Monday, 19 March 2018

विपक्ष ही जिताएगा भाजपा को...

प्रभात रंजन दीन
उत्तर प्रदेश के दो उप चुनावों में भाजपा को मिली हार भाजपा की अंदरूनी तिकड़मबाजी का परिणाम है. जब पार्टी का शीर्ष नेता ही प्रदेश के शीर्ष नेताओं के साथ तिकड़म और घात करता हो, तो पराजय मिलेगी ही. यूपी के उप चुनाव में भाजपा की पराजय का श्रेय विपक्ष को या सपा-बसपा तालमेल को नहीं जाता. यह हार भाजपा के अपने चारित्रिक विरोधाभासों के कारण हुई. हम भाजपा के अतिरिक्त-गुरूर, अंदरूनी घात-प्रतिघात और चारित्रिक खंडन पर क्रमशः चर्चा करेंगे... अभी पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के जरिए देश की राजनीति, खास तौर पर विपक्ष की राजनीति का लेखा-जोखा लेते हैं. विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है. यह स्खलन पिछले पांच वर्षों में तेजी से हुआ है. विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस 2014 तक 13 राज्यों में शासन कर रही थी, इन्हीं चार वर्षों में वह 13 से तीन पर पहुंच गई. वामपंथी दल भी कहीं के नहीं रहे, बस केरल के होकर रह गए. दूसरी कोई पार्टी है ही नहीं, जिसका नाम राष्ट्रीय स्तर पर लिया जा सके.
विपक्ष ने भारतीय जनता पार्टी को आखेट करने के लिए खुला मैदान छोड़ दिया है. अंदरूनी कलह ने कांग्रेस को और गपोड़बाजी ने वाम दलों को देश में अप्रासंगिक बना दिया है. रणनीति और तिकड़म में कांग्रेस और वाम दल दोनों ही भाजपा के आगे फेल साबित हो रहे हैं. इस कौशल में कमजोर होने के कारण ही मेघालय में 21 सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस पार्टी सरकार नहीं बना पाई और महज दो सीटें पाने वाली भाजपा अपने गठबंधन के साथ वहां सरकार बनाने में कामयाब हो गई. त्रिपुरा और नगालैंड में तो कांग्रेस इस बार खाता भी नहीं खोल पाई. त्रिपुरा में भाजपा ने अपने बूते सरकार बना ली और नगालैंड में गठबंधन के दम पर भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार बन गई. यानि, एकमात्र मिजोरम छोड़ कर पूर्वोत्तर से कांग्रेस का पत्ता कट गया है. त्रिपुरा में हार के बाद वामदल पूर्वोत्तर में कहीं अस्तित्व में नहीं रहे. त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में अभी हुए विधानसभा चुनाव के बाद अब पूर्वोत्तर के छह राज्यों पर भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का कब्जा हो गया है. जबकि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले तक पूर्वोत्तर के सात राज्यों में कांग्रेस का ही वर्चस्व कायम था.
आजादी के बाद लोकतांत्रिक भारत की सत्ता पर सबसे अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी का दायरा सिमट कर आज तीन राज्यों और एक केंद्र शासित राज्य तक रह गया है. तीन राज्यों में से भी कर्नाटक और मिजोरम में इसी साल के आखिर में चुनाव होने हैं. इसके अलावा पंजाब और केंद्र शासित पुडुचेरी में कांग्रेस का शासन बचा है. मेघालय में भाजपाई बिसात पर धराशाई हुई कांग्रेस ने अगर अपनी रणनीति पुख्ता नहीं बनाई तो पूरा पूर्वोत्तर साफ हो जाएगा. पिछले लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस पार्टी को एक-दो राज्य छोड़कर हर विधानसभा चुनाव में हार का ही सामना करना पड़ा है. 2014 तक कांग्रेस के पास 13 राज्यों में सरकार थी. पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के नतीजे मिजोरम और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों पर जरूर असर डालेंगे. गुजरात चुनाव में कांग्रेस के संतोषजनक प्रदर्शन और मध्य प्रदेश के उप चुनाव में कांग्रेस को जीत मिलने से जो माहौल बना था, कांग्रेस के नेता उस माहौल को कैश कराने में पूरी तरह विफल रहे. कांग्रेस के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने अब मिजोरम और कर्नाटक को प्रतिष्ठा का विषय नहीं बनाया तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बना बनाया माहौल ढह जाएगा. मेघालय से कांग्रेस को भीषण घाव लगा, लेकिन फिर भी सीख लेने का कोई भाव कांग्रेस नेताओं के चेहरे पर नजर नहीं आ रहा. सीख लेने के बजाय आरोप प्रत्यारोप का दौर और तेज और भद्दा हो गया है. पूर्वोत्तर राज्यों के प्रभारी वरिष्ठ कांग्रेस नेता सीपी जोशी कांग्रेस के शामियाने में सार्वजनिक निंदा के पात्र बने हुए हैं. मेघालय कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा भी कांग्रेस में चल रही निंदा प्रतियोगिता में निशाने पर हैं. कांग्रेसियों को यह नहीं समझ में आ रहा कि असम में चुनाव जीतने के बाद से भाजपा ने उस धार को बनाए रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, जबकि कांग्रेस अपने पंजे से अपनी ही सीटें गंवाती चली जा रही है. नगालैंड के कांग्रेस अध्यक्ष केवे खाप थेरी ने तो साफ-साफ कहा भी कि कांग्रेस नेतृत्व पूर्वोत्तर से भाग खड़ा हुआ है. इस तरह के बयानों से यह साफ लगता है कि कांग्रेस पार्टी का अंदरूनी माहौल मिजोरम के चुनाव का वातावरण खराब करेगा.
दूसरी तरफ पूर्वोत्तर में वर्चस्व स्थापित करने वाले भाजपा-गठबंधन ने त्रिपुरा में 25 साल पुराना वामपंथियों का ‘लाल-किला’ ध्वस्त कर दिया. लाल सलामियों को पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा पर गर्व रहा है. धीरे-धीरे उनका लाल सलाम केरल में सिमट गया. त्रिपुरा से वामदल का सत्ता से जाना काफी अहम राजनीतिक घटनाक्रम है, क्योंकि बीते 25 वर्षों से माणिक सरकार के नेतृत्व में त्रिपुरा वाम दलों का ‘लाल-किला’ बना हुआ था. त्रिपुरा में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और 60 में से 43 सीटों पर जीत हासिल की. इनमें 35 सीटें अकेले भाजपा की हैं और बाकी अन्य सहयोगी दलों की. पिछले विधानसभा चुनाव में सहयोगियों समेत 50 सीटें जीतने वाले वाम मोर्चा को इस बार के चुनाव में महज 16 सीटों पर जीत हासिल हुई. त्रिपुरा में भाजपा के बिप्लव कुमार देब के नेतृत्व में राजग की सरकार बनी है.
पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में भाजपा गठबंधन की जीत के जरिए हम विपक्ष की हार की राजनीतिक समीक्षा करें तो पाते हैं कि त्रिपुरा का ‘लाल-किला’ ढहाने में कांग्रेस ने परोक्ष रूप से भाजपा की ही मदद की. 40 लाख से अधिक आबादी वाले त्रिपुरा में मतदाताओं की संख्या 25 लाख है. इनमें से करीब 74 प्रतिशत वोटरों ने इस बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. छोटे से इस राज्य में हो रहे चुनाव पर दुनियाभर के अखबारों और समाचार चैनेलों की निगाह थी. यह दुर्लभ राजनीतिक परिदृश्य था कि 25 साल में पहली बार सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) को कांग्रेस के बजाय भाजपा से सीधी टक्कर मिल रही थी. भाजपा ने इस चुनाव में त्रिपुरा की साफ-सुथरी और ईमानदार वाम सरकार को पानी, सड़क और रोजगार जैसे विकास के बुनियादी मुद्दों पर घेर लिया और इन मसलों पर जनता ने भाजपा का साथ दिया. किसी ने सोचा नहीं था कि पिछले विधानसभा चुनाव में जिस भाजपा के 50 में से 49 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी, वही पार्टी अगले ही चुनाव में माकपा जैसे खुर्राट राजनीतिक दल को धराशाई कर देगी. पूर्वोत्तर मामलों के जानकार राजनीतिक विश्लेषक जीवानंद बोस कहते हैं कि त्रिपुरा में भाजपा ने ठोस रणनीति तो बनाई ही, लेकिन वाम दलों की काम से अधिक बेमानी बहसबाजी पर अधिक एकाग्रता और कांग्रेस की लचर नीतियों और ढीलेपन ने भाजपा को अधिक मजबूती दी. 2013 के चुनाव में त्रिपुरा में कांग्रेस ने 10 सीटों पर जीत हासिल की थी. उस चुनाव में कांग्रेस को 36.53 प्रतिशत वोट मिले थे. हैरत की बात है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर घटकर महज 1.8 प्रतिशत रह गया. दूसरी ओर भाजपा का वोट प्रतिशत डेढ़ से बढ़कर 43 प्रतिशत तक पहुंच गया. यानि, पिछले पांच साल में वाम सरकार को चुनौती देने और अपनी स्थिति मजबूत करने के बजाय अंदरूनी कलह में घिरी और ‘मूर्खत्व से भरे कल्पनालोक’ में जीती कांग्रेस लगातार अपना जनाधार खोती चली गई. भाजपा ने इसका भरपूर फायदा उठाया.
जीवानंद बोस कहते हैं कि कांग्रेस का हाल तो यह रहा कि उसने अपनी लंगोट बचाने पर भी ध्यान नहीं दिया. 2013 के चुनाव में 10 सीटें जीतने वाले कांग्रेसी विधायकों में से छह नेता पहले तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए. पिछले साल दिसम्बर में एक अन्य कांग्रेसी विधायक रतन लाल नाथ भी भाजपा में शामिल हो गए. भाजपा ने राज्य में स्थानीय नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर उनका मान बढ़ाया, जबकि कांग्रेस अपने स्थानीय नेताओं की उपेक्षा करती रही और सारे कांग्रेस नेता अपनी अलग-अलग डफली बजाते रहे और अपना अलग-अलग राग गाते रहे. कांग्रेस आलाकमान ने इस पर कोई ध्यान ही नहीं दिया. चुनाव हारने के बाद एक दूसरे को कोसने और गरियाने वाले कांग्रेसियों को राज्य के पुराने प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की शिकायतें याद नहीं, जब वे कांग्रेस आलाकमान द्वारा त्रिपुरा की उपेक्षा किए जाने के बारे में लगातार उलाहना दे रहे थे. पूर्वोत्तर के प्रभारी सीपी जोशी दो-तीन बार ही राज्य के दौरे पर गए और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तो बिल्कुल आखिरी वक्त पर त्रिपुरा पहुंचे, जब जहाज डूबने की सनद हो चुकी थी. दूसरी तरफ भाजपा नेताओं ने अलग-अलग क्रम में लगातार अपनी मौजूदगी बनाए रखी. बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सघन दौरा होता रहा.   
त्रिपुरा के आम लोग भी कांग्रेस के त्रिपुरा-रवैये को लेकर निंदा प्रस्ताव ही जारी करते हैं. वे कहते हैं कि त्रिपुरा में कांग्रेस हमेशा वाम दलों के दबाव में रही है. त्रिपुरा के लोग 1993 की उस घटना को अब भी याद करते हैं जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने केंद्र में वाम दलों का समर्थन हासिल करने के लिए त्रिपुरा की समीर रंजन बर्मन की सरकार बर्खास्त कर दी थी. इस फैसले का नतीजा यह हुआ कि अगले ही चुनाव में वहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी. कांग्रेस उस समय जो वहां से उखड़ी, उसके बाद वहां पैर नहीं जमा पाई. त्रिपुरा के लोगों ने कांग्रेस को उसकी बेजा और ढुलमुल नीतियों की सजा दी. अपने ही मुख्यमंत्री समीर रंजन बर्मन को अपमानित करने का परिणाम यह हुआ कि बर्मन का बगावती रुख लगातार कांग्रेस को नुकसान पहुंचाता रहा. पिछले चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल करने वाले उनके बेटे सुदीप राय बर्मन भी कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए. सुदीप राय बर्मन इस बार के चुनाव में अगरतला विधानसभा सीट पर भाजपा के टिकट से चुनाव जीते हैं. गैर वाम दलों के असंतुष्ट नेताओं को अपनी पार्टी में प्रतिष्ठा के साथ शामिल करने की भाजपा की रणनीति भी सियासत की बिसात पर कारगर साबित हुई.
इसी तरह नगालैंड में भी भाजपा-गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया. वहां सर्वाधिक सीटें सत्तारूढ़ नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) ने जीतीं. नगा पीपुल्स फ्रंट ने पहले ही प्रस्ताव पारित कर भाजपा गठबंधन में रहने की प्रतिबद्धता घोषित कर दी थी. वहां नीफिउ रीयो के नेतृत्व में सरकार बनी. मेघालय में 21 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी का तमगा लेने के बाद भी कांग्रेस वहां सरकार नहीं बना पाई और दो सीटें पाने वाली भाजपा ने अपने गठबंधन दलों के साथ नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) नेता कॉनराड संगमा के नेतृत्व में सरकार बना ली. एनपीपी ने मेघालय में 19 सीटें जीती हैं. पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में सरकार बनाने के बाद अब देश के कुल 21 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकार हो गई है. पूर्वोत्तर से शुरू करें तो अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, नगालैंड, मेघालय, मणिपुर, असम, त्रिपुरा, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, गुजरात, गोवा और जम्मू-कश्मीर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के छाते के नीचे आ चुके हैं.

अपने घर में भी तिकड़म करने से बाज नहीं आए अमित शाह
तिकड़म रचने की आदत है तो अपने घर में भी तिकड़म से बाज नहीं आते भाजपा के शीर्ष नेता. हिमाचल चुनाव से लेकर गुजरात और पूर्वोत्तर तक चुनाव जीतने के लिए भाजपा आलाकमान ने उत्तर प्रदेश के ‘फायर-ब्रांड’ और ‘ऑनेस्ट-ब्रांड’ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पूरा इस्तेमाल किया, लेकिन गोरखपुर लोकसभा के लिए होने वाले उप चुनाव में योगी की पसंद का उम्मीदवार नहीं दिया. अयोध्या के एक संन्यासी ने भाजपा के शीर्ष नेता के इस चरित्र पर उस बिच्छू की कथा सुनाई, जो उसकी प्राण रक्षा करने वाले साधु की हथेली पर बैठा भी था और उन्हें लहू-लुहान भी कर रहा था. गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ की पसंद का प्रत्याशी नहीं देने का फैसला करने वाले नेता की साधु के हाथ में बैठे बिच्छू से तुलना बिल्कुल सटीक है. गोरखपुर संसदीय सीट के लिए उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिए जाने का फैसला योगी को डंक मारने जैसा ही रहा. अमित शाह ने अपने ही मुख्यमंत्री के सामने ऐसी शातिराना बिसात बिछाई कि जीते तब भी गए और हारे तब भी गए. गोरखपुर लोकसभा सीट योगी आदित्यनाथ की पारंपरिक सीट रही है. वहां से योगी की पकड़ को कमजोर करने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उपेंद्र शुक्ला को उम्मीदवार बनाया. गोरखपुर सीट से हमेशा राजपूत प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरता और जीतता रहा है, लेकिन इस बार शाह ने ब्राह्मण को सामने करके राजपूत वर्चस्व को समाप्त करने का तानाबाना बुन दिया. गोरखपुर सीट से योगी आदित्यनाथ पिछले पांच बार से चुनाव जीतते आए. उनके मुख्यमंत्री बनने से यह सीट खाली हुई. 30 साल बाद गोरखपुर संसदीय सीट के लिए कोई ब्राह्मण प्रत्याशी भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ा. अमित शाह ने इस उम्मीदवार के जरिए गोरखपुर संसदीय सीट पर कायम गोरखधाम के प्रभाव को कम करने और योगी को कमजोर करने की कोशिश की. प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य फूलपुर से अपनी पत्नी को टिकट दिलाना चाह रहे थे, लेकिन पर-दुख से सुख लेने वाले अमित शाह ने ऐसा नहीं होने दिया और बाहरी प्रत्याशी ला खड़ा किया. सियासत की सारी रेस जीत लेने का दंभ भरने वाले भाजपा नेता ने टायर में सुई चुभो ली, इसका एहसास उन्हें परिणाम आने के बाद मिल ही गया होगा...

जनता की नाराजगी के कारण राजस्थान के उप चुनावों में हारी भाजपा
अब आते हैं मध्य प्रदेश और राजस्थान के उप चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के बावजूद अपेक्षित जन-समर्थन न मिलने के कारणों पर. राजस्थान में अलवर और अजमेर की दो लोकसभा और मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) की एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की. इस जीत का प्रदेश में जो ‘मैसेज’ गया वह कांग्रेस की जीत से अधिक भाजपा की हार का था. यानि, हार के बावजूद भाजपा ही चर्चा के केंद्र में रही. कांग्रेस इस जीत की ‘मार्केटिंग’ करने के बजाय अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट में ही फंसी रही. राजस्थान के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक भी राजस्थान उप चुपनाव के नतीजों को कांग्रेस की जीत से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी की हार के एंगल से देखते हैं. उनका मानना है कि जिस तरह पूर्वोत्तर में भाजपा ने रणनीतिक रफूगीरी की, वैसा ही ‘होमवर्क’ अगर राजस्थान में भी कर लिया तो उसका फायदा मिल सकता है. हालांकि राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया के कार्यकाल में चौपट हुई विकास-यात्रा के कारण लोगों में व्याप्त नाराजगी को भाजपा की ‘कलाकारी’ कितना कम कर पाएगी, इस बारे में राजनीतिक विश्लेषक अभी कुछ नहीं कह पा रहे हैं. उनका कहना है कि राजस्थान के उप चुनावों में कांग्रेस की जीत कांग्रेस की रणनीति के कारण नहीं, बल्कि मतदाताओं की भाजपा से नाराजगी के कारण हुई. तीनों सीटों पर आम मतदाता कांग्रेस के साथ दिखने के बजाय भाजपा के खिलाफ खड़े दिख रहे थे. नोटबंदी और जीएसटी के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों, मसलन, ढांचागत बदहाली, सड़कों की खराब हालत, किसान विरोधी नीति, खाद-बीज की सब्सिडी काटना, कर्मचारियों की उपेक्षा, पानी की अव्यवस्था, भ्रष्टाचारी मंत्रियों और अधिकारियों को बचाने के लिए काले कानून की सिफारिश, स्कूलों, बसों, चिकित्सकीय जांचों जैसे जनता से जुड़े अनिवार्य सरकारी काम को ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’ के फार्मूले से जोड़ने जैसे बेजा सरकारी फैसलों ने भी राजस्थान के मतदाताओं को भाजपा से दूर किया है. अधिकतर विश्लेषक और जानकार प्रदेश के विकास की तरफ सिंधिया सरकार की उपेक्षा और पार्टी की प्रदेश इकाई में मची अंदरूनी कलह को इस हार की मुख्य वजह बताते हैं. अलवर में पहलू खान की हत्या पर कानूनी कार्रवाई में ढिलाई बरतने, मेव समुदाय की उपेक्षा करने, राजसमंद में बुजुर्ग की हत्या पर चुप्पी साधने, धार्मिक उन्माद फैलाने, अजमेर में बाहुबली आनंदपाल को फर्जी इन्काउंटर में मारने और राजपूतों के विरोध के बावजूद पद्मावत फिल्म के प्रदर्शन को मंजूरी देने जैसे कई अहम स्थानीय मुद्दे भी वसुंधरा सरकार के खिलाफ गए हैं.
राजधानी जयपुर में मुख्यमंत्री सचिवालय और सरकार का कवरेज करने वाले कई वरिष्ठ पत्रकारों ने भी कहा कि मुख्यमंत्री समेत कई भाजपा नेताओं पर सत्ता का अहंकार हावी रहा, जिससे आम जनता के साथ-साथ कार्यकर्ता भी बिदक गए. नाराजगी इस हद तक पहुंच गई कि उप चुनाव के परिणाम पर भाजपा के कार्यकर्ता भी खुश नजर आए. कांग्रेस खेमे से ही यह बात भी निकल कर आई कि अजमेर में कई बूथों पर भाजपा के कार्यकर्ताओं ने अपनी पार्टी के खिलाफ वोट डलवाए. एक बूथ पर तो भाजपा के पक्ष में एक भी वोट नहीं पड़ा. दूसरे एक बूथ पर भाजपा को महज एक वोट मिला. इससे भाजपा के खिलाफ लोगों की नाराजगी स्पष्ट तौर पर समझी जा सकती है. स्थिति इतनी विपरीत है कि इन उपचुनावों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी खुद को अलग ही रखा. संघ से जुड़े एक वरिष्ठ स्वयं सेवक ने बताया कि चुनाव में जब संघ के कार्यकर्ता ही बाहर नहीं निकले तो वे मतदाताओं को कैसे बाहर निकालते. अजमेर में तो पार्टी की बैठक में संघ के पदाधिकारियों ने प्रदेश भाजपा के नेताओं के साथ बैठने से ही इन्कार कर दिया था.

