनकी ओजस्विता और उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व का ही परिणाम था कि महज एक वोट से राजनीतिक कुचक्र का शिकार हुए अटल अगले ही चुनाव में कांग्रेस जैसी उस समय की सशक्त पार्टी को धकेल कर केंद्र की सत्ता पर आरूढ़ हुए और पूरे पांच वर्ष देश को स्थिर सरकार दी. भारतीय जनता पार्टी को अटल के चेहरे का भरोसा रहा... तब भी और अब भी. अटल की जब भी उपेक्षा हुई भाजपा चुनाव हारी. अटल उपेक्षा से विचलित नहीं होते, राजनीतिक बयानबाजी नहीं करते, किसी तिकड़म में नहीं उतरते... बस कविता लिख कर रख लेते, ‘अपनी ही छाया से बैर, गले लगने लगे हैं गैर, कलेजे में कटार गड़ गई, दूध में दरार पड़ गई...’ अटल जी की कविताएं बहुत कुछ कहती हैं, ‘कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है / दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है…’ अटल जी और देश के अन्य नेताओं में मर्यादा का यही फर्क है. यह विशाल फर्क है. अपने विद्वत और मधुर अंदाज में अटल जी की चुटकियां और मुस्कुराहट विरोधियों को भी भीतर तक बेध जाती थीं. विरोधियों पर अमर्यादित टिप्पणियां करने और आत्मप्रशंसा में लगे नेताओं को अब भी अटल जी से सीख लेनी चाहिए. चाहे वह भाजपा के नेता हों या किसी अन्य राजनीतिक दल के. इसी अटल व्यक्तित्व की तो सीख थी कि प्रधानमंत्री रहते हुए अटल जी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, ‘शासक के लिए प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता, न जन्म के आधार पर, न जाति के आधार पर  और न सम्प्रदाय के आधार पर… मुझे विश्वास है कि नरेंद्र भाई यही कर रहे हैं.’ उस समय नरेंद्र मोदी भी अटल जी के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे.
अटल जी के विशाल व्यक्तित्व का वह पहलू बार-बार ध्यान में आता है. वर्ष 2001 में लखनऊ के राजभवन में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित थी. राजभवन का सभा कक्ष पत्रकारों से भरा था. अटल जी आए. अभी प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू भी नहीं हुई थी कि इस संवाददाता ने अटल जी से पूछा कि दो दिन पहले गुजरात में आए भूकंप में तकरीबन एक लाख लोग मरे, अधिकांश बच्चों की मौत हुई जो गणतंत्र दिवस समारोह मनाने स्कूल गए थे, क्या हजारों बच्चों की मौत पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा नहीं होनी चाहिए थी? क्या राष्ट्रीय शोक पर केवल नेताओं का एकाधिकार है? मेरे इस सवाल पर सामने बैठे कुछ पत्रकार हंस पड़े. अटल जी ने चुटकी लेने वाले अंदाज में कहा, ‘आपसे मुलाकात नहीं हुई, नहीं तो घोषणा हो जाती.’ इस पर कुछ ‘विद्वत’ पत्रकार फिर हंसे. क्या यह विषय मजाक का है? मेरे यह कहने पर अटल जी की मुख-मुद्रा अचानक गंभीर हो गई, उन्होंने कहा, ‘चूक हो गई.’ अटल जी की इस एक पंक्ति की स्वीकारोक्ति उन्हें कहां से कहां उठा कर रख देती है. आज कोई प्रधानमंत्री इस तरह क्या अपनी गलती सार्वजनिक रूप से कबूल कर सकता है? आज तो स्थिति यह है कि ऐसे सवाल पूछने वाले पत्रकार को धक्के मार कर कक्ष से बाहर निकाल दिया जाएगा. उसे गिरफ्तार करने की स्थिति भी आ सकती है. यह अटल के राजनीतिक युग और वर्तमान युग के बीच का चारित्रिक-संस्कारिक फर्क है. अटल जी का ऐसा ही ऊंचा चरित्र और संस्कार था जो जनता पार्टी की सरकार के धराशाई होने के बाद लोकनायक जयप्रकाश से माफी मांगने से नहीं हिचकता. अटल जी ने लिखा था, ‘क्षमा करो बापू तुम हमको, वचन भंग के हम अपराधी / राजघाट को किया अपावन, मंज़िल भूले, यात्रा आधी / जयप्रकाश जी! रखो भरोसा, टूटे सपनों को जोड़ेंगे / चिताभस्म की चिंगारी से, अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे.’
परमाणु परीक्षण से लेकर करगिल युद्ध का इतिहास अटल के योद्धा चरित्र की सनद देता है. एक तरफ विनम्रता तो दूसरी तरफ शौर्य, इन दो विलक्षण पहलुओं का सम्मिश्रण थे अटल जी. वे अटल ही थे जो एक तरफ कहते थे, ‘धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे, यह मत समझो / हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से भारत का भाल झुका लोगे, यह मत समझो…’ दूसरी तरफ अटल ही थे जो ‘इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत’ की पुरजोर हिमायत करते थे. अटल जी के ये तीन शब्द कश्मीरियों के दिल में बसते हैं और पूरी दुनिया इन तीन शब्दों को ही ‘अटल डॉक्टरिन’ की संज्ञा देती है. कश्मीरी यह मानते हैं कि अटल जी को कुछ और मौका मिलता तो वे कश्मीर की समस्या को अपने इन तीन नायाब शब्दों के फार्मूले से हल करके ही मानते.

कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने भाजपाई अटल के जरिए बचाई थी देश की इज्जत
तब देश में नरसिम्हा राव की सरकार थी. अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के नेता था. कांग्रेस सरकार के प्रस्ताव पर अटल जी पार्टी लाइन से ऊपर उठकर कश्मीर मसले पर फंसी नरसिम्हा राव सरकार का साथ दिया और उन्हें उबारा. नरसिम्हा राव ने अटल जी को संयुक्त राष्ट्र भेजे गए प्रतिनिधिमंडल में न केवल शामिल किया बल्कि उसे नेतृत्व करने का दायित्व सौंपा. तब पाकिस्‍तान ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ मानवाधिकार उल्‍लंघन का आरोप लगाया था. पाकिस्तान ने ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (ओआईसी) के जरिए प्रस्ताव रखवाया और भारत के खिलाफ कुचक्र रचा. अटल जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व ने सारे विरोधियों का पटाक्षेप कर दिया. अटल जी ने इस मसले पर उदार इस्लामिक देशों से सम्पर्क स्थापित किया और अपनी मुहिम में कामयाब हुए. कामयाबी भी ऐसी हासिल हुई कि पाकिस्तान के प्रस्‍ताव पर संयुक्त राष्ट्र में इस्लामी देशों ने भारत का साथ दिया और पाकिस्‍तान को समर्थन देने वाले मुस्लिम देशों ने प्रस्‍ताव के पक्ष में मतदान करने से इन्कार कर दिया. इंडोनेशिया और लीबिया ने ओआईसी के प्रस्ताव से ही खुद को अलग कर लिया. सीरिया ने भी पाकिस्तान के प्रस्ताव से दूरी बना ली और ईरान ने प्रस्ताव को संशोधित करने को कह दिया. तब चीन ने भी भारत का साथ दिया था. आखिरकार विवश होकर पाकिस्तान को वह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा.

Tuesday, 14 August 2018

देवरिया-कांड: धिक्कार है... धिक्कार है...

प्रभात रंजन दीन
नारी संरक्षण गृहों, संप्रेक्षण गृहों और अनाथालयों में बच्चियों की दुर्दशा का ताजा अध्याय बिहार के मुजफ्फरपुर के बाद उत्तर प्रदेश के देवरिया में भी खुला. बेसहारा और मजबूर लड़कियों के साथ प्रायोजित दुर्व्यवहार कोई नई घटना नहीं है. निकृष्टतम स्तर का यह धंधा देश में लगातार चल रहा है. कभी-कभार घटनाएं उजागर हो जाती हैं तो चिल्लपों मचती है. जांच और कार्रवाई की औपचारिकताएं होती हैं, फिर मामला ठंडा पड़ते ही धंधा चालू हो जाता है. हर बार यही होता है कि ऐसे घृणित धंधे में नेता, नौकरशाह, सफेदपोश, दलाल और सामाजिक संस्थाएं चलाने वालों का ‘नेक्सस’ उजागर होता है. लेकिन सत्ता व्यवस्था इस करतूत को स्थायी तौर पर काबू करने का कोई कारगर उपाय नहीं करती. यह उपाय क्यों नहीं होता? इस सवाल का जवाब बारी-बारी से सत्ता पर आरूढ़ होने वाले नेता और उनके तीमारदार नौकरशाह नहीं दे सकते, क्योंकि उनकी अय्याशियों और बदमिजाजियों का ‘उपाय’ इन्हीं लाचार महिलाओं की देह से होकर निकलता है.
मुजफ्फरपुर-देवरिया की ताजा घटना पर दुखी मेनका गांधी ने कितनी सटीक और असली बात कही कि वे दो साल से प्रत्येक सांसद को पत्र लिख कर आग्रह कर रही थीं कि सांसद अपने-अपने क्षेत्र में निराश्रित महिलाओं, लड़कियों और अनाथ बच्चों के लिए चलने वाली संस्थाओं का कम से कम एक बार निरीक्षण करें और वहां की स्थिति के बारे में उन्हें सूचित करें. लेकिन किसी भी सांसद ने मेनका के पत्र पर ध्यान नहीं दिया. मेनका की चिंता एक नेता या मंत्री की नहीं, बल्कि एक महिला की चिंता थी. इस चिंता ने तमाम सांसदों के असली सरोकार को भरी संसद में रेखांकित किया.
