Sunday, 27 September 2026

दलाई लामा के बाद.. क्या आपस में ही टकराएंगे तिब्बती बौद्ध और अंबेडकरवादी बौद्ध?


भारत में तिब्बती बौद्धों और अंबेडकरवादी बौद्धों के बीच वर्चस्व को लेकर खींचतान बढ़ती जा रही है। इसे भारत सरकार भी बढ़ावा दे रही है। भारत सरकार के बढ़ावा देने के पीछे सियासत भी है और कूटनीति भी है। तिब्बती बौद्ध भारत के मतदाता नहीं हैं, लेकिन अंबेडकरवादी बौद्ध भारत के नागरिक हैं, मतदाता हैं और दलित जाति से धर्मांतरित हैं। उनकी आस्था बाबा साहेब अंबेडकर में है। गौतम बुद्ध को मानने वाले तिब्बती बौद्धों के धर्मगुरु दलाई लामा (तेनज़िन ग्यात्सो) में अंबेडकरवादी बौद्धों की आस्था नहीं है। अभी हाल ही में दिल्ली में ब्रिक्स देशों का जो सम्मेलन हुआ, उसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच भारत-चीन सम्बन्धों को लेकर विषद वार्ता हुई। भारत और चीन के बीच शीर्ष प्रतिनिधिमंडल स्तर की भी बातचीत हुई। मोदी-जिनपिंग के बीच हुई ‘क्लोज़-डोर-मीटिंग’ की जो थोड़ी बहुत सूचनाएं विदेश मंत्रालय से जुड़े कुछ अधिकारियों से छन कर आईं, वह तिब्बदी बौद्धों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ाने वाली सूचनाएं हैं।

तिब्बती बौद्धों के धर्मगुरु दलाई लामा 91 वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं। दलाई लामा की विरासत संभालने के लिए चुने जाने वाले उत्तराधिकारी पर चीन की निगाह लगी है। चीन चाहता है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी तिब्बत यानि चीन में चुना जाए, जबकि दलाई लामा चाहते हैं कि उनका उत्तराधिकारी भारत में चुना जाए। तिब्बती बौद्धों के धर्मगुरु का चयन पुनर्जन्म के पराभौतिकीय विचार के आधार पर होता है। चीन भारत पर दबाव डाल रहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकार चयन की भारत में होने वाली प्रक्रिया को मान्यता न दे, ताकि दलाई लामा के उत्तराधिकारी चीन के अधिकारक्षेत्र में रहें और तिब्बत का विवाद खत्म हो। भारत सरकार इसी दुविधा में है। चीन के दोमुंहेपन का बार-बार अनुभव ले चुकी भारत सरकार संशय में है कि चीन के अधिकारक्षेत्र वाले उत्तराधिकारी दलाई लामा के बाद भारत-चीन सीमा विवाद स्थायी रूप से सुलझेगा या अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख पर चीन का दबाव और बढ़ जाएगा। मामला यहीं फंसा है। शी जिनपिंग के राजकीय रात्रिभोज में शरीक न होने और मुंह फुलाने की असली वजह इसे ही माना जा रहा है... इसके बाद ही शी जिनपिंग ‘डगरे का बैगन’ स्वभाव के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से गलबहियां करने चले गए और उनके राजकीय भोज में शरीक होकर भारत को मुंह चिढ़ाया।
बहरहाल, दलाई लामा के बाद तिब्बती बौद्धों का धर्मगुरु चीन के अधिकारक्षेत्र वाला हुआ तो भारत में तिब्बती बौद्ध प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण, आधिपत्य और वर्चस्व को लेकर तिब्बती बौद्धों और अंबेडकरवादी बौद्धों के बीच टकराव बढ़ेगा। जो तनातनी फिलहाल सैद्धांतिक दावे-प्रतिदावे की शक्ल में है, वह ताल ठोकने की स्थिति में आ जाएगा। इस पर राजनीतिक प्रलोभनों की मारी भारत सरकार अंबेडकरवादी बौद्धों का साथ देगी, क्योंकि वे भारत के अच्छी-खासी संख्या वाले वोटर हैं। भारत के दलित समुदाय के हिंदू, ईसाई और सिख भी अंबेडकरवादी बौद्धों के साथ ही खड़े नजर आएंगे... इसलिए भारत सरकार इन्हें नाराज नहीं कर पाएगी, भले ही मानवीय सिद्धांतों, धार्मिक निष्पक्षता और शरणागत तिब्बती समुदाय के हितों को ताक पर क्यों न रख देना पड़े। लेकिन इसके लिए अब अधिक समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी...

इसी मसले पर जम्मू-कश्मीर से प्रकाशित एवं जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पंजाब और दिल्ली तक प्रसारित अंग्रेजी अखबार ‘डेली एक्सेलसियर’ (जिसका मैं स्टाफर भी हूं), में मेरा यह शोध-लेख प्रकाशित हुआ है। मैंने अपने विचार के साथ यह शोध-लेख सोशल-मीडिया पर आपके समक्ष इसलिए डाला कि यह विषय गंभीर चर्चा के उपयुक्त है। विमर्श में आए विचारों से देश के प्रधानमंत्री को भी अवगत कराना उतना ही आवश्यक है। ...तो आएं इस विषय पर अपने तार्किक और तथ्यात्मक विचारों के साथ हमलोग बातचीत शुरू करें और इसके पूर्णता पर पहुंचने के उपरांत एक स्मार-पत्र तैयार कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संज्ञानार्थ प्रेषित कर दें... शुभकामनाएं 🙏 प्रभात रंजन दीन Note: आपलोग मूल लेख पढ़ना चाहें तो इस लिंक के जरिए 'डेली एक्सेलसियर' तक जा सकते हैं... https://www.google.com/url?rct=j&sa=t&url=https://www.dailyexcelsior.com/uncertainty-over-the-future-of-tibetan-buddhism-after-the-dalai-lama/&ct=ga&cd=CAEYACoTNTg2MDYxODI3ODMzNDc0NDk3MjIaN2I0ZmYwY2Y5NzEyODU3YTpjb206ZW46VVM&usg=AOvVaw116JXswEBIyK30eTk1JidZ

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