मध्य प्रदेश उप चुनावः कलह में भंग हो गया जीत का उत्साह
मध्य प्रदेश में भी दो विधानसभा सीटों कोलारस और मुंगावली में कांग्रेस की जीत ने कांग्रेस समर्थकों और कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार किया, लेकिन यह उत्साह ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के तीन खेमों में खिंच कर छिन्नभिन्न हो गया. विधानसभा की महज दो सीटों पर मिली जीत के आधार पर कांग्रेस का कोई नेता ज्योतिरादित्य को भावी मुख्यमंत्री बनाए दे रहा है तो कोई कमलनाथ को. कांग्रेस नेता दिग्विजय के पर कतरे जाने की चौपाल-चर्चा में लगे हैं और यह नहीं समझ रहे कि इसका असर फाइनल मैच पर कितना पड़ेगा. उप चुनाव के परिणाम आने के बाद से यह चर्चा भी सरगर्म है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश का जिम्मा कमलनाथ संभालेंगे या फिर ज्योतिरादित्य. दोनों नेताओं के समर्थक अपने-अपने तरीके से दावेदारी पेश कर रहे हैं और दिग्विजय सिंह खेमा चुप्पी साधे हुए इस दोधारी दावेदारी के छेद तलाश रहा है.
मध्य प्रदेश की कांग्रेसी राजनीति में दिग्विजय सिंह को खलनायक साबित करने की मुहिम चल पड़ी है. उप चुनाव में वैसे तो दिग्विजय की भूमिका हाशिए पर रही, लेकिन भविष्य में दिग्विजय फिर न उठ कर खड़े हो जाएं, इसके लिए अभी से पेशबंदी हो रही है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा इंदौर जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने का मसला भी प्रतिष्ठा का विषय बना हुआ है. दिग्विजय सिंह और उनके विधायक पुत्र जयवर्धन सिंह की सिफारिश पर जिला कमेटी में की गई नियुक्तियों के अलावा कांग्रेस से निष्कासित कमलेश खंडेलवाल के कहने पर बोरिंग के लिए दिग्विजय द्वारा अपनी सांसद निधि से 10 लाख रुपए देना भी जंजाल बना हुआ है. वार्ड चुनाव में मुहम्मद गौरी को दिग्विजय सिंह का समर्थन मिलना और दिग्विजय के बेटे जयवर्धन द्वारा कांग्रेस के बागी इकबाल खान के बेटे शाहनवाज को शहर कांग्रेस का महामंत्री बनवा देना आफत का सबब बन गया.

कलह और अराजकता के बीच कांग्रेस नेतृत्व का लाचार चेहरा
लब्लोलुबाव यह है कि कांग्रेस पार्टी में अनुशासन बनाए रखना भी पार्टी नेतृत्व के लिए भीषण चुनौती का विषय बन गया है. प्रदेश इकाइयों में मची कलह और अराजकता के बीच कांग्रेस आलाकमान का चेहरा बेहद कमजोर दिख रहा है. इस कमजोरी का असर विभिन्न राज्यों के चुनाव पर पड़ रहा है. केंद्रीय नेताओं द्वारा प्रदेश की इकाइयों पर बेवजह दादागीरी करने के आरोप भी सतह पर आ रहे हैं. ऐसी ही दादागीरी के कारण बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी कांग्रेस छोड़ कर जनता दल (यू) में शामिल हो गए. उनके साथ चार विधान परिषद सदस्य भी जदयू में चले गए. अशोक चौधरी ने कांग्रेस नेता सीपी जोशी पर गुटबाजी का आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस का आंतरिक प्रबंधन बिल्कुल लचर है. कांग्रेस के कई और नेताओं के भाजपा, जदयू या राजद में जाने की संभावना है. उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी ने सीपी जोशी के कहने पर ही अशोक चौधरी को बिहार कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया था. अशोक चौधरी बिहार के वरिष्ठ नेता महावीर चौधरी के बेटे हैं. सीपी जोशी पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के भी प्रभारी रहे हैं. पूर्वोत्तर में पार्टी की दुर्गति से जोशी की मुश्किलें बढ़ गई हैं. अरुणाचल प्रदेश के बाद अब नगालैंड में कांग्रेस विद्रोह पर उतारू है. अंतरकलह के कारण कांग्रेस उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अपनी दुर्गति पहले ही देख चुकी है.
बहरहाल, कांग्रेस की प्रदेश इकाइयों को मजबूत करने और प्रभावशाली प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति करने की मांग तेजी से बढ़ी है. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मानना है कि कमजोर नेतृत्व के कारण ही आपस का झगड़ा बढ़ा है और हाथ की सीटें भी हारनी पड़ी हैं. राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के ठीक पहले उनके समक्ष हिमाचल प्रदेश और गुजरात की चुनौती थी और राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के फौरन बाद पूर्वोत्तर के तीन राज्यों की चुनौती सामने आई. दोनों चुनौतियों में कांग्रेस पास नहीं हुई. गुजरात में कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें तो मिलीं, लेकिन सरकार नहीं बन पाई. हिमाचल में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकल गई. यही हाल पूर्वोत्तर में हुआ. अब राहुल गांधी के समक्ष कर्नाटक फिर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान विधानसभा चुनाव की चुनौतियां सामने खड़ी हैं. विधानसभा चुनावों में जूझने के साथ ही संगठन को नए सिरे से खड़ा करने और फिर पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी भी सिर पर है.

अपनी करनी से नाकाम दल में तब्दील हो गया वाम दल
पूर्वोत्तर से वाम दल का पत्ता साफ हो गया. पश्चिम बंगाल की ‘कालजयी’ वाममोर्चा सरकार को इसके पहले ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस उखाड़ चुकी है. वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों को 41 प्रतिशत वोट मिले थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में वाम दलों का वोट प्रतिशत 29.6 रह गया. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों को 26.1 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए. यानि, गिरावट लगातार होती रही. पश्चिम बंगाल ही क्यों, जहां-जहां भी लेफ्ट की कोई भी पार्टी अस्तित्व में रही है, वहां-वहां से उसका सफाया होता गया. अब केरल ही वाम दलों का अकेला ठौर बचा है. इस पतन-यात्रा की वजहें भी साफ-साफ दिखती हैं. वाम दलों का शीर्ष नेतृत्व आम देशवासियों के विचार से बिल्कुल ही अलग वैचारिक धरातल पर विचरण करता रहता है. कभी वह सर्जिकल स्ट्राइक के प्रमाण मांगने लगता है तो कभी कश्मीर के पत्थरबाजों के प्रति सार्वजनिक सहानुभूति जताने लगता है. पाकिस्तान और चीन के उकसावों पर चुप्पी साध लेता है तो नेपाल के मसले पर भारत विरोधी बयान जारी करने लगता है. वाम नेताओं के ऐसे बयानों ने उन्हें जनता से दूर कर दिया और धीरे-धीरे वाम दल देश की राजनीति से अप्रासंगिक होते चले गए. वाम की नीतियों, कार्यक्रमों और विचारों को जनता ने एक तरह से खारिज ही कर दिया. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) हो या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) या कोई अन्य वाम दल, किसी ने भी आम आदमी के मसले को जमीनी धरातल पर हल करने के व्यवहारिक उपाय नहीं तलाशे केवल वैचारिक आकाश पर पतंगबाजी करते रहे. इसी वजह से सियासी आसमान से वाम दलों की पतंग भक्क-काटा हो गई. कभी उत्तर प्रदेश में भी वाम दलों की अच्छी पकड़ रही है, लेकिन आज उनका हाल झख मारने से भी बदतर हो गया है. यूपी के विधानसभा चुनाव में पहली बार भाकपा, माकपा और माले ने मिल कर सौ सीटों पर साझा उम्मीदवार उतारे थे. वाम के साझा प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार में वाम दलों के सभी स्टार प्रचारक सीताराम येचुरी, डी. राजा, वृंदा करात, दीपंकर भट्टाचार्य समेत दर्जनों दिग्गज चुनावी सभाओं में जूझते रहे, लेकिन वोट नहीं दिला पाए. वाम दलों के नेताओं को फिर भी यह समझ में नहीं आया कि वे राजनीति की किस काल्पनिक जमीन पर खड़े हैं. सौ प्रत्याशियों के लिए देश के सभी वाम दल मिल कर भी डेढ़ लाख वोट नहीं जुटा पाए. प्रत्याशियों को अपना वोट देने के बजाय ‘इनमें से कोई नहीं’ (नोटा) का बटन दबाने वाले मतदाताओं ने भी वाम दलों के सौ प्रत्याशियों के कुल वोट से कहीं अधिक ‘नोटा’ के वोट डाले. वाम दलों के प्रत्याशियों को कुल एक लाख 38 हजार 763 वोट मिले, जबकि ‘नोटा’ के खाते में सात लाख 57 हजार 643 मत पड़े. यूपी के विधानसभा चुनाव में वाम दलों की बुरी हालत का संक्षिप्त जायजा इससे भी मिल जाएगा कि अयोध्या में वाम दलों के साझा प्रत्याशी भाकपा के सूर्यकांत पांडेय को मात्र 1353 वोट हासिल हुए. मुजफ्फरनगर दंगे के गर्म तवे पर सियासत की रोटी सेंकने वाले वाम दलों के साझा प्रत्याशी माकपा के मुर्तजा सलमानी को महज 491 वोट मिले. आजमगढ़ में वाम दलों के साझा प्रत्याशी माकपा के रामबृक्ष को 1040 वोट मिले और गाजियाबाद के साहिबाबाद में वाम के साझा प्रत्याशी माकपा के जगदंबा प्रसाद को 1087 वोट मिल पाए. वाम दलों के सभी साझा प्रत्याशी अपनी-अपनी जमानतें भी नहीं बचा पाए. आप समझ सकते हैं कि देश में वाम दल किस बुरी हालत में पहुंच गए हैं. फिर भी वे मान नहीं रहे और न अपनी नीतियों में समय की मांग के मुताबिक फेरबदल कर रहे हैं. 1991 के लोकसभा चुनाव में वाम दलों ने नौ राज्यों में जीत दर्ज की थी. आज लेफ्ट पार्टी एक राज्य में सिमट गई है. माकपा ने पश्चिम बंगाल में 1977 से लेकर 2011 तक राज किया. माकपा नेता ज्योति बसु सबसे लंबे समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे. लेकिन आज माकपा की दुर्दशा सियासी इतिहास की अजीबोगरीब बानगी है. देश के युवकों ने वाम दलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. अब वाम दल बुड्ढों की पार्टी होकर रह गए हैं. माकपा के कुल सदस्यों में महज साढ़े छह प्रतिशत सदस्य 25 वर्ष या उससे कम उम्र के हैं.

ऐसी ईमानदारी किस काम की जब विकास की फाइलों पर बैठे रहे 25 साल
वाम दलों के नेताओं ने व्यक्तिगत ईमानदारी तो बरती, लेकिन जिन राज्यों में वे राज करते रहे उन्हें विकास की दौड़ में काफी पीछे धकेल दिया. विकास की फाइलें वाम-राज में रुकी रहीं. वाम नेता विकास की फाइलों को अंडे की तरह सेते रहे, लेकिन एक चूजा भी क्यों नहीं निकाल पाए, विकास में काफी पीछे रह गए त्रिपुरा के लोग यह सवाल पूछते हैं. पिछले 25 साल में बढ़ी गरीबी की वजहें वे ईमानदार माणिक सरकार की वाम सरकार से जानना चाहते हैं. 13वें वित्त आयोग से त्रिपुरा को मिले 7283 करोड़ रुपए और 14वें वित्त आयोग के तहत मिले 25,396 करोड़ रुपए के बड़े फर्क ने भी त्रिपुरा के लोगों को राजनीतिक तौर पर सतर्क करने का काम किया. त्रिपुरा के लोग वाम दलों से 18 हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि का हिसाब मांग रहे थे, हिसाब नहीं मिला तो लोगों ने अपनी नाराजगी को वाम-विरोधी वोट में तब्दील कर दिया.

सपा-बसपा के अवसरवादी तालमेल से सशंकित कांग्रेस
बिहार में महागठबंधन से अलग होने वाली समाजवादी पार्टी के साथ उत्तर प्रदेश में हाथ मिलाने वाली कांग्रेस अब बसपा को लेकर फंस गई है. समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी जैसी बैरी पार्टी से तालमेल कर लिया है. अब कांग्रेस को तय करना है कि 2019 के पहले वह यूपी में सपा बसपा के साथ तिकड़ी में शामिल होती है या अपना अलग रास्ता अख्तियार करती है, जैसा उसने इस बार यूपी के दो उप चुनाव को लेकर अपना अलग रास्ता अख्तियार किया. कांग्रेस ने एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने का सपा को प्रस्ताव दिया था, लेकिन सपा ने इन्कार कर दिया. सपा को बसपा से गठजोड़ पसंद आया. हालांकि सपा-बसपा का गठबंधन भी 2019 के लोकसभा चुनाव तक शायद ही चल पाए. 23 साल बाद मिले हाथ जल्दी ही विलग भी हो सकते हैं. मायावती ने ऐसे संकेत भी दिए हैं. बहरहाल, अभी गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर हो रहे उप चुनाव में मायावती की पार्टी सपा प्रत्याशी का समर्थन करेगी. राजनीतिक पंडित इसे अवसरवादी करार बता रहे हैं. उनका मानना है कि मायावती ने राज्यसभा में अपनी एक सीट पक्की करने के लिए सपा से हाथ मिलाया है. बसपा अपने बूते राज्यसभा में एक भी प्रतिनिधि नहीं भेज सकती थी. बसपा ने कांग्रेस को भी यह कह कर अपने जाल में फंसाया है कि कांग्रेस अगर मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव जीतना चाहती है तो उसे यूपी के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के सात विधायकों के जरिए बसपा को वोट देना होगा. मध्य प्रदेश में बसपा के चार विधायक हैं. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा-बसपा समझौते को 'केर बेर का करार' कहा है. बसपा के साथ हाथ मिलाने के बाद सपा ने दिन में सपना देखना शुरू कर दिया है. सपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा कहते हैं कि सपा और बसपा के एक होने से फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव में साम्प्रदायिक ताकतें पराजित होंगी, क्योंकि भाजपा दोनों उप चुनाव हारने जा रही है. ‘स्वप्निल’ नंदा यह भी कहते हैं कि फूलपुर उप चुनाव 2019 के चुनावों की दिशा और दशा तय करेगा.
राज्यसभा पहुंचने के लिए सीटों का गणित बसपा के रास्ते में बाधा डाल रहा था. 19 विधायकों के बूते बसपा के किसी प्रतिनिधि का राज्यसभा पहुंच पाना मुश्किल था. इसलिए बसपा ने सपा का हाथ थाम लिया. बसपा प्रमुख मायावती ने कहा भी कि सपा राज्यसभा में बसपा का समर्थन करेगी और बसपा सपा को विधान परिषद में मदद करेगी. इससे सपा को विधान परिषद में एक सीट का फायदा हो जाएगा. पिछले साल जुलाई में मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था. मायावती की खाली सीट समेत राज्यसभा की यूपी से 10 सीटों पर 23 मार्च को चुनाव होगा. सपा छोड़कर कोई भी विपक्षी दल अपना एक भी उम्मीदवार राज्यसभा भेजने की स्थिति में नहीं है. सपा-बसपा करार हो जाने के बाद साझा उम्मीदवार के तौर पर बसपा का एक सदस्य राज्यसभा पहुंच जाएगा. राज्यसभा पहुंचने के लिए कम से कम 37 वोटों की जरूरत है. संख्या गणित के हिसाब से भाजपा अपने आठ उम्मीदवारों को राज्यसभा पहुंचा देगी. सपा के पास 47 विधायक हैं. मायावती के 19 विधायकों को मिला कर यह संख्या 66 हो जाएगी. सपा-बसपा का साथ देने के अलावा सात विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है. बसपा का साथ मिलने से 12 सीटों के लिए अप्रैल में होने वाले विधान परिषद चुनाव में सपा एक और सीट हासिल कर लेगी. विधान परिषद की एक सीट के लिए 32 वोटों की जरूरत है. लिहाजा संख्या बल के मुताबिक भाजपा 10 सीटें हासिल कर लेगी. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा के उपचुनाव और राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव सपा-बसपा के भविष्य के तालमेल को भी निर्धारित करेंगे.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तालमेल के जरिए सपा और बसपा दोनों ने मिल कर कांग्रेस को दबाव में लिया है. उप चुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी उतारा है, लेकिन उसकी मजबूरी है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा से भिड़ने के लिए वह सपा, बसपा, वाम दलों और राजग विरोधी छोटे दलों के साथ रहे. सपाई प्रेक्षकों की यह ‘कल्पना’ है कि उप चुनाव में यदि सपा का कोई प्रत्याशी जीता तो भाजपा के खिलाफ व्यापक गठबंधन तैयार करने में अखिलेश यादव का हाथ ऊपर रहेगा. गोरखपुर और फूलपुर के उप चुनाव में निषाद पार्टी और पीस पार्टी ने सपा का समर्थन किया है. सपा ने निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार निषाद के बेटे प्रवीण कुमार निषाद को गोरखपुर से अपना उम्मीदवार बनाया है. फूलपुर से सपा ने नागेंद्र पटेल को अपना प्रत्याशी बनाया है. फूलपुर से निर्दलीय प्रत्याशी के बतौर माफिया सरगना अतीक अहमद के खड़े होने और कांग्रेस द्वारा ब्राह्मण उम्मीदवार मनीष मिश्र को उतार दिए जाने से सपा का रास्ता मुश्किल और भाजपा के लिए आसान हो गया है. गोरखपुर में भी कांग्रेस द्वारा मुस्लिम प्रत्याशी मशहूर डॉक्टर सुरहिता करीम को उम्मीदवार बनाने से सपा के सामने अड़चन खड़ी हो गई है. डॉ. सुरहिता करीम समाजवादी पार्टी के वोट में असरकारक सेंध लगा सकती हैं.

बदलता गया समीकरण और ध्वस्त होता गया चुनावी गणित
पिछले ढाई दशक में उत्तर प्रदेश ने सियासी समीकरणों को बनते और बिगड़ते, टूटते और बिखरते देखा है. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा 177 सीटें जीती थी. सपा को तब 109 सीटें हासिल हुई थीं. बसपा को 67 और कांग्रेस को 28 सीटें मिली थीं. 177 सीटें जीत कर भी भाजपा सरकार नहीं बना पाई थी और सपा बसपा गठबंधन ने कांग्रेस से समर्थन लेकर मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार बना ली थी. गठबंधन में शामिल होने के बावजूद मायावती द्वारा सार्वजनिक मंचों से मुलायम की निंदा किए जाने से तल्खी बढ़ती गई. दो जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं. राजनीतिक काल-परिस्थिति ने ऐसी करवट बदली कि गेस्ट हाउस कांड की अभियुक्त पार्टी के साथ तालमेल करने से मायावती ने परहेज नहीं किया. राजनीति इसी मौकापरस्ती का नाम है.
हम यहां तीन चुनावों का जिक्र कर रहे हैं. 1993 का विधानसभा चुनाव, 2014 का लोकसभा चुनाव और 2017 का विधानसभा चुनाव. इन तीनों चुनावों के परिणाम और उसके बाद के हालात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल लाने का काम किया है. 1993 के चुनाव और प्रतिउत्पाद के दृश्य आपने देखे. अब आते हैं 2014 के लोकसभा चुनाव पर. लोकसभा के इस चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति के सारे आंकड़े और समीकरण ध्वस्त कर डाले. 2014 के चुनाव में भाजपा को 71 सीटों पर जीत मिली. प्रदेश में सरकार में होने के बावजूद सपा को महज पांच सीटें हासिल हुईं और बसपा शून्य पर पहुंच गई. राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी सीटें बचा ले गए. दो सीटें पाकर कांग्रेस ने अपनी इज्जत बचाई. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में भी ऐसा ही हुआ. भाजपा ने रिकॉर्ड जीत हासिल करते हुए अकेले 312 सीटें अपने खाते में कर लीं. भाजपा गठबंधन को 325 सीटें मिलीं, जिसमें अपना दल को नौ और भारतीय समाज पार्टी (सुहेलदेव) को चार सीटें शामिल हैं. सरकार पर बैठी सपा को 47 सीटें मिल पाईं. बसपा को 19 और कांग्रेस को महज सात सीटों पर संतोष करना पड़ा. आजाद भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ. लोकसभा चुनाव में 71 सीटों पर जीत और विधानसभा चुनाव में 312 सीटों पर भाजपा की जीत ने भविष्य के सारे राजनीतिक समीकरण गड्डमड्ड कर दिए. इसी में सारे विपक्षी दल चक्करघिन्नी हैं.

छोटे दल भी खोते जा रहे हैं अपना औचित्य
बदलते समय में छोटे और क्षेत्रीय दल भी अपना औचित्य खोते चले गए. 80 के दशक में उत्तर प्रदेश में जब जातिवादी राजनीति और क्षेत्रीयतावाद सिर चढ़ कर बोल रहा था, उस समय छोटे क्षेत्रीय दल भी प्रभावी तरीके से उभर रहे थे. हालांकि छोटे गैर मान्यता प्राप्त दलों के चुनाव मैदान में उतरने की शुरुआत 1962 में ही हो चुकी थी, जब दलितवादी रिपब्लिकन पार्टी और धर्मवादी हिन्दू महासभा और राम राज्य परिषद चुनाव मैदान में उतरी थी. उस वक्त रिपब्लिकन पार्टी को आठ सीटें और हिन्दू महासभा को दो सीटें मिली थीं. 1969 के चुनाव में चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांतिदल को 98 सीटों पर जीत हासिल हुई थी और वह पार्टी उत्तर प्रदेश की 425 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. 1985 में बसपा ने कामयाबी हासिल की और उसके बाद अपना दल, राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी, इंडियन जस्टिस पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी जैसे कई राजनीतिक दल सामने आते गए. बाद के दौर में शिवसेना और उलमा कौंसिल ने भी यूपी में चुनावी दाव खेले. इसी में पीस पार्टी ने भी अपने कुछ विधायक जिता कर शिनाख्त दर्ज करा ली. यानि, 1985 के बाद छोटे दलों की संख्या लगातार बढ़ी. 2007 में विधानसभा चुनाव लड़ने वाले छोटे दलों की तादाद 111 तक पहुंच गई. लेकिन संख्या बढ़ोत्तरी के साथ-साथ इनका औचित्य भी खोता गया. वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में 34 छोटे दलों ने कुल 645 उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें केवल दो ही जीत सके और 641 की जमानत जब्त हो गई. हालांकि 1993 में ग्राफ बढ़ा और 59 छोटे दलों के 1205 प्रत्याशियों में से 110 प्रत्याशी जीत गए. मुलायम सिंह यादव गैर मान्यता प्राप्त समाजवादी पार्टी (सपा) ने 109 सीटें जीती थीं. फिर यह ग्राफ नीचे गिरा और 1996 के विधानसभा चुनाव में 61 छोटे दलों के 1102 उम्मीदवारों में से महज 11 ही जीत पाए. 2002 के विधानसभा चुनाव में 58 छोटी पार्टियों ने 1332 प्रत्याशी उतारे जिनमें से 29 जीते. 2007 के विधानसभा चुनाव में 111 छोटे दलों ने 1356 प्रत्याशी उतारे लेकिन उनमें से महज सात जीत पाए और 1329 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में छोटे दलों ने बड़े समीकरणों को ‘डस्टर्ब’ करने का खेल जरूर किया. पीस पार्टी और महान दल जैसे छोटे दल तमाम सीटों पर चौथे, पांचवें और छठे स्थान पर तो जरूर रहे, पर इन दलों ने सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों का कई सीटों पर संतुलन बिगाड़ दिया था. 2012 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने जो नौ सीटें जीती थीं उनमें से आठ सीटों पर बसपा के उम्मीदवार हारे थे. पीस पार्टी ने जो चार सीटें जीती थीं उनमें से तीन पर बसपा और एक पर सपा प्रत्याशी को हराया था. नौ सीटों पर अपना दल दूसरे नंबर पर और 23 सीटों पर तीसरे स्थान पर आया था. पीस पार्टी तीन सीटों पर दूसरे स्थान, आठ सीटों पर तीसरे और 24 सीटों पर चौथे स्थान पर रही थी. 2012 के चुनाव में इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल ने बरेली की भोजीपुरा सीट जीतकर सबको हैरत में डाल दिया था. उसने बरेली शहर, कैंट और बिथरी चैनपुर सीट पर समाजवादी पार्टी का खेल भी बिगाड़ दिया था. इन तीनों सीट पर वह तीसरे स्थान पर रही थी. काउंसिल ने बरेली की छह विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में विपक्षी खेमे के सारे छोटे दल हवा में उड़ गए. भाजपा गठबंधन के साथ रहे अपना दल (सोनेलाल) को नौ सीटें मिलीं और भारतीय समाज पार्टी (सुहेलदेव) को चार सीटें मिलीं. भाजपा अकेले ही 312 सीटों पर जीत गई. 