मेनका ने कहा है कि मुजफ्फरपुर-देवरिया की घटनाएं भयावह हैं. सांसदों के प्रति मेनका की नाराजगी संसद में अभिव्यक्त हुई, फिर भी सांसदों में इतना नैतिक बल नहीं था कि कोई एक भी सांसद उठ कर अपनी गलती के लिए माफी मांगता और इस दिशा में सक्रिय होकर समाज में उतरने की घोषणा करता. मेनका का सवाल और उस पर सांसदों की चुप्पी ही उस सवाल का जवाब है कि आखिर क्यों नहीं सत्ता ऐसे गलीज धंधे को काबू में करने का कोई स्थायी उपाय करती है.
मामला उजागर होने के बाद जब पुलिस ने तलाशी ली तो उत्तर प्रदेश के देवरिया स्थित नारी संरक्षण गृह से 42 में से 18 लड़कियां गायब मिलीं. लड़कियां आखिर कहां गईं? देवरिया संरक्षण गृह से भागी और बाद में बरामद हुई एक लड़की का बयान इस सवाल का जवाब है. उस लड़की ने कहा है कि हर रात काली, सफेद और लाल रंग की कारें आती हैं और लड़कियों को संरक्षण गृह से बाहर ले जाती हैं. सुबह इन लड़कियों को वापस छोड़ दिया जाता है. लेकिन फिर वो लड़कियां जार-जार रोने के अलावा कुछ बोल नहीं पातीं. अदालतों का रोल भी कोई दूध का धुला नहीं है. ऐसे मामलों में अदालतों का रोल डंवाडोल ही है. देवरिया के विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाजिक सेवा संस्थान द्वारा संचालित नारी संरक्षण गृह में अनिमियता पाए जाने के बाद जब उसकी मान्यता स्थगित कर दी गई थी, तब कोर्ट ने उस पर रोक क्यों लगा दी थी? क्या अदालत को भी ऐसी घटनाओं के घटित होने की प्रतीक्षा रहती है? संरक्षण गृह की जिस संरक्षिका गिरिजा त्रिपाठी को कोर्ट का स्थगनादेश मिला था, वही महिला जरायम धंधा चलाने के आरोप में आज गिरफ्तार है. उसका पूरा परिवार इस धंधे में लिप्त था. संचालिका का पति और उसकी बेटी कंचनलता त्रिपाठी भी पकड़ी गई है. संचालिका की बेटी ही संस्था की अधीक्षिका थी. इन सब पर मानव तस्करी करने, देह व्यापार चलाने और बाल श्रम से जुड़ी धाराओं की धज्जियां उड़ाने का मुकदमा दर्ज किया गया है. अब स्थगनादेश के औचित्य के बारे में अदालत से कौन पूछे? अदालत का मान-सम्मान है. निराश्रित महिलाओं और लड़कियों का मान-सम्मान थोड़े ही है? अब जब मुजफ्फरपुर और देवरिया में ऐसी घटना घट गई तब अदालत ने पूछना शुरू किया, 'हर तरफ से बलात्कार और अनाचार की खबरें! देश में यह क्या हो रहा है?' देश की सर्वोच्च अदालत ने यह सवाल सामने रखा, लेकिन उन अदालतों से यह हिसाब नहीं मांगा जिन्हें सड़कों के गड्ढे और ट्रैफिक जाम तो दिखता है, लेकिन निराश्रित महिलाओं की त्रासदी नहीं दिखती. चलिए देर से ही सही, कुछ ठोस हो जाए तो गनीमत. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे निर्लज्ज धंधे को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत महसूस की है और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से देशभर के तीन हजार आश्रय गृहों के सामाजिक अंकेक्षण (ऑडिट) के तथ्य और सर्वेक्षणों की रिपोर्ट पेश करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इतनी बड़ी घटना हो जाती है और सरकार इतनी देर से जागती है, यह आश्चर्यजनक है. सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि इन घटनाओं को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि ये सब राज्य प्रायोजित गतिविधियां हैं.
इसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय भी हरकत में आया. उच्च अदालत ने कहा कि सीबीआई जांच की मॉनिटरिंग वह खुद करेगी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीबी भोसले और न्यायाधीश यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि अगर यह यौन शोषण का मामला है तो राजनेताओं, वीआईपी और पुलिसवालों की मिलीभगत के बिना यह कतई मुमकिन नहीं है. न्यायाधीशों ने राज्य सरकार को यह निर्देश दिया कि इस गोरखधंधे को मिल रहे नेताओं और वीआईपी हस्तियों के संरक्षण का पता लगाया जाए. हाईकोर्ट ने इतने बड़े अमानवीय कृत्य में केवल चार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई को संतोषजनक नहीं माना और पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई न होने पर गहरे सवाल उठाए. हाईकोर्ट ने संरक्षण गृह की सभी लड़कियों के मजिस्ट्रेटी बयान की कॉपी तलब कर ली है और सरकार से पूछा है कि इन लड़कियों को अब कहां रखा गया है, उनकी सुरक्षा के क्या इंतजाम किए गए हैं और लापता लड़कियों का पता लगाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं. कोर्ट ने लड़कियों को ढूंढ़ने और पुलिसवालों की जांच का जिम्मा गोरखपुर जोन के एडीजी को सौंपने के यूपी सरकार के फैसले पर मुहर लगाई लेकिन स्पष्ट कहा कि एडीजी ने चार दिनों में ठोस कदम नहीं उठाए तो अदालत अगली सुनवाई में यह जिम्मेदारी किसी अन्य एजेंसी को दे सकती है.

