Thursday, 18 January 2018

मोदी सरकार का खतरनाक नसबंदी अभियान-2... स्वास्थ्य मंत्रालय और न्यूज़ चैनल दोनों की कलई खुली

 
प्रभात रंजन दीन
गर्भधारण रोकने के लिए महिलाओं को ‘डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एसिटेट’ (डीएमपीए) दवा इंजेक्ट की जा रही है. दुनिया के कई देशों में खतरनाक यौन अपराधियों की यौन ग्रंथी नष्ट करने के लिए उन्हें सजा के बतौर डीएमपीए दवा काइंजेक्शन दिया जाता है, जिसे मेडिको-लीगल शब्दावली में ‘केमिकल कैस्ट्रेशन’ कहते हैं. यह दवा पुरुषों और महिलाओं के शरीर को घातक रूप से नुकसान पहुंचाती है. ‘चौथी दुनिया’ के पास दुनियाभर के चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह और रिपोर्ट, चिकित्सा शोध संस्थाओं के रिसर्च पेपर्स, अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रतिष्ठानों की रिपोर्ट्स, सामाजिक विशेषज्ञों की राय, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सामाजिक-अकादमिक फोरम पर रखे गए शोध-पत्रऔर दवा कंपनी की तकनीकी प्रोडक्ट रिपोर्ट्स हैं. इसके अलावा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का वह आधिकारिक ‘फ्रॉड’मूल-आधार है, जिसने ऐसे अमानुषिक कृत्य का पर्दाफाश करने का रास्ता खोला और ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं की देह में जहर चुभोये जाने का सरकारी योजना का सच सामने आ सका. कुछ प्रमुख वेब-मीडिया संस्थानों ने इस खबर को देश के जरूरी मुद्दे की तरह उठाया. समाचार चैनल ‘न्यूज़-24’ ने ‘चौथी दुनिया’ की पूरी खबर दिखाई, उसे ‘वाइरल’ भी बताया और आखिर में एक ही झटके में उसे ‘झूठा’ घोषित कर दिया. ‘चौथी दुनिया’ की खबर की समीक्षा करते हुए ‘न्यूज-24’ ने केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे और दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. माला श्रीवास्तव से एक झटके में बयान लिया और दूसरे झटके में खबर को ‘झूठा’ बता कर कार्यक्रम का शटर गिरा दिया. केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री और गायनोकोलॉजिस्ट ने क्या कहा, इसका हम तथ्यवार विवरण आपके समक्ष रख रहे हैं.
‘चौथी दुनिया’ने अपनी पिछली कवर स्टोरी (8 से 14 जनवरी 2018) में सात प्रमुख बिंदु सामने रखे थे. वे सात मुद्दे ‘चौथी दुनिया’ की कवर-स्टोरी के केंद्रीय तत्व हैं. समाचार चैनल ‘न्यूज-24’ ने इन तथ्यों को दिखाया जरूर, लेकिन अपनी तथाकथित छानबीन में इन सात केंद्रीय तत्वपर ध्यान केंद्रित नहीं किया. इन बिंदुओं पर न अपनी कोई जानकारी हासिल की, न कोई पढ़ाई की और न कोई शोध किया. चैनल ने महज दो लोगों (केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री और गायनोकोलॉजिस्ट) से फौरी तौर पर बयान लिया औरखबर के आधारभूत तथ्यों पर कोई पत्रकारीय सवाल-जवाब भी नहीं किया. उन्होंने जो कहा उसे ‘जजमेंट’ समझ लिया. केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने तो फिर भी सत्ता-चरित्र से जरा अलग हट कर थोड़ी ईमानदारी बरती. हालांकि उन्होंने एक सरकारी नुमाइंदे की तरह ही बयान दिया और सरकार के कृत्य को सही ठहराया, लेकिन यह भी कहा, ‘दवा के साइड-इफेक्ट्स हो सकते हैं, हम इसे खारिज नहीं करते’. दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. माला श्रीवास्तव ने डीएमपीए दवा के बारे में बताने के बजाय उसे लगवाने के तौर-तरीके बताने शुरू कर दिए,फिर कहा कि डीएमपीए इंजेक्शन से माताओं के दूध पर कोई असर नहीं पड़ता. गायनोकोलॉजिस्ट ने माताओं के शरीर पर होने वाले नुकसान की कोई चर्चा नहीं की और न ‘न्यूज-24’ ने उनसे ये सवाल पूछे. जानकारी रहती तो सवाल पूछते. डॉक्टर ने दूध पर ही कहा और चैनल ने दूध पर ही कार्यक्रम रोक दिया. डीएमपीए इंजेक्शन माताओं के शरीर पर क्या-क्या घातक नुकसान करता है, इसके आधिकारिक विस्तार में जाने से पहले हम दूध पर ही बात कर लें. भोपाल गैस त्रासदी में सुप्रीमकोर्ट द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच और सलाहकार समिति की सदस्य रहीं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्यातिप्राप्त चिकित्साशास्त्री डॉक्टर सी. सत्यमाला कहती हैं कि डीएमपीए इंजेक्शन महिलाओं और उसकी आने वाली संतति के लिए बेहद खतरनाक (हैज़ार्डस) है. इसका एक इंजेक्शन भी लगवाना खतरनाक है. यह स्तन-पान कराने वाली महिलाओं के लिए और भविष्य में खुद स्वस्थ रह कर स्वस्थ बच्चे की मां बनने की चाहत रखने वाली मां के लिए अत्यंत नुकसानदेह है. डॉक्टर सत्यमाला का कहना है कि डीएमपीए के असर पर शोध में जो तथ्य हासिल हुए, वे इस दवा के इस्तेमाल को पूरी तरह खारिज करते हैं. डेविड वार्नर की चिकित्साशास्त्र की मशहूर किताब ‘व्हेयर देयर इज़ नो डॉक्टर’ में डीएमपीए पर पांच साल शोध करने के बाद तैयार किया गया डॉ. सी. सत्यमाला का शोध-पत्र प्रकाशित किया गया है, जिसने पूरी दुनिया के चिकित्साशास्त्रियों और वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और उसकी संस्था काउंसिल फॉर इंटरनेशनल ऑरगेनाइजेशन ऑफ मेडिकल साइंसेज़ की गाइडलाइंस-11 तो इससे आगे बढ़ कर कहती है कि स्तन-पान कराने वाली महिलाओं को डीएमपीए इंजेक्शन देना ही नहीं चाहिए. डब्लूएचओ की गाइडलाइंस कहती है कि डीएमपीए इंजेक्शन के कारण हड्डी से खनिज तत्वों का क्षरण होने लगता है, लिहाजा दूध बनने की प्रक्रिया बाधित होती है और ऐसे में महिलाओं को डीएमपीए इंजेक्शन दिया जाना गंभीर विपरीत नकारात्मक असर डाल सकता है. ऐसा किया जाना अंतरराष्ट्रीय नियमों और नैतिकता का उल्लंघन है. दूध पिलाने वाली महिलाओं के लिए डीएमपीए इंजेक्शन को ठीक बताने वाली गंगाराम अस्पताल की गायनाकोलॉजिस्ट डॉ. माला श्रीवास्तव को ‘इंडियन जरनल ऑफ मेडिकल एथिक्स’ में प्रकाशित उस रिपोर्ट को ध्यान में रखना ही चाहिए जिसमें आगाह किया गया है कि डीएमपीए इंजेक्शन से स्तन-कैंसर, रीढ़ की हड्डी के कैंसर जैसी तमाम घातक बीमारियों का खतरा बढ़ता है. क्या ऐसे स्तन का दूध नवजात शिशु को पिलाया जाना चाहिए जिसमें कैंसर जैसी बीमारी पल रही हो? ‘न्यूज-24’ को गंगाराम अस्पताल की गायनाकोलॉजिस्ट डॉ. माला श्रीवास्तव से यह सवाल पूछना चाहिए था. ‘इंडियन जरनल ऑफ मेडिकल एथिक्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट में ही आप पाएंगे कि वर्ष 2001 में सुप्रीमकोर्ट के समक्ष भारत सरकार ने यह स्वीकार किया था कि डीएमपीए इंजेक्शन जैसी दवा का व्यापक स्तर (मास लेवल) पर प्रयोग उचित नहीं है. इसका इस्तेमाल किसी भी स्थिति में महिलाओं के लिए संघातक है. फिर ऐसा क्या हुआ कि 2017 में भारत सरकार ने इसे आनन-फानन लागू कर दिया? भारत सरकार ने क्या भारत के लोगों को खतरनाक रसायनिक प्रयोग करने के लिए ‘गिनी-पिग’ समझ रखा है? इस सवाल का जवाब आपको ‘इंडियन जरनल ऑफ मेडिकल एथिक्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट में ही मिल जाएगा, जिसमें यह कहा गया है कि सरकारी अस्पतालों में गरीब महिलाओं को डीएमपीए इंजेक्शन देकर ‘जीवित-प्रयोगशाला’ बना दिया जाएगा. प्रमुख समाजशास्त्री एनबी सरोजिनी और महिला मामलों की विशेषज्ञ प्रख्यात पत्रकार लक्ष्मी मूर्ति का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण का लक्ष्य पूरा करने के लिए डीएमपीए जैसी दवा का प्रयोग देश की महिलाओं और आने वाली नस्लों के स्वास्थ्य को इतना घातक नुकसान पहुंचाएगा कि इसकी कभी भरपाई नहीं हो सकती. दवा बनाने वाली कंपनी ‘फाइज़र’ को भारत में फेज़-3 ट्रायल का कानूनी प्रावधान पूरा किए बगैर इसके इस्तेमाल की इजाजत दे दी गई. क्लिनिकल-ट्रायल की जरूरी औपचारिकता पूरी किए बगैर दवा कंपनी ने ‘पोस्ट मार्केटिंग सर्विलांस सर्वे’ भी कर लिया और इसकी रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं की गई. रिपोर्ट में गलत तथ्यों के भरे जाने की पूरी आशंका है. ऐसे संदेहास्पद सर्वेक्षण और संदेहास्पद आंकड़े (डाटा) के आधार पर डीएमपीए को ‘सेफ’ घोषित कर दिया जाना पूरी तरह संदेहास्पद है. इसे देखते हुए ही महिला संगठनों, स्वास्थ्य संगठनों, मानवाधिकार संगठनों और तमाम विशेषज्ञों ने इस दवा पर पूर्ण पाबंदी लगाने की मांग की थी. लेकिन इसकी सुनवाई नहीं हुई. एनबी सरोजिनी और लक्ष्मी मूर्ति ने इस बारे में ‘इंडियन जरनल ऑफ मेडिकल एथिक्स’ में विस्तार से शोध-परक लेख भी लिखा है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्युट्रिशन, हैदराबाद की पूर्व उप निदेशक डॉ. वीणा शत्रुघ्न कहती हैं कि सरकार ने महिलाओं पर जैसे निशानासाध रखा है.कोई यह ध्यान नहीं रखता कि डीएमपीए इंजेक्शन उसी महिला को लगाया जा सकता है जो पूरी तरह स्वस्थ हो और गर्भधारण नहीं करना चाहती हो. महिला की जागरूकता का मान्य स्तर और उसकी औपचारिक सहमति जरूरी है, क्योंकि इस इंजेक्शन के साइड इफेक्ट्स बहुत गहरे हैं, जिसका खामियाजा तो महिला को ही भुगतना पड़ता है. हमारे देश का हेल्थ-केयर सिस्टम इसके साइड-इफेक्ट्स को हैंडिल नहीं कर सकता. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च के पूर्व असोसिएट प्रोफेसर एवं प्रिंसिपल टेक्निकल अफसर और संस्थान के जेनेटिक टॉक्सिकोलॉजी विभाग के मौजूदा सलाहकार डॉ. एल.के.एस. चौहान कहते हैं कि प्रतिष्ठित साइंस जरनल के संदर्भों को देखते हुए यह साबित होता है कि डीएमपीए इंजेक्शन स्तन कैंसर और यौन संक्रमण का खतरा बढ़ाता है. इस इंजेक्शन के इस्तेमाल से एचआईवी का भी खतरा बहुत बढ़ जाता है. यह दवा रोगों से लड़ने की स्वाभाविक क्षमता (इम्यूनिटी) को नष्ट करती है. जब किसी व्यक्ति के शरीर से इम्युनिटी ही खत्म हो जाएगी, तो वह सर्दी-जुकाम तक नहीं रोक पाएगा, फिर उसे गंभीर बीमारियां तो आसानी से पकड़ेंगी ही! ऐसी दवा को किस वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर मंजूरी दी जा सकती है, यह अपने आप में ही बड़ा सवाल है! डीएमपीए इंजेक्शन से होने वाले निर्बाध रक्तस्राव से ऑस्टियोपोरोसिस जैसी खतरनाक बीमारियां होने का भी अंदेशा रहता है. डॉ. चौहान कहते हैं कि अमेरिका के ‘फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ ने इस दवा को स्वास्थ्य के लिए खतरनाक घोषित कर रखा है. अमेरिका में डीएमपीए इंजेक्शन के पैकेट पर बाकायदा चेतावनी छपी रहती है. वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. चौहान कहते भी हैं कि गर्भधारण रोकने के जब दुनिया में कई सुरक्षित उपाय मौजूद हों तो फिर ऐसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल का कोई तार्किक औचित्य नहीं बनता.
डीएमपीए दवा बनाने वाली कंपनी ‘फाइज़र’ इसके सांघातिक खतरे के बारे में आगाह करती है लेकिन भारत सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय जिस ‘अंतरा’ के नाम पर डिम्पा का इंजेक्शन लगवा रहा है, उसके पैकेट पर ऐसी कोई वार्निंग छपी हुई नहीं है. जबकि कानूनी प्रावधान है कि ऐसे किसी खतरे के बारे में दवा के पैकेट पर प्रमुखता से चेतावनी छापी जाए. डीएमपीए दवा बनाने वाली कंपनी ‘फाइज़र’ की टेक्निकल प्रोडक्ट रिपोर्ट देखें तो आपको हैरत होगी कि जिस दवा के इतने ढेर सारे खतरे खुद दवा बनाने वाली कंपनी बता रही हो, उसे भारत सरकार ने किस अंधत्व में स्वीकार कर लिया? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा हों या स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, वे किस आधार पर यह ऐलान कर देंगे कि दवा का कोई नकारात्मक असर नहीं होता? और कोई न्यूज़ चैनल किस नैतिकता के बूते ‘चौथी दुनिया’ में प्रकाशित खबर को झूठा बता देगा? ‘फाइज़र’ की टेक्निकल रिपोर्टवर्ष 2017 की अद्यतन रिपोर्ट है, जिसके खतरों के बारे में आप चार अलग-अलग लाल रंग के बॉक्स में विस्तार से देख सकते हैं. इन खतरों के बारे में ‘अंतरा’ के पैकेट्स पर चेतावनी क्यों नहीं छापी गई? इसका जवाब स्वास्थ्य मंत्रालय को देना ही चाहिए.
डिम्पा के खतरनाक खेल का बिंदुवार खुलासा-

1- महिलाओं में इंजेक्ट की जा रही है यौन-अपराधियों को सजा में दी जाने वाली दवा
अब हम इस सनसनीखेज प्रकरण का बिंदुवार दृश्य दिखाते हैं. ‘चौथी दुनिया’ ने अपनी कवर-स्टोरी में लिखा है कि अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में खतरनाक यौन अपराधियों को सजा (केमिकल कैस्ट्रेशन) के बतौर डीएमपीए दवा इंजेक्ट की जाती है. अन्य देशों में मानव जीवन का इतना सम्मान है कि खूंखार यौन अपराधियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा में भी डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा इंजेक्ट किए जाने का सामाजिक संगठनों द्वारा विरोध किया जा रहा है. जबकि भारत सरकार यह दवा महिलाओं में धड़ल्ले से इंजेक्ट कर रही है और इस घोर सामाजिक अपराध पर देश चुप्पी साधे है. अमेरिका के कई राज्यों में यौन अपराधियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा के बतौर डीएमपीए का इंजेक्शन दिया जाता है. जबकि डीएमपीए के घातक असर को देखते हुए अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे ‘ब्लैक-बॉक्स’ में डाल रखा है. अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन शरीर पर नकारात्मक और घातक असर डालने वाली डीएमपीए जैसी दवा का यौन-अपराधियों पर भी इस्तेमाल किए जाने का विरोध कर रहा है. अमेरिका के अलावा इंगलैंड, जर्मनी और इजरायल जैसे देशों में भी जीर्ण (क्रॉनिक) यौन-अपराधियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने का प्रावधान है. केमिकल कैस्ट्रेशन में डीएमपीए के इस्तेमाल और उसके खतरनाक असर का संदर्भ ‘विकिपीडिया’ और ‘इंडियन अकादमी ऑफ फॉरेंसिक मेडिसिन’ के ‘जरनल ऑफ इंडियन अकादमी ऑफ फॉरेंसिक मेडिसिन’ में प्रकाशितशोध-पत्र से भी लिया जा सकता है.