Thursday, 8 March 2018

नोटबंदी इनके लिए नहींः आज भी चल रहे हैं पांच सौ और हजार के प्रतिबंधित नोट..!

प्रभात रंजन दीन
नोटबंदी के बाद प्रतिबंधित नोटों के चलन पर लगाई गई सख्ती भारत सरकार का दिखावा है. पांच सौ और हजार के प्रतिबंधित नोट्स आज भी चल रहे हैं. कुछ पड़ोसी देशों के बैंक भारत के प्रतिबंधित नोट्स अब भी जमा कर रहे हैं. जिन पड़ोसी देशों से भारत का सीधा व्यापारिक सम्बन्ध है और जहां भारतीय मुद्रा का चलन है, भारत में नोटबंदी लागू होने के बाद वहां के बैंकों में पांच सौ और हजार के नोट जमा तो हुए लेकिन भारत सरकार ने उसका हिसाब-किताब नहीं लिया. सारे नोट वहीं डंप पड़े हुए हैं. पड़ोसी देशों के बैंकों ने इसका फायदा उठाया और भारत के नेताओं, व्यापारियों, माफियाओं और काले धन के जमाखोरों से मिलीभगत करके वे मनमाने रेट पर प्रतिबंधित नोट अपने यहां नामी-बेनामी खातों में जमा कर रहे हैं. इस काम में पड़ोसी देशों के स्थानीय व्यापारियों के खाते भी काम आ रहे हैं.
नोटबंदी के दरम्यान भारतीय बैंकों के भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों ने जिस तरह अनापशनाप तरीके से काला धन सफेद कर माल कमाया, उसी तरह पड़ोसी देशों के बैंक अधिकारी भी भारत की नोटबंदी का लाभ कमा रहे हैं. फर्क यह है कि विदेशी बैंकों पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं है, लिहाजा वे बेखौफ हैं. भारतीय रिजर्व बैंक के कुछ अधिकारी यह भी कहते हैं कि पड़ोसी देशों के बैंकों में डंप प्रतिबंधित भारतीय करंसी को नोटबंदी के सवा साल बाद भी वापस लाने में कोताही बरतना सुनियोजित लापरवाही है. ऊंची पहुंच वाले धनपशुओं को काला धन सफेद करने की यह सुविधा बड़े ही सोचे-समझे तरीके से मुहैया कराई जा रही है. भारत सरकार को यह पता ही नहीं है कि नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका, बर्मा, अफगानिस्तान, भूटान, मालदीव और थाईलैंड समेत दक्षिण एशियाई मित्र देशों के बैंकों में कितनी प्रतिबंधित भारतीय करंसी डंप पड़ी है. भारत सरकार जब इसका हिसाब-किताब लेगी, तब तक तो यह धंधा जारी रहेगा! नोट बदली का गोरखधंधा खास तौर पर उन मित्र देशों के बैंकों में चल रहा है, जहां जाने के लिए वीज़ा लेने का नियम नहीं है. नेपाल इसमें अव्वल है. नोटबंदी के बाद प्रतिबंधित हुए पांच सौ और हजार के नोटों को मौद्रिक मुख्यधारा में चलाने का जाल इस कदर फैल चुका है कि अगर वहां डंप पड़े नोट्स भारत सरकार ने शीघ्र वापस नहीं लिए तो यह अलग प्रकार के आर्थिक असंतुलन की मुश्किलें पैदा कर देगा. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के रिसर्च एंड इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट से सम्बद्ध एक अधिकारी ने बताया कि नेपाल के ढाई दर्जन कमर्शियल बैंकों के अलावा 36 विकास बैंक, 25 वित्तीय संस्थान और करीब 50 माइक्रो क्रेडिट डेवलपमेंट बैंकों के जरिए प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा को चलाने का काम हो रहा है.
विचित्र बात यह है कि भारत सरकार ने पांच सौ और दो हजार के नए नोटों के चलन को वैध करने के लिए विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के तहत अधिसूचना तो आनन-फानन जारी कर दी, लेकिन नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका समेत दक्षिण एशियाई मित्र देशों के बैंकों में जो भारतीय मुद्रा नोटबंदी के बाद से डंप है उसे वापस लेने का कोई प्रबंधन आजतक नहीं किया. भारतीय मुद्रा की वापसी के तौर-तरीके पर दोपक्षीय सहमति कैसे बने, इसे लेकर कोई कवायद नहीं हो रही है. स्पष्ट है कि भारत सरकार यह जानबूझ कर कर रही है, ताकि खास-खास लोगों का काला धन सफेद हो सके.
भारत में नोटबंदी लागू होने के दो दिन के अंदर ही नेपाल राष्ट्र बैंक में 33,600,000 (336 लाख) रुपए जमा हो गए थे. विदेश मंत्रालय के नेपाल डेस्क के अधिकारी कहते हैं कि अब तक यह रकम हजारों करोड़ रुपए हो चुकी होगी. प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा आज भी नेपाल के बैंकों में जमा हो रही है. भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस पर चुप्पी साधे है. आरबीआई के एक अधिकारी ने इस चुप्पी या लापरवाही को भौंडा तर्क देकर ढंकने की कोशिश की और कहा कि नेपाल जाली करंसी का बड़ा जरिया बना रहा है इसलिए नेपाल के बैंकों में जमा भारतीय मुद्रा को वापस लेने के पहले नकली नोटों की पहचान जरूरी है. जबकि नेपाल राष्ट्र बैंक (एनआरबी) यह कह चुका है कि आरबीआई जो तकनीक सुझाएगा उसे वह नेपाल में आजमाने को तैयार है, जिससे नकली नोटों की पहचान हो सके और बाकी नोटों को भारतीय अथॉरिटी को औपचारिक तरीके से सुपुर्द किया जा सके. एनआरबी ने यह भी विकल्प दिया था कि आरबीआई खुद अपने विशेषज्ञों को भेज कर नोटों की पहचान करा ले और अपनी मुद्रा वापस ले ले. लेकिन आरबीआई ने न तकनीक सुझाई और न अपनी टीम भेजी, बस चुप्पी साध ली. नेपाल की अत्यधिक निर्भरता उन नेपाली श्रमिकों पर भी है जो भारत में कमाते हैं और छुट्टियों में भारतीय मुद्रा नकद लेकर नेपाल जाते हैं. यह रकम अरबों में होती है. वर्ष 2016 में यह रकम 42 अरब 36 करोड़ 35 लाख 55 हजार रुपए थी. स्वाभाविक है कि नोटबंदी के बाद इस मुद्रा में से भी पांच सौ और हजार का हिस्सा बैंकों में डंप हुआ होगा.
भूटान से नकली और फर्जी नोटों की आमद अत्यंत कम है, इसके बावजूद भूटान के बैंकों में डंप भारतीय मुद्रा अब तक वापस क्यों नहीं ली जा सकी? इस सवाल का जवाब भारत सरकार के पास नहीं है. भूटान में भारतीय मुद्रा का चलन भूटानी मुद्रा से अधिक है. लिहाजा, नोटबंदी का भूटान पर व्यापक असर पड़ा. भूटान ने पांच सौ और हजार के प्रतिबंधित नोटों को फौरन अपने बैंकों में जमा कराना शुरू कर दिया था, लेकिन भारत इन नोटों को वापस नहीं ले सका. भूटान की रॉयल मॉनिटरी अथॉरिटी का कहना है कि उसके पास तीन हजार करोड़ रुपए की भारतीय मुद्रा रिजर्व में है. इसके अलावा नोटबंदी के बाद जमा हुई भारतीय मुद्रा भी है, जिसे औपचारिक रूप से भारत सरकार को सुपुर्द करना है.
आठ नवम्बर 2016 के नोटबंदी आदेश के बाद खास तौर पर दो पड़ोसी देशों नेपाल और भूटान की बैंकिंग व्यवस्था हिल गई थी. भूटान में भारतीय मुद्रा के चलन को सरकारी तौर पर मंजूरी मिली हुई है और नेपाल में भारतीय मुद्रा का चलन पारंपरिक है. नोटबंदी के बाद भारत सरकार ने दोनों देशों को करंसी-एक्सचेंज का कोई कारगर रास्ता नहीं दिखाया. भारतीय रिजर्व बैंक और नेपाल राष्ट्र बैंक के बीच अब तक कोई औपचारिक सहमति का रास्ता नहीं निकल पाया जिससे नेपाल के बैंकों में जमा प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा का समुचित विनिमय हो सके और वह भारत लौट सके. यही छेद काले धन को सफेद करने का जरिया बना हुआ है. नेपाल राष्ट्र बैंक और नेपाल स्थित बैंकों के अलावा वहां के वित्तीय संस्थानों और नेपाल के नागरिकों के पास भी भारतीय मुद्रा है. यह कितनी है और इसकी गिनती कैसे हो, इसका कोई मैकेनिज्म अब तक नहीं ढूंढ़ा जा सका है. भारतीय रिजर्व बैंक ने नेपाल सरकार को साढ़े चार हजार रुपए की भारतीय मुद्रा का विनिमय करने की सलाह दी थी, लेकिन नेपाल सरकार ने प्रत्येक नेपाली नागरिक को कम से कम 25 हजार रुपए भारतीय मुद्रा रखने की मंजूरी पहले से दे रखी थी. पूर्व गोरखा सैनिकों समेत लाखों लोगों के पास भारत सरकार की ओर से मिलने वाले पेंशन की राशि भारतीय मुद्रा में ही रखी थी. नेपाल के बैंकों में डंप प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा की वापसी के लिए नेपाल राष्ट्र बैंक के फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट के प्रमुख भीष्मराज धूंगना और आरबीआई के अधिकारियों के बीच कई राउंड की बैठक हो चुकी, लेकिन सारी बैठकें बेनतीजा रही. नेपाल के वित्त मंत्री और भारतीय वित्त मंत्री के बीच भी बातचीत हुई लेकिन कोई ठोस रास्ता नहीं निकला. भारत के वित्त मंत्री ने एक्सचेंज सुविधा देने का वादा भी किया था, लेकिन अपने वादे पर वे कायम नहीं रहे.
उधर म्यांमार (बर्मा) के बैंकों में भी प्रतिबंधित नोटों का डंप भारत वापस लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है. आरबीआई के अधिकारी बर्मा के बैंकों में महज 18 लाख प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा पड़े होने का दावा करते हैं, जबकि जानकार बताते हैं कि बर्मा के गोल्डन पैगोडा को ही दान में मिले करोड़ों रुपए डंप पड़े हुए हैं. प्रतिबंधित भारतीय करंसी म्यांमार इकोनॉमिक बैंक और म्यांमार फॉरेन ट्रेड बैंक में जमा है. विडंबना यह है कि इन दोनों बर्मी बैंकों के कोलकाता के यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में ‘वोस्ट्रो’ अकाउंट हैं, इसके बावजूद वह रकम भारत ट्रांसफर नहीं हो पा रही है. म्यांमार और भारत के बीच व्यापारिक सम्बन्ध हैं. म्यांमार स्थित तामू विद्युत प्रबंधन इंफाल से बिजली खरीदता है. यूबीआई के जरिए पैसे का लेनदेन होता है, लेकिन प्रतिबंधित करंसी बर्मा में डंप पड़ी हुई है. बर्मा सरकार की तरफ से लगातार इस बारे में लिखा जा रहा है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही. बांग्लादेश सरकार भी अपने बैंकों में डंप प्रतिबंधित भारतीय नोट्स भारत सरकार को वापस नहीं कर पा रही है. बांग्लादेश के जनता बैंक, अग्रणी बैंक, रूपाली बैंक और सोनाली बैंक में भारत की प्रतिबंधित मुद्राएं डंप पड़ी हुई हैं. पहले यह कहा गया था कि सोनाली बैंक अपनी सिलिगुड़ी स्थित शाखा के जरिए भारतीय मुद्रा भेज सकता है, लेकिन वह भी विलंबित ताल में चला गया. जानकार बताते हैं कि बांग्लादेशी बैंकों के जरिए भी प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा को ‘सफेद’ करने का गोरखधंधा चालू है. पड़ोसी देशों के साथ व्यापार पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा है. खास तौर पर अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान, थाईलैंड और श्रीलंका के साथ. यहां के बैंकों में डंप पड़े भारतीय नोट्स के हस्तांतरण का काम अब तक नहीं होने से विदेश व्यापार प्रभावित हो रहा है. इन देशों के साथ भारत का व्यापार वर्ष 2015-16 में 2160 करोड़ डॉलर का था, जो वर्ष 2016-17 में काफी घट गया.
नोटबंदी के सवा साल बाद भी पांच सौ और हजार के प्रतिबंधित नोटों की बरामदगी जारी है. सवाल है कि इतनी सख्ती और पाबंदी के बावजूद लोग अपने पास ये नोट क्यों रख रहे हैं? इसका जवाब है कि प्रतिबंधित नोटों को सफेद करने के लिए नेपाल, बांग्लादेश व अन्य पड़ोसी देशों के बैंकों से मदद ली जा रही है. देश में जो नोट बरामद हो रहे हैं और जो नोट पड़ोसी मुल्क के बैंकों के जरिए बदले जा रहे हैं उनके ‘वजन’ में काफी फर्क है. नोटों की बरामदगी दिखावा है और अदला-बदली असलियत. यह खबर सार्वजनिक हो चुकी है कि नेपाल के जुआखानों (कैसीनो) और डांस बार के अड्डों पर भी भारत के प्रतिबंधित नोट्स खुलेआम चल रहे हैं. नेपाल में दो हजार से अधिक कैसीनो और डांस बार हैं. नेपाल के कैसीनो में पांच सौ के पुराने प्रतिबंधित नोट के बदले तीन सौ से चार सौ नेपाली रुपया मिलता है जबकि पांच सौ के नए नोट के बदले आठ सौ नेपाली रुपया मिलता है. नेपाल के जुआघरों और डांस-बार में पांच सौ और हजार रुपए के प्रतिबंधित नोट अधिक तादाद में ले जाने पर ही बदले जा रहे हैं. कैसीनो से इसके बदले में ग्राहकों को टोकन मिलते हैं. जानकार कहते हैं कि जुआघरों और डांस-बार से अधिक मुफीद रास्ता बैंकों का है. नेपाल के ‘सम्पर्क’ वहां के बैंक अधिकारियों से मिलवाते हैं और ऊंचे कमीशन पर भारतीय मुद्रा जमा कर ली जाती है. नेपाल के कैसीनो व्यापारियों के बैंकों से लिंक हैं, कैसीनो व्यापारी भी प्रतिबंधित भारतीय करंसी बैंकों में जमा करा रहे हैं. भारत में प्रतिबंधित नोटों को नेपाल में किस तरह खपाया जा रहा है उसे इस आधिकारिक सूचना से भी समझा जा सकता है कि नगालैंड के गृह मंत्री नौ लाख रुपए के प्रतिबंधित नोट लेकर एक शादी समारोह में शरीक होने काठमांडू गए थे. आप यह भी ध्यान में रखते चलें कि नेपाल के जुआखानों और डांस-बार्स पर भारतीय मूल के व्यापारियों का ही वर्चस्व है. काठमांडू में कई बड़े कैसीनो हैं, जिनमें होटल सॉलटे, होटल याक एंड येति, होटल हयात रीजेंसी और होटल संगरीला भी शामिल है. इसके अलावा काठमांडू में कुछ मिनी कैसीनो और नेपाल-भारत सीमा पर भी कई मिनी कैसीनो हैं. कैसीनो के लगभग दो तिहाई ग्राहक भारतीय ही हैं. इसी तरह मिनी कैसीनो में 95 फीसदी ग्राहक भारतीय ही आते हैं. ऐसे में प्रतिबंधित भारतीय करंसी का विनिमय कितनी आसानी से होता होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है.
प्रतिबंधित नोटों को बदलने का ‘मौका’ देने के लिए ही नेपाल सरकार और भारत सरकार के बीच मुद्रा विनियम को लेकर होने वाली सहमति लगातार टाली जा रही है. आधिकारिक तौर पर दोनों सरकारों को यह नहीं पता है कि कितनी करंसी जमा है और किन शर्तों पर उसे वापस लिया जाना है. जब सहमति औपचारिक शक्ल लेगी तब नेपाल के बैंक जितनी करंसी लौटाएंगे, उतनी भारत सरकार को वापस लेनी होगी. तब तक काले धन के धंधेबाज बहती गंगा में हाथ धो चुके होंगे. नेपाल के सेंटर फॉर इकोनॉमिक एंड टेक्निकल स्टडीज़ के एक्जेक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. हरिवंश झा का कहना है कि भारत सरकार के आग्रह पर नेपाल में पहले भी पांच सौ और हजार के नोट पर प्रतिबंध लगा था. जाली नोटों का चलन रोकने के लिए भारत सरकार ने नेपाल सरकार से ऐसा करने का आग्रह किया था. भारत में नोटबंदी लागू होते ही नेपाल में उन भारतीय नोटों की आमद बेतहाशा बढ़ गई जो भारत में प्रतिबंधित किए गए थे. पांच सौ के बदले चार सौ नेपाली रुपए पर भारतीय करंसी सफेद की गई. जबकि नेपाल में भारत के सौ रुपए की कीमत 160 रुपए से अधिक है, लेकिन नोटबंदी में नेपाल में भी इससे खूब कमाई की गई. झा कहते हैं कि नेपाल में जितना प्रतिबंधित नोट जमा बताया जा रहा है वास्तविक स्थिति उससे कहीं अधिक है. नेपाल के बैंकों में भारतीय मुद्रा के 40 करोड़ रुपए पहले से डंप पड़े हुए हैं, जब वहां इन नोटों को पहले दौर में प्रतिबंधित किया गया था. नेपाल ने इसे भारत सरकार को सुपुर्द करने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उस पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई. आरबीआई के सूत्र बताते हैं कि नेपाल के बैंकों में डंप पड़े पांच सौ और हजार रुपए के प्रतिबंधित भारतीय नोटों की अदलाबदली का फार्मूला निकालने के लिए 22 फरवरी को एक उच्चस्तरीय टीम नेपाल भेजी जाने वाली थी, लेकिन वह टीम नहीं गई. नेपाल राष्ट्र बैंक भारतीय टीम की प्रतीक्षा ही करता रह गया. इससे यह सूचना पुख्ता हुई कि बचे हुए प्रतिबंधित नोटों की खेप को नेपाल में खपाने के बाद ही अब कोई आधिकारिक पहल होगी.

प्रतिबंधित नोटों की वापसी पर आरबीआई का दावा झूठा
पड़ोसी देशों के बैंकों में जिस तरह भारत की प्रतिबंधित करंसी के डंप होने की सूचनाएं मिल रही हैं, उससे यह आशंका बढ़ी है कि नोटबंदी के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने जितने नोट जमा होने का दावा किया था, वह झूठा तो नहीं था! भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने यह दावा किया था कि अवैध घोषित किए गए नोटों में 15.28 लाख करोड़ की कीमत के नोट्स वापस जमा हो चुके हैं. आरबीआई के मुताबिक जमा हुए नोट्स पांच सौ और हजार के कुल छपे नोट्स का 99 प्रतिशत हैं. फिर वे नोट्स किस प्रतिशत में शामिल होंगे जो नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, बर्मा समेत पड़ोसी देशों के बैंकों में जमा हैं, या भारत में विभिन्न छापेमारियों में बरामद हो रहे हैं? आरबीआई ने बताया था कि कुल 15 लाख 44 हजार करोड़ के पुराने नोट प्रतिबंधित किए गए थे. इनमें से 15 लाख 28 हजार करोड़ की रकम बैंकों में लौट गई. नोटबंदी के बाद पुराने 1,000 रुपए के कुल 632.6 करोड़ नोटों में से 8.9 करोड़ नोट अब तक नहीं लौटे. यानि, हजार के डिनॉमिनेशन के 8,900 करोड़ रुपए बैंक के पास वापस नहीं पहुंचे. आरबीआई के मुताबिक नोटबंदी के बाद 1,000 रुपए के 1.4 प्रतिशत नोट छोड़कर इस डिनॉमिनेशन के बाकी सभी नोट बैंकों में वापस आ गए. आरबीआई ने यह भी दावा किया था कि वर्ष 2016-17 में 7.62 लाख नकली नोटों का पता चला. इसके पहले वर्ष 2015-16 में 6.32 लाख नकली नोट पकड़े गए थे. आरबीआई के इन दावों के बरक्स आपको यह बता दें कि नोटबंदी के बाद संसद की आकलन समिति ने आरबीआई को नए सिरे से रिपोर्ट को अद्यतन कर उसे दोबारा प्रस्तुत करने की सलाह दी थी. संसदीय समिति ने यह शिकायत की थी कि आरबीआई ने पांच सौ और हजार के नोटों का ब्यौरा नहीं दिया था और नोटबंदी के बाद के हालात पर अद्यतन जानकारियां नहीं दी थीं. आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल संसदीय समिति के सामने दो बार उपस्थित हुए थे, लेकिन दोनों बार यह नहीं बता पाए कि नोटबंदी के बाद कितने प्रतिबंधित नोट बैंकों के पास वापस आए.

