Friday, 9 October 2026

किस पर शर्म करें?


प्रभात रंजन दीन 

विधानसभा/विधान परिषद नियुक्ति घोटाला अत्यंत गंभीर मसला है... इस पर कुछ-कुछ कोनों से लगातार आवाज उठ रही है, लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की आवाज के अतिरिक्त कुछ नहीं साबित हो रही। सरकार की खाल पर कोई असर नहीं है। विधानसभा में फर्जी नियुक्तियों का घोटाला समाजवादी पार्टी की सरकार के काल से शुरू हुआ, जब मुलायम-पुत्र अखिलेश यादव विरासती मुख्यमंत्री बन कर सत्ता पर बैठे। विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय और विधानसभा के सचिव प्रदीप दुबे घोटाले में आकंठ लिप्त थे। विधानसभा नियुक्ति घोटाले की खबरें 'चौथी दुनिया' में क्रमवार प्रकाशित हुईं, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। स्पष्ट है कि अखिलेश यादव की सरकार उस घोटाले में लिप्त थी। उसके बाद सरकार बदली। योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। योगी के सत्ता संभालने के तुरंत बाद मैं मुख्यमंत्री से मिलने गया, उन्हें बधाई दी, उन्हें कुछ किताबें भेंट की, उन्हें एक नायाब कलम (उस ऐतिहासिक कलम के बारे में फिर कभी बताऊंगा) भेंट की और उनसे यह आह्वान किया कि न्याय के दस्तावेज पर इस कलम से हस्ताक्षर करिएगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष मैंने विधानसभा में चल रहे नियुक्ति-घोटाले का मसला उठाया और उन्हें  'चौथी दुनिया' की प्रतियां भी दिखाईं। हालांकि, योगी आदित्यनाथ ने उस समय कहा कि यह खबरें उनके संज्ञान में हैं। योगी के शासनकाल में हृदय नारायण दीक्षित विधानसभा अध्यक्ष हो गए थे। दीक्षित जी से यह उम्मीद थी कि वे विधानसभा नियुक्ति-घोटाले की जांच कराएंगे, घोटाला रोकेंगे और घोटालेबाज सचिव प्रदीप दुबे को विधानसभा से बर्खास्त करेंगे। लेकिन यह नैतिक कर्म करने के बजाय हृदय नारायण दीक्षित भी विधानसभा और विधान परिषद में होने वाली नियुक्तियों में मुब्तिला हो गए। आप समझ गए न कि मैं हृदय नारायण दीक्षित के बारे में क्या कह रहा हूं..!

खैर, मैंने भाजपा संगठन के (उस समय के) सर्व-शक्तिमान नेता सुनील बंसल का साक्षात्कार (पूरा पेज) 'चौथी दुनिया' में छापा। मैंने प्रदेश भाजपा के दफ्तर जाकर 'चौथी दुनिया' की प्रति उन्हें भेंट की, जबकि उन्होंने दिल्ली में ही अपना छपा इंटरव्यू पढ़ लिया था। बड़े प्रसन्न थे। मैंने उनसे कहा कि 'चौथी दुनिया' की यह प्रति मैं इस मांग और अपेक्षा के साथ लाया हूं कि आप विधानसभा के नियुक्ति घोटाले पर सरकार को संज्ञान लेने को कहेंगे। तब प्रदेश भाजपा दफ्तर के ऊपर वाले माले पर स्थित सुनील बंसल के कक्ष में केशव प्रसाद मौर्य भी आ गए और वे भी हमलोगों की बातचीत के साक्षी बने। सुनील बंसल ने कहा कि वे अभी ही मुख्यमंत्री से मिलने जा रहे हैं। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया कि वे विधानसभा नियुक्ति-घोटाले के बारे में मुख्यमंत्री से चर्चा करेंगे। लेकिन सत्ता के दो शीर्ष महानुभावों के बीच हुई वार्ता का नतीजा क्या निकला? इसे आगे सुनिए...

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक दिन अचानक हुई मुलाकात में मैंने उनसे फिर विधानसभा नियुक्ति घोटाले के बारे में पूछा। सीएम योगी ने कहा, मैंने विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जांच का आदेश दे दिया है। ऐसा कहते हुए वे आगे निकल गए। मुझे भी संतोष मिला और उम्मीद बढ़ी कि घोटालेबाजों पर कानूनी कार्रवाई हो पाएगी। लेकिन क्या हुआ जानते हैं? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जांच उसी अधिकारी को दे दी जो घोटाले में लिप्त था। सीएम योगी ने चोर को ही कोतवाल बना दिया। यह था भ्रष्टाचार के खिलाफ योगी सरकार के ज़ीरो-टॉलरेंस के बहु-प्रचारित ग्रंथ का पहला अध्याय। घोटालेबाज जांच अधिकारी प्रदीप दुबे ने जांच की लीपापोती कर दी और इस लीपापोती के एवज में योगी सरकार ने उसे तरक्की भी दी और उसे नौकरी में लगातार एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन भी मिलता जा रहा है। इस आपराधिक गठजोड़ में भाजपाई विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित भी शामिल रहे। प्रदीप दुबे का कार्यकाल अर्सा पहले ही समाप्त हो जाता, लेकिन योगी सरकार उसी भ्रष्ट, घोटालेबाज और अनैतिक व्यक्ति पर अपना आशीर्वाद बनाए हुई है और उसे संरक्षण दे रही है।

...इस घोटाले पर अदालतों ने क्या किया? सरकार और विधायिका की दो-नंबरी कार्यप्रणाली तो आपने देख ली... न्यायपालिका की कार्यप्रणाली वो सभी युवक भुगत रहे हैं, जो अदालतों का दरवाजा खटखटाते-खटखटाते थक गए और बुजुर्ग हो गए। ये है लोकतंत्र के तीन स्तम्भों का कमाल। अब आते हैं चौथे स्तम्भ यानि पत्रकारिता पर... विधानसभा/विधान परिषद में हुआ और हो रहा नियुक्ति घोटाला प्रकाशित करना क्या कुछ अखबारों के लिए ही नैतिक दायित्व था? क्या बाकी अखबारों, समाचार चैनलों और अन्य मीडिया संस्थानों के लिए यह विषय महत्वपूर्ण नहीं था? क्या सम्पूर्ण मीडिया द्वारा इस अत्यंत महत्वपूर्ण मसले को मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए था? इस मसले को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने का प्राथमिक पत्रकारीय दायित्व क्या समग्रता और सामूहिकता से नहीं निभाना चाहिए था? किस पर शर्म करें? सरकार पर? विधायिका पर? न्यायपालिका पर? या पत्रकारिता पर?

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