2. बिल गेट्स फाउंडेशन से साठगांठ कर स्वास्थ्य मंत्रालय कर रहा है घिनौना कारनामा
डीएमपीए का इस्तेमाल 1993-94 में कुछ खास प्राइवेट सेक्टर में हो रहा था. कई सामाजिक संस्थाएं इस इंजेक्शन के इस्तेमाल पर बैन लगाने की सुप्रीमकोर्ट से मांग कर रही थीं. 1995 में ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑरगेनाइजेशन ने खास तौर पर राष्ट्रीय परिवार नियोजन अभियान में डीएमपीए के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था. वर्ष 2001 में कई दवाएं प्रतिबंधित की गईं, लेकिन डीएमपीए को प्रमोट करने वाली लॉबी इतनी सशक्त थी कि वह बैन नहीं हुई, बस उसे प्राइवेट सेक्टर में सीमित इस्तेमाल की मंजूरी मिली.
डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल को लेकर हो रही कानूनी और व्यापारिक खींचतान में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के कूद पड़ने से डीएमपीए लॉबी मजबूत हो गई. फाउंडेशन ने वर्ष 2012 में ब्रिटिश सरकार को साधा और फिर विश्व के विकासशील और गरीब देशों में जनसंख्या नियंत्रण में सहयोग देने के बहाने अपना रास्ता साफ कर लिया. फाउंडेशन ने मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को साधा. स्वास्थ्य मंत्रालय ने परिवार कल्याण विभाग के जरिए ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) के पास प्रस्ताव भिजवाया कि डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल पर लगी पाबंदी हटाई जाए. डीटीएबी ने उस समय इस प्रस्ताव को टाल दिया और कहा कि इंजेक्शन का कुप्रभाव और गहरा गया है. डीटीएबी ने परिवार कल्याण विभाग को यह सलाह दी कि इस पर विशेषज्ञों से राय ली जाए और इसकी गहन पड़ताल कराई जाए. स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया, उल्टा चारों तरफ से दबाव बढ़ा दिया और सम्बद्ध महकमों पर सरकार का घेरा कस गया. फिर दृश्य बदलता चला गया. परिवार कल्याण विभाग ने 24 जुलाई 2015 को एक सम्मेलन बुलाया और विशेषज्ञों से सुझाव लेने का प्रायोजित-प्रहसन खेला. उन संस्थाओं, विशेषज्ञों और समाजसेवियों को सम्मेलन में बुलाया ही नहीं गया, जो डीएमपीए के इस्तेमाल पर लगातार विरोध दर्ज कराते रहे और कानूनी लड़ाई लड़ते रहे. इस सम्मेलन के बहाने तुगलकी तरीके से यह तय भी कर लिया गया कि प्राइवेट सेक्टर में डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल पहले से हो रहा है, इसलिए इसकी अलग से जांच की कोई जरूरत नहीं है और अब इसे सार्वजनिक क्षेत्र में भी आजमाना चाहिए. जबकि सबको पता है कि प्राइवेट सेक्टर में डीएमपीए के इस्तेमाल का आंकड़ा अत्यंत क्षीण है. दिलचस्प मोड़ तो यह आया कि अब तक विरोध दर्ज करते आ रहे डीटीएबी ने डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल किए जाने की 18 अगस्त 2015 को मंजूरी भी दे दी. इस तरह मोदी सरकार ने मांओं को बांझ बनाने और भावी नस्ल को पंगु बनाने वाली दवा के अराजक इस्तेमाल की भूमिका मजबूत कर दी. डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल का विरोध करने वाले लोगों का मुंह बंद करा दिया गया और मीडिया के मुंह पर ‘ढक्कन’ पहना दिया गया, ताकि कोई शोर न मचे, कोई वितंडा न खड़ा हो.
मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने जुलाई 2017 में ‘मिशन परिवार विकास’ की शुरुआत की और कहा कि इसके जरिए वे 2025 तक देश की जनसंख्या को काबू में ले आएंगे. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की सह अध्यक्ष मेलिंडा गेट्स ने कहा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए यह काम किया जा रहा है. गेट्स फाउंडेशन के फंड पर चलने वाले इस अभियान की मॉनिटरिंग फाउंडेशन का इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट कर रहा है. बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व अन्य सम्बद्ध राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लगातार सम्पर्क में हैं. उनकी सौहार्द मुलाकातें लगातार हो रही हैं. मिशन की फंडिंग का ब्यौरा क्या है, मिशन के ऑपरेशन का खर्च कहां से आ रहा है, दवा कहां से आ रही है, इसकी कीमत क्या है, इस पर रहस्य बना कर रखा जा रहा है, कोई पारदर्शिता नहीं है. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के आगे-पीछे सरकारें नाच रही हैं. फाउंडेशन के आगे विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था भी नतमस्तक रहती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन को फाउंडेशन ने 40 अरब डॉलर का फंड दे रखा है. इसके अलावा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑरगेनाइजेशन) को हर साल तीन अरब डॉलर देता है, जो डब्लूएचओ के सालाना बजट का 10 प्रतिशत होता है. पूरी दुनिया के स्वास्थ्य-अर्थशास्त्र पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और उसके ‘सिंडिकेट’ का बोलबाला है. फिरमोदी सरकार, योगी सरकार, नीतीश सरकार, रघुबर सरकार, सिंधिया सरकार, रमन सरकार, शिवराज सरकार और सोनोवाल सरकार क्या बला है! ये सरकारें भी फाउंडेशन की मुट्ठी में हैं. इसकी एक बानगी देखें, पूरा माजरा समझ में आ जाएगा. मिशन परिवार विकास के नाम पर चल रहे डीएमपीए इंजेक्शन अभियान को मॉनिटर कर रहा है बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट. गेट्स फाउंडेशन ने यूपी कैडर के आईएएस अफसर विकास गोठवाल को इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट का प्रमुख बना रखा है. गेट्स फाउंडेशन से प्रभावित रहे तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गोठवाल को बाकायदा छुट्टी देकर ट्रस्ट ज्वाइन करने की मंजूरी दी थी. गोठवाल का कार्यकाल वर्ष 2014-15-16 के लिए था. फिर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और उन्होंने गेट्स फाउंडेशन के त्वरित-प्रभाव में गोठवाल को अगले तीन साल के लिए भी ट्रस्ट में बने रहने की मंजूरी दे दी.

3. जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर सात राज्यों में शुरू हुआ गंदा खेल
4. देश की निम्न और निम्न-मध्यम वर्ग की महिलाओं को बांझ बनाने का कुचक्र
प्रजनन दर कम करने के लिए ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं को ‘अंतरा’ के नाम से दिया जाने वाला इंजेक्शन ‘डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एसिटेट’ उन्हें भीषण रोग की सुरंग में धकेल रहा है. इस दवा के इस्तेमाल के कुछ अर्से बाद महिलाएं फिर मां बनने लायक नहीं रह जातीं. अगर बनती भी हैं तो बच्चे इतने कमजोर होते हैं कि शीघ्र मौत का शिकार हो जाते हैं, जो बच जाते हैं वे विकलांग होकर रह जाते हैं. फार्माकोलॉजी विशेषज्ञों का कहना है कि डीएमपीए के इस्तेमाल से स्थायी तौर पर शारीरिक परिवर्तन हो जाता है और हड्डियां गलने लगती हैं. पुरुषों में इसका इस्तेमाल करने से उन्हें हृदयाघात और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा रहता है. पुरुषों की छाती महिलाओं की तरह फूलने लगती है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का शारीरिक विन्यास विद्रूप हो जाता है, हड्डी के घनत्व (बोन-मास) में गलन और संकुचन होने लगता है, होठ का रंग बदलने लगता है, बाल झड़ने लगते हैं और मांसपेशियों का घनत्व भी गलने लगता है. डीएमपीए इंजेक्शन ऑस्टियोपोरोसिस और स्तन कैंसर होने में योगदान देता है और इसके इस्तेमाल से कालांतर में गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है. यह एचआईवी के संक्रमण का आसान मददगार बन जाता है. डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने के एक वर्ष के अंदर 55 प्रतिशत महिलाओं के मासिक धर्म में अप्रत्याशित बदलाव देखा गया है और दो वर्ष के अंदर इस अप्रत्याशित घातक बदलाव ने 68 प्रतिशत महिलाओं को अपने घेरे में ले लिया. डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं बाद में जब गर्भधारण करना चाहती हैं तब पैदा होने वाला उनका बच्चा अत्यंत कम वजन का होता है और अधिकतर मामलों में ऐसे बच्चों की साल भर के अंदर मौत हो जाती है. दवा का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के कालांतर में गर्भधारण करने के बाद होने वाले बच्चों के यौन संक्रमित होने का खतरा अत्यधिक रहता है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के मस्तिष्क तंत्र पर भी बुरा असर पड़ता है. इस दवा से ब्रेस्ट कैंसर के अलावा सर्वाइकल (रीढ़ की हड्डी) का कैंसर होने का भी बड़ा खतरा रहता है. वर्ष 2006 का एक अध्ययन बताता है कि दवा के दो साल के प्रयोग से ऑस्टियोपोरोसिस होने की संभावना प्रबल हो जाती है. वर्ष 2012 के एक अध्ययन में यह पता चला कि 12 महीने या उससे अधिक समय तक डीएमपीए के उपयोग से आक्रामक स्तन कैंसर होने के कई केस सामने आए. डीएमपीए इंजेक्ट करने के पहले सम्बन्धित महिला को आगाह (कॉशन) करना जरूरी होता है. साथ ही डॉक्टर का यह दायित्व भी होता है कि वह इंजेक्शन लेने वाली महिला को डीएमपीए से होने वाले नुकसान के बारे में पहले ही बता दे. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. ‘अंतरा’ के पैकेट्स पर भी हिदायत या जोखिम की चर्चा नहीं है, यहां तक कि दवा निर्माता कंपनी का नाम भी दर्ज नहीं है. सामान्य तौर पर बच्चों को दिए जाने वाले टीके में भी चार हिदायतों के साथ टीका लगाया जाता है, लेकिन डिम्पा इंजेक्शन लगाने के पहले कोई हिदायत नहीं दी जा रही है. केंद्र सरकार का यह अभियान देश के निम्न वर्गीय, निम्न मध्यम वर्गीय ग्रामीण और गांव आधारित अशिक्षित, अर्ध-शिक्षित कस्बाई आबादी को टार्गेट कर रहा है. जिला स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कौन महिलाएं जाती हैं और वे किस वर्ग से आती हैं, इसके बारे में सबको पता है. स्वास्थ्य केंद्रों को अधिकाधिक इंजेक्शन लगाने का लक्ष्य दिया गया है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर कोई डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं रहता जो इंजेक्शन देने के पहले सम्बन्धित महिला का हारमोनल-असेसमेंट करे और उसे डीएमपीए इंजेक्शन के खतरों के प्रति आगाह करे. इंजेक्शन देने के पहले सम्बद्ध महिला से सहमति लेने की औपचारिकता केवल कागज पर पूरी की जा रही है. जिस वर्ग से महिलाएं आती हैं, उनकी जागरूकता का स्तर उन्हें इस काबिल नहीं बनाता कि वे लगने वाले इंजेक्शन के खतरों और जोखिम के बारे में कुछ जान पाएं. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘फाइज़र’ और चिल्ड्रेन्स इन्वेस्टमेंट फंड फाउंडेशन के साथ मिल कर कई गरीब देशों में डीएमपीए को ही ‘सायाना-प्रेस’ नाम से बेच रहा है. डीएमपीए इंजेक्शन सिरिंज के जरिए दिया जाता है जबकि ‘सायाना-प्रेस’ के पाउच में सुई लगी होती है. सुई को शरीर में चुभोकर पाउच का सिरा दबा देने से दवा शरीर के अंदर इंजेक्ट हो जाती है. स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि भारत में भी ‘सायाना-प्रेस’ को किसी दूसरे नाम से सीधे महिलाओं को देने की तैयारी चल रही है.

5. आंकड़ों का ‘फ्रॉड’ कर स्वास्थ्य मंत्रालय ने 145 जिलों में पहुंचाया डीएमपीए जहर
6. स्वास्थ्य केंद्रों को दिया गया टार्गेट, अधिक से अधिक महिलाओं को दें डिम्पा इंजेक्शन
मिशन परिवार विकास लॉन्च करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दावा किया था कि इस अभियान के जरिए वर्ष 2025 तक टोटल फर्टिलिटी रेट को 2.1 पर ले आया जाएगा. जबकि सच्चाई यह है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट 1015-16 के सर्वेक्षण में ही 2.1 दर्ज किया जा चुका है. स्पष्ट है कि आधिकारिक आंकड़ों के फर्जीवाड़े में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा की सीधी मिलीभगत है. आंकड़ों का फर्जीवाड़ा करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का वर्ष 2010-11 का पुराना डाटा उठा लिया और नेशनल टोटल फर्टिलिटी रेट 3.8 दिखा कर अधिक से अधिक जिलों को अपनी चपेट में लेने का कुचक्र रचा. केंद्रीय सत्ता के इस नियोजित ‘फ्रॉड’ में यूपी का फर्टिलिटी रेट 5 दिखाया गया और इस आधार पर यूपी के 57 जिलों में धंधा फैला लिया गया. राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) का ताजा आंकड़ा 2015-16 का है, जो यह बताता है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट घट कर 2.1 पर आ चुका है. ताजा आंकड़े के मुताबिक उत्तर प्रदेश का फर्टिलिटी रेट 2.7 पर आ चुका है.

7. ‘मिशन परिवार विनाश’ साबित हो रहा है भारत सरकार का ‘मिशन परिवार विकास’
‘मिशन परिवार विकास’ विनाशकारी इसलिए भी है क्योंकि जिन प्राइवेट अस्पतालों और नर्सिंग होमों में सम्पन्न और धनाढ्य लोग इलाज कराने जाते हैं, वहां के डॉक्टर कुलीन महिलाओं को डीएमपीए इंजेक्शन प्रेसक्राइब नहीं करते. ‘चौथी दुनिया’ ने कई प्राइवेट अस्पतालों में तहकीकात की और प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले कई डॉक्टरों ने भी पूछताछ में कहा कि वे डीएमपीए इंजेक्शन प्रेसक्राइब नहीं करते. अधिकांश डॉक्टरों ने कहा कि महिलाएं गर्भधारण न करें इसके लिए वे पतियों को सलाह देते हैं और महिलाओं को बस गर्भनिरोधक गोली लेने की सलाह देते हैं. डॉक्टरों ने कहा कि डीएमपीए के साइड-इफेक्ट इतने ज्यादा हैं कि उसे संभाल पाना मुश्किल है, इससे क्लिनिक या अस्पताल की साख खराब होगी और व्यवसाय चौपट हो जाएगा. डीएमपीए इंजेक्शन को मंजूरी देने के खिलाफ कई सामाजिक संगठनों ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिख कर उन्हें ऐसा करने से मना किया था. लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई. स्वास्थ्य मंत्रालय की योजना देश के निम्न और मझोले परिवारों के लिए विनाशकारी साबित हो रही है.

सरकार से उसकी पाशविकता के बारे में पूछा जाएगा कि नहीं..!
अंग्रेजी का एक सूत्र-वाक्य है, ‘where ignorance is bliss, it is folly to be wise.’ यानि, जहां अज्ञानता परमानंद हो, वहां ज्ञान ही मूर्खत्व है. मीडिया सार्वजनिक मंच है, हम जो बोलते हैं, लिखते हैं या प्रतिक्रिया देते हैं, उसकी व्यापक श्रवणीयता और पठनीयता है. बिना सोचे-समझे, बिना किसी सामाजिक-मानवीय सरोकार के, बिना कुछ जानकारी हासिल किए, बगैर कुछ पढ़े-लिखे हम किसी भी गंभीर मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हैं तो हम यह नहीं समझते कि हमारे ही व्यक्तित्व का हास्य-पतंग सामाजिक आकाश पर उड़ता है और यह चारों तरफ स्थापित करता है कि हमारी अज्ञानता ही हमारा परमानंद है. इस ‘परमानंद के भाव’ के प्रति हमें सतर्क रहना चाहिए.
अभी का प्रसंग वह खबर है जो ‘चौथी दुनिया’ में प्रकाशित हुई और जिसे सोशल मीडिया का भी हिस्सा बनाया गया, ताकि वह और व्यापक दायरे में फैले और समाज में बृहत्तर सकारात्मक बहस का मार्ग प्रशस्त कर सके. ‘चौथी दुनिया’ में प्रकाशित खबर अत्यंत संवेदनशील है. इस खबर पर पिछले पांच महीने से काम चल रहा था, जब ‘मिशन परिवार विकास’ शुरू करने की घोषणा हुई थी. स्वास्थ्य विभाग के एक आला अधिकारी ने तब ही कहा था कि केंद्र ने जिस ‘नेशनल फर्टिलिटी रेट’ के आधार पर देश के 145 जिलों में यह मिशन शुरू किया है, वह आंकड़ा 2010-11 का है. यानि, केंद्र सरकार ने 2015-16 का ‘नेशनल फर्टिलिटी रेट’ छुपा लिया और पिछला वाला अधिक फर्टिलिटी रेट बता कर अधिक जिलों को इस योजना के दायरे में ले लिया. आखिर केंद्र सरकार ने झूठ का सहारा क्यों लिया? क्या बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन से टेबुल के नीचे से मिलने वाले दो-तीन सौ करोड़ रुपए के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री झूठ परोसेंगे? यह सच है कि दुनिया के स्वास्थ्य-अर्थ (हेल्थ-इकोनॉमी) पर बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन का एकाधिपत्य है. लेकिन इस योजना के पीछे क्या केवल अर्थ (पैसा) है? या इसके पीछे कोई अनर्थ छुपा है? इन सवालों की छानबीन करने के क्रम में डीएमपीए पर ध्यान गया, जिसे ‘अंतरा’ के नाम से महिलाओं में इंजेक्ट किया जा रहा है. दवा के गुणधर्म को लेकर जांच-पड़ताल हुई और जो परिणाम सामने आया, उसने हिला कर रख दिया. फिर ‘डीएमपीए’ को लेकर दुनिया के कई महत्वपूर्ण मेडिकल जर्नल्स से लेकर चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और मेडिको-लीगल एक्सपर्ट्स के मंतव्य और संदर्भ पढ़े गए. विशेषज्ञों से विस्तार से बात की गई. और तब यह लगा कि केंद्र सरकार की इस योजना के पीछे केवल धन की लोलुपता नहीं, बल्कि इसके पीछे कुछ और ही खतरनाक इरादा है. वह इरादा क्या हो सकता है, इसी पर तो समाज में बहस होनी चाहिए और लोकतांत्रिक दायित्वों के तहत सरकार से जवाब मांगा जाना चाहिए.
जो दवा खूंखार यौन अपराधियों को सजा के बतौर दी जाती है उसे अशिक्षित, अर्ध-शिक्षित महिलाओं में इंजेक्ट किया जा रहा है, महज इसलिए कि जनसंख्या कम हो सके? यह कैसी जघन्य बात है? और ऐसी जघन्य हरकतों पर इसी देश का कोई नागरिक यह बोले कि देश की विशाल जनसंख्या कम करने के लिए यह जरूरी है, या मीडिया सत्ता-सुर में रेंके... तो आप सोचेंगे न कि हम कैसे देशवासी हैं..! इस खबर को समाचार चैनल ‘न्यूज-24’ ने कह दिया कि फर्जी है तो दूसरी तरफ एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बढ़ती जनसंख्या का हवाला देते हुए इसे जरूरी बता दिया. फिर अपनी बात सुधारते हुए कहा कि हर दवा के थोड़े साईड इफेक्ट तो होते हैं. कुछ लोगों ने इसे मुस्लिम-प्रेरित बताने का भी धर्म निभाया.
इन बेमानी बहसों में उलझने के बजाय सरकार की पाशविकता पर बहस होनी चाहिए थी. यह प्रामाणिक तथ्य है कि डीएमपीए का इंजेक्शन लेने वाली महिला अगर दो साल बाद मां बनना चाहे तो उसके गर्भधारण में तमाम बाधाएं आएंगी. डीएमपीए की तासीर है कि वह हड्डियां गलाएगी, शारीरिक विन्यास को विद्रूप करेगी, रासायनिक स्राव से कोख गंदा करेगी, मासिकधर्म को बाधित करेगी, स्तन कैंसर से लेकर रीढ़ की हड्डी में कैंसर का रोग बढ़ाएगी, महिला की देह को खतरनाक यौन-रोगों के संक्रमण का उपकरण बना देगी और ऐसी जर्जर महिलाओं से जो नस्ल पैदा होगी, वह विकलांग, मानसिक रूप से अर्ध विकसित और पंगु निकलेगी. बहस इस बात पर होनी चाहिए या इस बात पर कि जनसंख्या रोकने के लिए यह जरूरी कदम है? देश के जिन 145 जिलों को इसके लिए टार्गेट बनाया गया है, वहां का सामाजिक ढांचा देखेंगे तो आपको रोना आएगा. कोई शिक्षा नहीं, कोई जागरूकता नहीं, इन्हें क्या पता कि डीएमपीए का जहर उनकी नस्ल का नाश करने वाला है! ऐसी दवाओं के इस्तेमाल के लिए ऐसे ही पिछड़े इलाकों को क्यों चुना जाता है जहां जागरूकता का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं! उन भोले-भाले ग्रामीणों को क्या पता कि जो दवा उनके परिवार की महिलाओं को इंजेक्ट किया जा रहा है, उस दवा का इस्तेमाल यौन अपराधियों की यौन-क्षमता नष्ट करने के लिए किया जाता है! तो क्या केंद्र सरकार से यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि देश की महिलाओं की यौन क्षमता क्यों नष्ट की जा रही है? या कि अंधभक्तों की जमात में शामिल होकर हम लोकतंत्र को अपने ही पैरों तले कुचल दें..! क्या सरकार को यह बताना हमारी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी नहीं कि बढ़ती जनसंख्या को काबू में करने के और भी तरीके हैं, मानवीय से लेकर प्रशासनिक तक..! जनसंख्या को नौकरी से लेकर सुविधाओं तक जोड़ें, लोगों को दिमागी तौर पर यह समझाएं कि आबादी बढ़ाना अपना ही नुकसान है! ऐसा नहीं करके क्या जनसंख्या कम करने के लिए सरकार नरसंहार करेगी..? यह डीएमपीए का इंजेक्शन रसायनिक-नरसंहार नहीं है तो क्या है? सरकार से यह पूछा जाना चाहिए कि नहीं..?