रिजर्व बैंक को लिंचेस्टाइन बैंक या पनामा स्कैम नहीं पता!
नेपाल और अन्य पड़ोसी देशों के बैंकों में जमा प्रतिबंधित भारतीय नोटों के बारे में रिजर्व बैंक को कुछ नहीं पता. रिजर्व बैंक को यह भी नहीं पता कि काला धन सफेद करने वाला बैंक एचएसबीसी क्या बला है और लिंचेस्टाइन, पनामा गेट, पैराडाइज स्कैम जैसे महाघोटाले क्या हैं. जब आरबीआई इतनी ‘इन्नोसेंट’ है तो भारत सरकार की मासूमियत तो और भी रिकार्डतोड़ होगी. फिर भारत सरकार को क्या पता होगा कि अनाज और दूसरे सामानों से लदे ट्रकों में छुपा कर प्रतिबंधित नोट्स नेपाल भेजे जा रहे हैं.
हम आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश और बिहार को नेपाल से जोड़ने वाले विशाल सीमा-क्षेत्र से यह गोरखधंधा खूब चल रहा है. पश्चिम बंगाल से लगने वाली नेपाल सीमा के जरिए भी यह धंधा चल रहा है, लेकिन अपेक्षाकृत कम. पश्चिम बंगाल से प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा बांग्लादेश जा रही है और वहां से जाली नोट्स भारत आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल इस आवागमन का केंद्र बना हुआ है. उधर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नगालैंड से कम मात्रा में भारतीय करंसी बर्मा जा रही है. लेकिन प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा के जाने की गति असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा से बांग्लादेश की तरफ तेज बनी हुई है. खुफिया एजेंसी के सूत्रों का कहना है कि म्यांमार के तामू और रिह बॉर्डर को मणिपुर से जोड़ने वाले मोर और मिजोरम को जोड़ने वाले जॉखथर बॉर्डर पर प्रतिबंधित भारतीय नोट्स पकड़े भी जा चुके हैं.
नेपाल, बर्मा या बांग्लादेश सीमा पर पकड़े जाने वाले प्रतिबंधित भारतीय नोट्स की तादाद कम है जबकि निकल जाने वाले नोटों की तादाद कहीं अधिक. नेपाल में जाली नोटों की बढ़त के कारण वर्ष 2011 में जब भारत सरकार ने वहां पांच सौ और हजार के नोट बैन किए थे, तभी तीन करोड़ रुपए से अधिक के भारतीय नोट जब्त किए गए थे, जबकि खातों में बाकायदा जमा किए गए प्रतिबंधित नोटों की तादाद करीब 50 करोड़ थी. यानि, पकड़ा जाना केवल दिखावा साबित हो रहा है. अभी पिछले ही दिनों नेपाल में पांच करोड़ के भारतीय नोट के साथ 15 लोग पकड़े गए थे. पकड़े गए लोगों के कहने पर काठमांडू के कालीमाटी से 29 लाख 59 हजार के भारतीय नोट के साथ कृष्णा श्रेष्ठ और काठमांडू के बूढ़ा नीलकंठ इलाके से हरियाणा निवासी किरण वर्मा उर्फ सोनी को साढ़े 50 लाख के प्रतिबंधित भारतीय नोट्स के साथ पकड़ा गया था. लेकिन छापामारी और बरामदगी करने वाले अधिकारी ही बताते हैं कि नेपाल के विभिन्न सरकारी बैंकों के माध्यम से खपाने के लिए करोड़ों के प्रतिबंधित भारतीय नोट्स स्टॉक किए गए हैं, इसमें दो-चार करोड़ रुपए की बरामदगी कुछ भी नहीं.
अब आते हैं सबसे दिलचस्प लेकिन दुखद तथ्य की तरफ. भारतीय रिजर्व बैंक ने यह आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसे काला धन सफेद करने का धंधा करने वाले हॉन्गकॉन्ग एंड शंघाई बैंकिंग कॉरपोरेशन (एचएसबीसी), लिंचेस्टाईन बैंक, पनामा-गेट, पैराडाइज जैसे महाघोटालों के बारे में कुछ भी नहीं पता. गैर-जिम्मेदार भारतीय रिजर्व बैंक के कारण ही देश का धन विजय माल्या या नीरव मोदी जैसे घोटालेबाज व्यापारियों और भ्रष्ट बैंक अधिकारियों के जरिए विदेश जा रहा है. सूचना के अधिकार के तहत संजय शर्मा द्वारा पूछे गए सवाल पर आरबीआई ने कहा है कि एचएसबीसी और लिंचेस्टाइन बैंक के काले धन को सफेद करने के कारोबार की जांच के लिए क्या कार्रवाई की गई और कार्रवाई का क्या नतीजा सामने आया इसकी उसे कोई जानकारी नहीं है. आरबीआई को यह भी नहीं पता है कि पनामा पेपर्स और पैराडाइज पेपर्स प्रकरण में कौन लोग और कौन प्रतिष्ठान लिप्त थे. देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले घोटालों और काले धन से जुड़े बड़े मामलों के बारे में आरबीआई का यह रुख वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है.

Wednesday, 28 February 2018

मोदी बनाम मोदीः चौकीदार से बड़ा चोर...

प्रभात रंजन दीन
पंजाब नेशनल बैंक घोटाले पर अखबारों में, समाचार चैनेलों पर और सोशल मीडिया पर बहुत कुछ लिखा, दिखाया और कहा जा चुका. लेकिन बातें इधर-उधर छितराई या बिखरी रह गईं. कोई सिरा कहीं गया तो कोई सिरा कहीं. पंजाब नेशनल बैंक घोटाला कहें या नीरव मोदी तिकड़ी घोटाला, इसमें कई कड़ियों को एक साथ मिला कर देखने की जरूरत है. भाजपा विरोधी राजनीतिक खेमा इसे नरेंद्र मोदी सरकार से जोड़ रहा है तो कांग्रेस विरोधी सियासी दल इसे कांग्रेस से जोड़ रहे हैं. लेकिन इस जोड़ा-जोड़ी की सियासत से अलग, तथ्यों के आधार पर हमें बिखरे हुए तमाम सिरे सामने रख कर उन्हें समग्रता से देखने की कोशिश करनी चाहिए.
केंद्र में सरकार भारतीय जनता पार्टी की है तो किसी भी घोटाले के होने या किसी भी घोटालेबाज के फरार होने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर ही आएगी, इस जिम्मेदारी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाग नहीं सकते, भले ही उनके चहेते वित्त मंत्री अरुण जेटली वास्तविकताओं के सतह पर आने से डर कर मुंह छुपाए बैठे हों. सोशल मीडिया पर इस घोटाले के प्रसंग में नरेंद्र मोदी के कई पुराने बयान वायरल हुए, मसलन, ‘भाइयो-बहनों, आप मुझे प्रधानमंत्री मत बनाएं, मुझे चौकीदार बनाएं. मैं दिल्ली जाकर चौकीदार की तरह बैठूंगा, आप मेरे जैसा चौकीदार बिठाओगे तो हिंदुस्तान की तिजोरी पर कोई पंजा नहीं पड़ने दूंगा’. ‘मैं वादा करता हूं कि चाहे कोई नया कानून बनाना पड़े या किसी अन्य देश के साथ समझौता करना पड़े, मैं कालाधन भारत वापस लाऊंगा और देश का धन भारत से बाहर नहीं जाने दूंगा’. ‘जिन लोगों ने देश को लूटा है, वे चाहे जितने भी ताकतवर हों, उन्हें देश के लोगों को जवाब देना ही होगा’. 'मैंने जो रास्‍ता चुना है, हो सकता है, इसके लिए मुझे राजनीतिक कीमत चुकानी पड़े, लेकिन मैं इससे पीछे नहीं हटूंगा. मैं इसके लिए कोई भी राजनीतिक कीमत चुकाने को तैयार हूं.' वगैरह, वगैरह...
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन बयानों का यहां प्रसंग बनता है, ताकि वे अपने बयानों से या तो इन्कार कर सकें या अब तक फेल साबित हुए अपने बयानों पर आगे खरा उतरने का फिर से संकल्प ले सकें. सत्ता में आने के बाद से जो हालात सामने आए हैं उसमें मोदी के बयानों का विरोधाभास ही देश के सामने प्रस्तुत हुआ है. ललित मोदी, विजय माल्या, पनामा गेट, नीरव मोदी और ऐसे कई माध्यमों के जरिए देश का अकूत धन विदेश चला गया और देशवासी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन सख्त बयानों की असलियत ही टटोलते रह गए. किसी व्यक्ति के विदेश भाग जाने और उसे फिर से पकड़ कर वापस लाने का मसला उतना महत्वपूर्ण नहीं है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि जो धन विदेश चला गया उसे वापस कैसे लाया जाए. केंद्र सरकार को विदेश गया धन वापस लाने और भविष्य में भारत का धन विदेश न जाने पाए उसके छेद बंद करने के उपायों पर शीघ्रता से काम करना चाहिए. अर्थ और बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की नासमझ नीतियों के कारण देश का बैंकिंग सिस्टम ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गया है, लेकिन प्रधानमंत्री इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहे. बड़े-बड़े वित्तीय घोटाले बैंकों के माध्यम से हो रहे हैं, लेकिन बैंकों की शीर्ष स्तरीय साठगांठ और मिलीभगत पर उतनी चर्चा नहीं हो रही, जितनी होनी चाहिए. मीडिया भी विजय माल्या और नीरव मोदी की फरारी पर ताबड़तोड़ लगा है, लेकिन उन बैंकों और बैंक अधिकारियों की संलिप्तता पर कुछ नहीं बोल रहा, जो घोटालों में बराबर से शरीक रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी या वित्त मंत्री जेटली भी बैंकों के भ्रष्टाचार पर चुप हैं और भ्रष्टाचार के कारण बैंकों में हो रहे घाटों की भरपाई करने के लिए देश में नोटबंदी लागू कर देते हैं. अकूत भ्रष्टाचार और घोटालों में बैंकों की आपराधिक भूमिका पर प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री की चुप्पी या तो मिलीभगत है या कोई भय... इन दो स्थितियों के अलावा कोई तीसरी स्थिति हो ही नहीं सकती. लिहाजा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को देश के सामने आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.
अखबारों और समाचार चैनेलों पर तो नहीं, लेकिन सोशल मीडिया पर नीरव मोदी के भाई नीशल मोदी की मुकेश और अनिल अम्बानी से नजदीकी रिश्तेदारी, नीरव मोदी की एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली से नजदीकी तो दूसरी तरफ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम और सोनिया के दामाद रॉबर्ड वाड्रा से करीबी के तमाम चर्चे सरगर्म हैं. इन मुद्दों पर सम्बद्ध लोगों को पब्लिक फोरम पर आकर सफाई पेश करनी ही चाहिए, लेकिन वे चुप हैं. मुकेश अम्बानी और अनिल अम्बानी को भी समाज के सामने आकर यह बताना चाहिए कि नीशल मोदी उनकी भांजी इशिता (धीरूभाई अम्बानी की बेटी दीप्ति सलगांवकर की बेटी) का पति है कि नहीं. पंजाब नेशनल बैंक के मुम्बई जोनल ऑफिस से सीबीआई को दी गई तहरीर में भी और सीबीआई की तरफ से दर्ज एफआईआर में भी नीरव मोदी के साथ-साथ उसका भाई नीशल मोदी नामजद अभियुक्त है. ऐसे में अम्बानी परिवार से सम्बन्धों को लेकर सधी चुप्पी संदेहास्पद है.
आपको यह बताते चलें कि नीरव मोदी, उसकी पत्नी अमि नीरव मोदी, भाई नीशल मोदी और मामा मेहुल चीनूभाई चोकसी की साझेदारी की तीन कंपनियों ‘डायमंड आर यूएस’, ‘सोलर एक्सपोर्ट्स’ और ‘स्टेलर डायमंड्स’ ने पंजाब नेशनल बैंक के साथ साठगांठ करके ‘लेटर ऑफ अंडरटेकिंग’ (एलओयू) के जरिए अरबों रुपए हड़प लिए. धन हड़पने का कुचक्र पिछले छह-सात वर्ष से चल रहा था. धीरे-धीरे इसकी गति बढ़ती गई. देश का धन हड़पने की स्पीड का आलम यह रहा कि महज तीन दिन में अरबों रुपए ‘सोख’ लिए गए. इसमें पंजाब नेशनल बैंक के साथ-साथ कुछ अन्य बैंकों की मिलीभगत रही. पंजाब नेशनल बैंक से सीबीआई को मिले दस्तावेज बताते हैं कि 09 फरवरी 2017 को ‘डायमंड आर यूएस’ के लिए 4415791.96 अमेरिकी डॉलर का एलओयू इलाहाबाद बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी हुआ. फिर 09 फरवरी 2017 को ही ‘सोलर एक्सपोर्ट्स’ के लिए 4335319.38 यूएस डॉलर का एलओयू इलाहाबाद बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी हो गया. 10 फरवरी 2017 को ‘डायमंड आर यूएस’ के लिए 5942017.70 यूएस डॉलर का एलओयू फिर इलाहाबाद बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी हुआ. 10 फरवरी 2017 को ही ‘सोलर एक्सपोर्ट्स’ के लिए भी 5843161.93 यूएस डॉलर का एलओयू इलाहाबाद बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी हुआ. फिर उसी दिन यानि 10 फरवरी 2017 को ही ‘स्टेलर डायमंड’ के लिए 6093321.10 यूएस डॉलर का एलओयू इलाहाबाद बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी कर दिया गया. 14 फरवरी 2017 को ‘डायमंड आर यूएस’ के लिए 5856885.00 यूएस डॉलर का एलओयू एक्सिस बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी हुआ. 14 फरवरी 2017 को ही ‘सोलर एक्सपोर्ट्स’ के लिए 5862251.03 यूएस डॉलर का एलओयू फिर से एक्सिस बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी हुआ. उसी दिन यानि 14 फरवरी 2017 को ही ‘स्टेलर डायमंड’ के लिए 5877064.00 यूएस डॉलर का एलओयू एक्सिस बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम जारी हुआ. ये सारे एलओयू पंजाब नेशनल बैंक के मुम्बई जोन के तहत ब्रैडी हाउस स्थित मिड कारपोरेट शाखा से जारी हुए.
फरवरी 2017 के महज तीन दिनों में नीरव मोदी ‘गिरोह’ के लिए पंजाब नेशनल बैंक ने इलाहाबाद बैंक और एक्सिस बैंक की हॉन्गकॉन्ग शाखा के नाम 44225812.10 अमेरिकी डॉलर का एलओयू जारी किया. एलओयू जारी होते समय एक यूएस डॉलर की कीमत करीब 70 रुपए थी. यानि, भारतीय मुद्रा में 3095806847 रुपए. इन सभी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग्स (एलओयू) का भुगतान विदेश से ऑपरेट कर रही एक्सपोर्ट्स कंपनियों ‘ऑरा जेम कंपनी लिमिटेड’, ‘साइनो ट्रेडर्स लिमिटेड’, ‘ट्राई कलर जेम्स एफजेडई’, ‘सनशाइन जेम्स लिमिटेड’, ‘युनिटी ट्रेडिंग एफजेडई’ और ‘पैसिफिक डायमंड्स एफजेडई’ ने उठा लिया. नीरव मोदी ‘गिरोह’ की कंपनियों को ‘लेटर ऑफ अंडरटेकिंग’ की सारी रकम 25 जनवरी 2018 तक क्लियर कर देनी थी, लेकिन इसके पहले ही घपले के सारे कर्ताधर्ता देश छोड़ कर जाते रहे. नीरव मोदी की पत्नी अमी नीरव मोदी पहले से अमेरिकी नागरिक है. अमी ने छह जनवरी को ही भारत छोड़ दिया. नीरव का मामा चोकसी चार जनवरी को देश छोड़ कर भाग गया था. नीरव मोदी का भाई नीशल मोदी बेल्जियम का नागरिक है. नीशल ने अमेरिका को भी अपना ठिकाना बनाया हुआ है. नीशल मोदी एक  जनवरी को ही भारत छोड़ कर भाग गया था. शातिर नीरव मोदी खेलता रहा. इस बीच वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डावोस दौरे में उद्योगपतियों के प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल रहा और उसने पंजाब नेशनल बैंक से और लेटर ऑफ अंडरटेकिंग हासिल करने की कोशिश की. लेकिन इस दरम्यान पंजाब नेशनल बैंक के मुम्बई जोन के डिप्टी जनरल मैनेजर अवनीश नेपालिया ने घोटाले का भंडाफोड़ कर दिया. अंदरूनी जांच के बाद नेपालिया ने 29 जनवरी को अपनी लिखित तहरीर सीबीआई को दी. सीबीआई मुम्बई की बैंक स्कैम एंड फाइनैंशियल क्राइम सेल के एसपी शारदा राउत ने 31 जनवरी 2018 को एफआईआर दर्ज कर औपचारिक छानबीन शुरू कर दी. एफआईआर दर्ज करने के बाद 31 जनवरी को ही सीबीआई ने अभियुक्तों के खिलाफ ‘लुक-आउट नोटिस’ जारी की, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. घोटाले की आखिरी महत्वपूर्ण कड़ी नीरव मोदी भी देश से फरार हो चुका था. सीबीआई ने अपनी पहली एफआईआर में 280 करोड़ रुपए के घोटाले का मामला दर्ज किया. पीएनबी के डिप्टी जोनल मैनेजर अवनीश नेपालिया ने भी अपनी तहरीर में 280.70 करोड़ के घपले का ही जिक्र किया था.
अब आपको उन तथ्यों की जानकारी दें जिसके बारे में आम जानकारी नहीं है. नीरव मोदी ‘गिरोह’ से जुड़ी वे कंपनियां जो विदेशों से ऑपरेट कर रही हैं, उनमें हॉन्गकॉन्ग से ऑपरेट करने वाली ‘ऑरा जेम कंपनी लिमिटेड’ महत्वपूर्ण है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके तार पनामा-गेट कांड से जुड़े हैं. ‘ऑरा जेम कंपनी लिमिटेड’ की नियंत्रक कंपनी ‘अटलांटिक सेन्सर लिमिटेड’ ने ही ‘ऑरा जेम’ को हॉन्गकॉन्ग में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ के यहां 28 मई 2010 में पंजीकृत कराया था. ‘अटलांटिक सेंसर’ टैक्स चोरों के स्वर्ग ब्रिटिश वर्जिन द्वीपसमूह और पनामा पेपर्स मनी लॉन्ड्रिंग मामले से सीधे सम्बद्ध रही है. ‘अटलांटिक सेन्सर’ ने वर्ष 2012 में ‘ऑरा जेम’ की समस्त शेयर-होल्डिंग्स दुबई के सोनू शैलेश मेहता के नाम ट्रांसफर कर दी थी. वही मेहता वर्ष 2016 तक ‘ऑरा जेम’ का इकलौता निदेशक था. बाद में हॉन्गकॉन्ग के दिव्येश कुमार गांधी को निदेशक नियुक्त किया गया. नीरव मोदी ‘गिरोह’ के एलओयू का विदेश में भुगतान उठाने वाली कंपनियों में ‘साइनो ट्रेडर्स लिमिटेड’ भी शामिल है. यह कंपनी हॉन्गकॉन्ग में 22 फरवरी 2013 को पंजीकृत (नंबर:1865307) हुई थी. इसी तरह ‘सनशाइन जेम्स लिमिटेड’ भी हॉन्गकॉन्ग के कोउलून से ऑपरेट करती है. ‘ट्राई कलर जेम्स एफजेडई’ संयुक्त अरब अमीरात के शारजाह से, ‘युनिटी ट्रेडिंग एफजेडई’ दुबई से और ‘पैसिफिक डायमंड्स एफजेडई’ अजमान से ऑपरेट करती है. विदेशों से ऑपरेट कर रही इन्हीं कंपनियों ने नीरव मोदी ‘गिरोह’ की भारत की तीन कंपनियों के लिए जारी हुए 44225812.10 अमेरिकी डॉलर के एलओयू पर भुगतान ले लिया.
यह भुगतान उठाने के बाद भी नीरव मोदी ने पंजाब नेशनल बैंक से और एलओयू जारी करने का आवेदन दिया. लेकिन पीएनबी मुम्बई के डिप्टी जोनल मैनेजर ने इसे पकड़ा और जांच के लिए भेज दिया. हालांकि जानकार बताते हैं कि भ्रष्टाचार में शरीक पीएनबी के अधिकारियों ने एलओयू जारी करने के लिए अधिक रिश्वत देने की मांग शुरू कर दी थी. अधिक रिश्वत देने से नीरव मोदी के मना करने पर पीएनबी ने एलओयू जारी नहीं किया ओर वर्षों से चल रहा यह कुचक्र अचानक थम गया. इसके थमते ही एक विदेशी बैंक ने हांगकांग की नियामक एजेंसी के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक को भी इसकी सूचना भेज दी. इस तरह मामला खुल गया और रिजर्व बैंक द्वारा पूछने पर पंजाब नेशनल बैंक को मामले की अंदरूनी जांच कराने और सीबीआई में प्राथमिकी दर्ज कराने पर विवश होना पड़ा. तब यह भी भेद खुला कि एलओयू कांड में पंजाब नेशनल बैंक के साथ-साथ भारतीय स्टेट बैंक, इलाहाबाद बैंक, एक्सिस बैंक, यूनियन बैंक भी लिप्त हैं. भारतीय स्टेट बैंक के बाद पंजाब नेशनल बैंक ही देश का दूसरा सबसे बड़ा राष्ट्रीयकृत बैंक है. आधिकारिक तौर पर जो रकम घोटाले की बताई जा रही है वह 11,330 करोड़ रुपए यानि 1.8 अरब डॉलर है. वर्ष 2017 में पंजाब नेशनल बैंक की कुल आय 1320 करोड़ रुपए थी. साफ है कि घोटाले की रकम पीएनबी की सालाना आय से आठ गुना अधिक है. यही वजह है कि घोटाला उजागर होते ही शेयर बाजार में पंजाब नेशनल बैंक का शेयर धड़ाम हो गया और दूसरे बैंकों के शेयर भी अधर में झूलते रहे. जानकार बताते हैं कि भारत में हीरे और हीरे के जेवरात का व्यापार 70 हजार करोड़ रुपए से अधिक का है. इस व्यापार का मुख्य केंद्र गुजरात का सूरत और महाराष्ट्र का मुम्बई है. पूंजी-केंद्रित इस व्यापार में देश की छह बड़ी हस्तियों के नाम हैं, जिनमें से दो नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के चेहरे से पर्दा हट चुका है. कुछ अन्य की बारी भी आने वाली है. नीरव मोदी ज्वेलरी डिजाइनर भी था और ढाई अरब डॉलर की कंपनी ‘फायर-स्टार डायमंड’ का मालिक भी. नीरव मोदी का नाम वर्ष 2013 में फोर्ब्स की भारतीय अरबपतियों की सूची में शामिल हो गया था और उसे देश के सबसे रईस लोगों की कतार में 46वां स्थान प्राप्त हुआ था. एलओयू घोटाले के दूसरे अभियुक्त नीरव मोदी का ‘शकुनी’ मामा मेहुल चीनूभाई चोकसी नक्षत्र, संगिनी रश्मि जैसे जेवर बनाने वाली कंपनी ‘गीतांजलि जेम्स’ का मालिक है. चोकसी घपलेबाजी में मास्टर-माइंड रहा है, सेबी ने भी इसकी कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की थी. जनवरी 2017 में आयकर विभाग ने नीरव मोदी के घर और उसके करीब 50 ठिकानों पर छापेमारी की थी. उन्हीं दिनों नीरव के चोकसी मामा के भी ठिकानों पर आयकर का छापा पड़ा था. लेकिन विडंबना देखिए कि आयकर विभाग की उस कार्रवाई के अगले ही महीने इस तिकड़ी ने पंजाब नेशनल बैंक के जरिए अरबों रुपए उड़ा लिए. एलओयू का खेल भाजपा के लिए भी जाना बूझा हुआ है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेटे अप्रत्याशित अकूत सम्पत्ति के मालिक जय शाह को भी एक प्राइवेट वित्तीय कम्पनी ने लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किया था.
बहरहाल, नीरव मोदी घोटाला प्रकरण में कुछ सवाल अनछुए या अनुत्तरित ही रह गए. किसी भी बैंक द्वारा जारी होने वाले ‘लेटर ऑफ अंडरटेकिंग्स’ की जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक को दी जाती है. वर्ष 2011 में ही पंजाब नेशनल बैंक की ओर से पहला एलओयू जारी हुआ, लेकिन उसे ‘कोर बैंकिंग सिस्टम’ (सीबीएस) में दर्ज क्यों नहीं किया गया? पीएनबी के शीर्ष प्रबंधन ने इस गंभीर खामी पर ध्यान क्यों नहीं दिया? भारतीय रिजर्व बैंक ने इस आपराधिक कोताही पर कार्रवाई क्यों नहीं की? ‘सोसाइटी फॉर दि वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनैंशियल टेलीकम्युनिकेशन’ (स्विफ्ट) कोड के जरिए विदेशी बैंकों से हो रहे लेनदेन को मॉनीटर क्यों नहीं किया जा रहा था? पंजाब नेशनल बैंक के विदेशी मुद्रा विनिमय विभाग (फॉरेन एक्सचेंज डिपार्टमेंट) ने शीर्ष अधिकारियों को इस बारे में त्वरित रूप से अलर्ट क्यों नहीं किया? कहीं ऐसा तो नहीं पीएनबी के शीर्ष प्रबंधन स्तर से ही इस मसले पर चुप्पी साधे रहने के निर्देश दिए गए थे? पंजाब नेशनल बैंक प्रबंधन अब यह कह रहा है कि बैंक के कुछ भ्रष्ट अफसरों ने अनधिकृत रूप से ‘स्विफ्ट-कोड’ के जरिए साढ़े ग्यारह हजार करोड़ रुपए विदेश भेज दिए. बैंक के शीर्ष प्रबंधन के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि ऐसे संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर अलर्ट संदेश जारी करने और ‘कोर-बैंकिंग सिस्टम’ में इसे दर्ज करने के अनिवार्य नियम का पालन क्यों नहीं किया गया? आधा दशक से भी अधिक समय से हो रही घपलेबाजी के प्रति आपराधिक अनदेखी के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? पंजाब नेशनल बैंक की तरफ से जारी अरबों डॉलर के एलओयू प्राप्त करने वाली इलाहाबाद बैंक या एक्सिस बैंक की विदेशी शाखाओं ने जारी एलओयू की पुष्टि के लिए ‘लेटर ऑफ कन्फर्मेशन’ भेजा था कि नहीं? अगर भेजा था तब पीएनबी प्रबंधन ने क्या कार्रवाई की? अगर नहीं भेजा तब पीएनबी प्रबंधन ने इस पर क्या कार्रवाई की? स्पष्ट है कि नीरव मोदी ‘गिरोह’ का घोटाला पंजाब नेशनल बैंक प्रबंधन के साथ-साथ अन्य सम्बद्ध बैंकों की मिलीभगत से चल रहा था.