18 लड़कियां तो लापता हैं ही, सात नवजात शिशु भी गायब हैं
देवरिया के मां विंध्यवासिनी बालिका संरक्षण गृह से 18 लड़कियों के अलावा सात नवजात शिशुओं के भी लापता होने की सूचना आम नागरिकों को व्यथित कर रही है. जबकि अब शासन-प्रशासन लापता लड़कियों की संख्या साबित करने की हरकतों में भी लग गया है. लड़कियों और नवजात शिशुओं की रहस्यमय गुमशुदगी दिसम्बर 2017 में ही हुई, लेकिन शासन, प्रशासन और ‘भाषण’ पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. नवजात शिशुओं की गुमशुदगी की सूचना सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी को भी मिली थी. अथॉरिटी ने बाल कल्याण समिति और डिस्ट्रिक्ट प्रोबेशन अफसर (डीपीओ) से जानकारी मांगने की औपचारिकता पूरी कर ली, लेकिन देवरिया से जानकारी नहीं भेजे जाने पर कोई रेस्पॉन्स नहीं लिया. पुलिस और प्रशासन की खाल पर भी नवजातों के गुम होने का कोई असर नहीं पड़ा. घटना के बाद मुंह खोलने का साहस कर रहे बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष डॉ. एसके यादव ने  कहा कि संरक्षण गृह की संचालिका गिरिजा त्रिपाठी के आगे पूरी सत्ता नतमस्तक रहती थी. यादव ने माना कि सात नवजात बच्चों का रजिस्ट्रेशन होने के छह माह बाद भी उन्हें गोद देने (अडॉप्शन) की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई. अथॉरिटी की तरफ से बच्चों के ‘अडॉप्शन’ की प्रक्रिया शुरू करने को लेकर डीपीओ को कई चिट्ठियां लिखीं गईं, पर वहां से जवाब नहीं मिला. नवजात शिशुओं को गिरिजा त्रिपाठी के रजला स्थित शिशु गृह में रखा गया था. बाल कल्याण समिति ने बच्चों को गोरखपुर स्थित दत्तक केंद्र में रखे जाने की काफी कोशिश की, लेकिन गिरिजा त्रिपाठी के आगे समिति की एक नहीं चली. आखिरकार नवजात शिशु गायब ही हो गए. पता चला कि कई और नवजात शिशु लापता हैं, जिन्हें विभिन्न स्थानों से बरामदगी के शिशु गृह लाया गया था. लेकिन सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी में उनका पंजीकरण नहीं कराया गया और आज वे लापता हैं.
अब यह बात खुल कर सामने आ रही है कि देवरिया के मां विध्यवासिनी बालिका संरक्षण गृह समेत पांच संस्थाओं की संचालिका गिरिजा त्रिपाठी और उसके परिवार ने सत्ता तक सीधी पहुंच का जमकर फायदा उठाया और मासूमों का भीषण शोषण किया. तब सारे जिम्मेदार अधिकारी और संस्थाएं चुप्पी साधे या चिट्ठियां लिखते रहे. घटना उजागर होने के बाद सब एक-दूसरे को दोषी ठहराने में लगे हैं. 23 जून 2017 को गिरिजा त्रिपाठी की संस्था को ब्लैक लिस्टेड किया गया था. इसके बाद भी पुलिस और प्रशासन की शह पर बच्चियों को बाल कल्याण समिति को बताए बगैर वहां भेजा जाता रहा. समिति ने आपत्तियां दर्ज कीं, जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखा. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. यह भी पता चल रहा है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का भी संरक्षण गृह में आना-जाना लगा रहता था. देवरिया संरक्षण गृह को वर्ष 2011 से अनुदान मिलना शुरू हुआ, लेकिन संस्था 2009 से ही चल रही थी. जून 2017 में अनुदान बंद होने के बाद भी संरक्षण गृह चलता रहा. साफ है कि बिना अनुदान पाए संस्था कैसे चल रही थी.

योगी और जोशी ने पूर्व की सरकारों पर दोष मढ़े, पर कुछ तथ्य भी खुले
देवरिया घटना के उजागर होते ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फौरन सक्रियता दिखाते हुए मामले की सीबीआई से जांच कराने की घोषणा कर दी. योगी ने बचाव का बेहतर रास्ता निकाला. सीबीआई जांच की घोषणा के बाद आम लोग चुप हो जाते हैं, वे ‘टोपी-ट्रांसफर’ की त्वरित प्रक्रिया नहीं समझ पाते. योगी ने पिछली सरकार पर ठीकरा फोड़ा और देवरिया की संस्था वर्ष 2009 से ही चल रही थी और पिछली सरकारों, यानि बसपा और सपा सरकारों ने उसे खूब धन-लाभ कराया. योगी ने सीबीआई जांच की घोषणा करते हुए यह भी जोड़ा कि देवरिया प्रकरण में पुलिस की संदेहास्पद भूमिका की भी जांच की जाएगी. मुख्यमंत्री ने बाल कल्याण समिति भी भंग कर दी.