Tuesday, 2 January 2018

मोदी सरकार का खतरनाक नसबंदी अभियान

प्रभात रंजन दीन
जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए केंद्र सरकार देश की मांओं को बांझ बनाने की दवा चुभो रही है. राष्ट्रधर्मी मोदी सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मिल कर महिलाओं में वह जहर इंजेक्ट कर रहा है जो खूंखार यौन अपराधियों को ‘केमिकल कैस्ट्रेशन’ की सजा के तहत ठोका जाता है. बलात्कारियों और यौन अपराधियों की यौन-ग्रंथी नष्ट करने के लिए दी जाने वाली दवा ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं में अनिवार्य रूप से इंजेक्ट की जा रही है, ताकि देश की जनसंख्या कम की जा सके. यह ‘मिशन परिवार विनाश’ अभियान है जो विदेशी कुचक्र और धन के कंधे पर चढ़ कर भारत के सात राज्यों के 145 जिलों में दाखिल हो चुका है. इनमें उत्तर प्रदेश के 57 जिले शामिल हैं. मोदी सरकार के ‘मिशन परिवार विनाश’ कार्यक्रम के लिए भाजपा शासित सात राज्य चुने गए हैं, जिससे धन और षडयंत्र का खेल निर्बाध रूप से खेला जा सके. उत्तर प्रदेश समेत बिहार, झारखंड, असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के 145 जिलों के जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए महिलाओं को ‘डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट’ (डीएमपीए) इंजेक्शन अनिवार्य रूप से दिया जा रहा है. यही दवा कई देशों में खूंखार यौन अपराधियों की यौन-ग्रंथी नष्ट करने के लिए सजा के बतौर इंजेक्ट की जाती है.
अधिक जनसंख्या वाले सात भाजपा शासित राज्यों के अधिक से अधिक जिलों में ‘मिशन परिवार विनाश’ का धंधा फैलाने के लिए जेपी नड्डा के नेतृत्व वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने आधिकारिक आंकड़ों का सुनियोजित ‘फ्रॉड’ किया. आंकड़ों का फर्जीवाड़ा करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का वर्ष 2010-11 का पुराना डाटा उठा लिया और नेशनल टोटल फर्टिलिटी रेट 3.8 दिखा कर अधिक से अधिक जिलों को अपनी चपेट में लेने का कुचक्र रचा. केंद्रीय सत्ता के इस नियोजित ‘फ्रॉड’ में यूपी का फर्टिलिटी रेट 5 दिखाया गया और इस आधार पर यूपी के 57 जिलों में धंधा फैला लिया गया. राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) का ताजा आंकड़ा 2015-16 का है, जो यह बताता है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट घट कर 2.1 पर आ चुका है. ताजा आंकड़े के मुताबिक उत्तर प्रदेश का फर्टिलिटी रेट 2.7 पर आ गया है. अगर स्वास्थ्य मंत्रालय इस अद्यतन (करेंट) आंकड़े को आधार बनाता तो इंजेक्शन का कुचक्र बहुत कम जिलों में फैल पाता. लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने जानबूझ कर पुराने आंकड़े (एनएफएचएस-3) को आधार बनाया और अधिकाधिक जिलों का चयन कर लिया. ताजा आंकड़ों के आधार पर मिशन परिवार विकास का दायरा कम जिलों में ही केंद्रित होता, लेकिन अधिक स्थानों पर घुसने के लिए सरकार और गेट्स फाउंडेशन ने बढ़ा हुआ टीएफआर दिखा कर देशभर के 145 जिलों और यूपी के 57 जिलों में घुसपैठ बना ली. सुनियोजित फर्जीवाड़े की जमीन तैयार कर मांओं में जहर निरूपित करने और देश को बांझ बनाने का धंधा चल रहा है. यौन अपराधियों को सजा के बतौर दिया जाने वाला इंजेक्शन डीएमपीए सात राज्यों के 145 जिला अस्पतालों तक पहुंच चुका है और बड़ी तेजी से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने वाला है. अभी थोड़ा समय बचा है, जनता चाहे तो इसे समय रहते रोक सकती है. जिला, सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और मददगार विभागों और संस्थाओं को बाकायदा यह टार्गेट दिया गया है कि वे अधिकाधिक संख्या में महिलाओं में डीएमपीए दवा इंजेक्ट करें.
‘अंतरा’ के नाम से दिया जाने वाला इंजेक्शन ‘डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट’ (डीएमपीए) महिलाओं को भीषण रोग की सुरंग में धकेल रहा है. इस दवा के इस्तेमाल के कुछ ही दिनों बाद महिलाएं फिर मां बनने लायक नहीं रह जातीं. अगर बनती भी हैं तो बच्चे इतने कमजोर होते हैं कि शीघ्र मौत का शिकार हो जाते हैं, जो बच जाते हैं वे विकलांग और पंगु होकर रह जाते हैं. विश्व के कई देशों में खतरनाक यौन अपराधियों की यौन ग्रंथि को रासायनिक विधि से नष्ट करने (केमिकल कैस्ट्रेशन) के लिए डेपो-प्रोवेरा (डीएमपीए) इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता रहा है. फार्माकोलॉजी विशेषज्ञों का कहना है कि डीएमपीए के इस्तेमाल से स्थायी तौर पर शारीरिक परिवर्तन हो जाता है और हड्डियां गलने लगती हैं. पुरुषों में इसका इस्तेमाल करने से उन्हें हृदयाघात और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा रहता है. पुरुषों की छाती महिलाओं की तरह फूलने लगती है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का शारीरिक विन्यास विद्रूप हो जाता है, हड्डी के घनत्व (बोन-मास) में गलन और संकुचन होने लगता है, होठ का रंग बदलने लगता है, बाल झड़ने लगते हैं और मांसपेशियों का घनत्व भी गलने लगता है. डीएमपीए इंजेक्शन ऑस्टियोपोरोसिस और स्तन कैंसर होने में योगदान देता है और इसके इस्तेमाल से कालांतर में गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है. यह एचआईवी के संक्रमण का आसान मददगार बन जाता है. चिकित्सा विशेषज्ञ कहते हैं कि डीएमपीए के मामले में स्थिति अत्यंत जटिल है. विडंबना है कि देश की मांओं में डीएमपीए दवा इंजेक्ट करने के लिए सरकार प्रायोजित ‘फ्रॉड’ तो हुआ, लेकिन इस खतरनाक दवा के कारण महिलाओं में होने वाले ऑस्टियोपोरोसिस और स्तन कैंसर जैसे तमाम जानलेवा रोगों को लेकर कोई सरकार प्रायोजित शोध नहीं हुआ. डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने के एक वर्ष के अंदर 55 प्रतिशत महिलाओं के मासिक धर्म में अप्रत्याशित बदलाव देखा गया है और दो वर्ष के अंदर इस अप्रत्याशित घातक बदलाव ने 68 प्रतिशत महिलाओं को अपने घेरे में ले लिया. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में एचआईवी और यौन संक्रमण (क्लैमाइडिया इन्फेक्शन) का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है. डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं बाद में जब गर्भधारण करना चाहती हैं तब पैदा होने वाला उनका बच्चा अत्यंत कम वजन का होता है और अधिकतर मामलों में ऐसे बच्चों की साल भर के अंदर मौत हो जाती है. दवा का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के कालांतर में गर्भधारण करने के बाद होने वाले बच्चों के यौन संक्रमित होने का खतरा अत्यधिक रहता है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के मस्तिष्क तंत्र पर भी बुरा असर पड़ता है. इस दवा से ब्रेस्ट कैंसर के अलावा सर्वाइकल (रीढ़ की हड्डी) का कैंसर होने का भी बड़ा खतरा रहता है. वर्ष 2006 का एक अध्ययन बताता है कि दवा के दो साल के प्रयोग से ऑस्टियोपोरोसिस होने की संभावना प्रबल हो जाती है. वर्ष 2012 के एक अध्ययन में यह पता चला कि 12 महीने या उससे अधिक समय तक डीएमपीए के उपयोग से आक्रामक स्तन कैंसर होने के कई केस सामने आए. डीएमपीए इंजेक्ट करने के पहले सम्बन्धित महिला को आगाह (कॉशन) करना जरूरी होता है. साथ ही डॉक्टर का यह दायित्व भी होता है कि वह इंजेक्शन लेने वाली महिला को डीएमपीए से होने वाले नुकसान के बारे में पहले ही बता दे. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. ‘अंतरा’ के पैकेट्स पर भी हिदायत या जोखिम की चर्चा नहीं है, यहां तक कि दवा निर्माता कंपनी का नाम भी दर्ज नहीं है. सामान्य तौर पर बच्चों को दिए जाने वाले टीके में भी चार हिदायतों के साथ टीका लगाया जाता है, लेकिन डिम्पा इंजेक्शन लगाने के पहले कोई हिदायत नहीं दी जा रही है. दिहाड़ी मजदूर मुकेशचंद्र की पत्नी का नाम महज एक उदाहरण के बतौर पेश किया जा रहा है, जिसे डिम्पा इंजेक्शन लगाया गया और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. इंजेक्शन के पहले मुकेश की पत्नी पूरी तरह से स्वस्थ थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद हालत उनकी बिगड़ने लगी. 20 दिन में ही इतना रक्तस्राव हुआ कि एक निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. डिम्पा इंजेक्शन लगाने वालों का कुछ पता नहीं चला. महिला की हालत गंभीर हुई तो महिला के पहले से ही बीमार होने का तोहमत मढ़ दिया गया. मुकेश की पत्नी की तरह के दर्जनों उदाहरण सामने आ चुके हैं, जो इंजेक्शन का नतीजा अपने शरीर और अपनी सीमित आर्थिक क्षमता पर भुगत रहे हैं. डीएमपीए इंजेक्शन महिलाओं को रोगग्रस्त कर भावी नस्लों को खराब करने की साजिश साबित हो रहा है.
केंद्र सरकार का यह अभियान देश के निम्न वर्गीय, निम्न मध्यम वर्गीय ग्रामीण और गांव आधारित अशिक्षित, अर्ध-शिक्षित कस्बाई आबादी को टार्गेट कर रहा है. जिला स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए ‘अंतरा’ के नाम से डीएमपीए दवा का इंजेक्शन महिलाओं में ठोका जा रहा है. जिला स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक कौन सी महिलाएं जाती हैं और वे किस वर्ग से आती हैं, इसके बारे में सबको पता है. स्वास्थ्य केंद्रों को अधिकाधिक इंजेक्शन लगाने का लक्ष्य दिया गया है. इन स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात डॉक्टरों को यह भी नहीं कहा गया है कि इंजेक्शन देने के पहले वे सम्बन्धित महिला का हारमोनल-असेसमेंट करें उसे डीएमपीए इंजेक्शन के खतरों के प्रति आगाह करें. इंजेक्शन के स्टरलाइजेशन और उसके रख-रखाव को लेकर कोई हिदायत नहीं है. यहां तक कि महिलाओं को खुद ही इंजेक्शन ले लेने की सलाह दी जा रही है. इंजेक्शन देने के पहले सम्बद्ध महिला से सहमति लेने की औपचारिकता केवल कागज पर पूरी की जा रही है. महिलाओं से बिना पूछे धड़ल्ले से इंजेक्शन ठोका जा रहा है. जिस वर्ग से महिलाएं आती हैं, उनकी जागरूकता का स्तर उन्हें इस काबिल ही नहीं बनाता कि वे लगने वाले इंजेक्शन के खतरों और जोखिम के बारे में कुछ जान पाएं. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘फाइज़र’ और चिल्ड्रेन्स इन्वेस्टमेंट फंड फाउंडेशन के साथ मिल कर कई गरीब देशों में डीएमपीए को ही ‘सायाना-प्रेस’ नाम से बेच रहा है. डीएमपीए इंजेक्शन सिरिंज के जरिए दिया जाता है जबकि ‘सायाना-प्रेस’ के पाउच में सुई लगी होती है. सुई को शरीर में चुभोकर पाउच का सिरा दबा देने से दवा शरीर के अंदर इंजेक्ट हो जाती है. स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि भारत में भी ‘सायाना-प्रेस’ को सीधे महिलाओं को देने की तैयारी चल रही है. 
डीएमपीए का इस्तेमाल 1993-94 में कुछ खास प्राइवेट सेक्टर में हो रहा था. कई सामाजिक संस्थाएं इस इंजेक्शन के इस्तेमाल पर बैन लगाने की सुप्रीमकोर्ट से मांग कर रही थीं. 1995 में ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑरगेनाइजेशन ने खास तौर पर राष्ट्रीय परिवार नियोजन अभियान में डीएमपीए के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था. बोर्ड ने कहा था कि विशेष स्थिति में यह इंजेक्शन उसी महिला को लगाया जाएगा, जो इसके खतरों और जोखिम के बारे में जानकारी के साथ बाकायदा सूचित रहेंगी. वर्ष 2001 में कई दवाएं प्रतिबंधित हुई, लेकिन डीएमपीए को प्रमोट करने वाली लॉबी इतनी सशक्त थी कि वह बैन नहीं हुई, बस उसे प्राइवेट सेक्टर में सीमित इस्तेमाल की मंजूरी मिली, इस हिदायत के साथ कि इंजेक्शन का इस्तेमाल उन्हीं महिलाओं पर किया जाएगा जिनकी पहले काउंसलिंग होगी और उन्हें खतरों के बारे में आगाह कर उनकी औपचारिक सहमति ली जाएगी.
डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल को लेकर हो रही कानूनी और व्यापारिक खींचतान में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के कूद पड़ने से डीएमपीए लॉबी मजबूत हो गई. फाउंडेशन ने पहले तो वर्ष 2012 में ब्रिटिश सरकार को साधा और फिर विश्व के विकासशील और गरीब देशों में जनसंख्या नियंत्रण में सहयोग देने के बहाने अपना रास्ता साफ कर लिया. फाउंडेशन ने मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को साधा और स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘सधते’ हुए परिवार कल्याण विभाग के जरिए ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) के पास प्रस्ताव भिजवाया कि डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल पर लगी पाबंदी हटाई जाए. डीटीएबी ने उस समय इस प्रस्ताव को टाल दिया और कहा कि इंजेक्शन का कुप्रभाव और गहरा गया है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं पर ओस्टिपोयोरोटिक-कुप्रभाव भीषण पड़ रहा है. लिहाजा, डीटीएबी ने परिवार कल्याण विभाग को यह सलाह दी कि डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल के बारे में देश के नामी स्त्री रोग विशेषज्ञों (गायनाकोलॉजिस्ट) से राय ली जाए और इसकी गहन पड़ताल कराई जाए. डीटीएबी ने अमेरिका के फूड और ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा डीएमपीए को ‘ब्लैक-बॉक्स’ में रखे जाने का हवाला भी दिया. लेकिन लोकतांत्रिक मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया, उल्टा चारों तरफ से दबाव बढ़ा दिया गया और सम्बद्ध महकमों पर सरकार का घेरा कस गया. मंत्रालय के निर्देश पर परिवार कल्याण विभाग ने 24 जुलाई 2015 को विशेषज्ञों का सम्मेलन बुलाया और इस मसले पर विशेषज्ञों से सलाह-सुझाव लेने का प्रायोजित-प्रहसन खेला. इस सम्मेलन में उन संस्थाओं, विशेषज्ञों और समाजसेवियों को बुलाया ही नहीं गया, जो डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल पर लगातार विरोध दर्ज कराते रहे और कानूनी लड़ते रहे हैं. एक हजार से अधिक संगठनों की साझा संस्था जन स्वास्थ्य अभियान, सहेली, सामा जैसी तमाम संस्थाओं को इस सम्मेलन में प्रवेश नहीं करने दिया गया. इस सम्मेलन ने यह तय भी कर लिया कि प्राइवेट सेक्टर में डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल पहले से हो रहा है, इसलिए इसकी अलग से जांच कराने की कोई जरूरत नहीं है और अब इसे सार्वजनिक क्षेत्र में भी आजमाना चाहिए. दिलचस्प मोड़ यह आया कि अब तक विरोध दर्ज करते आ रहे ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड ने सामुदायिक स्वास्थ्य प्रणाली (पब्लिक हेल्थ सिस्टम) में डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल किए जाने की 18 अगस्त 2015 को मंजूरी दे दी. इस तरह मोदी सरकार ने देश की मांओं को बांझ बनाने वाली और भावी नस्ल को पंगु और विकलांग पैदा करने वाली दवा के अराजक इस्तेमाल की भूमिका मजबूत कर दी. डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल का विरोध करने वाले लोगों का मुंह बंद करा दिया गया और मीडिया के मुंह पर ‘ढक्कन’ पहना दिया गया, ताकि कोई शोर न मचे, कोई वितंडा न खड़ा हो.
मोदी सरकार के ताकतवर और हठी स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने जुलाई 2017 में ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर ‘मिशन परिवार विनाश’ अभियान की शुरुआत कर दी. नड्डा ने खुलेआम कहा कि इसके जरिए वे 2025 तक देश की जनसंख्या को काबू में ले आएंगे. कैसे काबू में लाएंगे, अब तक तो आप इसे समझ ही चुके होंगे. नड्डा ने यह भी दावा किया था कि इस परियोजना की पहल उन्होंने ही की है. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव सीके मिश्रा ने इस परियोजना के पक्ष में लंदन से अपना संदेश दिया. इस पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की सह अध्यक्ष मेलिंडा गेट्स ने कहा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए यह काम किया जा रहा है. मिशन परिवार विकास लॉन्च करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने दावा किया कि इस अभियान के जरिए वर्ष 2025 तक टोटल फर्टिलिटी रेट को 2.1 पर ले आया जाएगा. जबकि सच्चाई यह है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट 1015-16 के सर्वेक्षण में ही 2.1 दर्ज किया जा चुका है. स्पष्ट है कि आधिकारिक आंकड़ों के फर्जीवाड़े में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा की सीधी मिलीभगत है. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के फंड पर चलने वाले इस अभियान की मॉनिटरिंग गेट्स फाउंडेशन का इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट कर रहा है. इस सिलसिले में बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व अन्य सम्बद्ध राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लगातार सम्पर्क में हैं. उनकी सौहार्द मुलाकातें भी लगातार हो रही हैं. मिशन की फंडिंग का ब्यौरा क्या है, मिशन के ऑपरेशन का खर्च कहां से आ रहा है, दवा कहां से आ रही है, इसकी कीमत क्या है, इस पर रहस्य बना कर रखा जा रहा है, कोई पारदर्शिता नहीं है. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के आगे-पीछे सरकारें नाच रही हैं. फाउंडेशन के आगे विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था भी नतमस्तक रहती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन को फाउंडेशन ने 40 अरब डॉलर का फंड दे रखा है. इसके अलावा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑरगेनाइजेशन) को हर साल तीन अरब डॉलर देता है, जो संगठन के सालाना बजट का 10 प्रतिशत होता है. पूरी दुनिया के स्वास्थ्य-अर्थशास्त्र पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और उसके ‘सिंडिकेट’ का बोलबाला है, फिर मोदी सरकार, योगी सरकार, नीतीश सरकार, रघुबर सरकार, सिंधिया सरकार, रमन सरकार, शिवराज सरकार और सोनोवाल सरकार क्या बला है..!

जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर किया जा रहा है महिलाओं का केमिकल-कैस्ट्रेशन
भारत में निर्भया कांड के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने यौन अपराधियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने की तैयारी की थी, लेकिन फिर यह ठंडे बस्ते में चला गया. कांग्रेस ने यह प्रस्ताव न्यायमूर्ति जेएस वर्मा आयोग को सौंपने का फैसला किया था, लेकिन बाद में इसे हटा लिया. जब कांग्रेस ने वर्मा आयोग को अपने सुझाव सौंपे तब उसमें केमिकल कैस्ट्रेशन का प्रस्ताव शामिल नहीं था. कांग्रेस सरकार ने बलात्कारियों को 30 साल तक की सजा देने, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने और आयु सीमा घटाकर जुवेनाइल एक्ट को नए सिरे पारिभाषित करने की सिफारिश की थी. कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और तत्कालीन मंत्री रेणुका चौधरी ने बलात्कारियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने की मांग की थी. बलात्कारियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने के कांग्रेसी विचार को भाजपा सरकार ने ठीक विपरीत तरीके से देश में लागू कर दिया. भाजपा सरकार जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर देश की महिलाओं का केमिकल कैस्ट्रेशन करा रही है.

भाजपा सरकार का सोचा-समझा अमानुषिक कृत्य और सोची-समझी चुप्पी
संसार के कई देशों में खूंखार यौन अपराधियों को भी केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने का विरोध हो रहा है, लेकिन भारत सरकार केमिकल कैस्ट्रेशन में इस्तेमाल आने वाली दवा भारतवर्ष की आम महिलाओं में धड़ल्ले से इंजेक्ट करने का अमानुषिक कृत्य कर रही है. इस घनघोर सामाजिक अपराध के खिलाफ पूरा देश चुप्पी साधे है. न सामाजिक संगठन सड़क पर आ रहे हैं और न बुद्धिजीवी और मानवाधिकारकर्मी. धुआं और सड़क जाम पर इजलास सजा कर बैठ जाने वाली अदालतें भी इतने गंभीर मामले में चुप हैं. आप भी यह जानकारी हासिल करते चलें कि वर्ष 1966 में ही अमेरिका में एक कुख्यात यौन अपराधी पर मेड्रॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट दवा का केमिकल कैस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल किया गया था. इस दवा का आधार-तत्व (बेस इन्ग्रेडिएंट) वही है जो डीएमपीए में है, जिसे भारत की महिलाओं में ठोका जा रहा है. इस दवा के इस्तेमाल का विरोध करते हुए अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे खारिज कर दिया था. कैलिफोर्निया पेनल कोड (धारा 365) केवल बाल-यौन अपराधियों को डीएमपीए के जरिए केमिकल कैस्ट्रेशन की इजाजत देता है. फ्लोरिडा में बाल-यौन अपराध दोहराने वाले अपराधी के लिए इस सजा का प्रावधान है. जॉर्जिया, लूसियाना, मोंटाना, टेक्सस और विसकॉन्सिन में भी यौन अपराध दोहराने वाले अपराधी को डीएमपीए के जरिए केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने का कानूनी प्रावधान है. अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन शरीर पर नकारात्मक और घातक असर डालने वाली डीएमपीए दवा का यौन-अपराधियों पर भी इस्तेमाल किए जाने का विरोध कर रहा है. अमेरिका के अलावा इंगलैंड, जर्मनी और इजरायल जैसे देशों में भी जीर्ण (क्रॉनिक) यौन-अपराधियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने का प्रावधान है. भारत सरकार ठीक इसका उल्टा कर रही है.

नियुक्ति देकर आईएएस अफसरों को खरीद लेता है गेट्स फाउंडेशन
वंश-नाश के इंजेक्शन अभियान को यूपी में मॉनिटर कर रहा है बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट. विचित्र किंतु सत्य यह है कि गेट्स फाउंडेशन ने एक आईएएस अफसर को इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट का प्रमुख बना रखा है. उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अफसर विकास गोठवाल इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट के प्रमुख हैं. सरकारी तंत्र में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की गहरी पैठ का यह नायाब उदाहरण है. गेट्स फाउंडेशन से प्रभावित रहे तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आईएएस अफसर विकास गोठवाल को बाकायदा छुट्टी देकर इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट ज्वाइन करने की मंजूरी दी थी. गोठवाल का कार्यकाल वर्ष 14-15-16 के लिए था. फिर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और उन्होंने गेट्स फाउंडेशन के त्वरित-प्रभाव में गोठवाल को अगले तीन साल के लिए भी इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट में बने रहने की मंजूरी दे दी. अब विकास गोठवाल इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट के प्रमुख के पद पर 2020 तक बने रहेंगे. फिलहाल वे लंदन में रहकर शैक्षणिक-अवकाश का आनंद ले रहे हैं और वहीं से ट्रस्ट के यूपी-ऑपरेशंस को मॉनिटर भी कर रहे हैं. पूंजी संस्थाओं ने सत्ता के राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र दोनों को अपनी मुट्ठी में कर रखा है. शीर्ष सत्ता और उसके तंत्र तक धनपशु संस्था के आधिपत्य की ये कुछ अकाट्य बानगियां आप देख रहे हैं. 

Wednesday, 22 November 2017

चीनी मिल बिक्री घोटाले की एक और जांचः ताकि आंच और जांच से बची रहें मायावती

प्रभात रंजन दीन
चीनी मिल बिक्री घोटाले की आंच और सीबीआई जांच से मायावती को बचाने के लिए केंद्र सरकार नए-नए पैंतरे आजमा कर रही है. मायावती के कार्यकाल में कुछ खास पूंजी घरानों को प्रदेश की 21 चीनी मिलें कौड़ियों के भाव बेचे जाने के मामले में अब फिर से नया मोड़ आ गया है. इस नए मोड़ की खास वजहें हैं. इसे जानने के लिए पहले हम यह रुटीन सूचना प्राप्त करते चलें कि दो उन कंपनियों के खिलाफ पिछले दिनों लखनऊ के गोमती नगर थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया, जो चीनी मिलों की खरीद में शामिल थीं. जबकि चीनी मिलें खरीदने में सबसे अधिक धांधली विवादास्पद पूंजीपति पौंटी चड्ढा (अब दिवंगत) की कंपनियों ने प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व और नौकरशाहों से साठगांठ कर मचाई थी. अब आप याद करें कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता-ग्रहण के बाद ही चीनी मिल खरीद घोटाले की सीबीआई से जांच कराने की मंशा जाहिर की थी. इसके फौरन बाद अरुण जेटली के कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय ने इस मामले में कानूनी बाधा डालने की कोशिश की. जेटली के मंत्रालय के तहत आने वाले राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा आयोग (कम्पीटीशन कमीशन ऑफ इंडिया) ने मायावती को फौरन क्लीन-चिट दे दी और कहा कि यूपी की चीनी मिलों की बिक्री में कोई गड़बड़ी नहीं हुई. आयोग ने अपने ही डीजी (इन्वेस्टिगेशन) की जांच रिपोर्ट दबा दी और ‘दबाव’ में मायावती को बेदाग करार देते हुए चरित्र-प्रमाण-पत्र जारी कर दिया. ‘चौथी दुनिया’ ने आयोग के डायरेक्टर जनरल (इन्वेस्टिगेशन) की वह जांच रिपोर्ट छाप दी, जिसमें चीनी मिलों की बिक्री में घनघोर अनियमितताएं किए जाने की आधिकारिक पुष्टि की गई थी. ‘चौथी दुनिया’ में रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद आयोग की घिघ्घी बंध गई और इस प्रकरण में केंद्र सरकार के राजनीतिक तिकड़म और केंद्र व राज्य के राजनीतिक विरोधाभास की कलई खुल गई.
शीर्ष राजनीतिक स्तर से मायावती को ‘छत्र’ देने की कोशिशें उजागर होते ही केंद्र सरकार को अपने पैर पीछे खींचने पड़े. फिर केंद्र ने एक नया कानूनी पैंतरा अख्तियार किया. इस नई पैंतरेबाजी का भी मजा देखिए... अरुण जेटली के जिस कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय के एक महकमे ‘सीसीआई’ ने मायावती को बेदाग बताया, उसी मंत्रालय के एक अन्य विभाग ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस’ (सीआईएफओ) को चीनी मिलों की बिक्री की जांच सौंप दी गई. मंत्रालय के ही अधिकारी कहते हैं कि यह जांच ‘बलि का बकरा’ तलाशेगी और मायावती को बचाएगी. आप यह जानते हैं कि चीनी मिलों की बिक्री में बरती गई अनियमितताएं महालेखाकार (कैग) की जांच में पहले ही पकड़ी जा चुकी हैं. इसके बाद कम्पीटीशन कमीशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक (अनुसंधान) ने भी अपनी जांच में अनियमितताएं पकड़ीं. यह अलग बात है कि आयोग ने अपने महानिदेशक (अनुसंधान) की जांच रिपोर्ट का ध्यान नहीं रखकर मायावती का ध्यान रखा. जब दो-दो जांचें चीनी मिलों की बिक्री में घोटाले की पुष्टि कर चुकी थीं, फिर तीसरी जांच की क्या जरूरत थी? इस सवाल का जवाब देते हुए आयोग के ही एक अधिकारी ने कहा कि सीबीआई से मामले की जांच न हो, इसके लिए सारी पेशबंदियां की जा रही हैं. मायावती भविष्य की भाजपाई सियासत का तुरुप का पत्ता बनने वाली हैं, केंद्र सरकार की इन हरकतों से यही साबित हो रहा है. मायावती सीबीआई जांच के चपेटे में न आ जाएं, इसके लिए जांच, प्रति-जांच और प्रति-प्रति-जांच का नियोजित घनचक्कर चलाया जा रहा है. चीनी मिलों की बिक्री प्रकरण की सीबीआई से जांच कराने के बजाय उसकी जांच कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय के ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस’ को क्यों और कब दी गई? सरकार ने इस पर गोपनीयता क्यों बरती? जब कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय के ही कम्पीटीशन कमीशन ऑफ इंडिया ने मायावती को क्लीन-चिट दे दी थी, फिर उसी मंत्रालय के दूसरे विभाग को जांच क्यों दी गई? अगर सीसीआई की क्लीन-चिट गलत थी तो केंद्र सरकार ने उसके चेयरमैन और अन्य सम्बद्ध सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की? इन बेहद जरूरी सवालों पर राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों अपने मुंह पर पट्टा बांधे हुई है.

चीनी मिल बिक्री-घोटाले की एक और जांच का ‘सीरियस-फ्रॉड’
दिलचस्प यह है कि ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस’ (सीएफआईओ) ने अपनी जांच में दो कम्पनियों को फर्जी पाया. चीनी मिल बिक्री प्रकरण का यह अपने आप में ‘सीरियस-फ्रॉड’ है. मायावती के शासनकाल के दरम्यान वर्ष 2010-11 में 10 चालू चीनी मिलें और 11 बंद पड़ी चीनी मिलों की बिक्री प्रक्रिया में शामिल अधिकतर कंपनियों ने सिंडिकेट बना कर घपला किया. लेकिन सीएफआईओ ने केवल नम्रता मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड और गिरियाशो कंपनी प्राइवेट लिमिटेड को अलग (सिंगल आउट) किया. नम्रता मार्केटिंग ने देवरिया, बरेली, लक्ष्मीगंज (कुशीनगर) और हरदोई की चीनी मिलें खरीदने का दावा किया था और गिरियाशो कंपनी प्राइवेट लिमिटेड ने रामकोला, छितौनी और बाराबंकी की चीनी मिलों को खरीदने का दावा पेश किया था. इन दोनों कम्पनियों के निदेशकों की ओर से हस्ताक्षरित बैलेंस शीट दावे के साथ संलग्न की गई थी. उसी आधार पर सरकार ने दोनों कंपनियों को नीलामी प्रक्रिया में शामिल होने के योग्य घोषित किया था. इसके बाद बिक्री प्रक्रिया पूरी हुई और कंपनियों को चीनी मिलें बेच दी गईं. अब ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस’ ने अपनी जांच में इन दो कंपनियों की धांधली पकड़ी. यानि, ‘बलि का बकरा’ किसे बनाया जाएगा, यह तय हो रहा है. इस जांच के आधार पर राज्य चीनी निगम लिमिटेड के प्रधान प्रबंधक एसके मेहरा ने आनन-फानन गोमतीनगर थाने जाकर एफआईआर दर्ज करा दी. मेहरा ने नम्रता मार्केटिंग कंपनी के निदेशक दिल्ली के रोहिणी निवासी राकेश शर्मा, गाजियाबाद के इंदिरापुरम निवासी धर्मेंद्र गुप्ता, सहारनपुर के साउथ सिटी निवासी सौरभ मुकुंद, सहारनपुर के मिर्जापुर पोल-3 निवासी मोहम्मद जावेद, दिल्ली के रोहिणी निवासी सुमन शर्मा, सहारनपुर के तहसील बेहट निवासी मोहम्मद नसीम अहमद और मोहम्मद वाजिद अली के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया.
आप जैसे-जैसे खबर के विस्तार में जाएंगे, ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस’ की जांच के पीछे के नियोजित षडयंत्र की परतें अपने आप खुलती दिखेंगी. महालेखाकार से लेकर सीसीआई के डीजी (अनुसंधान) की जांच में भी यह तथ्य खुल कर सामने आ चुका है कि चीनी मिलों की बिक्री प्रक्रिया में शामिल तमाम कंपनियां पूंजीपति पौंटी चड्ढा से ही जुड़ी थीं. कुछ अन्य कंपनियां भी एक-दूसरे से जुड़ी छद्म कंपनियां थीं. लेकिन ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस’ के जांच अधिकारियों को केवल दो कंपनियों का ही फर्जीवाड़ा दिखा. नम्रता और गिरियाशो जैसी दो कंपनियों के खिलाफ गोमती नगर थाने में जैसे ही एफआईआर दर्ज हुई, वैसे ही पूर्व आईएएस अफसर सूर्य प्रताप सिंह ने बेसाख्ता कहा कि यह एफआईआर ही धोखा है. सरकार को अगर ठोस कार्रवाई करनी है तो उन नौकरशाहों पर करे, जिन्होंने चीनी मिलों की बिक्री प्रक्रिया में ‘सक्रिय’ भूमिका निभाई थी.