चौकसी में फेल और कार्रवाई में नाकारा साबित हुआ सरकार का तंत्र
केंद्र सरकार का तंत्र घोटालेबाजों पर चौकसी बरतने में फेल हो गया और सारे अभियुक्त बड़े आराम से फरार हो गए. अभियुक्तों के विदेश भाग जाने के कारण कानूनी कार्रवाइयों की औपचारिकता बिल्कुल आधी रह गईं. सरकारी तंत्र के नाकारेपन की स्थिति अब यह है कि प्रवर्तन निदेशालय (इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट) सम्मन जारी करता है और अभियुक्त उसे इन्कार करके वापस भेज देता है. नीरव मोदी ‘गिरोह’ ने भी निदेशालय के समक्ष हाजिर होने से इन्कार कर दिया है. यही हाल विदेश मंत्रालय का भी है. विदेश मंत्रालय ने भी नीरव मोदी ‘गिरोह’ को नोटिस भेजने की औपचारिकता निभाई है और जवाब का इंतजार कर रहा है. विदेश मंत्रालय ने भगोड़े अभियुक्तों का अब तक पासपोर्ट भी रद्द नहीं कर पाया है. मंत्रालय का अजीबोगरीब तर्क है कि नीरव मोदी ‘गिरोह’ की तरफ से जवाब मिलने के बाद उस हिसाब से कार्रवाई की जाएगी. मंत्रालय जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ तब उसका पासपोर्ट रद्द किया जाएगा. विदेश मंत्रालय का यह रुख बताता है कि वह जवाब मिलने के पहले से ही संतुष्ट है. उधर, प्रवर्तन निदेशालय ने कहा कि नीरव मोदी घोटाला मामले में अब तक 5,826 करोड़ रुपए की सम्पत्ति व अन्य कीमती सामान जब्त किए गए हैं. प्रवर्तन निदेशालय ने नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के 94.52 करोड़ रुपए कीमत के म्युचुअल फंड्स और शेयर भी जब्त किए हैं. इनमें से 86.72 करोड़ रुपए के म्युचुअल फंड्स और शेयर चोकसी के और 7.80 करोड़ रुपए फंड्स और शेयर के नीरव मोदी के हैं.
प्रवर्तन निदेशालय ने नीरव मोदी की नौ लग्जरी कारें भी जब्त की हैं. इन कारों में एक रॉल्स रॉयस घोस्ट, एक मर्सिडीज बेंज, एक पोर्श पनामेरा, होंडा की तीन कारें, एक टोयोटा फॉर्चुनर और एक इनोवा शामिल है. सीबीआई इस मामले की जांच कर ही रही है. सीबीआई की दूसरी एफआईआर में गीतांजलि ग्रुप की तीन कंपनियों के नाम शामिल किए गए हैं.

कई नेता हैं नीरव मोदी ‘गिरोह’ के ‘मनी-ट्रैप’ में
पीएनबी घोटाले से जैसे-जैसे परतें हट रही हैं, वैसे-वैसे कई राजनीतिक दलों के लोगों से नीरव मोदी ‘गिरोह’ के जुड़े होने की बातें सामने आ रही हैं. लेकिन दोनों ओर से प्रवक्ताओं के आरोप-प्रत्यारोपों की आड़ लेकर संदर्भित नेता शातिराना चुप्पी साधे बैठे हैं. नीरव मोदी ‘गिरोह’ की जिन डेढ़ सौ शेल कंपनियों का पता चल रहा है उनमें से कई कंपनियां एक नव-सत्ताधारी राजनीतिक दल से जुड़ी बताई गई हैं. जानकार बताते हैं कि शेल कंपनियों का इस्तेमाल कालेधन को खपाने के लिए किया जाता है. वर्ष 2010 से 2014 के बीच पीएनबी और केनरा बैंक ने मिल कर ऐसी ही एक कंपनी को 5,86,50,00,000 रुपए का लोन दिया था. इस कंपनी के निदेशक उसी नव-सत्ताधारी राजनीतिक दल को दो करोड़ रुपए का चंदा देने के मामले में सुर्खियों में आए थे. दो सौ करोड़ में एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के लिए आलीशान घर खरीदने में नीरव मोदी का नाम पहले से आयकर नेट पर है. कुख्यात हथियार डीलर अदनान खशोगी के खास हसन अली खान से नीरव मोदी की नजदीकियां और स्विट्ज़रलैंड के बैंक अकाउंट जमा कराए गए 48 करोड़ रुपए का रहस्य भी अब खुलने ही वाला है. प्रवर्तन निदेशालय के सूत्र बताते हैं कि एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के दुबई के बैंक खाते में जमा कराए गए 14.5 करोड़ रुपए की भी जांच की जा रही है. एक नेता की पत्नी तो नीरव मोदी की कंपनी में डायरेक्टर तक रही हैं.

आरबीआई का फरमानः अगर बैंक डूबा तो आपका पैसा भी डूबा
पंजाब नेशनल बैंक महाघोटाले के बाद इसकी भरपाई करने में पीएनबी समेत सभी सम्बद्ध बैंकों की हालत खराब हो जाएगी. अगर केंद्र सरकार ने ‘बेलआउट-पैकेज’ देने से मना कर दिया तो बैंकों में जमा आम ग्राहकों के पैसे पर आफत आ सकती है. भारतीय रिजर्व बैंक का नया नियम भी कहता है कि बैंक डूब गया तो उसमें जमा आपका पैसा भी डूब गया. बैंक में आपका करोड़ रुपया भी जमा हो और अगर बैंक डूब जाए तो आपको केवल एक लाख रुपए ही प्राप्त होंगे, बाकी रकम डूब जाएगी. इसी अंधेरगर्दी की तरफ हम तेजी से बढ़ रहे हैं. रिजर्व बैंक ने जमाकर्ताओं को उनके जमा धन पर मिलने वाले इन्श्योरेंस कवर को लेकर कुछ नियम बनाए हैं. डिपॉजिट इन्श्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (डीआईसीजीसी) के नाम से बने इस नियम के अनुसार बैंकों में आपके द्वारा जमा किए गए रकम में से केवल एक लाख रुपए का इन्श्योरेंस कवर है. यह कवर सभी तरह के खातों पर लागू होगा. आरबीआई की वेबसाइट पर भी यह नियम प्रदर्शित है.

पहले ही वायरल हो गया था नीरव मोदी की ‘फरारी’ वाला विज्ञापन!
हजारों करोड़ का घोटाला करने वाले नीरव मोदी ‘गिरोह’ का एक विज्ञापन आजकल चर्चा में है. इस विज्ञापन में फिल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा हैं. इस विज्ञापन के जरिए काफी पहले ही फरारी-गाथा रचे जाने का संकेत दे दिया गया था. हीरे के जेवरात से सम्बन्धित विज्ञापन में प्रियंका चोपड़ा सिद्धार्थ मल्होत्रा को बता रही हैं कि उनका एक जानने वाला शख्स बैंक से बड़ा लोन लेकर देश छोड़कर भाग गया है. यह विज्ञापन सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है. कहते हैं कि नीरव मोदी ने इस विज्ञापन को खुद ही यू-ट्यूब पर भी अपलोड किया था. दूसरी तरफ कुछ फिल्म अभिनेत्रियों ने नीरव मोदी ‘गिरोह’ पर धोखाधड़ी करने का भी आरोप लगाया है. फिल्म अभिनेत्री कंगना रानावत और विपाशा बसु ने नीरव मोदी के रिश्तेदार और जूलरी ब्रांड के मालिक मेहुल चोकसी पर बकाया भुगतान न करने और कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने का आरोप लगाया है. कंगना रानावत को मेहुल की कंपनी से पैसे मिलने बाकी थे, जबकि बॉन्ड पूरा हो चुका था. विपाशा बसु ने कहा है कि वे चोकसी से जुड़े एक ब्रैंड को प्रमोट करने का काम करती थीं. करार की अवधि पूरी होने के बाद विपाशा के मैनेजर ने चोकसी को विपाशा की फोटो का इस्तेमाल बंद करने की सलाह दी, लेकिन चोकसी विपाशा की फोटो अपने ब्रांड प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करते रहे पर उन्हें दूसरा कॉन्ट्रैक्ट नहीं दिया.

बैंकों के एनपीए घोटाले की अनदेखी कर रही सरकार
बैंकिंग सेक्टर से जुड़े संगठन बैंकों के डूबे हुए कर्ज यानि ‘नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट’ (एनपीए) के खिलाफ लगातार आंदोलन चला रहे हैं. उन संगठनों और बैंकिंग विशेषज्ञों का भी मानना है कि एनपीए बैंकों के घोटालों में लिप्त होने का परिणाम है. लेकिन केंद्र सरकार इस अकूत घोटाले की लगातार अनदेखी कर रही है. विजय माल्या से लेकर नीरव मोदी समेत तमाम पूंजीपशुओं के ऋण लेकर भाग जाने की घटनाएं सीधे तौर पर बैंकों की मिलीभगत की तरफ इशारा करती हैं, लेकिन सरकार बैंकों के खिलाफ कार्रवाई करने से कन्नी काट रही है. अगर ठीक से जांच हो जाए तो बैंकों का एनपीए घोटाला ही अकेले एक लाख करोड़ से अधिक का घोटाला साबित होगा.

बैंक हैं घोटालेबाज, प्रमाण के बावजूद कार्रवाई नहीं करती केंद्र सरकार
भ्रष्टाचार और वित्तीय घोटालों में बैंकों के लिप्त होने के प्रमाण सरकार के हाथ में हैं, लेकिन सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही. सरकार में शामिल मंत्रियों, नेताओं और नौकरशाहों के इसमें लिप्त रहने के कारण कार्रवाई कती संभव नहीं. इस संदर्भ में आपको यह बता दें कि नोटबंदी लागू होने के एक महीने पहले यह आधिकारिक तौर पर खुलासा हुआ था विभिन्न बैंकों के जरिए बहुत बड़ी तादाद में काले धन का ट्रांजैक्शन हो रहा है. विभिन्न बैंक पैन नंबर दर्ज किए बगैर करोड़ों और अरबों रुपए का लेन-देन कर रहे हैं. इस तरह के सात लाख बड़े व सामूहिक लेन-देन (क्लस्टर ट्रांजैक्शन) से सम्बन्धित लोगों को नोटिसें भेजी गई थीं, लेकिन उनमें से छह लाख 90 हजार नोटिसें ‘एड्रेसी नॉट फाउंड’ लिख कर वापस आ गईं. यानि, सात लाख बड़े ट्रांजैक्शंस में जो पते लिखाए गए थे, उन पतों पर कोई मिला ही नहीं. न नाम का पता चला, न पते पर कोई पाया गया और न उनके केवाईसी (नो योर कस्टमर) का कोई ब्यौरा मिला. 90 लाख बैंक ट्रांजैक्शन पैन नंबर के बगैर हुए, जिनमें 14 लाख बड़े (हाई वैल्यू) ट्रांजैक्शन हैं और सात लाख बड़े जोखिम वाले (हाई-रिस्क) ट्रांजैक्शन हैं. इन्हीं सात लाख ट्रांजैक्शन के सिलसिले में नोटिसें जारी हुई थीं, जो लौट कर वापस आ गईं. यह बैंकों के घोटाले में शामिल होने का आधिकारिक प्रमाण था, लेकिन केंद्र सरकार ने बैंकों पर कार्रवाई करने के बजाय उस खाई को पाटने के लिए नोटबंदी का फरमान जारी कर दिया.
सरकार को आधिकारिक तौर पर पता चल गया है कि विभिन्न बैंकों के माध्यम से काले धन का ट्रांजैक्शन धड़ल्ले से हो रहा है, लेकिन केंद्र सरकार बैंकों की करतूतों पर पर्दा डालने का काम कर रही है. वित्त मंत्रालय के एक आला अधिकारी ने कहा कि करोड़ों और अरबों रुपए के लेन-देन में बैंकों द्वारा पैन नंबर की अनिवार्यता का ध्यान नहीं रखा जाना और केवाईसी नॉर्म्स का पालन नहीं किया जाना साफ तौर पर घोटालों में बैंकों की मिलीभगत का प्रमाण है. तकनीकी व्यवस्था है कि एक वर्ष की अवधि में भी अगर 10 लाख रुपए डिपॉजिट हुए या लेन-देन हुआ तो वह फाइनैंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (वित्तीय खुफिया इकाई) के समक्ष खुद ब खुद फ्लैश करने लगेगा. लेकिन वह फ्लैश नहीं हुआ. इससे स्पष्ट हो गया कि बैंक केवाईसी नियमों और पैन नंबर इंट्री के नियम का पालन नहीं कर रहा है. आयकर विभाग के अनुसंधान अधिकारी कहते हैं कि बैंक के माध्यम से हो रहा नॉन पैन ट्रांजेक्शन काले धन को सफेद करने के धंधे (मनी लॉन्ड्रिंग) का प्रमुख जरिया बना हुआ है. पैन नंबर दर्ज किए बगैर होने वाले लेन-देन के लिए सीधे तौर पर बैंक दोषी हैं, फिर भी कुछ मामूली अफसरों की गर्दन नापने के सिवा बैंकों के शीर्ष प्रबंधन पर इसका कोई दायित्व तय नहीं होता. प्रवर्तन निदेशालय के एक अधिकारी ने कहा कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस लाना संभव नहीं है क्योंकि इसमें बड़े नेता, बड़े नौकरशाह, बड़े उद्योगपति और बड़े सामर्थ्यवान दलाल शामिल हैं. काला धन जमा करने का सबसे बड़ा स्रोत देश स्विट्जरलैंड के बैंकों में खाता खोलने की न्यूनतम राशि ही 50 करोड़ डॉलर होती है. इससे भारत से काला धन ले जाने वालों की औकात का अंदाजा लगाया जा सकता है. हवाला के जरिए देश का धन बेतहाशा दूसरे देशों में जा रहा है. फेमा (फॉरेन एक्सचेंज मेंटेनेंस एक्ट) आने से हवाला का धंधा करने वालों पर फेरा (फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट) जैसे सख्त कानून का भी खौफ नहीं रहा. शुरुआती दौर में स्विस बैंक एसोसिएशन ने कहा था कि गोपनीय खातों में भारत के लोगों की 1,456 अरब डॉलर की राशि जमा है. लेकिन भारत सरकार ने इसे हासिल करने की कोई कारगर पहल नहीं की. बताया जाता है कि भारतीय मुद्रा में 300 लाख करोड़ रुपए का काला धन अकेले स्विस बैंकों में जमा है. उस समय एक आकलन भी आया था कि उक्त राशि भारत को वापस मिल जाए तो देश के प्रत्येक जिले को 50,000 करोड़ रुपए मिल जाएंगे. लेकिन विजय माल्या से लेकर नीरव मोदी प्रकरण ने आम लोगों की इस उम्मीद को धुआं धुआं कर दिया. प्रवर्तन निदेशालय के एक आला अधिकारी ने बताया कि नोटबंदी के बाद बैंकों के अधिकारियों ने काला धन सफेद करने के एवज में अंधाधुंध कमाई की. बैंक अधिकारी भी मालामाल हो गए और काला धन के जमाखोर भी 30 प्रतिशत कमीशन देकर रुपए बटोर ले गए. आम नागरिक एटीएम और बैंक काउंटर की लंबी कतार में लग कर अपनी ईमानदारी से कमाई रकम लेने के चिरौरियां करता रहा और अपमानित होता रहा.

देश छोड़ कर नहीं भागे ‘पान-पराग फेम’ विक्रम कोठारी, बाप-बेटे गिरफ्तार
पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के उजागर होने के दरम्यान ही यूपी के कानपुर में पांच हजार करोड़ का बैंकिंग घोटाला सामने आ गया. इस घोटाले के तार कानपुर के प्रसिद्ध ‘पान-पराग’ फेम उद्योगपति विक्रम कोठारी से जुड़े हैं. हालांकि पारिवारिक बंटवारे के बाद विक्रम कोठारी के हिस्से में रोटोमैक ग्लोबल कंपनी आई, लेकिन इसके बाद भी कोठारी ‘पान-पराग’ से ही मशहूर हैं. रोटोमैक कम्पनी के विस्तार के लिए विक्रम कोठारी ने पांच हजार करोड़ से अधिक बैंक लोन लिया था. बैंकों ने रोटोमैक के घाटे की अनदेखी कर कोठारी को अंधाधुंध लोन दिया, लेकिन भुगतान के वक्त कोठारी भाग खड़े हुए. अब विक्रम कोठारी की कंपनी पर ताला लगा है. बैंकों ने कोठारी पर मुकदमा कर रखा है और कोठारी ने बैंकों पर. इस गुत्थी को कानूनी पेंचों में उलझा कर कोठारी देनदारी से बचने की जुगत लगा रहे हैं.
विक्रम कोठारी को लोन देने वाले पांच बड़े बैंकों में इंडियन ओवरसीज़ बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनियन बैंक और इलाहाबाद बैंक के नाम सामने आ चुके हैं. इसमें इंडियन ओवरसीज बैंक ने कोठारी की बीमारू कंपनी को 1400 करोड़ रुपए का लोन दे दिया. बैंक ऑफ इंडिया ने 1395 करोड़ का लोन दिया. बैंक ऑफ बड़ौदा ने 600 करोड़ रुपए का लोन दिया. यूनियन बैंक ने 485 करोड़ रुपए का लोन दिया और इलाहाबाद बैंक ने 352 करोड़ रुपए का लोन दिया. कानपुर के मशहूर व्यापारी विक्रम कोठारी पान पराग समूह से जुड़े रहे हैं. 18 अगस्त 1973 को मनसुख भाई कोठारी ने पान पराग का उत्पादन शुरू किया था. सन् 1983 से 1987 के बीच ‘पान पराग’  सबसे बड़ी विज्ञापनदाता कंपनी बन गई. मनसुख भाई कोठारी की मृत्यु के बाद उनके बेटे दीपक कोठारी और विक्रम कोठारी में बंटवारा हो गया. विक्रम कोठारी के हिस्से में कलम बनाने वाली कंपनी ‘रोटोमैक’ आई. प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता सलमान खान कभी ‘रोटोमैक’ कंपनी के ब्रैंड अम्बैसेडर हुआ करते थे. सलमान ने ‘रोटोमैक’ पेन के लिए काफी विज्ञापन भी किए. कभी इस कंपनी ने काफी मुनाफा कमाया. लेकिन आज यह घाटे के कारण बंदी के कगार पर है. विक्रम कोठारी को डिफॉल्टर घोषित किया जा चुका है. उन पर 600 करोड़ का चेक बाउंस होने का भी केस दर्ज है. लेकिन तमाम आशंकाओं के बावजूद विक्रम कोठारी देश छोड़ कर नहीं भागे और आखिरकार विक्रम कोठारी और उनके बेटे राहुल कोठारी को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया. कोठारी परिवार पर कुल 3,700 करोड़ रुपए का लोन हड़पने का आरोप है.