योगी ने कहा कि सीबीआई द्वारा औपचारिक रूप से जांच ‘टेक-ओवर’ करने तक तीन सदस्यीय एसआईटी साक्ष्यों की निगरानी करेगी, ताकि उससे कोई छेड़छाड़ न हो. स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) इस टीम की सहायता करेगी. मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि देवरिया प्रकरण की जांच के लिए महिला कल्याण विभाग की अपर मुख्य सचिव रेणुका कुमार और ‘महिला-हेल्पलाइन’ की अपर पुलिस महानिदेशक अंजू गुप्ता की जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. इसके बाद ही देवरिया के संरक्षण गृह की बालिकाओं को वाराणसी के संरक्षण गृह में शिफ्ट करने का निर्णय लिया गया. मुख्यमंत्री ने यह माना कि जून 2017 में देवरिया के उक्त संरक्षण गृह की मान्यता समाप्त कर दी गई थी. जिला प्रशासन को इस संरक्षण गृह को बंद करने और वहां रह रही बालिकाओं को स्थानांतरित किए जाने के निर्देश भी दिए गए थे, लेकिन प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की. इस दोष के लिए देवरिया के जिलाधिकारी का तबादला कर उनके खिलाफ चार्जशीट जारी की जा रही है. देवरिया के पूर्व जिला प्रोबेशन अधिकारी को भी निलम्बित कर दिया गया. सरकार ने देवरिया के मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान का पंजीकरण निरस्त कर दिया और रजिस्ट्रार चिट फंड ने भी हरकत में आते हुए गोरखपुर के वृद्ध आश्रम का पंजीकरण भी खारिज कर दिया.
योगी सरकार में महिला एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने ऐसे मौके पर विपक्ष पर प्रहार करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. डॉ. जोशी ने कहा, ‘जिनके समय में इन संस्थाओं ने जन्म लिया, आज वही इसे राजनीतिक रूप देने में लगे हैं.’ मंत्री ने कहा कि देवरिया की संदर्भित संस्था को वर्ष 2009-10 में मान्यता देकर बाल संरक्षण गृह, बालिका संरक्षण गृह और सुधार गृह का काम दिया गया था. उस समय प्रदेश में बसपा और सपा की सरकारें थीं. डॉ. जोशी ने सपा सरकार के कार्यकाल में हुए ‘सचल’ पालना गृह भ्रष्टाचार प्रकरण का भी उल्लेख किया. मौजूदा सरकार के कार्यकाल में जो लापरवाही, अनदेखी और मिलीभगत हुई उस बारे में पूछे गए सवाल पर मंत्री ने कहा कि इन सारे पहलुओं की छानबीन कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. डॉ. जोशी ने कहा कि प्रतिबंध लगने के बाद भी पुलिस लावारिस बच्चों-बच्चियों को संरक्षण गृह कैसे पहुंचाती रही, यह गंभीर विषय है और इसकी जांच कराई जा रही है.
विडंबना यह है कि उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले में बाल कल्याण समिति गठित है. इन समितियों को हर महीने कम से कम 20 संस्थाओं की जांच करनी होती है. जांच के लिए समिति को सरकार की तरफ से धन मिलता है. जब धन खर्च हुआ तो जांच क्यों नहीं हुई? और अगर जांच हुई तो संरक्षण गृहों में चलने वाले जरायम धंधे का पता क्यों नहीं चला? ये सवाल संदेहास्पद स्थितियों और आपसी मिलीभगत की ओर इशारा करते हैं. यह बात सही है कि सपा सरकार के आखिरी दौर में समितियों का गठन कर सदस्यों की नियुक्ति कर दी गई थी. डॉ. रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं कि सपा सरकार में जब लोक सेवा आयोग तक में सदस्यों की नियुक्ति में धांधली हुई, तो इन संस्थाओं में धांधली नहीं होने की क्या गारंटी है. डॉ. जोशी कहती हैं कि देवरिया कांड के खिलाफ आज जो खास राजनीतिक दलों के लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं उन्हें बताना चाहिए कि बाल कल्याण समिति में सदस्यों का गठन किसने किया था और उन सदस्यों ने कितनी संस्थाओं की जांच की थी? देवरिया में उस महिला को बाल कल्याण समिति का सदस्य बना दिया गया था, जो पहले देवरिया कांड की मुख्य अभियुक्त गिरिजा त्रिपाठी की संस्था की काउंसलर थी.
उल्लेखनीय है कि देवरिया की उक्त विवादास्पद संस्था उत्तर प्रदेश राज्य समाज कल्याण बोर्ड द्वारा संचालित 'सचल पालना गृह' में हुए भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच में भी शामिल है. बोर्ड की पूर्व अध्यक्ष डॉ. रूपल अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड, यूपी सरकार के महिला कल्याण विभाग, और महिला कल्याण मंत्रालय को पत्र लिख कर यह सूचित किया था कि विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लाभार्थियों तक नहीं पहुंच रहा है और इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की मिलीभगत है. लेकिन इन सूचनाओं का संज्ञान लेने के बजाय डॉ. अग्रवाल को ही अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. डॉ. रूपल अग्रवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर कहा है कि उनके द्वारा उजागर किए गए तथ्यों की जांच करवा कर उचित कार्रवाई करें.