सत्ता की हांडी, सीसीआई की खिचड़ी और सीएफआईओ का रायता
मायावती के कार्यकाल में चीनी मिलों को औने-पौने भाव में बेचे जाने के मामले की जांच की घोषणा योगी सरकार ने सत्तारूढ़ होने के महीनेभर बाद ही अप्रैल महीने में कर दी थी. अगले ही महीने चार मई 2017 को कम्पीटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने मायावती सरकार को बेदाग बता दिया. जबकि महालेखाकार (सीएजी) की जांच रिपोर्ट पहले ही यह कह चुकी थी कि चीनी मिलों की बिक्री में घनघोर अनियमितताएं की गईं. सीसीआई के डायरेक्टर जनरल (इन्वेस्टिगेशन) नितिन गुप्ता ने भी अपनी छानबीन में पौंटी चड्ढा की कंपनी के साथ नीलामी में शामिल अन्य कंपनियों की साठगांठ की पुष्टि की थी. गुप्ता ने जांच में यह पाया कि नीलामी में शामिल कई कंपनियां पौंटी चड्ढा की ही मूल कंपनी से जुड़ी हैं, जबकि नीलामी की पहली शर्त ही थी कि एक मिल के लिए एक ही कंपनी निविदा-प्रक्रिया में शामिल हो सकती है. राज्य चीनी निगम लिमिटेड की 10 चालू चीनी मिलों की बिक्री प्रक्रिया में पहले 10 कंपनियां शरीक हुईं, लेकिन आखिर में केवल तीन कंपनियां वेव इंडस्ट्रीज़ प्राइवेट लिमिटेड, पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड और इंडियन पोटाश लिमिटेड ही रह गईं. 10 चालू चीनी मिलों को खरीदने के लिए आखिर में बची तीन कंपनियों में ‘गजब’ की समझदारी पाई गई. जिन मिलों को खरीदने में पौंटी चड्ढा की कंपनी ‘वेव’ की रुचि थी, वहां अन्य दो कंपनियों ने कम दर की निविदा (बिड-प्राइस) भरी और जिन मिलों में दूसरी कंपनियों को रुचि थी, वहां ‘वेव’ ने काफी दम दर की निविदा दाखिल की. इस तरह की मिलीभगत से पांच चीनी मिलें इंडियन पोटाश लिमिटेड ने और चार चीनी मिलें वेव इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड ने खरीदीं.
दसवीं चीनी मिल की खरीद में और रोचक खेल हुआ. बिजनौर की चांदपुर चीनी मिल की नीलामी के लिए इंडियन पोटाश लिमिटेड ने 91.80 करोड़ की निविदा दर (बिड प्राइस) कोट की. पीबीएस फूड्स ने 90 करोड़ की प्राइस कोट की, जबकि इसमें ‘वेव’ ने महज 8.40 करोड़ की बिड-प्राइस कोट की थी. बिड-प्राइस के मुताबिक चांदपुर चीनी मिल खरीदने का अधिकार इंडियन पोटाश लिमिटेड को मिलता, लेकिन ऐन मौके पर पोटाश लिमिटेड नीलामी की प्रक्रिया से खुद ही बाहर हो गई. लिहाजा, चांदपुर चीनी मिल पीबीएस फूड्स को मिल गई. नीलामी प्रक्रिया से बाहर हो जाने के कारण इंडियन पोटाश की बिड राशि जब्त हो गई, लेकिन पीबीएस फूड्स के लिए उसने पूर्व-प्रायोजित-शहादत दे दी. सीसीआई की जांच में यह भी तथ्य खुला कि पौंटी चड्ढा की कंपनी वेव इंडस्ट्रीज़ प्राइवेट लिमिटेड और पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, दोनों के निदेशक त्रिलोचन सिंह हैं. त्रिलोचन सिंह के वेव कंपनी समूह का निदेशक होने के साथ-साथ पीबीएस कंपनी का निदेशक और शेयरहोल्डर होने की भी आधिकारिक पुष्टि हुई. इसी तरह वेव कंपनी की विभिन्न सम्बद्ध कंपनियों के निदेशक भूपेंद्र सिंह, जुनैद अहमद और शिशिर रावत पीबीएस फूड्स के भी निदेशक मंडल में शामिल पाए गए. मनमीत सिंह वेव कंपनी में अतिरिक्त निदेशक थे तो पीबीएस फूड्स में भी शेयर होल्डर थे. इस तरह वेव कंपनी और पीबीएस फूड्स की साठगांठ और एक ही कंपनी का हिस्सा होने का दस्तावेजी तथ्य सामने आया. यहां तक कि वेव कंपनी और पीबीएस फूड्स द्वारा निविदा प्रपत्र खरीदने से लेकर बैंक गारंटी दाखिल करने और स्टाम्प पेपर तक के नम्बर एक ही क्रम में पाए गए. आयोग के डीजी ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा है कि दोनों कंपनियां मिलीभगत से काम कर रही थीं. चालू हालत की 10 चीनी मिलों की बिक्री प्रक्रिया में शामिल होकर आखिरी समय में डीसीएम श्रीराम इंडस्ट्रीज लिमिटेड, द्वारिकेश शुगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड, लक्ष्मीपति बालाजी शुगर एंड डिस्टिलरीज़ प्राइवेट लिमिटेड, पटेल इंजीनियरिंग लिमिटेड, त्रिवेणी इंजीनियरिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, एसबीईसी बायोइनर्जी लिमिटेड और तिकौला शुगर मिल्स लिमिटेड जैसी कंपनियों के भाग खड़े होने का मामला भी रहस्य के घेरे में है.

सत्ता अलमबरदारों के होठ सिले हुए हैं, सब मिले हुए हैं
चीनी एवं गन्ना विकास निगम लिमिटेड की बंद पड़ी 11 चीनी मिलों की बिक्री प्रक्रिया में भी यही हुआ. नीलामी में कुल 10 कंपनियां शरीक हुईं, लेकिन आखिरी समय में तीन कंपनियां मेरठ की आनंद ट्रिपलेक्स बोर्ड लिमिटेड, वाराणसी की गौतम रियलटर्स प्राइवेट लिमिटेड और नोएडा की श्रीसिद्धार्थ इस्पात प्राइवेट लिमिटेड मैदान छोड़ गईं. जो कंपनियां रह गईं उनमें पौंटी चड्ढा की कंपनी वेव इंडस्ट्रीज के साथ नीलगिरी फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, नम्रता, त्रिकाल, गिरियाशो, एसआर बिल्डकॉन व आईबी ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड शामिल थीं. इनमें भी खूब समझदारी थी. नीलगिरी फूड्स ने बैतालपुर, देवरिया, बाराबंकी और हरदोई चीनी मिलों के लिए निविदा दाखिल की थी, लेकिन आखिर में बैतालपुर चीनी मिल के अलावा उसने बाकी पर अपना दावा छोड़ दिया. इसमें उसे जमानत राशि भी गंवानी पड़ी. बैतालपुर चीनी मिल खरीदने के बाद नीलगिरी ने उसे कैनयन फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड के हाथों बेच डाला. इसी तरह त्रिकाल ने भटनी, छितौनी और घुघली चीनी मिलों के लिए निविदा दाखिल की थी, लेकिन आखिरी समय में जमानत राशि गंवाते हुए उसने छितौनी और घुघली चीनी मिलों से अपना दावा हटा लिया. वेव कंपनी ने भी बरेली, रामकोला और शाहगंज की बंद पड़ी चीनी मिलों को खरीदने के लिए निविदा दाखिल की थी. लेकिन उसने बाद में बरेली और रामकोला से अपना दावा छोड़ दिया और शाहगंज चीनी मिल खरीद ली. बाराबंकी, छितौनी और रामकोला की बंद पड़ी चीनी मिलें खरीदने वाली कंपनी गिरियाशो और बरेली, हरदोई, लक्ष्मीगंज और देवरिया की चीनी मिलें खरीदने वाली कंपनी नम्रता में वही सारी संदेहास्पद-समानताएं पाई गईं जो वेव इंडस्ट्रीज़ और पीबीएस फूड्स लिमिटेड में पाई गई थीं. यह भी पाया गया कि गिरियाशो, नम्रता और कैनयन, इन तीनों कंपनियों का दिल्ली के सरिता विहार में एक ही पता है. बंद पड़ी 11 चीनी मिलें खरीदने वाली सभी कंपनियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई पाई गईं, खास तौर पर वे पौंटी चड्ढा की वेव इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड से सम्बद्ध पाई गईं. ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस’ ने अपनी जांच में इन सारे तथ्यों की अनदेखी कर केवल दो कंपनियों नम्रता मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड और गिरियाशो कंपनी प्राइवेट लिमिटेड पर निशाना साधा. यह सारा प्रहसन केवल मायावती को बचाने के लिए खेला जा रहा है. 

Tuesday, 14 November 2017

अपने ही 'रॉ' एजेंटों को धोखा देती है सरकार

प्रभात रंजन दीन
छोटे से सीलन भरे कमरे से आने वाली चीख और सिसकियों की आवाजें किसकी हैं? दर्द से मुक्ति पाने की छटपटाहट के बेचैन स्वर किसके हैं? देर रात लोगों को परेशान करने वाले बेमानी शब्द-शोर से भरी पागल आवाजें किसकी हैं? किसकी सुनाई पड़ती हैं किसी बच्चे को फुसलाने जैसी कातर ध्वनियां? आप यह न समझें कि यह किसी खूंखार जेल के बंद सेल से आने वाली दुखी-प्रताड़ित कैदियों की आवाजें हैं. यह उन देशभक्तों का यथार्थ आर्तनाद है, जिन्होंने अपने देश के लिए पाकिस्तान में जासूसी करते हुए जीवन खपा दिया, लेकिन आज अपने देश में दिहाड़ी मजदूर या उससे भी गलीज हालत में हैं. उन्हें कोई ‘राष्ट्रभक्त’ पूछता नहीं. ‘राष्ट्रभक्त’ सरकार को देशभक्त जासूस की कोई चिंता नहीं. अब संकेत में नहीं, सीधी बात पर आते हैं. लखनऊ में एक शख्स मिले जो भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रिसर्च एंड अनालिसिस विंग’ (‘रॉ’) के जासूस थे. उन्होंने अपने बेशकीमती 21 वर्ष पाकिस्तान के अलग-अलग इलाकों में सड़कों पर खोमचा घसीटते हुए, मुल्ला बन कर मस्जिद में नमाज पढ़ाते हुए, संवेदनशील सरकारी महकमों पर महीनों नजरें रखते हुए, पाकिस्तानी सेना द्वारा पोषित आतंकियों से दोस्ती गांठते हुए, जान की परवाह न कर वहां की सूचनाएं भारत भेजते हुए और आखिर में बर्बर यातनाओं के साथ जेल काटते हुए बिताए. बड़ी मुश्किल से पाकिस्तान की जेल से छूट कर भारत पहुंचे ‘रॉ’ एजेंट मनोज रंजन दीक्षित का जीवन अपने देश आकर और दुश्वार हो गया. उनकी पत्नी शोभा दीक्षित को कैंसर हो गया. कीमोथिरेपी और दुष्कर इलाज के क्रम में शोभा मां नहीं बन सकीं. वे मानसिक तौर पर विक्षिप्त हो गईं. रात-रात को उस छोटे से कमरे से आने वाली चीखें और सिसकियां उन्हीं की हैं. दर्द से छटपटाने की आवाजें उन्हीं की हैं. विक्षिप्तता में होने वाली हरकतें और पति को नोचने-खसोटने-मारने की आवाजें शोभा की ही हैं. पत्नी को बच्चे की तरह मनाने की कातर कोशिश करने वाले वही शख्स हैं... ‘रॉ’ एजेंट मनोज रंजन दीक्षित उर्फ मोहम्मद इमरान.
दीक्षित की तरह ऐसे अनगिनत देशभक्त हैं, जिनका जीवन देश के लिए जासूसी करते हुए और जान को जोखिम में डालते हुए बीत गया. जब वे अपने वतन वापस लौटे तो अपना ही देश उन्हें भूल चुका था. सरकार को भी यह याद नहीं रहा कि भारत सरकार का प्रतिनिधि होने के नाते ही वह पाकिस्तान में प्रताड़नाएं झेल रहा था. कुलभूषण जाधव तो सुर्खियों में इसलिए हैं कि उनसे सरकार का राजनीतिक-स्वार्थ सध रहा है. यह सियासत क्या कुलभूषण के जिंदा रहने की गारंटी है? अगर गारंटी होती तो रवींद्र कौशिक, सरबजीत सिंह जैसे तमाम देशभक्त पाकिस्तान की जेलों में क्या सड़ कर मरते? फिर सरकार का उनसे क्या लेना-देना, जो देशभक्ति में खप चुके, पर आज भी जिंदा हैं! ऐसे खपे हुए देशभक्तों की लंबी फेहरिस्त है, जो अपनी बची हुई जिंदगी घसीट रहे हैं. इन्होंने देश की सेवा में खुद को मिटा दिया, पर सरकार ने उन्हें न नाम दिया न इनाम. पूर्व ‘रॉ’ एजेंट मनोज रंजन दीक्षित का प्रकरण सुनकर केंद्रीय खुफिया एजेंसी के एक आला अधिकारी ने कहा कि मोदी सरकार बदलाव की बातें तो करती है, लेकिन विदेशों में काम कर रहे ‘रॉ’ एजेंट्स को स्थायी गुमनामी के अंधेरे सुरंग में धकेल देती है. विदेशों में हर पल जान जोखिम में डाले काम कर रहे अपने ही जासूसों की हिफाजत और देश में रह रहे उनके परिवार के लिए आर्थिक संरक्षण का सरकार कोई उपाय नहीं करती. जबकि देश के अंदर काम करने वाले खुफिया अधिकारियों की बाकायदा सरकारी नौकरी होती है. वेतन और पेंशन उन्हें और उनके परिवार वालों को ठोस आर्थिक संरक्षण देता है. इसके ठीक विपरीत ‘रॉ’ के लिए जो एजेंट्स चुने जाते हैं, सरकार उनकी मूल पहचान ही मिटा देती है. उनका मूल शिक्षा प्रमाणपत्र रख लेती है और किसी भी सरकारी या कानूनी दस्तावेज से उसका नाम हटा देती है. मनोज रंजन दीक्षित इसकी पुष्टि करते हैं. दीक्षित कहते हैं कि नजीबाबाद स्थित एमडीएस इंटर कॉलेज से उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी और रुहेलखंड विश्वविद्यालय के साहू-जैन कॉलेज से उन्होंने ग्रैजुएशन किया था. ‘रॉ’ के लिए चुने जाने के बाद उनसे स्कूल और कॉलेज के मूल प्रमाणपत्र ले लिए गए. जब वे 21 साल बाद अपने घर लौटे तो उनकी पूरी दुनिया बदल चुकी थी. उन्हें बताया गया कि सरकारी मुलाजिमों का एक दस्ता वर्षों पहले उनके घर से उनकी सारी तस्वीरें ले जा चुका था. राशनकार्ड से मनोज का नाम हट चुका था. सरकारी दस्तावेजों से मनोज का नाम ‘डिलीट’ किया जा चुका था. भारत सरकार ऐसी घिसी-पिटी लीक पर क्यों चलती है? भारतीय खुफिया एजेंसी के अधिकारी ही यह सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि अमेरिका, चीन, इजराइल, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे कई देश अपने जासूसों की हद से आगे बढ़ कर हिफाजत करते हैं और उनके परिवारों का ख्याल रखते हैं. यहां तक कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई तक अपने एजेंटों को सुरक्षा कवच और आर्थिक संरक्षण देती है, लेकिन भारत सरकार इस पर ध्यान नहीं देती, क्योंकि सत्ता-सियासतदानों को इसमें वोट का फायदा नहीं दिखता.
वर्ष 1984 में ‘रॉ’ के टैलेंट हंट के जरिए चुने गए मनोज रंजन दीक्षित की अकेली आपबीती देश के युवकों को यह संदेश देने के लिए काफी है कि वे ‘रॉ’ जैसी खुफिया एजेंसी के लिए कभी काम नहीं करें. मेजर रवींद्र कौशिक से लेकर ऐसे तमाम ‘रॉ’ एजेंटों की बेमानी गुमनाम-शहादतों के उदाहरण भरे पड़े हैं. खुफिया एजेंसियों के अफसर ही यह कहते हैं कि पाकिस्तान या अन्य देशों में तैनात ‘रॉ’ एजेंट के प्रति आंखें मूंदने वाली सरकार भारत में रह रहे उनके परिवार वालों को लावारिस क्यों छोड़ देती है, यह बात समझ में नहीं आती. ऐसे में देश का कोई युवक ‘रॉ’ जैसी खुफिया एजेंसी के लिए काम करने के बारे में क्यों सोचे? मनोज रंजन दीक्षित को ‘रॉ’ के टैलेंट फाइंडर जीतेंद्रनाथ सिंह परिहार ने चुना था. एक साल की ट्रेनिंग के बाद दीक्षित को जनवरी 1985 में भारत-पाकिस्तान सीमा पर मोहनपुर पोस्ट से ‘लॉन्च’ किया गया. दीक्षित के साथ एक गाइड भी था जो उन्हें पाकिस्तान के पल्लो गांव होते हुए बम्बावली-रावी-बेदियान नहर पार करा कर लाहौर ले गया और उन्हें वहां छोड़ कर चला गया. उसके बाद से दीक्षित का जासूसी करने का सारा रोमांच त्रासद-कथा में तब्दील होता चला गया. 23 जनवरी 1992 को सिंध प्रांत के हैदराबाद शहर से गिरफ्तार किए जाने तक दीक्षित ने जासूसी के तमाम पापड़ बेले, खोमचे घसीटे, लाहौर, कराची, मुल्तान, हैदराबाद, पेशावर जैसे तमाम शहरों में आला सैन्य अफसरों से लेकर बड़े नेताओं की जासूसी की और दुबई, कुवैत, कतर, हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर जैसी जगहों पर बैठे ‘रॉ’ अफसरों के जरिए भारत तक सूचना पहुंचाई. ‘रॉ’ ने हैदराबाद के आमिर आलम के जरिए दीक्षित को अफगानिस्तान भी भेजा जहां जलालाबाद और कुनर में उन्हें अहले हदीस के चीफ शेख जमीलुर रहमान के साथ अटैच किया गया. वहां के सम्पर्कों के जरिए दीक्षित पेशावर में डेरा जमाए अरब मुजाहिदीन के सेंटर बैतुल अंसार पहुंच गए और जेहादी के रूप में ग्रुप में शामिल हो गए. दीक्षित बताते हैं कि बैतुल अंसार पर ओसामा बिन लादेन और शेख अब्दुर्रहमान जैसे आतंकी सरगना पहुंचते थे और सेंटर को काफी धन देते थे. 23 जनवरी 1992 को दीक्षित को सिंध प्रांत के हैदराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के बाद दीक्षित की यंत्रणा-यात्रा शुरू हुई. पहले उन्हें हैदराबाद में आईएसआई के लॉकअप में रखा गया फिर उन्हें मिलिट्री इंटेलिजेंस की 302वीं बटालियन में शिफ्ट कर दिया गया. हैदराबाद से उन्हें मिलिट्री इंटेलिजेंस की दूसरी कोर के कराची स्थित मुख्यालय भेजा गया. पूछताछ के दौरान दीक्षित को बर्बर यातनाएं दी जाती रहीं. पिटाई के अलावा उन्हें सीधा बांध कर नौ-नौ घंटे खड़ा रखा जाता था और कई-कई रात सोने नहीं दिया जाता था. करीब एक साल तक उन्हें इसी तरह अलग-अलग फौजी ठिकानों पर टॉर्चर किया जाता रहा और पूछताछ होती रही. इस दरम्यान दीक्षित के हबीब बैंक के हैदराबाद और मुल्तान ब्रांच के अकाउंट भी जब्त कर लिए गए और उसमें जमा होने वाले धन के स्रोतों की गहराई से छानबीन की गई. 21 दिसम्बर को उन्हें कराची जेल शिफ्ट कर दिया गया. पांच महीने बाद जून 1993 से दीक्षित पर पाकिस्तानी सेना की अदालत में मुकदमा शुरू हुआ और उन्हें कराची जेल से 85वीं एसएंडटी कोर (सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट कोर) को हैंड-ओवर कर दिया गया. इस दरम्यान दीक्षित को पाक सेना की 44वीं फ्रंटियर फोर्स (एफएफ) के क्वार्टर-गार्ड में बंद रखा गया. वर्ष 1994 में दीक्षित 21वीं आर्मर्ड ब्रिगेड के हवाले हुए और उन्हें 51-लांसर्स के क्वार्टर-गार्ड में शिफ्ट किया गया. इस बीच मेजर नसीम खान, मेजर सलीम खान, लेफ्टिनेंट कर्नल हमीदुल्ला खान और ब्रिगेडियर रुस्तम दारा की फौजी अदालतों में मुकदमा (कोर्ट मार्शल) चलता रहा. दीक्षित कहते हैं कि कोई कबूलदारी और सबूत न होने के कारण पाकिस्तान सेना ने उन्हें सिंध सरकार के सिविल प्रशासन के हवाले कर दिया. सिंध सरकार ने वर्ष 2001 में ही दीक्षित को भारत वापस भेजने (रिपैट्रिएट करने) का आदेश दे दिया था, लेकिन वह चार साल तक कानूनी चक्करों में फंसता-निकलता आखिरकार मार्च 2005 में तामील हो पाया. मनोज रंजन दीक्षित को 22 मार्च 2005 को बाघा बॉर्डर पर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सुपुर्द कर दिया गया. ‘रॉ’ के मिशन पर पाकिस्तान में 21 वर्ष बिताने वाले मनोज रंजन दीक्षित 13 साल से अधिक समय तक जेल में बंद रहे. भारत लौटने पर भारत सरकार के एक नुमाइंदे ने उन्हें दो किश्तों में एक लाख 36 हजार रुपए दिए और उसके बाद फाइल क्लोज कर दी. पाकिस्तान की जेल से निकल कर दीक्षित भारत के अधर में फंस गए. जीने के लिए उन्हें ईंट भट्टे पर मजदूरी करनी पड़ी. फिलहाल वे लखनऊ की एक कंसट्रक्शन कंपनी में मामूली मुलाजिम हैं. पत्नी कैंसर से पीड़ित हैं. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में कीमोथिरैपी और ऑपरेशन के बाद भी इलाज का क्रम जारी ही है. लखनऊ के ही नूर मंजिल मानसिक रोग चिकित्सालय में उनकी मानसिक विक्षिप्तता का इलाज चल रहा है. अल्पवेतन में बीमार पत्नी के साथ जिंदगी की गाड़ी खींचना दीक्षित को मुश्किलों भरा तो लगता है, लेकिन वे कहते हैं, ‘पाकिस्तान की यंत्रणाएं झेल लीं तो अपने देश की त्रासदी भी झेल ही लेंगे’. दीक्षित कभी प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं तो कभी मुख्यमंत्री को. सारे पत्र वे अपने साथ संजो कर रखते हैं और उन्हें दिखा कर कहते हैं, ‘जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से हम सब मर-मर के जीते हैं, वो सुबह कभी तो आएगी..!’