Wednesday, 21 February 2018

इन्वेस्टर्स समिट लखनऊ... मंच से प्रपंच

प्रभात रंजन दीन
लखनऊ में 'इन्वेस्टर्स समिट' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश के गन्ना, आलू, धान, गेहूं, सब्जियों और फल के रिकॉर्ड उत्पादन पर गर्व जताते हुए उद्योगपतियों को यूपी में पैसा लगाने के लिए लुभा रहे थे. उस समय इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के आलीशान सभागार में बैठे-बैठे मुझे फ्लैशबैक में विधानसभा के सामने गन्ना जलाते किसानों की तस्वीरें दिख रही थीं और मुख्यमंत्री के घर के सामने बिखरे और कुचले हुए आलू का दर्दनाक मंजर दिखाई दे रहा था. मंच से गर्वोक्ति का ऐसा प्रपंच किसानों के साथ-साथ उनकी पीड़ा समझने वाले संजीदा लोगों को गहरे आक्रोश से भरता है, तन और मन को अंदर तक दहकाता है. किसानों को हम उनकी फसलों की लागत तो दे नहीं पाते और बड़ी-बड़ी बातें बोल-बोल कर उद्योगपतियों को लुभाते हैं...
मंचों से ऐसी ‘ऊंची’ बोलियां अभी और तेज होंगी... अब तो फिर लोकसभा चुनाव आने वाला है. अभी पिछले ही साल तो विधानसभा का चुनाव बीता है. इस बीच भी कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. यानि चुनाव चुनाव चुनाव.... सत्तर साल से हम केवल चुनाव ही देखते रह गए. अब तो नेता पर चुनाव का खुमार देखते ही मगज पर बुखार चढ़ जाता है. यह बुखार पूरी जन-जमात तक पहुंचे, यही कामना है, जबरदस्ती थोड़े ही है. यह जो मैं लिख रहा हूं उसमें गद्य भी है, पद्य भी है, कविता भी है और अकविता भी... सब गड्डमड्ड, भारतीय लोकतंत्र जैसा. है तो बहुत ही अजीब मेरा यह सोचना. लेकिन आज के प्रसंग में बहुत ही वाजिब और सटीक है. चूकी यह बहुत ही वाजिब और सटीक है, इसीलिए बहुत ही अजीबोगरीब है...

...कि मैं मरे हुए गन्ने और सड़क पर फेंकी गई फसलों की लाशें ढो रहा हूं,
कि मैं सियासत के गंदे पैरों से कुचली गई खेतों की मेड़ों को नमामि-गंगे से धोने का जतन कर रहा हूं,
कि मैं उन खेतों में नाखून से हल चला कर लोकतंत्र के बीज बोने की कोशिश कर रहा हूं,
अजीब तो हूं ही मैं...

कि मेरी भृकुटियां बगावत करती हैं,
कि मेरे नथुने राष्ट्र-समाज को नष्ट करने वाले नेताओं को देख कर फड़कने लगते हैं,
कि मेरे पैने नाखून खेत कोड़ना छोड़ कर मुंह नोचने के लिए उद्धत होने लगते हैं,
कि नेताओं के चेहरे और चोंचले मेरी आंखों के आगे जादू नहीं जगाते, असली और खौफनाक दिखते हैं,
कि जब भी फर्जी लोकतंत्र के बेमानी मतदान का वक्त आता है,
तो अपने ही खिलाफ मैं आंदोलन के लिए निकल पड़ता हूं,
अपने ही मत और अपने ही अधिकार के खिलाफ खड़ा हो जाता हूं,
मत का मतलब और अधिकार के औचित्य पर सवाल उठाने लगता हूं,
अजीबोगरीब तो हूं ही मैं.

मेरे उपजाए गन्ने से उनके जीवन में शक्कर की सुरसुराहट हो..!
मेरे खेत की सब्जियां कौड़ियों में उखड़ जाएं, उनकी बेशकीमती प्लेटों में वेश्या की तरह सज जाएं..!
मेरे खेत का अनाज उनके दलाल-स्टोर में बंधक बन जाए, उनकी कमाई, हमारी गंवाई का जरिया बन जाए..!
हमारी फसलें उनके पेट में पकें, हमारे पेट लोहार की धधकती भट्ठी की तरह तपें..!
हमारे पशुओं का दूध उनकी नस्लों को सुधारे, हमारी नस्लें स्वर्ग सिधारे..!
हम अपनी कसी मुट्ठियों में बंद वोट के बारूद से कब फाड़ेंगे छद्म-लोकतंत्र का फर्जी अंतरिक्ष..!
कब पूरा होगा अपनी जगती आंखों का सपना, तमाशबीन बन कर कब तक यूं ही होगा तकना..!
कहते हैं कि बसंत आ चुका है और होली आने वाली है...
होली जब भी आए, होलिका की आग भीतर चटख-चटख कर लगातार दहक रही है.
काश ऐसा हो कि नेता गांवों में वोट मांगने निकले तो बिन जुते खेतों में दफ्न अनाज की लाशें
अचानक एक साथ उठ खड़ी हों,
जले हुए गन्ने की आत्माएं एक साथ अचानक हुंकार कर उठें,
कि नेता राजनीति ही नहीं अपनी नस्ल तक भूल जाए.
ऐसा ही सोचता हूं, ऐसा ही मनाता हूं, अजीब और गरीब तो हूं ही मैं...

Thursday, 15 February 2018

यह बच्चों की सुनियोजित हत्या है...

प्रभात रंजन दीन
नवजात शिशुओं की कोमल देह पर सूरजमुखी का तेल घिस कर सैकड़ों शिशुओं को मार डाला गया. अनगिनत बच्चे बुरी तरह जख्मी हुए. जो शिशु बच गए उनके शरीर पर बड़े-बड़े घाव निकल आए. उनकी कोमल त्वचा फटने लगी और वे घातक संक्रमण का शिकार हुए. आप उन बच्चों की तस्वीरें देखेंगे तो आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे और आपके मन में स्वाभाविक मानवीय सवाल उठेंगे कि वे पाशविक और बर्बर तत्व कौन थे जिन्होंने नवजात शिशुओं के साथ ऐसी आपराधिक हरकत की? तो आप इसका जवाब भी सुन लें. नवजात शिशुओं पर सूरजमुखी का तेल घिस कर उन्हें मार डालने के पाशविक दुष्प्रयोग में केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की उत्तर प्रदेश इकाई, एक एनजीओ कम्युनिटी इम्पावरमेंट लैब और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की तिकड़ी शरीक है. इसके पीछे गेट्स फाउंडेशन की अकूत फंडिंग है, जिसे चाटने के लिए सरकार से लेकर नौकरशाह और धंधेबाज संस्थाएं अपने ही देश के बच्चों और मांओं को खतरनाक रसायनों को परखने का उपकरण बना देते हैं. दुष्प्रयोगों के बाद सरकार और संस्थाएं सब भाग खड़ी होती हैं और भुक्तभोगी दर्दनाक मौत झेलने के लिए छोड़ दिए जाते हैं. शीर्ष अदालतें भी ऐसे अमानवीय दुष्प्रयोगों पर संदेहास्पद कन्नी काट लेती हैं. ऐसा ही नवजात शिशुओं की दर्दनाक मौत के मसले में भी हुआ. मीडिया के चारित्रिक स्खलन की तो कोई सीमा ही नहीं. सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे भी वही उछाले जाते हैं जिनमें मीडिया का अपना राजनीतिक पूर्वाग्रह और आर्थिक आग्रह होता है. उत्तर प्रदेश में महज डेढ़ साल में सौ से अधिक नवजात शिशुओं की मौत पर मीडिया ने शातिराना उपेक्षा बरती. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में 50-60 बच्चों की मौत का मसला भी इसलिए उठा कि उसके पीछे राजनीतिक हित सध रहा था और सरकार उसे सही तरीके से ‘मैनेज’ नहीं कर पाई. घटना के विस्तार में जाएंगे, उसके पहले यह बताते चलें कि जिन दो जिलों में नवजात शिशुओं के मरने और बुरी तरह जख्मी होने की भयावह घटना घटी, वहां के लोग कहते हैं कि मरने वाले शिशुओं की तादाद चार सौ से कम नहीं है. हमने सौ शिशुओं की मौत का जिक्र इसलिए किया कि यह आंकड़ा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने औपचारिक तौर पर पेश हो चुका है. उदाहरण के बतौर हम आपके समक्ष 10 नवजात शिशुओं की मौत का ब्यौरा पेश करेंगे और इतने ही जख्मी बच्चों के बारे में बताएंगे. ‘चौथी दुनिया’ के पास अमेठी और रायबरेली के विभिन्न गांवों के ऐसे कई भुक्तभोगी परिवारों के रिकॉर्डेड बयान भी हैं जो उनके नवजात शिशुओं पर तेल घिसे जाने की त्रासद घटना का पर्दाफाश करते हैं.
आपने देखा ही कि किस तरह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ साठगांठ कर देश के 145 जिलों में जन्म-दर कम करने के लिए ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं को ‘डिम्पा’ इंजेक्शन चुभोने का अभियान चला रखा है. ‘डिपो मेड्रॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एसीटेट’ (डिम्पा) दवा खूंखार यौन अपराधियों की यौन ग्रंथी नष्ट करने की सजा (केमिकल कैस्ट्रेशन) में इस्तेमाल की जाती है. ‘चौथी दुनिया’ ने पिछले दो अंकों में केंद्र सरकार की इस करतूत का सिलसिलेवार और तथ्यवार पर्दाफाश किया, लेकिन सरकार ने इस अमानवीय आपराधिक अभियान को वापस नहीं लिया. इस प्रसंग में भी मीडिया ने शातिराना चुप्पी साधे रखी. समाचार चैनल न्यूज-24 ने खबर उठाई भी तो उसे आखिर में झूठा बता दिया. ‘चौथी दुनिया’ ने अपने पिछले अंक में न्यूज-24 के उस कृत्य को भी प्रामाणिकता के साथ ‘एक्सपोज़’ किया.
नवजात शिशुओं पर सूरजमुखी का तेल घिसने का दुष्प्रयोग ‘डिम्पा-अभियान’ के पहले किया गया. इसके लिए उत्तर प्रदेश के दो जिले अमेठी और रायबरेली चुने गए थे. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की फंडिंग पर चलने वाली योजना नवजात शिशुओं के शरीर पर सूरजमुखी का तेल घिसने की थी. कहा गया कि नवजात शिशुओं की मृत्यु-दर कम करने के लिए शिशुओं की देह पर सूरजमुखी का तेल मला जाएगा. लेकिन असलियत में इसके पीछे का इरादा नवजात शिशु मृत्यु-दर कम करना नहीं, बल्कि शिशुओं के शरीर पर ‘कोल्ड प्रेस्ड सनफ्लावर सीड ऑयल’ घिस कर उसका असर देखना था. यह सबगेट्स फाउंडेशन के इशारे पर हो रहा था और उसके लिए जरिया बना केंद्र सरकार का राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और लखनऊ की एक गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) कम्युनिटी इम्पावरमेंट लैब. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की उत्तर प्रदेश इकाई के तत्कालीन निदेशक अमित कुमार घोष ने इस आपराधिक कृत्य में एनजीओ को मदद पहुंचाने का बीड़ा उठाया और अमेठी और रायबरेली के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को बाकायदा लिखित आदेश (एसपीएमयू/एनएचएम/सीएच/18-9-4/2015-15/3329/30, दिनांकः 30.10.2014) जारी कर दिया कि इस कृत्य में वे एनजीओ की मदद करें. शासन का आदेश पाकर दोनों जिलों के सीएमओ ने सभी सरकारी अस्पतालों के अधीक्षकों कोयही फरमान जारी कर दिया. एनजीओ के प्रमुख डॉ. विश्वजीत कुमार की सरकार में कितनी पैठ है, इसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है. यह तुगलकी फरमान जारी करने के पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन या उसके सहयोगी सरकारी उपक्रम ‘सिफसा’ (राज्य परिवार नियोजन सेवा अभिनवीकरण परियोजना एजेंसी) ने न तो तेल की तकनीकी या उसके विषैलेपन की वैज्ञानिक जांच कराई और न एनजीओ से ही इसकी जांच कराने को कहा. सीधे नवजात शिशुओं के शरीर पर तेल घिसने की मंजूरी दे दी. एनएचएम निदेशक ने अपने सरकारी आदेश-पत्र में एनजीओ के मालिक विश्वजीत कुमार को देश का मशहूर पब्लिक हेल्थ साइंटिस्ट बता कर एनजीओ के साथ अपनी साठगांठ पर आधिकारिक मुहर लगा दी.
नवजात शिशुओं के शरीर पर खतरनाक तेल घिसने की परियोजना दो वर्ष (जनवरी 2015 से लेकर दिसम्बर 2016) के लिए थी. एनजीओ खुद यह मानता है कि अमेठी और रायबरेली के 276 गांवों के 41 हजार 72 नवजात शिशुओं की देह पर सूरजमुखी का तेल घिसा गया. लिहाजा, इलाके के लोगोंकी इस बात में दम है कि तेल की घिसाई के कारण तीन-चार सौ नवजात शिशुओं की मौत हुई. सौ नवजात शिशुओं की मौत का संदर्भ हाईकोर्ट के संज्ञान में आ चुका है. सूरजमुखी तेल की घिसाई के कारण सौ बच्चों के मरने की मौत तो छोड़िए,सरकार ने अपने दस्तावेज में एक भी बच्चे की मौत को शुमार नहीं किया है. एनजीओ ने भी शासन को ऐसी कोई रिपोर्ट न देकर सबूत छिपाने और मिटाने का आपराधिक कृत्य किया है. एनजीओ से जुड़े लोग ही यह कहते हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब खुले बाजार से सनफ्लावर रिफाइंड ऑयल खरीद कर शिशुओं के शरीर पर घिसवा दिया गया. एनजीओ रायबरेली के शिवगढ़ से अपना कैंप ऑफिस चला रहा था और तेल की कारगुजारी वहीं से ऑपरेट हो रही थी.
कम्युनिटी इम्पावरमेंट लैब ‘सक्षम स्नेह नवजात शिशु तेल’ के नाम पर सूरजमुखी का तेल (कोल्ड प्रेस्ड सन फ्लावर सीड ऑयल) मुफ्त में मुहैया कराता था और सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले शिशुओं के शरीर पर उसे घिसवाता था. अंधेरगर्दी देखिए कि शिशुओं की देह पर तेल घिसवाने में सरकारी अस्पताल के कर्मचारियों से काम लिया जाता था. इस आपराधिक कृत्य की वजह से तकरीबन डेढ़ साल में सौ से अधिक शिशुओं की मौत हो गई और सैकड़ों बच्चे गंभीर रूप से जख्मी हो गए. जख्मी शिशुओं के शरीर फफोलों से भर गए. उन्हें तरह-तरह के चर्म रोग हो गए और वे एलर्जी का शिकार हो गए. एनजीओ ने जख्मी बच्चों का इलाज भी नहीं कराया और सहमति-प्रपत्र दिखा कर भाग खड़े हुए.विष-विज्ञान (टॉक्सिकोलॉजी) के विशेषज्ञ डॉ. एलकेएस चौहान बताते हैं कि सूरजमुखी के बीज का तेल सबसे अधिक असंतुलित तेल होता है. इसके अणुओं में लंबी कारबन श्रृंखला होती है और हाइड्रोजन अणुओं से असंतृप्त होते हैं. इसमें पैलमिटिक एसिड की मात्रा नौ प्रतिशत, स्टीयरिक एसिड सात प्रतिशत, ओलेइक एसिड 40 प्रतिशत और लिनोलेइक एसिड की मात्रा 74 प्रतिशत तक पाई जाती है. खाने में भी इसके इस्तेमाल से परहेज किया जाना चाहिए, नवजात शिशुओं की देह पर इसे मलने की तो बात ही दूर रही. डॉ. चौहान कहते हैं कि जो लोग नवजात शिशुओं पर सनफ्लावर सीड ऑयल की मालिश करते हैं, वे शिशुओं की जान जोखिम में डालते हैं. नवजात शिशुओं के शरीर पर मलते ही यह तेल फैटी एसिड्स में ब्रेक कर जाता है और शिशुओं की कोमल त्वचा की ऊपरी सतह को तोड़ कर तमाम संक्रामक और क्षोभक तत्वों (इरिटेंट्स) को त्वचा के अंदर घुसने का रास्ता बना देता है. इससे शिशुओं की त्वचा की नमी नष्ट हो जाती है, त्वचा में दरारें पड़ने लगती हैं, पानी रिसने लगता है और एक्जिमा समेत कई अन्य घातक बीमारियां प्रवेश कर जाती हैं.
शिशु रोग विशेषज्ञों का कहना है कि नवजात शिशुओं के शरीर पर सूरजमुखी के तेल की मालिश कतई उचित नहीं है. डॉक्टर बताते हैं किमां की कोख से ही देह के ऊपर एक पतली झिल्ली (वर्निक्स) लेकर पैदा हुए शिशुओं के शरीर को वही झिल्ली बाहरी संक्रमण से बचाती है. जांचे-परखे हुए स्वच्छ और स्वस्थ तेल की अत्यंत कोमल मालिश से धीरे-धीरे झिल्ली हटती है और तब तक शिशु का शरीर बाहरी आबोहवा से अनुकूलन बना लेता है. संक्रमण के कारण ही नवजात शिशुओं की मृत्यु का दर खास तौर पर भारत के ग्रामीण इलाकों में अधिक है. लोगों में जागरूकता का अभाव है, जिसका फायदा उठा कर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के फंड से इतराए एनजीओ और एनएचएम ने सूरजमुखी का तेल घिस कर उसका नतीजा जानने की आपराधिक कोशिश की और इस कोशिश में सैकड़ों शिशुओं को मार डाला. यह खतरनाक क्लिनिकल ट्रायल था, जिस पर नियंत्रण का भारत सरकार ने आजादी के 70 साल बाद भी कोई कारगर तरीका अख्तियार नहीं किया है. आप ध्यान रखें कि बच्चों के शरीर पर सूरजमुखी के बीज का तेल घिसने की परियोजना विश्व स्वास्थ्य संगठन के नाम पर घुसाई गई जिसकी फंडिंग बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन कर रहा है. तेल घिसने की योजना शुरू करते हुए एनजीओ के प्रमुख डॉ. विश्वजीत कुमार ने कहा था कि नवजात शिशुओं पर सूरजमूखी का तेल चमत्कारिक काम करेगा. और ठीक ऐसा ही हुआ, लेकिन नकारात्मक नतीजों के साथ.
बिना जांचे परखे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने धंधेबाज एनजीओ के साथ मिल कर तेल-घिसने के प्रोजेक्ट को दो साल तक जारी रखने की मंजूरी दी. यह किसी भी जागरूक व्यक्ति को पता है कि विषैले पदार्थ या रसायन का मानव पर प्रयोग आपराधिक कृत्य की परिधि में आता है. इसके बावजूद कानून को ताक पर रख कर इस खतरनाक तेल का इस्तेमाल नवजात शिशुओं पर किया गया. शिशुओं के मरने पर तेल की गुणवत्ता और प्रामाणिकता की वैज्ञानिक और वैधानिक जांच की मांग भी की गई, लेकिन इसकी भी सरकार ने अनदेखी कर दी. विडंबना यह है कि खतरनाक तेल के इस्तेमाल के लिए सरकार और एनजीओ दोनों ने मिल कर पहले ही सारी पेशबंदी कर ली थी. गांव के भोले-भाले अशिक्षित लोगों से एक फॉर्म पर हस्ताक्षर लेकर रख लिया था. हस्ताक्षर लेने के बाद एनजीओ ने उस फॉर्म को भर कर उसे सहमति प्रपत्र बना लिया. जिनसे हस्ताक्षर लिया उन्हें यह नहीं बताया कि उनके नवजात शिशु पर किस तरह का तेल घिसना है, क्यों घिसना है और इसका क्या खतरनाक असर होगा. खतरनाक तेल के कुप्रभाव से बच्चे मरे और जो बुरी तरह जख्मी हुएउनका इलाज कराने में भोले-भाले गरीब मां-बाप आर्थिक रूप से भी भीषण संकट में आ गए.
अमेठी और रायबरेली जिले के गांवों में बड़े ही गुपचुप तरीके से चलाए जा रहे इस खतरनाक खेल की सुगबुगाहट मिलने पर समाजसेवी पवन कुमार सिंह ने इस मामले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से लेकर स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव और शासन तक से पूछताछ की और बच्चों की मौत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और एनजीओ के खिलाफ कार्रवाई के बारे में पूछा, लेकिन सरकार की तरफ से कोई सुगबुगाहट नहीं दिखी. बाल स्वास्थ्य विभाग के महाप्रबंधक डॉ. अनिल कुमार वर्मा ने पहले तो बेसाख्ता झूठ बोला कि नवजात शिशुओं के शरीर पर तेल का उपयोग किए जाने के सम्बन्ध में भारत सरकार या एनएचएम द्वारा कोई आदेश जारी नहीं किया गया है. फिर यह कहा कि कम्युनिटी इम्पावरमेंट लैब को रायबरेली और अमेठी में केवल अध्ययन करने की इजाजत दी गई है और इस अध्ययन में दोनों जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को सहयोग देने का निर्देश दिया गया है. साफ है कि गेट्स फाउंडेशन, एनएचएम की यूपी इकाई और एनजीओ ने आपसी मिलीभगत करके खतरनाक खेल खेला और सैकड़ों नवजात शिशुओं को अपना शिकार बना डाला. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की राज्य कार्यक्रम प्रबंधन इकाई में कम्युनिटी प्रॉसेस अनुभाग के महाप्रबंधक डॉ. राजेश झा ने तो यहां तककह दिया कि ऐसी कोई सूचना ही उनके पास उपलब्ध नहीं है.
समाजसेवी पवन कुमार सिंह ने फिर अमेठी और रायबरेली के सीएमओ से सम्पर्क कर इस खतरनाक खेल को तत्काल प्रभाव से बंद करने का आग्रह किया, लेकिन दोनों सीएमओ ने मुख्यालय और शासन के आदेश का हवाला देकर मना कर दिया. जीवन रक्षा के मूल संवैधानिक अधिकार का संरक्षण करने के बजाय प्रदेश सरकार एनजीओ के आपराधिक कृत्य को अपना संरक्षण देती रही और नवजात शिशुओं की हत्या होती रही. आखिरकार विवश होकर पवन कुमार सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में जनहित याचिका दाखिल की. याचिका में पूरे घटनाक्रम की जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया. हाईकोर्ट की डबल बेंच में खुद मुख्य न्यायाधीश दिलीप बी. भोसले मौजूद थे और उनके साथ न्यायाधीश राजन रॉय बैठे थे. हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की यूपी इकाई के निदेशक आलोक कुमार (तब तक अमित कुमार घोष स्थानांतरित हो चुके थे) को तलब कर लिया. सरकार से कोई समुचित जवाब देते नहीं बन पड़ा. आलोक कुमार ने अदालत के समक्ष गलती स्वीकार की और अदालत से कहा कि सरकार प्रोजेक्ट से सम्बन्धित सभी आदेश वापस लेती है. हाईकोर्ट ने उन सारे निर्देशोंको भी वापस लेने का आदेश दिया जो तेल-प्रोजेक्ट को सहयोग करने के लिए विभिन्न स्तर के अधिकारियों को जारी किए गए थे. मिशन निदेशक नेमुख्य न्यायाधीश की बेंच को यह भी आश्वासन दिया कि प्रोजेक्ट बंद करने के बाद के अनुवर्ती आदेश भी तत्काल प्रभाव से जारी कर दिए जाएंगे. यानि, सरकार ने हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर तेल-घिसने की परियोजना के पूरा होने के हफ्ताभर पहलेउस पर रोक लगा दी. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार 15 दिनों के भीतर सारे जरूरी कदम उठाए जिससे भविष्य में नवजात शिशुओं की जान जोखिम में न पड़े. हाईकोर्ट का फैसला सात दिसम्बर 2016 को आया. हाईकोर्ट ने सरकार को 15 दिन का समय दिया था. लिहाजा, सरकार को 22 दिसम्बर तक का वक्त मिल गया. इस तरह नवजात शिशुओं के शरीर पर तेल-घिसने की करतूत औपचारिक तौर पर रुक भी गई और व्यवहारिक तौर पर प्रोजेक्ट का लक्ष्य पूरा भी हो गया. प्रोजेक्ट को 31 दिसम्बर 2016 तक ही चलना था.हाईकोर्ट ने तेल घिसने से हुई नवजात शिशुओं की मौत की तरफ ध्यान नहीं दिया और न ही सरकार या मिशन को यह निर्देश ही दिया कि इस जघन्य करतूत के दोषी अफसरों और एनजीओ पर कानूनी कार्रवाई की जाए.