महिलाएं लापता? कहीं दूसरा देवरिया तो नहीं बनने जा रहा हरदोई?
हरदोई के बेनीगंज स्थित निराश्रित महिलाओं के संरक्षण गृह (स्वाधार गृह) में भी कुछ संदेहास्पद गतिविधियां चल रही हैं, लेकिन प्रशासन इसकी छानबीन या समयानुकूल कार्रवाई करने के बजाय उसे अभी से ढंकने की कोशिश में लगा है. हरदोई के स्वाधार-गृह का रजिस्टर बताता है कि वहां से 19 महिलाएं गायब हैं. हरदोई की यह संस्था भी एक एनजीओ द्वारा संचालित है. स्वाधार गृह में 21 महिलाओं के होने के बजाय वहां केवल दो महिलाएं ही पाई गईं. जिला प्रशासन ने 19 महिलाओं की गुमशुदगी प्रकरण की गहराई में जाने के बजाय यह कह दिया कि यह आर्थिक फर्जीवाड़ा है. सरकारी सहायता लेने के लिए स्वाधार गृह के रजिस्टर में 19 महिलाओं के फर्जी नाम भर दिए गए थे. विडंबना यह है कि जो डायलॉग संस्था दोहराती, वह संवाद जिला प्रशासन दोहरा रहा है. जबकि खुद हरदोई के जिलाधिकारी ने बेनीगंज में आयशा ग्रामोद्योग समिति पिहानी द्वारा संचालित स्वाधार गृह का निरीक्षण किया था. जिलाधिकारी ने स्वाधार गृह के रजिस्टर में 21 महिलाओं के नाम पाए, लेकिन मौके पर केवल दो महिलाएं मिली. पहले तो जिला प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई करने की बात कही, फिर क्या हुआ कि अचानक जिला प्रशासन के सुर-ताल बदल गए. फिर डिस्ट्रिक्ट प्रोबेशन अफसर सुशील कुमार, संडीला के तहसीलदार पंकज सक्सेना, कानूनगो राम प्रकाश मिश्रा और बेनीगंज कोतवाल ने स्वाधार गृह का निरीक्षण किया. दोबारा निरीक्षण के बाद बताया गया कि रजिस्टर में 19 महिलाओें के नाम फर्जी हैं. जबकि स्वाधार गृह के संचालक मोहम्मद रजी और अधीक्षका आरती गृह में 21 महिलाओं के होने की बात पर अड़ी हैं. उनका कहना है कि जिलाधिकारी के निरीक्षण के समय संरक्षण गृह की महिलाओं मंदिर गई थीं. अधिकारियों को दोबारा निरीक्षण में उसी गृह में 13 महिलाएं मौजूद पाई गई थीं. जिला प्रशासन इस मसले पर चुप्पी साधे है कि स्वाधार गृह के रजिस्टर में दर्ज 19 महिलाओं के नाम फर्जी हैं, तो वे 13 महिलाएं कौन थीं जो मौके पर पाई गईं? दाल में काला है, लेकिन काला हटाने के बजाय प्रशासनिक अधिकारी दाल को घोंटने में लगे हैं. प्रशासन ने स्वाधार गृह के संचालक और अधीक्षिका के खिलाफ फर्जीवाड़ा करने और काम में लापरवाही बरतने का मुकदमा दर्ज कराने की औपचारिकता निभा ली है. दबाव बढ़ने पर जिला प्रशासन ने स्वाधार गृह की अधीक्षिका आरती को गिरफ्तार कर लिया है. संस्था का संचालक मोहम्मद रजी फरार बताया जा रहा है.

देवरिया के बाद भी खाल पर असर नहीं, लखनऊ में हालत बदतर
देवरिया घटना से भी महिला और बाल कल्याण महकमे से जुड़े अधिकारियों की गैंडे जैसी खाल पर कोई असर नहीं पड़ रहा है. राजधानी लखनऊ में जितने भी संरक्षण गृह, अनाथालय और रिमांड होम्स हैं, उनकी बदतर हालत की आधिकारिक पुष्टि हुई है. लखनऊ के जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा द्वारा गठित आठ टीमों ने विभिन्न इलाकों में स्थित संरक्षण गृहों की जांच की तो हालात जघन्य स्थिति में पाए गए. पूरी रिपोर्ट सरकार के समक्ष पेश कर दी गई है. लेकिन इस रिपोर्ट में भी ‘लोचा’ है. रिपोर्ट में कुछ संस्थानों की मान्यता का ही जिक्र है, बाकी संस्थानों की मान्यता का कोई जिक्र नहीं है. इससे राजधानी लखनऊ में कई केंद्रों के अवैध रूप से चलने की आशंका है. शासन को पेश रिपोर्ट पर कार्रवाई कब होगी? इस पर एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने कहा, ‘भगवान जाने.’