‘रॉ’ एजेंट्स की लंबी जमातः पाकिस्तान में हुए कुर्बान, भारत ने मिटा दी पहचान
‘रॉ’ के लिए जासूसी करने के आरोप में पकड़े गए नौसेना कमांडर कुलभूषण जाधव का पहला मामला है जब केंद्र सरकार ने उनकी रिहाई के लिए पुरजोर तरीके से आवाज उठाई और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक गुहार लगाई. लेकिन इसके पहले मेजर रवींद्र कौशिक से लेकर सरबजीत सिंह और सरबजीत से लेकर तमाम नाम, अनाम और गुमनाम जासूसों की हिफाजत के लिए भारत सरकार ने आज तक कोई कदम नहीं उठाया. कुलभूषण जाधव का मसला ही अलग है. उन्हें तो तालिबानों ने ईरान सीमा से अगवा किया और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथों बेच डाला. जर्मन राजनयिक गुंटर मुलैक अंतरराष्ट्रीय फोरम पर इसे उजागर कर चुके हैं. पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद सरबजीत की रिहाई के मसले में भी सामाजिक-राजनीतिक शोर तो खूब मचा लेकिन भारत सरकार ने कोई कारगर दबाव नहीं बनाया. आखिरकार, दूसरे पाकिस्तानी कैदियों को उकसा कर कोट लखपत जेल में ही सरबजीत सिंह की हत्या करा दी गई.
पाकिस्तान में मिशन पूरा कर या जेल की सजा काट कर वापस लौटे कई ‘रॉ’ एजेंटों ने केंद्र सरकार से औपचारिक तौर पर आर्थिक संरक्षण देने की गुहार लगाई है, लेकिन उस पर कोई सुनवाई नहीं की गई. यहां तक कि भारत सरकार ने उन्हें सरकारी कर्मचारी मानने से ही इन्कार कर दिया. सरकार ने अपने पूर्व ‘रॉ’ एजेंटों को पहचाना ही नहीं. ऐसे ही ‘रॉ’ एजेंटों में गुरदासपुर के खैरा कलां गांव के रहने वाले करामत राही शामिल हैं, जिन्हें वर्ष 1980 में पाकिस्तान ‘लॉन्च’ किया गया था. पहली बार वे अपना मिशन पूरा कर वापस लौट आए, लेकिन ‘रॉ’ ने उन्हें 1983 में फिर पाकिस्तान भेज दिया. इस बार 1988 में वे मीनार ए पाकिस्तान के नजदीक गिरफ्तार कर लिए गए. करामत 18 साल जेल काटने के बाद वर्ष 2005 में वापस लौट पाए. करामत की रिहाई भी पंजाब के उस समय भी मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह के हस्तक्षेप और अथक प्रयास से संभव हो पाई. देश वापस लौटने के बाद करामत ने ‘रॉ’ मुख्यालय से सम्पर्क साधा, लेकिन ‘रॉ’ मुख्यालय के आला अफसरों ने धमकी देकर करामत को खामोश कर दिया. भारत सरकार की इस आपराधिक अनदेखी के खिलाफ करामत ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली, लेकिन अदालत भी कहां ‘नीचा’ सुनती है!
इन मामलों में सम्बन्धित राज्य सरकारें भी ‘रॉ’ एजेंटों के प्रति आपराधिक उपेक्षा का ही भाव रखती हैं. ‘रॉ’ एजेंट कश्मीर सिंह का मामला अपवाद की तरह सामने आया जब 35 साल पाकिस्तानी जेल की सजा काट कर लौटने के बाद पंजाब सरकार ने उन्हें जमीन दी और मुआवजा दिया. वर्ष 1962 से लेकर 1966 तक कश्मीर सिंह सेना की नौकरी में थे. उसके बाद ‘रॉ’ ने उन्हें अपने काम के लिए चुना और पाकिस्तान ‘लॉन्च’ कर दिया. 1973 में वे पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिए गए. उन्हें पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में घुमाया जाता रहा और प्रताड़ित किया जाता रहा. 17 साल तक उन्हें एक एकांत सेल में बंद रखा गया. चार मार्च 2008 को वे रिहा होकर भारत आए, लेकिन इस लंबे अंतराल में कश्मीर सिंह जिंदगी से नहीं, पर उम्र से शहीद हो चुके थे.
गुरदास के डडवाईँ गांव के रहने वाले सुनील मसीह दो फरवरी 1999 को पाकिस्तान के शकरगढ़ में गिरफ्तार किए गए थे. आठ साल के भीषण अत्याचार के बाद वर्ष 2006 में वे अत्यंत गंभीर हालत में भारत वापस लौटे, लेकिन केंद्र सरकार ने उनके बारे में कोई ख्याल नहीं किया. उन्हीं के गांव डडवाईं के डैनियल उर्फ बहादुर भी पाकिस्तानी रेंजरों द्वारा 1993 में गिरफ्तार किए गए थे. चार साल की सजा काट कर वापस लौटे. अब पूर्व ‘रॉ’ एजेंट डैनियल रिक्शा चला कर अपना गुजारा करते हैं. पाकिस्तान की जेल में तकरीबन तीन दशक काटने के बाद छूट कर भारत आने वाले पूर्व ‘रॉ’ एजेंटों में सुरजीत सिंह का नाम भी शामिल है. ‘रॉ’ ने सुरजीत सिंह को वर्ष 1981 में पाकिस्तान ‘लॉन्च’ किया था. वे 1985 में गिरफ्तार किए गए और पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी करने के आरोप में उन्हें फांसी की सजा दी गई. 1989 में उनकी सजा आजीवन कारावास में बदल दी गई. वर्ष 2012 में पाकिस्तान की कोट लखपत जेल से सजा काटने के बाद सुरजीत रिहा हुए. सुरजीत ने भी ‘रॉ’ के अधिकारियों से सम्पर्क साधा लेकिन नाकाम रहे. सुरजीत अपनी पत्नी को यह बोल कर पाकिस्तान गए थे कि वे जल्दी लौटेंगे लेकिन 1981 के गए हुए 2012 में वापस लौटे. जब लौटे तब वे 70 साल के हो चुके थे. भारत सरकार ने उनके वजूद को इन्कार कर दिया, जबकि वापस लौटने पर सुरजीत ने पूछा कि भारत सरकार ने उन्हें पाकिस्तान नहीं भेजा तो वे अपनी मर्जी से पाकिस्तान कैसे और क्यों चले गए? सुरजीत मिशन के दरम्यान 85 बार पाकिस्तान गए और आए. पाकिस्तान में गिरफ्तार हो जाने के बाद भारतीय सेना की तरफ से उनके परिवार को हर महीने डेढ़ सौ रुपए दिए जाते थे. सुरजीत पूछते हैं कि अगर वे लावारिस ही थे तो सेना उनके घर पैसे क्यों भेज रही थी? सुरजीत ने भी न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट में शरण ले रखी है.
गुरदासपुर जिले के डडवाईं गांव के ही रहने वाले सतपाल को वर्ष 1999 में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था. तब भारत पाकिस्तान के बीच करगिल युद्ध चल रहा था. पाकिस्तान में सतपाल को भीषण यातनाएं दी गईं. पाकिस्तान की जेल में ही वर्ष 2000 में उनकी मौत हो गई. विडंबना यह है कि पाकिस्तान सरकार ने सतपाल का पार्थिव शरीर भारत को सौंपने की पेशकश की तो भारत सरकार ने शव लेने तक से मना कर दिया. सतपाल का शव लाहौर अस्पताल के शवगृह में पड़ा रहा. पंजाब में स्थानीय स्तर पर काफी बावेला मचने के बाद सतपाल का शव मंगवाया जा सका. शव पर प्रताड़ना के गहरे घाव और चोट के निशान मौजूद थे. तब भी भारत सरकार को उनकी शहादत की कीमत समझ में नहीं आई. सतपाल के बेटे सुरेंदर पाल आज भी अपने पिता के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं. पंजाब सरकार ने सतपाल के बेटे सुरेंदर पाल को सरकारी नौकरी का आश्वासन भी दिया, लेकिन यह आश्वासन भी ढाक के तीन पात ही साबित हुआ.
विनोद साहनी को 1977 में पाकिस्तान भेजा गया था, लेकिन वे जल्दी ही पाकिस्तानी तंत्र के हाथों दबोच लिए गए. उन्हें 11 साल की सजा मिली. सजा काटने के बाद विनोद 1988 में वापस लौटे. ‘रॉ’ ने विनोद को सरकारी नौकरी देने और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन दिया था, लेकिन लौटने के बाद ‘रॉ’ ने उन्हें पहचानने से भी इन्कार कर दिया. विनोद अब जम्मू में ‘पूर्व जासूस’ नामकी एक संस्था चलाते हैं और तमाम पूर्व जासूसों को जोड़ने का जतन करते रहते हैं.
रामराज ने 18 साल तक भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’  की सेवा की. 18 सितम्बर 2004 को उन्हें पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया. करीब आठ साल जेल काटने के बाद रिहा हुए रामराज को भारत आने पर उसी खुफिया एजेंसी ने पहचानने से इन्कार कर दिया. ऐसा ही हाल गुरबक्श राम का भी हुआ. एक साल की ट्रेनिंग देकर उन्हें वर्ष 1988 को पाकिस्तान भेजा गया था. उनका मिशन पाकिस्तान की सैन्य युनिट के आयुध भंडार की जानकारियां हासिल करना था. मिशन पूरा कर वापस लौट रहे गुरबक्श को पाकिस्तानी सेना के गोपनीय दस्तावेजों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें सियालकोट की गोरा जेल में रखा गया. 14 साल की सजा काट कर वर्ष 2006 में वापस अपने देश लौटे गुरबक्श को अब सरकार नहीं पहचानती. रामप्रकाश को प्रोफेशनल फोटोग्राफर के रूप में ‘रॉ’ ने वर्ष 1994 में पाकिस्तान में ‘प्लांट’ किया था. 13 जून 1997 को भारत वापस आते समय रामप्रकाश को गिरफ्तार कर लिया गया. सियालकोट की जेल में नजरबंद रख कर उनसे एक साल तक पूछताछ की जाती रही. वर्ष 1998 में उन्हें 10 साल की सजा सुनाई गई. सजा काटने के बाद सात जुलाई 2008 को उन्हें भारत भेज दिया गया. सूरम सिंह तो 1974 में सीमा पार करते समय ही धर लिए गए थे. उनसे भी सियालकोट की गोरा जेल में चार महीने तक पूछताछ होती रही और 13 साल सात महीने पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में प्रताड़ित होने के बाद आखिरकार वे 1988 में रिहा होकर भारत आए. बलबीर सिंह को 1971 में पकिस्तान भेजा गया था. 1974 में बलबीर गिरफ्तार कर लिए गए और 12 साल की जेल की सजा काटने के बाद 1986 में भारत वापस लौटे. भारत आने के बाद उन्हें जब ‘रॉ’ से कोई मदद नहीं मिली तो उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया. दिल्ली हाईकोर्ट ने मुआवजा देने का आदेश दिया, लेकिन ‘रॉ’ ने हाईकोर्ट के आदेश पर भी कोई कार्रवाई नहीं की.
‘रॉ’ एजेंट देवुत को पाकिस्तान की जेल में इतना प्रताड़ित किया गया कि वे लकवाग्रस्त हो गए. देवुत को 1990 में पाकिस्तान भेजा गया था. जेल की सजा काटने के बाद वे 23 दिसम्बर 2006 को लकवाग्रस्त हालत में रिहा हुए. लकवाग्रस्त केंद्र सरकार ने भी उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया और उनकी पत्नी वीणा न्याय के लिए दरवाजे-दरवाजे सिर टकरा रही हैं और मत्था टेक रही हैं. ‘रॉ’ ने तिलकराज को भी पाकिस्तान ‘लॉन्च’ किया था, लेकिन उसका कोई पता ही नहीं चला. ‘रॉ’ ने भी पाकिस्तान में गुम हुए तिलकराज को खोजने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. तिलकराज के वयोवृद्ध पिता रामचंद्र आज भी अपने बेटे के वापस लौटने का इंतजार कर रहे हैं. ‘रॉ’ ने इसी तरह ओमप्रकाश को भी वर्ष 1988 में पाकिस्तान भेजा, लेकिन ओमप्रकाश का फिर कुछ पता नहीं चला. कुछ दस्तावेजों और कुछ कैदियों की खतो-किताबत से ओमप्रकाश के घर वालों को उनके पाकिस्तान की जेल में होने का सुराग मिला. इसे ‘रॉ’  को दिया भी गया, लेकिन ‘रॉ’ ने कोई रुचि नहीं ली. बाद में ओमप्रकाश ने अपने परिवार वालों को चिट्ठी भी लिखी. 14 जुलाई 2012 को लिखे गए ओमप्रकाश के पत्र के बारे में ‘रॉ’ को भी जानकारी दी गई, लेकिन सरकार ने इस मामले में कुछ नहीं किया. ‘रॉ’ एजेंट सुनील भी पाकिस्तान से अपने घर वालों को चिट्ठियां लिख रहे हैं, लेकिन उनकी कोई नहीं सुन रहा.

केंद्र की बेजा नीतियों और ‘रॉ’ की साजिश से मारे गए कौशिक
पाकिस्तानी की सेना में मेजर के ओहदे तक पहुंच गए मेजर नबी अहमद शाकिर उर्फ रवींद्र कौशिक भारत सरकार की बेजा नीतियों और खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ की साजिश के कारण मारे गए. ‘रॉ’ के अधिकारियों ने सोचे-संमझे इरादे से इनायत मसीह नामके ऐसे ‘बेवकूफ’ एजेंट को पाकिस्तान भेजा जिसने वहां जाते ही रवींद्र कौशिक का भंडाफोड़ कर दिया. कर्नल रैंक पर तरक्की पाने जा रहे रवींद्र कौशिक उर्फ मेजर नबी अहमद शाकिर गिरफ्तार कर लिए गए. ‘रॉ’ के सूत्र कहते हैं कि पाकिस्तानी सेना में रवींद्र कौशिक को मिल रही तरक्की और भारत में मिल रही प्रशंसा (उन्हें ब्लैक टाइगर के खिताब से नवाजा गया था) से जले-भुने ‘रॉ’ अधिकारियों ने षडयंत्र करके कौशिक की हत्या करा दी. कौशिक को पाकिस्तान में भीषण यंत्रणाएं दी गईं. पाकिस्तान की जेल में ही उनकी बेहद दर्दनाक मौत हो गई. भारत सरकार ने कौशिक के परिवार को यह पुरस्कार दिया कि रवींद्र से जुड़े सभी रिकॉर्ड नष्ट कर दिए और चेतावनी दी कि रवींद्र के मामले में चुप्पी रखी जाए. रवींद्र ने जेल से अपने परिवार को कई चिट्ठियां लिखी थीं. उन चिट्ठियों में उन पर ढाए जा रहे अत्याचारों का दुखद विवरण होता था. रवींद्र ने अपने विवश पिता से पूछा था कि क्या भारत जैसे देश में कुर्बानी देने वालों को यही सिला मिलता है? राजस्थान के रहने वाले रवींद्र कौशिक लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र थे, जब ‘रॉ’ के तत्कालीन निदेशक ने खुद उन्हें चुना था. 1965 और 1971 के युद्ध में मार खाए पाकिस्तान के अगले षडयंत्र का पता लगाने के लिए ‘रॉ’ ने कौशिक को पाकिस्तान भेजा. कौशिक ने पाकिस्तान में पढ़ाई की. सेना का अफसर बना और तरक्की के पायदान चढ़ता गया. कौशिक की सूचनाएं भारतीय सुरक्षा बलों के लिए बेहद उपयोगी साबित होती रहीं और पाकिस्तान के सारे षडयंत्र नाकाम होते रहे. पहलगाम में भारतीय जवानों द्वारा 50 से अधिक पाक सैनिकों का मारा जाना रवींद्र की सूचना के कारण ही संभव हो पाया. कौशिक की सेवाओं को सम्मान देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ की उपाधि दी थी. लेकिन ऐसे सपूत को ‘रॉ’ ने ही साजिश करके पकड़वा दिया और अंततः उनकी दुखद मौत हो गई.