जिसने शिशुओं को मारा, सरकार ने उसे ही दे दिया दूसरा प्रोजेक्ट..!
उत्तर प्रदेश सरकार ने उसी एनजीओ को ‘कंगारू मदर थिरेपी प्रोजेक्ट’ का काम सौंपा है, जिस पर बेजा तेल घिस कर तकरीबन सौ नवजात शिशुओं को मार डालने और अनगिनत बच्चों को जख्मी करने का गंभीर आरोप है. हाईकोर्ट के आदेश पर सरकार ने तेल-प्रोजेक्ट को बंद कर परोक्ष रूप से एनजीओ का अपराध स्वीकार भी कर लिया. लेकिन फिर भी उसी एनजीओ को नए प्रोजेक्ट में शरीक कर लिया जाना एनजीओ के साथ शासन की मिलीभगत की आधिकारिक पुष्टि करता है. इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि आखिर कम्युनिटी इम्पावरमेंट लैब नामक इस एनजीओ पर सरकार इतनी मेहरबान क्यों रही है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की उत्तर प्रदेश इकाई ने इस एनजीओ के माध्यम से नवजात शिशुओं पर सूरजमुखी तेल का दुष्प्रयोग कर उनके जीवन और स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया और अब उसी एनजीओ को अपना हेल्थ पार्टनर बना कर करोड़ों का खेल कर रही है. शासन के एक आला अधिकारी ने ही बताया कि इस एनजीओ को लगातार काम मिलता रहे और शासन-प्रशासन में उसका धंधा निर्बाध गति से चलता रहे इसके लिए एनजीओ ने कई बड़े अफसरों के रिश्तेदारों को मोटे वेतन पर अपने यहां मुलाजिम नियुक्त कर रखा है. विचित्र किंतु सत्य है कि बच्चों को मारने के बाद अब वही एनजीओ‘कंगारू मदर थिरेपी प्रोजेक्ट’ में शरीक होकर माताओं को सिखा रहा है कि बच्चों को कैसे कलेजे से लगा कर रखें.

एनएचएम हो या सिफ्सा, सबको है बस धन की लिप्सा..!
नवजात शिशुओं के शरीर पर सन फ्लावर सीड ऑयल घिसने के प्रोजेक्ट में उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, सिफसा (स्टेट इन्नोवेशन्स इन फैमिली प्लानिंग सर्विसेज़ प्रोजेक्ट एजेंसी) और एनजीओ कम्युनिटी इम्पावरमेंट लैब की मिलीभगत थी. इसे त्रिपक्षीय सहभागिता का नाम दिया गया था. हद यह है कि सरकार ने एक पीसीएस अधिकारी अवनीश सक्सेना को सिफसा में परियोजना प्रबंधन इकाई का प्रमुख बना कर बैठा दिया था. सक्सेना परियोजना के बीच ही भाग खड़े हुए या हटा दिए गए.सक्सेना को ‘डिम्पा प्रोजेक्ट’ की भी निगरानी करनी थी और इसके लिए उन्हें तीन लाख रुपए मासिक वेतन पर रखा गया था. फिलहाल यह पद रिक्त है, जल्द ही किसी ‘अनुकूल’ नौकरशाह को इस पद पर बैठाया जाएगा.
सिफसा का अस्तित्व भी विवादों से घिरा रहा है. इसकी नींव ही भीख के धन से पड़ी थी. अमेरिकी फंडिंग से उत्तर प्रदेश के 18 जनपदों में जन्मदर स्थिर करने के लिए सिफसा प्रोजेक्ट शुरू किया गया था, लेकिन वर्ष 2006 में प्रोजेक्ट के पूरी तरह फेल हो जाने के कारण अमेरिका ने फंडिंग  रोक दी थी. दरअसल, जिन जिलों में यह एजेंसी काम कर रही थी वहां जन्म-दर कम होने के बजाय बढ़ गई. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस संस्था को बंद करने का निर्णय लिया, लेकिन तत्कालीन अधिशासी निदेशक चंचल कुमार तिवारी ने इस संस्था को बंद होने से बचाया. उन्होंने सभी अठारह जिलों में सिफसा की यूनिटों को तो बंद किया, लेकिन राज्य स्तर पर इसे जिंदा रखा. तिवारी ने उन जिलों के निकम्मे प्रभारियों सहित लगभग सौ अधिकारियों/कर्मचारियों को अमेरिकी फंड के बचे हुए धन से आने वाले ब्याज से वेतन देने देने का विकल्प मुख्यमंत्री को सुझाया. वर्ष 2006 तक यह व्यवस्था चलती रही. उसी समय राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का प्रारम्भ हुआ और सिफसा को पुनर्जीवित करने का मौक़ा मिल गया. सभी मंडलों में उन्हीं अठारह निकम्मों को मंडलीय कार्यक्रम प्रबंधक बना दिया गया. बाद में उन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से ही वेतन दिया जाने लगा. सिफसा के अधिशासी निदेशक को ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का मिशन निदेशक भी बना दिया गया. सिफसा प्रशासनिक अधिकारियों के नाते-रिश्तेदारों और चहेतों की ऐशगाह की तरह है. एनएचएम में भर्ती सहित तमाम महत्वपूर्ण काम सिफसा के चहेतों से कराया जाने लगा और आज भी कराया जा रहा है. सभी मंडलों में उन्हीं अठारह निकम्मों को मंडलीय कार्यक्रम प्रबंधक बना दिया गया. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तरप्रदेश की परिवार नियोजन और प्रचार-प्रसार की गतिविधियों को सिफसा के माध्यम से करा कर पिछले पांच साल में लगभग दो हज़ार करोड़ के बजट की हेराफेरी की जा चुकी है.

सौ शिशुओं की मौत में दस की बानगी

        गांव और विवरण      मरने वाले बच्चों की संख्या
1. ग्रामः इंदौरा, ब्लॉकः महराजगंज -     3
(तीन परिवार ने पहचान सार्वजनिक किए जाने से मना किया)
2. ग्रामः जैतीपुर, ब्लॉकः सतावां -            1
(रामपाल लोधी का बच्चा)
(जन्मः 27.11.2015, मृत्युः तरीख अनुपलब्ध)
3. ग्रामः कोन्सा, ब्लॉकः सतावां -            1
(गीता पत्नी नन्हें पाल का बच्चा) 
(जन्मः 09.07.2015, मृत्युः 11.07.2015)
4. ग्रामः हाजीपुर, मजराः पुरेलाल साहब -           1
(कमलेश लोध का बच्चा)
(जन्मः 17.06.2015, मृत्युः 19.06.2015)
5. ग्रामः सौइठा, मजराः झरिया, ब्लॉकः सतांव -  1
(संतलाल पासी का बच्चा)
(जन्मः 27.07.15, मृत्युः 02.08.15)
6. ग्रामः पोरई, मजराः पुरे लोध -            1
(रूपवती पत्नी रामबाबू का बच्चा)
(जन्मः 30.07.2015, मृत्युः 01.08.2015)
7. ग्रामः हाजीपुर, मजराः पुरे महेशी, ब्लॉकः सतांव -  1
(रामकुमार लोध पुत्र श्रीपाल का बच्चा)
(जन्मः 02.08.2015, मृत्युः 03.08.2015)
8. ग्रामः अरियांव, मजराः डिहवा बाबा, ब्लॉकः तिलोई -  1
(हेमऊ पासी पुत्र विशंभर पासी का बच्चा)
(जन्मः 03.08.2015, मृत्युः 05.08.2015


   सैकड़ों जख्मी शिशुओं में दस की बानगी
        गांव और विवरण      गंभीर रूप से जख्मी होने वाले बच्चों की संख्या
1. ग्रामः पोखरनी (भुजिया गांव) -           1
(सुनीता पत्नी केशवलाल का बच्चा)
2. ग्रामः खुसरूपुर, मजराः हुसेपुर, ब्लॉकः सतांव -        1
(बिट्टन देवी का बच्चा)
3. ग्रामः सोइठा, पुरवा झड़िया, ब्लॉकः सतांव -         1
(बिसुना पत्नी सोनू का बच्चा)
4. ग्रामः डोमापुर, ब्लॉकः महराजगंज -    1
(श्रीमती गुधनू का बच्चा)
5. ग्रामः जैतीपुर, ब्लॉकः सतांव -           1
(मां प्रेमा का बच्चा)
6. ग्राम कोन्सा, ब्लॉकः सतांव -     1
(पहचान सार्वजनिक किए जाने से मना किया)
7. ग्रामः भीतरगांव, ब्लॉकः खीरों -            1
(पहचान सार्वजनिक किए जाने से मना किया)
8. ग्रामः जिहवां, ब्लॉकः महराजगंज -    1
(राम अवतार का बच्चा)
9. ग्रामः डोडेपुर, ब्लॉकः खीरों -             1
(पहचान सार्वजनिक किए जाने से मना किया)
10. ग्रामः बोनई, ब्लॉकः सतांव -     1
(रूपा का बच्चा)

Saturday, 27 January 2018

यूपी की राजनीति से जनता के मुद्दे गायब

प्रभात रंजन दीन
उत्तर प्रदेश में जनता से जुड़े मसले सत्ता की राजनीति से गायब हैं. विपक्ष की राजनीति से भी जनता के मसले गायब हैं. भारतीय जनता पार्टी जिन मुद्दों पर चुनाव जीत कर सत्ता तक पहुंची, वे सारे मुद्दे अनछुए रह गए और अब लोकसभा चुनाव भी आने वाला है. विपक्ष की राजनीति बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोपों तक सिमट गई है. जन-मुद्दों पर सड़कों पर आंदोलन और उनमें आम जनता की भागीदारी अब बीते दिनों की बातें रह गई हैं. मुख्यमंत्री आवास के सामने या विधानसभा के सामने आलू बिखेर देने भर से किसानों का भला नहीं होने वाला, यह बात समझते हुए भी समाजवादी पार्टी इससे आगे नहीं बढ़ पा रही. अन्य विपक्षी दल तो इससे भी गए. विपक्षी दलों को रंग की राजनीति खूब भा रही है. खुद सत्ता में रहते हैं तो अपने रंग से खेलते हैं और दूसरे जब सत्ता में आकर अपना रंग दिखाते हैं तो इन्हें वह नहीं सुहाता. हरा नीला खेलने वालों को आज भगवा से एलर्जी हो रही है. पूरी राजनीति रंग के ही आगे-पीछे चक्करघिन्नी है. विपक्ष में किसी भी मुद्दे पर कोई एकता नहीं दिख रही है. विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ तालमेल करके मैदान में उतरी थी, लेकिन आज कांग्रेस मैदान से गायब है. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव संयुक्त बैठक बुलाते हैं तो उसमें भी कांग्रेस शरीक नहीं होती. बसपा तो नहीं ही रहती. अब दूरियां फिर से पूर्वकालिक हो गई हैं और यह लगभग तय हो गया है कि सपा-कांग्रेस गठजोड़ आने वाले लोकसभा चुनाव में कायम नहीं रहेगा. 2019 के चुनाव में विपक्ष पूरी एकता से भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करेगा, यह केवल मंचीय सच है, जमीनी सच नहीं है. अगर विपक्षी दल एकता से चुनाव लड़ते तो यह अराजक दृश्य नहीं दिखता. सारे विपक्षी दल एक दूसरे पर अपना वर्चस्व स्थापित करने, दबाव में रखने और मोलभाव की भंगिमा बनाने में समय नहीं गंवाते. इन रवैयों को देखते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को कहना पड़ा कि लोकसभा चुनाव में सपा कांग्रेस के साथ तालमेल नहीं करेगी. उन्होंने पार्टी की एक अंदरूनी बैठक में कहा कि तालमेल करना होता तो कांग्रेस और सपा मिल कर स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ती. अखिलेश यह भी मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में तालमेल का कोई फायदा नहीं हुआ. लब्बोलुबाव यह है कि सारी विपक्षी पार्टियां अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग साधने में लगी हैं. बसपा कांग्रेस और सपा को कहीं नहीं बख्शती. अभी पिछले ही दिनों बसपा नेता मायावती ने संविधान से छेड़छाड़ के मसले पर भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि संविधान और बाबा साहेब अम्बेडकर के प्रति कांग्रेस की आस्था भी भाजपा जैसी ही है. मायावती अब भी दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण समीकरण पुख्ता करने में लगी हैं. उत्तर प्रदेश में सपा कांग्रेस और बसपा की परस्परविरोधी राजनीति ने प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य और जनता को भ्रमित कर रख दिया है. लोकसभा चुनाव में जनता के समक्ष अब बिखरे विपक्ष और भाजपा में कोई एक विकल्प चुनने की विवशता है. आम लोग खुलेआम कहते हैं कि विपक्षी दलों को जनता का मसला उठाना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय सब भगवा रंग में ही फंसे हुए हैं. पहले तो मुख्यमंत्री सचिवालय का भगवा रंग मुद्दा बना फिर ट्रांसपोर्ट की बसें, साइन बोर्ड और अब हज हाउस की चारदीवारी का भगवा रंग विपक्षी पार्टियों का मुद्दा बन गया. हालांकि बाद में हज हाउस की चारदीवारी का रंग बदला भी गया और नीचे के स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई, लेकिन इससे सियासत पर चढ़ा भगवा रंग कम नहीं हुआ. सपा और बसपा इस रंग-प्रयोग पर अधिक हाय-हाय कर रही है. हालांकि प्रदेश के लोग बसपा और सपा काल के रंग-प्रयोग भूले नहीं हैं. यही वजह है कि विपक्ष की इस नासमझ सियासत का फायदा भाजपा को ही मिल रहा है. लोगों को यह पहले का अनुभव है कि सरकार बदलते ही प्रदेश में रंगों की सियासत शुरू हो जाती है. सपा और बसपा सरकारों में भी रंगारंग कार्यक्रम खूब चला. बसपा के कार्यकाल में सड़क के किनारे लगी दीवारें, ग्रिल, सरकारी डायरी और कैलेंडर तक नीले रंग से रंग दिए गए थे. सपा सरकार के कार्यकाल में भी सब तरह हरा-हरा दिखने लगा था. बसपा काल में ट्रांसपोर्ट की बसें नीली तो सपा काल में हरे रंग में रंग दी गई थीं. भाजपा ने भी सपा और बसपा की नकल पर भगवा रंग से रंगवा दिया.
सभी राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्रों के जरिए जनता से किस्म-किस्म के वादे करते हैं. सत्‍ता में आने के बाद उन वादों को पूरा करने का वि‍श्‍वास दिलाते हैं और वोट ठगते हैं. जनता हर बार चुनाव में ठगी जाती है. विकल्प के अभाव के कारण वोट देने और ठगे जाने की प्रक्रिया जारी रहती है. चुनाव आयोग भी कह चुका है कि अव्यवहारिक और झूठे वायदे पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. लेकिन अभी तक ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई. शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, सुरक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें मुहैया कराने में राजनीतिक दल फेल ही साबित होते हैं. सत्ता मिलते ही आम जनता की सुविधा या उसके अधिकार पर कोई बात नहीं होती. लोकसभा चुनाव आता है तो देश के विकास की बात होती है, विधानसभा चुनाव आता है तो राज्य के विकास की बात होती है, निकाय और पंचायत चुनाव आता है तो निकायों और ग्राम पंचायतों के विकास की बात होती है. लेकिन इन चुनावों के बाद सारी बातें ताक पर चली जाती हैं और धोखाधड़ी और लूट शुरू हो जाती है. संविधान प्रशासन में जनता की सीधी भागीदारी तय करता है, लेकिन असलियत क्या है, इसे हम सब जानते हैं और भुगतते हैं. लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई हमारी पंचायतें उत्‍तर प्रदेश में सबसे अधिक कमजोर हैं. यूपी की पंचायतें भ्रष्टाचार की सबसे प्राथमिक इकाई बन कर रह गई हैं. राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के खिलाफ केवल बातें करते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर पसरा भ्रष्टाचार उन्हें दिखाई नहीं पड़ता.