बहरहाल, जिलाधिकारी द्वारा गठित टीमों ने लखनऊ के 23 बालिका केंद्रों और महिला संरक्षण गृहों की त्वरित जांच कराई. दर्जनभर से अधिक केंद्रों में कोई सुरक्षा गार्ड नहीं है और साफ-सफाई की स्थिति भयावह है. लखनऊ के माल इलाके में तिवारीखेड़ा स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में जांच के दौरान आगंतुक रजिस्टर में गड़बड़ी पाई गई. लोग बालिका विद्यालय में धड़ल्ले से आते-जाते रहते हैं, लेकिन इसे रजिस्टर में दर्ज नहीं किया जाता. जांच करने पहुंचे मलिहाबाद के एसडीएम जयप्रकाश अग्निहोत्री ने मुख्य वॉर्डन रंजीता सिंह को नया रजिस्टर बनाने की सख्त हिदायत दी. राजकीय महिला शरणालय: प्राग नारायण रोड स्थित इस संस्था में पंजीकृत सभी 76 लड़कियां मौके पर पाई गईं, लेकिन शरणालय की सफाई और दूसरी व्यवस्था अराजक स्थिति में मिली. संस्था में एक भी महिला होमगार्ड तैनात नहीं है, जबकि 29 जुलाई को इस संस्थान से एक संवासिनी भाग चुकी है. दयानंद बाल सदन: मोतीनगर स्थित इस संस्था में रजिस्टर्ड सभी 30 लड़कियां मौके पर मिलीं. गंदगी का अंबार पाया. खंदारी बाजार के लखनऊ चिल्ड्रेन होम में रजिस्टर्ड सभी 17 लड़कियां मौके पर पाई गईं. इस संस्थान में कोई सुरक्षा गार्ड नहीं है. परिसर में अपार गंदगी मिली. इंदिरा नगर के स्नेह वेलफेयर सोसायटी (मानसिक महिला आश्रम गृह) में पंजीकृत सभी 14 युवतियां मौके पर पाई गईं. युवतियों ने जांच दल को बताया कि उन्हें न तो समय पर खाना दिया जाता है और निर्धारित मेनू का पालन होता है. संस्थान में सुरक्षा का भी की इंतजाम नहीं है. इंदिरा नगर के आशा ज्योति (मानसिक) में रजिस्टर्ड सभी 16 बालक मौके पर थे. सुरक्षा के लिए कोई गार्ड नहीं पाया गया. कमरों और परिसर में गंदगी पाई गई. अलीगंज स्थित श्रीराम औद्योगिक अनाथालय में रजिस्टर्ड सभी 9 लड़के और 12 लड़कियां मौके पर मिलीं. सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं पाया गया. त्रिवेणी नगर के गंगोत्री शिशु गृह में पंजीकृत सभी 12 बच्चे मौके पर पाए गए. सफाई की बेहद कमी पाई गई. छत पर बनी चारदीवारी इतनी छोटी पाई गई कि बच्चों के फांद कर भागने में कोई दिक्कत नहीं होगी. सुरक्षा का भी बंदोबस्त नहीं है. जानकीपुरम स्थित दृष्टि सामाजिक संस्थान में पंजीकृत सभी 212 लड़के-लड़कियां मौके पर मिलीं. लेकिन इस संस्थान में लड़के-लड़कियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. मोहान रोड के ममता मानसिक मंदित बालिका विद्यालय में 18 लड़कियां रजिस्टर्ड हैं, लेकिन मौके पर सिर्फ 15 लड़कियां पाई गईं. बताया गया कि कि तीन लड़कियां घर गई हैं. मोहान रोड स्थित राजकीय संकेत मूक बधिर विद्यालय में 95 बच्चे रजिस्टर्ड हैं, लेकिन जांच के दौरान 17 लापता मिले. विद्यालय प्रबंधन ने बताया 17 बच्चे अपने घर गए हैं. विद्यालय के शौचालय में भीषण गंदगी पाई गई. मोहान रोड स्थित प्रयास विद्यालय में 39 बच्चे रजिस्टर्ड हैं, लेकिन उनमें से पांच बज्जे नदारद मिले. उनके बारे में भी कहा गया वे घर गए हैं. विद्यालय में रहन-सहन और कमरों की सफाई जघन्य हालत में मिली. मोहान रोड के ही राजकीय विशेषीकृत बालगृह में सभी 99 रजिस्टर्ड बच्चे मौके पर तो मिले, लेकिन बालगृह में गंदगी का अंबार मिला. सफाई का कोई इंतजाम ही नहीं है. मोहान रोड स्थित स्पर्श दृष्टि बाधित बालिका इंटर कॉलेज में 97 लड़कियां रजिस्टर्ड हैं, लेकिन मौके से पांच लड़कियां गायब मिलीं. कॉलेज में सुरक्षा को कोई इंतजाम नहीं मिला. मोतीनगर स्थित लीलावती मुंशी (बालिका) निराश्रित बालगृह में रजिस्टर्ड सभी 62 लड़कियां मौके पर मिलीं. सफाई की हालत बहुत खराब पाई गई. मोतीनगर स्थित राजकीय बालिका गृह