भीषण अराजकता और बदइंतजामी का शिकार है ‘रॉ’
केंद्रीय खुफिया एजेंसी ‘रिसर्च एंड अनालिसिस विंग’ (रॉ) में भीषण अराजकता व्याप्त है. ‘रॉ’ की जिम्मेदारियां (अकाउंटिबिलिटी) कानूनी प्रक्रिया के तहत तय नहीं हैं. एकमात्र प्रधानमंत्री के प्रति उत्तरदायी होने के कारण ‘रॉ’ के अधिकारी इस विशेषाधिकार का बेजा इस्तेमाल करते हैं और विदेशी एजेंसियों से मनमाने तरीके से सम्पर्क साध कर फायदा उठाते रहते हैं. ‘रॉ’ के अधिकारियों कर्मचारियों के काम-काज के तौर तरीकों और धन खर्च करने पर अलग से कोई निगरानी नहीं रहती, न उसकी कोई ऑडिट ही होती है. ‘रॉ’ के अधिकारियों की बार-बार होने वाली विदेश यात्राओं का भी कोई हिसाब नहीं लिया जाता. कौन ले इसका हिसाब? प्रधानमंत्री या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार छोड़ कर कोई अन्य अधिकारी ‘रॉ’ से कुछ पूछने या जलाब-तलब करने की हिमाकत नहीं कर सकता. ‘रॉ’ के अधिकारी अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड और यूरोपीय देशों में बेतहाशा आते-जाते रहते हैं. लेकिन दक्षिण एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीकी देशों में उनकी आमद-रफ्त काफी कम होती है. जबकि इन देशों में ‘रॉ’ के अधिकारियों का काम ज्यादा है. ‘रॉ’ के अधिकारी युवकों को फंसा कर पाकिस्तान जैसे देशों में भेजते हैं और उन्हें मरने के लिए लावारिस छोड़ देते हैं. प्रधानमंत्री भी ‘रॉ’ से यह नहीं पूछते कि अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे आलीशान देशों में ‘रॉ’ अधिकारियों की पोस्टिंग अधिक क्यों की जाती है और पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका या अन्य दक्षिण एशियाई देशों या मध्य पूर्व के देशों में जरूरत से भी कम तैनाती क्यों है? इन देशों में ‘रॉ’ का कोई अधिकारी जाना नहीं चाहता. लेकिन इस अराजकता के बारे में कोई पूछताछ नहीं होती. ‘रॉ’ में सामान्य स्तर के कर्मचारियों की होने वाली नियुक्तियों की कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं है. कोई निगरानी नहीं है. ‘रॉ’ के कर्मचारियों का सर्वेक्षण करें तो अधिकारियों के नाते-रिश्तेदारों की वहां भीड़ जमा है. सब अधिकारी अपने-अपने रिश्तेदारों के संरक्षण में लगे रहते हैं. तबादलों और तैनातियों पर अफसरों के हित हावी हैं. यही वजह है कि जिस खुफिया एजेंसी को सबसे अधिक पेशेवर (प्रोफेशनल) होना चाहिए था, वह सबसे अधिक लचर साबित हो रही है.
‘रॉ’ में सीआईए वह कुछ अन्य विदेशी खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ भी गंभीर चिंता का विषय है. ‘रॉ’ के डायरेक्टर तक सीआईए के लिए जासूसी करने के आरोप में जेल की हवा खा चुके हैं. इसी तरह एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी जिसे आईबी का निदेशक बनाया जा रहा था, उसके बारे में पता चला कि वह दिल्ली में तैनात महिला सीआईए अधिकारी हेदी अगस्ट के लिए काम कर रहा था. तब उसे नौकरी से जबरन रिटायर किया गया. भेद खुला कि सीआईए ही उस आईपीएस अधिकारी को आईबी का निदेशक बनाने के लिए परोक्ष रूप से लॉबिंग कर रही थी. ‘रॉ’ में गद्दारों की लंबी कतार लगी है. ‘रॉ’ के दक्षिण-पूर्वी एशिया मसलों के प्रभारी व संयुक्त सचिव स्तर के आला अफसर मेजर रविंदर सिंह का सीआईए के लिए काम करना और सीआईए की साजिश से फरार हो जाना भारत सरकार को पहले ही काफी शर्मिंदा कर चुका है. रविंदर सिंह जिस समय ‘रॉ’ के कवर में सीआईए के लिए क्रॉस-एजेंट के बतौर काम कर रहा था, उस समय भी केंद्र में भाजपा की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. वर्ष 2004 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार आने के बाद रविंदर सिंह भारत छोड़ कर भाग गया. अराजकता का चरम यह है कि उसकी फरारी के दो साल बाद नवम्बर 2006 में ‘रॉ’ ने एफआईआर दर्ज करने की जहमत उठाई. मेजर रविंदर सिंह की फरारी का रहस्य ढूंढ़ने में ‘रॉ’ को आधिकारिक तौर पर आजतक कोई सुराग नहीं मिल पाया. जबकि ‘रॉ’ के ही अफसर अमर भूषण ने बाद में यह रहस्य खोला कि मेजर रविंदर सिंह और उसकी पत्नी परमिंदर कौर सात मई 2004 को राजपाल प्रसाद शर्मा और दीपा कुमारी शर्मा के छद्म नामों से फरार हो गए थे. उनकी फरारी के लिए सीआईए ने सात अप्रैल 2004 को इन छद्म नामों से अमेरिकी पासपोर्ट जारी कराया था. इसमें रविंदर सिंह को राजपाल शर्मा के नाम से दिए गए अमेरिकी पासपोर्ट का नंबर 017384251 था. सीआईए की मदद से दोनों पहले नेपालगंज गए और वहां से काठमांडू पहुंचे. काठमांडू में अमेरिकी दूतावास में तैनात फर्स्ट सेक्रेटरी डेविड वास्ला ने उन्हें बाकायदा रिसीव किया. काठमांडू के त्रिभुवन हवाई अड्डे से दोनों ने ऑस्ट्रेलियन एयरलाइंस की फ्लाइट (5032) पकड़ी और वाशिंगटन पहुंचे, जहां डल्स इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सीआईए एजेंट पैट्रिक बर्न्स ने दोनों की अगवानी की उन्हें मैरीलैंड पहुंचाया. मैरीलैंड के एकांत आवास में रहते हुए ही फर्जी नामों से उन्हें अमेरिका के नागरिक होने के दस्तावेज दिए गए, उसके बाद से वे गायब हैं. पीएमओ ने रविंदर सिंह के बारे में पता लगाने के लिए ‘रॉ’ से बार-बार कहा लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला, जबकि ‘रॉ’ प्रधानमंत्री के तहत ही आता है. इस मसले में ‘रॉ’ ने कई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के निर्देशों को भी ठेंगे पर रखा. रविंदर सिंह प्रकरण खुलने पर ‘रॉ’ के कई अन्य अधिकारियों की भी पोल खुल जाएगी, इस वजह से ‘रॉ’ ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया.
विदेशी एजेंसियों के लिए क्रॉस एजेंसी करने और अपने देश से गद्दारी करने वाले ऐसे कई ‘रॉ’ अधिकारी हैं, जो पकड़े जाने के डर से या प्रलोभन से देश छोड़ कर भाग गए. मेजर रविंदर सिंह जैसे गद्दार अकेले नहीं हैं. ‘रॉ’ के संस्थापक रहे रामनाथ काव का खास सिकंदर लाल मलिक जब अमेरिका में तैनात था तो वहीं से लापता हो गया. सिकंदर लाल मलिक का आज तक पता नहीं चला. मलिक को ‘रॉ’ के कई खुफिया प्लान की जानकारी थी. बांग्लादेश को मुक्त कराने की रणनीति की फाइल सिकंदर लाल मलिक के पास ही थी, जिसे उसने अमेरिका को लीक कर दिया था. मलिक की उस कार्रवाई को विदेश मामलों के विशेषज्ञ एक तरह की तख्ता पलट की कोशिश बताते हैं, जिसे इंदिरा गांधी ने अपनी बुद्धिमानी और कूटनीतिक सझ-बूझ से काबू कर लिया.
मंगोलिया के उलान बटोर और फिर इरान के खुर्रमशहर में तैनात रहे ‘रॉ’ अधिकारी अशोक साठे ने तो अपने देश के साथ निकृष्टता की इंतिहा ही कर दी. साठे ने खुर्रमशहर स्थित ‘रॉ’ के दफ्तर को ही फूंक डाला और सारे महत्वपूर्ण और संवेदनशील दस्तावेज आग के हवाले कर अमेरिका भाग गया. विदेश मंत्रालय को जानकारी है कि साठे कैलिफोर्निया में रहता है, लेकिन ‘रॉ’ उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया. ‘रॉ’ के सीनियर फील्ड अफसर एमएस सहगल का नाम भी ‘रॉ’ के भगेड़ुओं में अव्वल है. लंदन में तैनाती के समय ही सहगल वहां से फरार हो गया. टोकियो में भारतीय दूतावास में तैनात ‘रॉ’ अफसर एनवाई भास्कर सीआईए के लिए क्रॉस एजेंट का काम कर रहा था. वहीं से वह फरार हो गया. काठमांडू में सीनियर फील्ड अफसर के रूप में तैनात ‘रॉ’ अधिकारी बीआर बच्चर को एक खास ऑपरेशन के सिलसिले में लंदन भेजा गया, लेकिन वह वहीं से लापता हो गया. बच्चर भी क्रॉस एजेंट का काम कर रहा था. ‘रॉ’ मुख्यालय में पाकिस्तान डेस्क पर अंडर सेक्रेटरी के रूप में तैनात मेजर आरएस सोनी भी मेजर रविंदर सिंह की तरह पहले सेना में था, बाद में ‘रॉ’ में आ गया. मेजर सोनी कनाडा भाग गया. ‘रॉ’ में व्याप्त अराजकता का हाल यह है कि मेजर सोनी की फरारी के बाद भी कई महीनों तक लगातार उसके अकाउंट में उसका वेतन जाता रहा. इस्लामाबाद, बैंगकॉक, कनाडा में ‘रॉ’ के लिए तैनात आईपीएस अधिकारी शमशेर सिंह भी भाग कर कनाडा चला गया. इसी तरह ‘रॉ’ अफसर आर वाधवा भी लंदन से फरार हो गया. केवी उन्नीकृष्णन और माधुरी गुप्ता जैसे उंगलियों पर गिने जाने वाले ‘रॉ’ अधिकारी हैं, जिन्हें क्रॉस एजेंसी या कहें दूसरे देश के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा सका. पाकिस्तान के भारतीय उच्चायोग में आईएफएस ग्रुप-बी अफसर के पद पर तैनात माधुरी गुप्ता पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी के साथ मिल कर भारत के ही खिलाफ जासूसी करती हुई पकड़ी गई थी. माधुरी गुप्ता को 23 अप्रैल 2010 को गिरफ्तार किया गया था. इसी तरह अर्सा पहले ‘रॉ’ के अफसर केवी उन्नीकृष्णन को भी गिरफ्तार किया गया था. पकड़े जाने वाले ‘रॉ’ अफसरों की तादाद कम है, जबकि दूसरे देशों की खुफिया एजेंसी की साठगांठ से देश छोड़ कर भाग जाने वाले ‘रॉ’ अफसरों की संख्या कहीं अधिक है. 