किसानों का मसला सबसे अहम, लेकिन सबसे अधिक उपेक्षित किसान
केवल उत्तर प्रदेश ही क्या पूरे देश में सबसे महत्वपूर्ण मसला किसानों का है. आजादी के बाद से ही किसानों की लगातार उपेक्षा होती आ रही है, लेकिन सियासत की रोटियां भी इन्हीं के बूते सिंकती रही हैं. किसान आयोग के गठन का मसला हो या स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को अक्षरशः लागू करने का. किसी भी सरकार ने इसे लागू करने की कोई पहल नहीं की. आम बजट से कृषि बजट को अलग करने की मांग ठोस शक्ल पकड़ती उसके पहले केंद्र सरकार ने रेल बजट को भी आम बजट में ही विलीन कर दिया. लागत के मुताबिक कृषि उत्पाद का मूल्य निर्धारित नहीं किया गया और किसान बर्बाद होता चला गया. कितने किसानों ने आत्महत्या की, इसका भारी आंकड़ा दोहराने की आवश्यकता नहीं. 30 दिसम्बर 2016 को जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आधिकारिक आंकड़े के अनुसार कर्ज के बोझ, सूदखोरी, सूखा, आर्थिक तबाही और सरकार की किसान विरोधी नीतियों के चलते साल 2015 में 12,602 किसानों और खेत मज़दूरों ने आत्महत्या की थी. यह संख्या साल 2014 में हुई आत्महत्याओं में दो प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दिखा रही थी. इसके बाद तो 2017 भी बीत गया. इसका आधिकारिक आंकड़ा आना अभी बाकी है. इन मौतों के बावजूद किसानों के कृषि उपज की बिक्री का कोई समुचित बंदोबस्त नहीं किया जा सका और न उचित बाजार का निर्माण ही हो सका. कृषि उपज के भंडारण और वितरण का प्रदेश में कोई इंतजाम नहीं है और न भारतीय खाद्य निगम की भंडारण क्षमता में वृद्धि के कोई ठोस उपाय किए जा रहे हैं. कृषि उपज की खरीद में बिचौलियों और दलालों का दबदबा है और खाद, बीज, तेल की बढ़ती कीमतों से किसान बुरी तरह से दबा जा रहा है. विडंबना यह है कि इन समस्याओं के निपटारे में सरकारों की कोई रुचि नहीं है. लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों के लोकसभा या विधानसभा चुनाव के समय जारी हुए घोषणापत्रों पर गौर करें तो किसानों से जुड़े ये सारे मुद्दे आपको कागज पर मिल जाएंगे. कांग्रेस न्यूनतम ब्याज पर कृषि ऋण देने, कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने और कृषि उत्पाद को पेशेगत तरीके से बाजार देने की बातें करती रही. लेकिन जब तक केंद्र में उसकी सरकार रही, इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई. समाजवादी पार्टी किसानों को लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देने, कर्ज न चुकाने पर किसानों की जमीन नीलाम नहीं करने, बेकार पड़ी जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए सिंचाई की व्यवस्था करने और नदियों को जोड़ने जैसे वादे अपने घोषणा पत्र में शामिल करती रही, लेकिन सत्ता में आई तो किसानों से किए गए इन वादों को ताक पर रख दिया. भाजपा ने भी अपने घोषणा पत्र (संकल्प-पत्र) में बड़ी-बड़ी बातें कहीं. मसलन, किसानों को लागत का 50 फीसदी लाभ सुनिश्चित किया जाएगा, खाद्य प्रसंस्करण के साथ-साथ एग्रो फूड प्रोसेसिंग क्लस्टर की स्थापना होगी, गेहूं खरीदा जाएगा, धान खरीदा जाएगा, आलू खरीदा जाएगा वगैरह, वगैरह. लेकिन हिसाब लें, तो भाजपा ने सत्ता में आने के बाद इस दिशा में कुछ नहीं किया. किसानों के गन्ना बकाये के भुगतान की दिशा में सरकार आगे बढ़ी, लेकिन गन्ने के समर्थन मूल्य में 10 रुपए की बढ़ोत्तरी करके अपनी ही किरकिरी करा ली. प्रदेश के गन्ना विकास मंत्री सुरेश राणा ने अभी कुछ ही दिन पहले गन्ना मूल्य में 10 रुपए की बढ़ोत्तरी करने की हास्यास्पद घोषणा की थी. ये वही सुरेश राणा हैं जो विधानसभा में यह मांग उठाते रहे हैं कि गन्ना मूल्य चार सौ रुपए प्रति क्विंटल किया जाए. समाजवादी पार्टी की सरकार ने जब गन्ना मूल्य की घोषणा की थी तब राणा ने उसे किसानों के साथ धोखा बताया था. सत्ता मिलते ही नेता के सुर कैसे बदलते हैं, सुरेश राणा की गन्ना विकास राज्य मंत्री के रूप में की गई घोषणा, इसका सटीक उदाहरण है. जब तत्कालीन सपा सरकार ने 2016-17 के पेराई सत्र के लिए गन्ना मूल्य में 25 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोत्तरी की थी, तब भाजपा ने इसपर नाराजगी जताते हुए कहा था कि इससे फसल की लागत भी नहीं निकल पा रही है. भाजपा ने चीनी के बढ़े दामों के सापेक्ष गन्ना मूल्य निर्धारित करने की मांग की थी. भाजपा सत्ता में आ गई तो सारी बातें तहखाने में डाल दी. हालत यह है कि प्रदेश की चीनी मिलों पर पिछले पेराई सत्र 2016-17 का हजार करोड़ से अधिक अभी भी बकाया है. गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में महज 10 रुपए प्रति क्विंटल का इजाफा चीनी मिल मालिकों को रियायत देने के लिए किया गया, ताकि चीनी मिल मालिकों के सिर से गन्ना बकाये का बोझ कम किया जा सके. सामान्य किस्म के गन्ने की कीमत 2017-18 सत्र में 310 से बढ़ कर 315 रुपए प्रति क्विंटल हो जाएगी. प्रदेश के किसान लगातार बढ़ती लागत के मद्देनजर गन्ने की कीमत बढ़ाने की मांग कर रहे थे, लेकिन चीनी मिल मालिकों के अड़ंगे के कारण गन्ना मूल्य नहीं बढ़ सका.

धान और आलू में मारा गया किसान, गेहूं में भी बर्बाद करने की तैयारी
गेहूं का समर्थन मूल्य 1450 रुपए प्रति क्विंटल किए जाने से किसानों में भीषण नाराजगी है. इस वर्ष किसानों को गेहूं खरीद पर बोनस भी नहीं मिलेगा. गन्ना, आलू, धान के गिरते दाम के बाद अब किसानों को गेहूं से भी लागत निकाल पाना मुश्किल होगा. किसान गेहूं का मूल्य 1550 रुपए प्रति क्विंटल करने और बोनस देने की मांग कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि सरकार किसानों की परेशानी पर ध्यान नहीं दे रही है, इसके जवाब में वे आगामी चुनाव में भाजपा पर ध्यान दे देंगे. किसानों का कहना है कि धान और आलू के कारण वे पहले ही मर चुके हैं और गेहूं उन्हें और मार डालेगा. उनका आरोप है कि भाजपा सरकार किसान विरोधी नीतियों पर चल रही है. योगी सरकार ने बड़े प्रचार-प्रसार से 50 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने की घोषणा की थी, लेकिन जमीन पर वह घोषणा सफेद झूठ साबित हुई. सरकार ने यह भी कहा था कि सामान्य धान न्यूनतम समर्थन मूल्य 1550 प्रति क्विंटल पर और ग्रेड धान 1590 प्रति क्विंटल के भाव से खरीदा जाएगा और 72 घंटे के भीतर किसानों का भुगतान कर दिया जाएगा. धान की खरीद पर किसानों को बोनस दिए जाने की भी बात कही गई थी. लेकिन नतीजा यह निकला कि भ्रष्ट अफसरों और दलालों ने पीडीएस सिस्टम के तहत मिलने वाले निकृष्ट स्तर के चावल को धान खरीदा दिखा कर पूरा पैसा हड़प लिया. इस तरह धान की खरीद का पूरा मामला ही फर्जीवाड़ा साबित हुआ. सरकारी धान खरीद केंद्र सूने पड़े रहे और कागजों पर धुआंधार खरीद हो गई. आढ़तियों और राइस मिलरों ने जो धान किसानों से सीधे खरीदा था, उसे ही सरकारी केंद्रों पर हुई खरीद दिखा दिया गया. क्रय केंद्रों पर अपनी फसल लेकर पहुंचे किसानों को फसल में नमी होने या दाना न होने का आरोप लगा-लगा कर वापस लौटा दिया गया तो मजबूरी में किसानों को हजार रुपए क्विंटल के भाव से अपना धान बेच कर घर लौटना पड़ा. किसानों की मजबूरी का फायदा आढ़तियों ने उठाया जिसे सरकारी अफसरों की शह मिली हुई थी. किसानों के नाम से फर्जी खाते तक खुलवाए गए और उनके खातों में भुगतान भेज दिया गया, वे खाते मंडी के व्यापारियों और राइस मिलर्स द्वारा संचालित किए जा रहे थे. योगी सरकार ने राज्य में पांच हजार खरीद केंद्रों के जरिए 80 लाख टन गेहूं खरीदने की घोषणा की थी. लेकिन वह घोषणा भी टांय-टांय-फिस्स साबित हुई थी. सरकार ने गेहूं की तर्ज पर 3500 क्रय केंद्रों के जरिए 50 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने की घोषणा की लेकिन धान खरीद में भी सरकार फ्लॉप रही और बिचौलियों का बोलबाला बना रहा. यूपी के पूरे धान बेल्ट में धान की खरीद का सरकारी दावा बेमानी साबित हुआ है. बिचौलियों के जरिए मनमानी कीमत पर धान खरीदा गया और सरकार के नुमाइंदे बिचौलियों को ही अपना सहयोग देते रहे. बदायूं, पीलीभीत और तराई के विस्तृत धान पट्‌टी क्षेत्र के किसानों में इससे भीषण नाराजगी है.
आलू को लेकर भी योगी सरकार ने ऐसे ही बड़े-बड़े वायदे किए थे, लेकिन आलू ने किसानों को बुरी तरह से मारा. विवश किसानों ने सड़कों पर आलू फेंकना अधिक श्रेयस्कर समझा. मुख्यमंत्री आवास और विधानसभा के सामने आलू फेंका गया तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुरा मान गए. लखनऊ में विधानभवन के सामने, मुख्यमंत्री आवास के पास और कुछ अन्य महत्वपूर्ण मार्गों पर काफी संख्या में आलू बिखरा पाया गया. इसे लेकर राजनीति अचानक गरमा गई. योगी सरकार के विरोध में किसानों की नाराजगी सड़क पर आलू के जरिए जाहिर हुई. नाराज किसानों ने मुख्यमंत्री आवास और विधानसभा के बाहर आलू फेंककर प्रदर्शन किया. सुबह के समय विधानसभा के सामने की मुख्य सड़क पर आलू ही आलू नजर आ रहे थे. प्रशासन आलू हटाने में लगा था. ऐसा केवल लखनऊ में ही नहीं हुआ, पूरे प्रदेश में आलू किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया. पिछले साल आलू की रिकॉर्ड पैदावार होने से किसानों ने आलू कोल्ड स्टोरेज में रखवा दिया था, लेकिन पुराने आलू की मांग कम होने के कारण स्टोरेज मालिकों और किसानों के पास इसे सड़क पर फेंकने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था. रिकॉर्ड आलू पैदा करने वाले फर्रुखाबाद जिले के ही करीब 70 कोल्ड स्टोरेज आलू से भरे पड़े हैं. अब कोई भी कोल्ड स्टोर आलू रखने की स्थिति में नहीं है. किसान भी कोल्ड स्टोरेज में ही आलू छोड़ कर चला गया. फर्रुखाबाद के तकरीबन 34 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की फसल बोई गई थी. आलू के रिकॉर्ड उत्पादन का नतीजा यह निकला कि वह या तो कौड़ियों के मोल बिका या कूड़े की तरह रास्तों पर फेंका सड़ता हुआ नजर आया. प्याज और टमाटर के बढ़ते दामों के बीच आलू किसानों के लिए सरकार की तरफ से कोई भी घोषणा नहीं की गई. उल्टा, सड़क पर आलू फेंकने के आरोप में लखनऊ पुलिस ने कुछ सपाइयों को पकड़ लिया और जेल के अंदर कर दिया. जिस आलू के कारण किसानों के मरने की नौबत आ गई, उस पर विरोध जताने का लोकतांत्रिक अधिकार भी सरकार छीन लेने पर आमादा है. पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि आलू खरीदा नहीं गया इसीलिए यह राजधानी की सड़कों पर दिखाई दे रहा है. जमीनी स्थिति यही रही कि आलू खरीद केंद्र खुले ही नहीं, जहां आलू खरीदे जाते. किसानों की आम शिकायत थी कि सरकार ने आलू का समर्थन मूल्य तो घोषित कर दिया लेकिन खरीद केंद्र खोले नहीं, किसान आलू कहां बेचते! ऐसा कई साल से हो रहा है. सपा के शासनकाल में भी आलू किसानों के साथ ऐसा ही हुआ था. आलू का सही दाम नहीं मिलने से किसानों की कमर टूट चुकी है. बाजार में आलू की कीमत चार-चार रुपए प्रति किलो तक आ गई. इस स्थिति में किसानों के पास आलू फेंकने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. किसानों का कहना है कि आलू की कीमत कम से कम 10 रुपए प्रति किलो पर तय कर दी जाए, लेकिन सरकार सुनती ही नहीं.
आलू फेंकने पर सपाइयों के पकड़े जाने पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किसानों और पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और सरकार द्वारा की गई कार्रवाई की निंदा की. अखिलेश ने कहा कि आलू की फसल की बर्बादी किसानों के प्रति भाजपा सरकार की उपेक्षा नीति का नतीजा है. उन्होंने योगी सरकार से पूछा कि किसानों और गरीबों के पक्ष में आवाज उठाना क्या अपराध है? उन्होंने यह भी पूछा कि योगी सरकार ने आलू किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने का वादा किया था उसका क्या हुआ? अखिलेश ने कहा कि भाजपा सरकार ने किसानों से धोखा किया है और अब उन्हें अपमानित भी कर रही है. किसानों की आवाज उठाने वालों का उत्पीड़न कर उन्हें झूठे केसों में फंसाया जा रहा है. पुलिस अपराधी पकड़ नहीं पा रही, लेकिन आलू फेंकने पर त्वरित कार्रवाई कर सपाइयों को गिरफ्तार कर ले रही है. अखिलेश ने कहा कि ऐसी त्वरित कार्रवाई करने वाले लखनऊ के पुलिस अधीक्षक को यश भारती पुरस्कार दिया जाना चाहिए.

नेता ही बंद कराते हैं मिलें और वही चालू कराने का वादा भी करते हैं
उत्तर प्रदेश की बंद पड़ी मिलें और कल कारखाने केवल चुनावी मुद्दा बनते हैं, लेकिन उन पर कोई काम नहीं होता. आधिकारिक तथ्य है कि महज 10 साल में उत्तर प्रदेश के करीब डेढ़ लाख छोटे और मध्यम उद्योग धंधे बंद हो गए. इनके बंद होने से लाखों लोग बेरोजगार हो गए और उनका पलायन हो गया. राज्य सरकार और नौकरशाही औद्योगिक सुधार के केवल दावे करती है, पर कोई काम नहीं करती. मध्यम और लघु उद्योग मंत्रालय की रिपोर्ट खुद ही कहती है कि उत्तर प्रदेश में ग्रामीण स्तर पर लघु और मध्यम उद्योगों की संख्या नगण्य रह गई है. महिला उद्यमियों की संख्या तो न के बराबर है. उद्योग खड़ा करने में दलितों की भागीदारी भी कम ही है. उद्यम में सबसे अधिक भागीदारी पिछड़ी जाति के लोगों की रही है, लेकिन वे भी अधिकांश हताश होकर अपना उद्योग बंद कर चुके. 30 प्रतिशत से अधिक उद्योग स्थाई रूप से बंद हो गए. इंडियन इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन का कहना है कि प्रदेश में उद्योगों को संचालित करने के लिए न तो मूलभूत सुविधाएं मिलती हैं और न ही उद्यमी यहां अपने आपको सुरक्षित समझते हैं. अकेले जीएसटी के कारण ही यूपी के कालीन उद्योग से जुड़े 20 लाख से अधिक बुनकर बेरोज़गार हो गए. पूरा कालीन उद्योग जीएसटी के बाद बर्बादी के कगार पर पहुंच गया. नोटबंदी के कारण कालीन उद्योग पहले से कराह रहा था. जीएसटी ने बाकी की कसर पूरी कर दी. कालीन निर्माताओं और निर्यातक संघों का कहना है कि जीएसटी के चलते लगभग पांच हजार इकाइयां बंद हो गईं और हजार करोड़ रुपए का निर्यात नुकसान में चला गया. कोई नया आर्डर नहीं दिया जा रहा है और नए आर्डर के लिए बुनाई पूरी तरह बंद हो गई है. केंद्र सरकार की भौंडी नीति और प्रदेश सरकार की उपेक्षा का फायदा चीन और तुर्की जैसे देशों को मिल रहा है. सरकार कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों को फायदा पहुंचाने के इरादे से ऐसा कर रही है, ताकि मशीन-निर्मित कालीनों का बाजार चल निकले. उत्तर प्रदेश के कालीन उत्पादक क्षेत्र भदोही, मिर्जापुर, वाराणसी, घोसिया, औराई, आगरा, सोनभद्र, सहारनपुर, सहजनपुर, जौनपुर, गोरखपुर वगैरह बुनकरों के लिए तबाही का केंद्र बन चुके हैं. लेकिन इन पर न तो गोरखपुर के योगी आदित्यनाथ की निगाह जाती है और न विपक्ष की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों की.
योगी सरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की ‘कृपा’ से प्रदेश की बंद पड़ी चीनी मिलों में से कुछ मिलों को फिर से चलाने की बात कर रही है. ये कुछ मिलें पूर्वांचल की हैं. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पूर्वांचल (गोरखपुर) के हैं तो यहां के लोगों को उम्मीद है कि अगले चुनाव के पहले कहीं ये मिलें फिर से शुरू हो जाएं. यही उम्मीद कानपुर के लोगों को भी थी जिन्हें लगातार यह आश्वासन मिल रहा था कि कपड़ा उद्योग के कारण कभी पूरब का मैंचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर को पुराने दिन लौटाए जाएंगे. कपड़ा उद्योग के लिए मशहूर मऊ के लोगों को भी यही भरोसा दिया गया था. लेकिन अब भाजपा सरकार के मंत्रियों के मुंह से उसकी भुनभुनाहट भी सुनाई नहीं पड़ती. योगी सरकार के कद्दावर मंत्री कानपुर निवासी सतीश महाना ने कहा था कि कानपुर की बंद पड़ी कपड़ा मिलों के ताले जल्दी ही खुलने वाले हैं. इससे कानपुर से तेजी से हो रहा श्रम-जगत का पलायन रुकेगा. महाना ने कहा था कि पिछली सरकारों की गलत नीतियों के चलते उद्योगपति कानपुर में उद्योग लगाने से डरते थे, लेकिन अब माहौल बदल गया है. केंद्र और योगी सरकार मिलकर उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर उद्योग धंधे शुरू करने के लिए रोडमैप तैयार कर रही है. महाना के मुताबिक मशहूर कपड़ा मिल लाल-इमली कांग्रेस के शासनकाल में बंद हुई थी. इसे चालू करने के लिए कपड़ा मंत्रालय से पैसा भी आया, नई मशीनें लाई गईं, लेकिन इसके बावजूद इसे चालू नहीं कराया जा सका. महाना ने कानपुर के लोगों को सपना दिखाया कि आने वाले समय में कानपुर में और भी नए-नए उद्योग लगेंगे. बड़ी-बड़ी कंपनियों से इस सिलसिले में बातचीत चल रही है. महाना ने दावा किया था कि कानपुर की बंद पड़ी कपड़ा मिलों को दोबारा चालू करने के बारे में उनकी केंद्रीय वित्त मंत्री और कपड़ा मंत्री से कई बार मुलाकात हो चुकी है. लेकिन उसका नतीजा क्या निकला, इसका लोग इंतजार ही कर रहे हैं. एल्गिन और लाल-इमली समेत अन्य बंद मिलों की चिमनियों से धुआं निकलना कब शुरू होगा, इसकी प्रतीक्षा में कई नस्लें बूढ़ी हो चुकी हैं. इन नस्लों को गुमान था कि कानपुर में कभी स्वदेशी, लाल इमली, एल्गिन समेत दर्जनों मशहूर कपड़ा मिलें थीं. कपड़े के कई अन्य छोटे-मोटे उद्योग भी थे. इन मिलों में लाखों की संख्या में लोग काम करते थे. कानपुर की पहचान ही इसकी औद्योगिक धाक के कारण थी. कानपुर के लोगों की घड़ियां मिलों के सायरन से ही चलती थीं. यहां के कपड़े की मांग विदेशों तक थी. लाल-इमली के कपड़े और कालीन का मांग पाकिस्तान से लेकर ईरान और ईराक तक थी. एल्गिन का बना कपड़ा अमेरिका, यूरोप और जापान के बाजारों तक पूछा जाता था. कानपुर सबसे ज्यादा कपड़े का उत्पादन करने वाला एशिया का अकेला शहर था. सत्तर के दशक के बाद कानपुर की कपड़ा मिलें धीरे-धीरे बंद होती चली गईं. मऊ की बंद कपड़ा मिलों को भी दोबारा खोलने की जुमलेबाजी लगातार हो रही है. हाल ही में योगी सरकार ने मऊ की मशहूर स्वदेशी कॉटन मिल और परदहां कॉटन मिल की बंदी पर अफसोस जताते हुए इसे चालू करने का आश्वासन दिया था. लेकिन यह आश्वासन और चिंता केवल जुबानी कसरत ही साबित हो रही है. स्वदेशी कॉटन मिल केंद्र सरकार का उपक्रम थी और परदहां कॉटन मिल उत्तर प्रदेश सरकार चलाती थी. मिल बंद होने से बेरोजगार हुए एक बुजुर्ग कारीगर कहते हैं कि सरकारों को सियासत की मिल चलाने से फुर्सत नहीं, बंद कारखाने कहां से खुलवाएगी! बुजुर्ग बताते हैं कि महज 64 करोड़ के घाटे के कारण परदहां कॉटन मिल को सरकार ने बंद कर दिया था. इस बंदी के कारण पांच हजार से अधिक कर्मचारी बेरोजगार हो गए थे. विडंबना यह है कि योगी सरकार बनने के 25 दिनों के भीतर इस मिल को फिर से चालू कराने की बात कही गई थी. अधिकारियों और इंजीनियरों की टीम ने बंद मिल का निरीक्षण करने की औपचारिकता भी पूरी कर ली, लेकिन सारी कवायद सतही सियासत ही साबित हो रही है. उल्लेखनीय है कि 15 जनवरी 1974 में शुरू हुई यह मिल वर्ष 2005 में महज 64 करोड़ के घाटे की वजह से बंद कर दी गई. तब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.

बंद में यूपी का नाम, चालू में कहीं नहीं
केंद्र सरकार की यह आधिकारिक स्वीकारोक्ति है कि देश की 682 बड़ी कपड़ा मिलें बंद पड़ी हैं. 1399 कपड़ा मिलें चल रही हैं. 30 जून 2017 तक की सूचना के मुताबिक देश में 1399 कपड़ा मिलें परिचालित हो रही हैं और 682 कपड़ा मिलें बंद हैं. बंद पड़ी कपड़ा मिलों में सबसे अधिक तमिलनाडु की 232 कपड़ा मिलें शामिल हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र में 85, उत्तर प्रदेश में 60, गुजरात में 52 और हरियाणा में 42 कपड़ा मिलें बंद हैं. तमिलनाडु में 752 कपड़ा मिलें अब भी चल रही हैं. मध्य प्रदेश में 135 कपड़ा मिलें, महाराष्ट्र में 135, पंजाब में 97, गुजरात में 55 और राजस्थान में 41 कपड़ा मिलें परिचालित हो रही हैं, लेकिन इनमें उत्तर प्रदेश का नाम कहीं शामिल नहीं है. इन मुद्दों पर राजनीतिक दलों का कभी ध्यान नहीं जाता और यह व्यापक जन-आंदोलन का कारण बने, इस बारे में नेताओं की शातिराना चुप्पी सधी रहती है.