में रजिस्टर्ड सभी 60 लड़कियां मौके पर मिलीं. लेकिन बालिका गृह के शौचालयों और परिसर में सफाई जघन्य हालत मिली. मोतीनगर स्थित राष्ट्रीय पश्चातवर्ती देखरेख संगठन (महिला) संस्थान में भी सभी 47 पंजीकृत बच्चे मौके पर मिले, लेकिन सफाई की स्थिति खराब मिली. गोलागंज स्थित ब्लू हैवन चिल्ड्रेन असाइलम में रजिस्टर्ड सभी 26 बच्चे मौके पर मिले. लेकिन यहां भी सफाई की हालत खराब है. चौक स्थित आल इंडिया शिया यतीमखाना में रजिस्टर्ड सभी 34 बच्चे मौके पर पाए गए. सफाई का इंतजाम संतोषजनक नहीं पाया गया. तकरोही स्थित स्वैच्छिक संस्था निर्वाण (बालिका) में रजिस्टर्ड सभी 90 बच्चे मौके पर पाए गए. संस्था में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और गार्ड भी तैनात पाया गया. आलमबाग स्थित स्नेहालया में पंजीकृत सभी 18 लड़कियां मौके पर पाई गईं. भोजन के साथ सुरक्षा, सफाई और शौचालय की स्थिति अपेक्षाकृत सही पाई गई. अमीनाबाद स्थित मुमताज़ दारुल यतामा संस्थान में रजिस्टर्ड सभी 87 बच्चे मौके पर थे. सफाई का बेहतर इंतजाम नहीं मिला और एक ही गार्ड की तैनाती सुरक्षा व्यवस्था की खामी है. मोहनलालगंज स्थित डॉन बास्को में रजिस्टर्ड सभी 57 बच्चे मौके पर मिले. यहां भी महज एक गार्ड तैनात पाया गया. कुर्सी रोज स्थित स्वैच्छिक संस्थान आशीर्वाद ट्रस्ट में रजिस्टर्ड सभी 19 लड़कियां मौके पर मिलीं. भोजन व साफ-सफाई संतोषजनक पाई गई.

जिन्हें निगरानी करनी थी, वे सोए थे या मिले हुए थे?
निराश्रित महिलाओं, लड़कियों और बच्चों की संस्थाओं पर नजर रखने के लिए बनी संस्थाएं क्या कर रही थीं? आम लोग कहते हैं कि ये संस्थाएं भी अवैध धंधे में बराबर की लिप्त हैं. यह महज लापरवाही का मसला नहीं है. प्रशासन से लेकर पुलिस और महिला एवं बाल कल्याण विभाग की जिला इकाई से लेकर स्थानीय थाना, लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू), बीट के सिपाही और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग महकमे के अधिकारी-कर्मचारी आखिर क्या करते रहे कि जरायम धंधा निर्बाध गति से होता रहा? संरक्षण गृहों की लड़कियां दुराचारियों के लिए बाहर भेजी जाती रहीं, लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया? यह केवल लापरवाही नहीं है. बात जिलाधिकारी से शुरू होती है. जिलाधिकारी की ड्यूटी में शामिल है संरक्षण और आश्रय गृहों का समय-समय पर औचक निरीक्षण करते रहना. फिर इस ड्यूटी का पालन क्यों नहीं किया गया? अगर यह ड्यूटी प्रतिबद्धता से की जाती तो क्या देवरिया जैसी घटना घटती? जिलों के एसपी क्या करते रहे? निराश्रित महिलाओं और बच्चियों से देह का धंधा कराया जाता रहा और एसपी को पता नहीं चला? यह असंभव है. संरक्षण गृहों का निरीक्षण करने के एकमात्र काम के लिए प्रत्येक जिले में प्रोबेशन अफसर तैनात हैं. वे क्या करते रहे? शासन के समक्ष डीपीओ की एक भी रिपोर्ट ऐसी नहीं है जो संरक्षण गृहों में चल रहे जरायम धंधे का जिक्र करती हो. पुलिस की स्थानीय खुफिया इकाई (एलआईयू) क्या करती रही कि उसे संरक्षण गृहों के धंधे की सूचना नहीं मिली? एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल भी संदेह के घेरे में है. संरक्षण गृह की लड़कियों को देवरिया से गोरखपुर और अन्य स्थानों पर ले जाया जाता रहा, यहां तक कि विदेशों में भी भेज दिया गया, लेकिन सेल सोता रहा, या मिला रहा. भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के उत्तर प्रदेश राज्य मंत्रिपरिषद ने देवरिया घटना पर निंदा प्रस्ताव पारित करते हुए सही कहा कि बच्चियों के साथ इस तरह का घोर अमानवीय नृशंसतम अपराध अधिकारियों और नेताओं के संरक्षण के बगैर संभव ही नहीं है.