Friday, 10 November 2017

लड़ाई के लिए तैयार हो रहे हैं किसान

प्रभात रंजन दीन
उत्तर प्रदेश में जुझारू किसान आंदोलन की चिंगारी सुलग रही है. गन्ना मूल्य में 10 रुपए की बढ़ोत्तरी करके उत्तर प्रदेश सरकार ने यूपी के किसानों को और भड़का दिया है. आलू, गेहूं और धान खरीद के नाम पर योगी सरकार की धोखाधड़ी से प्रदेश के किसान पहले से बेहाल और नाराज थे, उस पर गन्ना मूल्य के नाम पर किसानों के साथ मजाक कर सरकार ने मामले को अत्यंत गंभीर बना दिया है. जगह-जगह गन्ने फूंके जा रहे हैं और आलू सड़कों पर फेंके जा रहे हैं. यूपी के किसान संगठनों के साथ देशभर के किसान संगठन बैठकें कर रहे हैं और इन सबकी कोशिश है कि यूपी का किसान आंदोलन इस बार ठोस परिणाम लेकर ही माने. इस बार के किसान आंदोलन का हश्र महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश या राजस्थान की तरह न हो. भाजपा सरकार ने जिस तरह महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के किसान आंदोलनों की जड़ में मट्ठा डाला, इस बार उससे सतर्क रहने की जिद है. कई राजनीतिक दलों से जुड़े किसान संगठनों ने यूपी में शुरू किए जाने वाले किसान आंदोलन को राजनीति से अलग रखने का संकल्प लिया है. सब यह मान रहे हैं कि राजनीति बहुत हो गई, अब ठोस परिणाम की लड़ाई जरूरी हो गई है. यूपी की राजधानी लखनऊ से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक बैठकों का सिलसिला चल रहा है. दिल्ली में किसानों का जन-संसद आयोजित करने की जोरदार तैयारी चल रही है.
अभी हाल-हाल तक गन्ना मूल्य साढ़े तीन सौ रुपए और चार सौ रुपए किए जाने की मांग करती रही भाजपा ने सत्ता पर सवार होते ही ऐसे उड़ान भरनी शुरू कर दी कि उसे जमीन का एहसास ही नहीं रहा. प्रदेश के गन्ना विकास मंत्री सुरेश राणा ने पिछले दिनों बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर गन्ना मूल्य में 10 रुपए की बढ़ोत्तरी करने की हास्यास्पद घोषणा की. ये वही सुरेश राणा हैं जो विधानसभा में यह मांग उठाते रहे हैं कि गन्ना मूल्य चार सौ रुपए प्रति क्विंटल किया जाए. समाजवादी पार्टी की सरकार ने जब गन्ना मूल्य की घोषणा की थी तब थानाभवन के भाजपा विधायक सुरेश राणा ने उसे किसानों के साथ धोखा बताया था और सरकार से चार सौ रुपए प्रति क्विंटल गन्ना मूल्य घोषित करने की मांग की थी. राणा के सुर में सुर मिलाते हुए शामली के भाजपा विधायक पंकज मलिक ने भी विधानसभा में गन्ना मूल्य का मुद्दा उठाकर सपा सरकार को आड़े हाथों लिया था और गन्ना मूल्य कम से कम साढ़े तीन सौ से चार सौ रुपए प्रति क्विंटल करने की मांग की थी. सुरेश राणा ने सपा सरकार को खूब कोसा था और उसे किसान विरोधी बताया था. सत्ता मिलते ही नेता के सुर कैसे बदलते हैं, सुरेश राणा की गन्ना विकास मंत्री के रूप में की गई घोषणा, इसका सटीक उदाहरण है. जब तत्कालीन सपा सरकार ने 2016-17 के पेराई सत्र के लिए गन्ना मूल्य में 25 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोत्तरी की थी तब भाजपा ने इसपर नाराजगी जताते हुए कहा था कि इससे फसल की लागत भी नहीं निकल पा रही है. भाजपा ने चीनी के बढ़े दामों के सापेक्ष गन्ना मूल्य निर्धारित करने की मांग की थी. तब इन्हीं सुरेश राणा (जो आज प्रदेश के गन्ना विकास राज्य मंत्री हैं) ने कहा था कि गन्ना मूल्य में 25 रुपए की बढ़ोत्तरी किसानों के साथ धोखा है. राणा ने विधानसभा में 2011 में बसपा शासनकाल के दरम्यान शिवपाल यादव द्वारा गन्ना मूल्य 350 रुपए किए जाने की मांग का हवाला देते हुए सपा शासनकाल को आड़े हाथों लिया था और कहा था कि सपा सरकार किसान विरोधी है.  सुरेश राणा के हास्यास्पद और फूहड़ व्यवहार से प्रदेश के लोगों को यह समझ में आ गया कि असल में कौन किसान विरोधी है.
उल्लेखनीय है कि यूपी में गन्ने का राज्य परामर्शित मूल्य (एसएपी) वर्ष 2011 से लेकर 2015 तक 280 रुपए था. आखिरी दौर में सपा सरकार ने एसएपी में 25 रुपए की बढ़ोत्तरी कर उसे 315 रुपए प्रति क्विंटल किया था. उसे भाजपा ने धोखा बताया था. वर्ष 2014 से लेकर यूपी के विधानसभा चुनाव तक प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों से कई बार वादा किया कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट शीघ्र लागू की जाएगी और किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना मूल्य निर्धारित किया जाएगा. लेकिन मोदी ने इसे लागू नहीं किया. किसानों को एकजुट करने में लगे राष्ट्रीय किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद सिंह कहते हैं कि किसानों को लागत का दो गुना मूल्य मिलना चाहिए, लेकिन मोदी ने जो घोषणा की और जो वादा किया उसे ही वे लागू करें. सिंह कहते हैं कि गन्ना का सम्मानजनक और पोषणीय समर्थन मूल्य घोषित करने के नाम पर सरकार ‘लीचड़बाजी’ करती है, चीनी बाजार में महंगी बिकती है लेकिन गन्ना कौड़ियों में खरीदा जाता है. यह तो सीधा-सीधा मानवाधिकार हनन है. सरकार खुद किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश करती है, उकसाती है. जब तक कच्चा माल और उत्पाद के लाभ का बंटवारा बराबर नहीं किया जाएगा, तब तक किसानों की स्थिति नहीं सुधरेगी. और ऐसा करने में सरकार को परेशानी क्या है? यह सरकारों का षडयंत्र है कि कच्चा माल मुहैया करने वाला किसान लागत मूल्य नहीं पाता और उसी के माल से व्यापारी और बिचौलिया मालामाल होता रहता है. दूसरी तरफ सरकार किसानों के लिए सब्सिडी भी कम करती जा रही है. कर्ज माफी की सरकारी घोषणाएं समस्या का समाधान नहीं हैं, बल्कि वह और नासूर की तरह किसानों को ग्रसता जा रहा है.
इन्हीं मुद्दों पर विचार करने और किसानों को जागरूक और सतर्क करने के लिए राष्ट्रीय किसान मंच ने बीते 16 से 18 सितम्बर तक वाराणसी में तीन दिवसीय राष्ट्रीय किसान परिसंवाद का आयोजन किया था. इस परिसंवाद में शरीक हुए ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ने भी कहा था कि आज की सबसे बड़ी जरूरत किसानों को उपज का सही मूल्य मिलने की है. बाजार की ताकतों की साजिश है कि पैदावार बाजार में आते ही दाम इतने कम कर दिए जाते हैं कि किसान उन्हें सड़कों पर फेंकने को मजबूर हो जाते हैं. किसान अगर इस शिकंजे से निकल जाएं तो उन्हें उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है. इसके लिए स्थानीय स्तर पर अनाज के भंडारण की व्यवस्था और उसे सही कीमत पर बेचने की सुविधा सुनिश्चित करनी होगी. पंचायत और ब्लॉक स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और अन्य कृषि उद्योगों की स्थापना बेहद जरूरी है, जो सरकार की मदद के बिना भी हो सकती हैं. लेकिन इसके लिए एकजुट पहल करनी होगी. श्री भारतीय ने कहा कि दरअसल मर्म पर चोट ही नहीं हो रही. विभिन्न प्रदेशों में जो किसान आंदोलन चले, वे स्वतःस्फूर्त हैं. इनका नेतृत्व कोई स्थापित नेता या राजनीतिक दलों से सम्बद्ध किसान संगठन नहीं कर रहे हैं. अब किसानों से जुड़े मसलों पर समग्र रूप से विचार करने और उसे संगठित राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने की जरूरत है. इसके लिए सभी किसान संगठनों को एकजुट होना होगा. संतोष भारतीय ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक किसान एकता का आधार पुख्ता करने की आवश्यकता पर जोर दिया.
उत्तर प्रदेश गन्ना किसान संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष शिवाजी राय कहते हैं कि गन्ना मूल्य में 10 रुपए की बढ़ोत्तरी किसानों के साथ क्रूर मजाक है. ऐसा करके प्रदेश के किसानों को चिढ़ाया गया है. प्रदेश की हालत यह है कि चीनी मिल मालिक गन्ना किसानों का पैसा नहीं दे रहा है और सरकार उन्हें राहत पर राहत दिए जा रही है. चीनी मिलों को बिना ब्याज का अरबों का राहत पैकेज मिलता है, यानि, गन्ना किसानों के बकाये का जो भी थोड़ा-बहुत भुगतान हो रहा है, वह सरकार ही परोक्ष रूप से दे रही है. दूसरी तरफ किसानों को जो ऋण दिया जाता है उसे बेहद क्रूरता पूर्वक ब्याज सहित वसूलता जाता है. शिवाजी राय ने कहा कि सरकारों ने पूर्वांचल के पूरे अर्थशास्त्र को तबाह कर डाला. हम कहते हैं कि हमें ट्रेनें नहीं, उद्योग चाहिए. लेकिन सरकार बंद पड़े उद्योग खोलने के बजाय उसे बंद रखने में रुचि रखती है ताकि पूंजीपतियों के विभिन्न ट्रेड सेंटरों पर सस्ता मजदूर मिल सके. किसानों को गिरमिटिया मजदूर बना कर रख दिया गया है. ट्रेनें उन्हीं मजदूरों को ढोने का काम कर रही हैं. सरकारों ने पूंजिपतियों के ट्रेड सेंटरों को मजबूती दी और उसे ही विकास नाम दे दिया. किसानों को सस्ता मजदूर बना कर उन्हीं पूंजिपतियों को उपलब्ध करा दिया. पूर्वी क्षेत्र के आर्थिक स्वावलंबन को साजिश करके तोड़ा गया. पूर्वी क्षेत्र का उद्योग धंधा और उत्पादन कृषि आधारित था. चीनी मिल चलाने के लिए किसानों ने अपनी-अपनी जमीनें लीज़ पर दी थीं. लखनऊ से आप पूरब की तरफ रेल से चलें तो सारे स्टेशन चीनी मिलों के कारण स्थापित हुए थे. ट्रेनें पहले गन्ना ढोने का काम करती थीं, जो आज मजदूर ढोने का काम कर रही हैं. लखनऊ से रेल से चलें तो मैजापुर (बाराबंकी), जरवल रोड (बहराइच), कुंदरखी (गोंडा), बभनान (बस्ती), गोविंद नगर (बस्ती), मुंडेरवा (बस्ती), बस्ती, खलीलाबाद (संत कबीर नगर), सरदार नगर (गोरखपुर), गौरीबाजार (देवरिया), बैतालपुर (देवरिया), देवरिया, भटनी (देवरिया), प्रतापपुर (देवरिया) से होते हुए बिहार के सीवान स्टेशन और उससे आगे सुदूर उत्तरी बिहार तक चीनी मिलों के कारण ही तमाम स्टेशन अस्तित्व में आए. पूरा पूर्वी क्षेत्र गन्ना आधारित उद्योग-धंधों के कारण फल-फूल रहा था. रेलवे ट्रैक के किनारे-किनारे चीनी मिलों की कतारें आप देख सकते हैं. जिनमें से अधिकांश मिलें आज बंद हालत में भूतहा खंडहर की तरह दिखती हैं. गन्ना आधारित उद्योगों के विकसित होने के कारण पूर्वी क्षेत्र में हथकरघा उद्योग भी खूब विकसित हुआ. भदोही, वाराणसी, मऊ, गोरखपुर, संत कबीर नगर, बस्ती, मगहर, टांडा, खलीलाबाद गन्ना आधारित उद्योगों के साथ-साथ हथकरघा, कालीन, साड़ी के बेहतरीन उत्पादन के लिए विश्व स्तर पर जाना गया. पूर्वी क्षेत्र में ठोस आर्थिक स्वावलंबन और स्वायत्तता स्थापित थी, लेकिन नेताओं ने पूंजीपतियों के साथ साठगांठ करके इस क्षेत्र की पूरी इकोनॉमी को ध्वस्त कर दिया. केवल इसलिए कि पूंजीपति विकसित हो और उसके लिए सस्ता श्रम उपलब्ध कराया जा सके और धीरे-धीरे किसानों की जमीनें भी छीन कर पूंजीपतियों को कारपोरेट फार्मिंग दी जा सकें. आज पूर्वी क्षेत्र के गांव के गांव खाली हैं. निम्नवर्गीय तबका तो छोड़िए, मध्यवर्गीय जमात तक महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात, पंजाब के विभिन्न पूंजी उत्पाद केंद्रों पर मजदूरी करने के लिए जा चुकी है. इन राज्यों में पूर्वी क्षेत्र के लोग सस्ता श्रम भी देते हैं और अपमानित भी होते हैं. गन्ने की खेती तेजी से बंद होती जा रही है. पूर्वांचल के किसान सुनियोजित षडयंत्र का शिकार हुए हैं. किसानों की समस्या स्वाभाविक नहीं है. यह समस्या साजिश करके उत्पन्न की गई है.
उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच अब ये मुद्दे उग्र रूप लेते जा रहे हैं. किसान खुद को ठगा महसूस कर रहा है. किसानों के विरोध प्रदर्शनों और बैठकों का सिलसिला पश्चिम से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक तेज गति से चल रहा है. पिछले दिनों लखनऊ में विभिन्न किसान संगठनों की बैठक हुई जिसमें अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के अध्यक्ष धरमपाल सिंह, महासचिव हीरालाल, किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष शिवाजी राय, जन जागरूकता अभियान के संयोजक सीवी सिंह, भूमिहीन किसान संघर्ष समिति के नेता अरविंद मूर्ति, अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा के अध्यक्ष बचाऊ राम और स्वराज अभियान के अखिलेंद्र प्रताप समेत किसान संग्राम समिति, खेत मजदूर किसान संग्राम समिति, अखिल भारतीय किसान सभा हरदोई, मानववादी जनमंच, जनवादी किसान सभा व कई अन्य किसान संगठनों के नेता शरीक थे. इस सभा में यह मसला पुरजोरी से उठा कि सभी सरकारें बड़े उद्योगपतियों को टैक्स में छूट देती हैं, उन्हें बिना ब्याज का पैकेज देती हैं, उनके कर्ज माफ करती हैं और बकाया नहीं वसूलतीं, लेकिन किसानों के प्रति सरकारों का रवैया बिल्कुल नकारात्मक और उत्पीड़नात्मक रहता है. पिछले वर्ष ही केंद्र सरकार ने उद्योगपतियों को छह लाख करोड़ के टैक्स की छूट दी. पिछले पांच साल का रिकॉर्ड देखा जाए तो छूट की रकम 25 लाख करोड़ रुपए से अधिक होती है. जबकि देश के किसानों पर कुल ऋण 12 करोड़ 60 लाख रुपए है, जिसे ब्याज सहित क्रूरतापूर्वक वसूला जा रहा है. किसानों को दिया गया ऋण खेती-किसानी के काम में और बैंकों के अधिकारियों-कर्मचारियों को घूस देने में ही खर्च होता है. स्वामीनाथन आयोग ने किसानों को उनकी फसलों की लागत का डेढ़ गुना देने की सिफारिश की थी, लेकिन उसे आज तक लागू नहीं किया गया. किसानों की सभा में यह सवाल भी उठा कि जब सिफारिशें लागू नहीं होतीं, तो आयोग बनाए ही क्यों जाते हैं? फसलों के लागत-मूल्य का डेढ़ गुना अधिक समर्थन मूल्य तय करने के अलावा किसानों से जुड़े कई अन्य मसलों पर भी चर्चा हुई और आंदोलन की रूपरेखा तय की गई. इसके बाद बागपत के भड़ल में और 14 अक्टूबर को दिल्ली में किसान संगठनों की बैठक हुई, जिसमें देशभर के 187 किसान संगठनों ने हिस्सा लिया. भड़ल की सभा में किसान अधिकार समन्वय मंच बना जो देशभर के किसान संगठनों के साथ समन्वय बनाएगा. दिल्ली बैठक में 167 विभिन्न किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व लेकर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति गठित की गई. दिल्ली बैठक में यूपी, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक और तमिलनाडु तक के किसान संगठन शामिल हुए. दिल्ली बैठक में यह तय हुआ कि उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन तेज करने के पहले दिल्ली में 20 नवम्बर से धरना और भूख हड़ताल शुरू की जाएगी.
गन्ने का समर्थन मूल्य 10 रुपए बढ़ा कर सरकार ने आग में घी डालने का काम किया है. सरकार के इस फैसले के खिलाफ राजधानी लखनऊ से लेकर पूरे प्रदेशभर में किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया और गन्ने की फसलें फूंकीं. भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने सरकार की इस मजाकिया घोषणा को चीनी मिलों और सरकार की मिलीभगत का नतीजा बताया. टिकैत ने कहा कि भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में उचित और लाभकारी मूल्य देने की बात कही थी लेकिन मिल मालिकों के दबाव में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार गन्ना किसानों को लागत और श्रम पर आधारित मूल्य दिलाने में भी नाकाम रही. राष्ट्रीय किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष रिंकू तिवारी ने कहा कि डीजल, बिजली, कीटनाशक, खाद वगैरह के दाम बढ़ने से गन्ना किसानों की लागत भी काफी बढ़ गई है. विडंबना यह है कि उत्तर प्रदेश में गन्ना मूल्य तय करने को लेकर आयोजित बैठक में भी किसानों ने अपनी लागत का आंकड़ा गन्ना विभाग को दिया था. लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. स्पष्ट है कि सरकार चीनी मिल मालिकों के साथ खड़ी है. राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल दुबे ने घोषित गन्ना खरीद मूल्य को किसानों के साथ विश्वासघात बताया और कहा कि सत्ता में आने से पहले खुद भाजपा ने प्रदेश के किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने का वादा किया था. भाजपा ही 350 रुपए प्रति क्विंटल गन्ना मूल्य देने की मांग करती रही है, फिर सत्ता में आते ही चरित्र कैसे बदल लिया? यह साबित हो गया कि  भाजपा के एजेंडे में किसानों और मजदूरों के लिए कोई स्थान नहीं है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी थोपकर देश की अर्थव्यवस्था चौपट कर दी और किसानों को बदहाल-बेहाल कर दिया. सरकार ने आलू किसानों को गुमराह किया. गन्ना किसान को भाजपा ने पुराने मूल्य से 10 रुपए की बढ़त दी, जबकि समाजवादी सरकार ने 40 रुपए की एकमुश्त बढ़त की थी. अखिलेश ने विधानसभा के समक्ष गन्ना किसानों के प्रदर्शन और गन्ना फूंक कर विरोध दर्ज कराए जाने को सही बताया और उनके प्रति अपना समर्थन जताया. सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि भाजपा सरकार ने पेराई सत्र 2017-18 के लिए गन्ना खरीद का राज्य परामर्शित मूल्य 10 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा कर किसानों के साथ घोर अन्याय किया है. भाजपा सरकार की किसानों के साथ धोखाधड़ी का यह कोई पहला मामला नहीं है. कर्जमाफी के मामले में भी वह किसानों के साथ विश्वासघात कर चुकी है. चौधरी ने कहा कि भाजपा पूंजीघरानों की पोषक पार्टी रही है. किसान, गरीब, गांव कभी उसकी प्राथमिकता में नहीं रहे हैं. गरीब किसान का एक लाख तक कर्ज माफ करने में उसने हेराफेरी की जबकि बड़े व्यापारिक घरानों के करोड़ों रुपए के कर्ज माफ कर दिए गए. किसानों को उनकी फसल का उचित और लाभप्रद मूल्य देने में आनाकानी से भाजपा का किसान विरोधी चरित्र उजागर हो गया है. भारतीय किसान यूनियन के मंडल अध्यक्ष हरिनाम सिंह वर्मा ने भाजपा सरकार की घोषणा को किसानों के साथ कुठाराघात बताया और गन्ने का मूल्य 450 रुपए प्रति क्विंटल, धान का मूल्य 2500 रुपए प्रति क्विंटल और आलू का मूल्य हजार रुपए प्रति क्विंटल करने की मांग की. वर्मा ने कहा कि योगी सरकार ने ऐसा नहीं किया तो प्रदेश के किसान सरकार को उचित और करारा जवाब देंगे.
गन्ना मूल्य को लेकर यूपी सरकार की घोषणा के बाद प्रदेशभर में धरना-प्रदर्शन तेज हो गया है. पश्चिमी यूपी के गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर, इटावा, आगरा, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, बागपत, एटा, कासगंज, बरेली, कानपुर से लेकर पूर्वांचल के चंदौली, देवरिया, वाराणसी, कुशीनगर, गोरखपुर, गाजीपुर, महराजगंज, बलिया, बस्ती, गोंडा और राजधानी लखनऊ के साथ-साथ हरदोई, शाहजहांपुर, पीलीभीत, सीतापुर और लखीमपुर खीरी में किसानों की सभाएं और प्रदर्शन तेजी से शुरू हुए हैं. प्रदेशभर में किसानों को एकजुट करने का काम सक्रियता से हो रहा है. मुजफ्फरनगर के किसानों ने तो फैसला कर लिया है कि गन्ना मूल्य साढ़े चार सौ रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित नहीं किया गया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में वे भाजपा को वोट नहीं देंगे. राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के जिलाध्यक्ष सुमित मलिक ने किसानों के साथ जोरदार प्रदर्शन किया और यह घोषणा की. उन्होंने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को इस आशय का ज्ञापन भी दिया, जिसे सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा गया. संभल क्षेत्र के किसानों ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से गन्ना मूल्य साढ़े चार सौ या कम से कम चार सौ रुपए करने की मांग की. समाज हित संरक्षण समिति के अध्यक्ष महंत भगवानदास शर्मा ने इस सिलसिले में मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा है. भारतीय किसान यूनियन ने सरकार के फैसले के खिलाफ बिजनौर में भी गन्ने की होली जलाई और गन्ने का भाव 450 रुपए प्रति क्विंटल करने की मांग की. भाकियू नेता नरेश प्रधान ने कहा कि भाजपा सरकार ने मात्र दस रुपए का रेट बढ़ाकर गन्ना किसानों के साथ धोखा किया है. भाकियू नेता दिगम्बर सिंह और धर्मवीर सिंह धनकड़ ने गन्ने का भाव कम से कम 450 रुपए प्रति क्विंटल करने की मांग की. रालोद के जिला अध्यक्ष अशोक चौधरी ने कहा कि बाजार में चीनी का भाव अच्छा है लेकिन गन्ने का भाव अत्यंत कम. यह किसानों के साथ अपराध है. आजाद किसान यूनियन के नेता राजेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह ने सरकार द्वारा घोषित गन्ना मूल्य को ऊंट के मुंह में जीरा बताया. सपा के जिला अध्यक्ष अनिल यादव ने कहा कि भाजपा सरकार किसान विरोधी है. बसपा के जिला अध्यक्ष सरजीत सिंह ने कहा कि किसानों के लिए भाजपा सरकार की कथनी और करनी का भेद उजागर हो गया है.
कैथल में भी किसानों ने सरकार के फैसले के खिलाफ व्यापक संघर्ष छेड़ने और चीनी मिल घेरने की घोषणा कर दी है. कैथल के किसानों की बैठक में गन्ना संघर्ष समिति और भारतीय किसान संघ के सदस्यों ने बाकायदा कैथल शुगर मिल परिसर में बैठक की. बैठक की अध्यक्षता प्रधान गुल्तान सिंह नैना ने की. भारतीय किसान संघ के प्रदेश प्रवक्ता रणदीप सिंह आर्य, श्रीराम मोहना, दीपक वालिया, नरेंद्र राणा, अमरदीप सहारण, कुलदीप नैना, मियां सिंह, महेंद्र सिंह, गौरव नैन, कृष्ण वालिया, मग्गर सिंह, पाला राम, विक्रम सिंह, अरुण वालिया वगैरह बैठक में मौजूद थे. इस मसले पर गाजियाबाद में भी भाकियू ने धरना-प्रदर्शन किया और व्यापक आंदोलन छेड़ने की मुनादी की. सरकार द्वारा की गई गन्ना मूल्य वृद्धि के विरोध में किसानों ने गाजियाबाद तहसील पर जोरदार धरना दिया जिसकी अध्यक्षता बिजेन्द्र सिंह ने की और संचालन वेदपाल मुखिया ने किया. भाकियू के प्रदेश उपाध्यक्ष राजवीर सिंह, जयकुमार मलिक, ब्रजवीर सिंह, सुंदरपाल, अशोक कुमार, चन्द्रपाल, सतवीर सिंह, राजेन्द्र समेत बड़ी तादाद में किसान मौजूद थे. भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) ने भी जिलाध्यक्ष राजबहादुर सिंह यादव के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया और गन्ने की होली जलाई. जनप्रतिनिधियों को कोसा. सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर नाराजगी जताई. सरकार के फैसले के खिलाफ बागपत के चौगामा क्षेत्र के किसानों ने पंचायत की और सरकार को चेतावनी दी कि यदि गन्ना मूल्य नहीं बढ़ा तो व्यापक आंदोलन किया जाएगा. बागपत के किसानों की दोघट, दाहा, पुसार में पंचायतें हुईं. किसानों की दोघट पंचायत की अध्यक्षता करने वाले बलबीर सिंह लंबरदार ने कहा कि प्रदेश सरकार ने साबित किया है कि वह किसान मजदूर विरोधी है. चौगामा किसान क्लब दाहा और राष्ट्रीय मजदूर किसान पार्टी के अध्यक्ष डॉक्टर रणबीर राणा ने कहा कि किसानों के साथ किया गया मजाक सरकार पर भारी पड़ेगा. प्रदेश के किसान लोकसभा चुनाव में हिसाब-किताब चुकता कर देंगे.

अपना जिला छोड़ कर दूसरे जिलों का गन्ना खरीद लेती है चीनी मिल
फैजाबाद के सोहावल तहसील में मसौधा स्थित केएम शुगर मिल की धांधली भी अजीबोगरीब है. केएम शुगर मिल प्रबंधन जिले का गन्ना न खरीद कर सस्ते में गन्ना बेचने के लिए उद्धत दूसरे जिलों के किसानों से गन्ना खरीद लेता है. जिले का किसान अपनी फसल लिए मिल के बाहर लाइन लगाए कई-कई दिन खड़ा रहता है जबकि दूसरे जिले का गन्ना सीधे मिल के अंदर पहुंच जाता है. इसे लेकर फैजाबाद जिले के किसानों में गहरी नाराजगी है. पिछले दिनों राष्ट्रीय किसान मंच ने इस समस्या पर स्थानीय किसानों के साथ बैठक की और आंदोलन का तानाबाना बुना. किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र तिवारी उर्फ रिंकू ने बताया कि छतिरवां गांव के किसानों की पंचायत में केएम शुगर मिल की धांधलियों का मसला उठा. किसानों ने कहा कि सर्वे में जिले के किसानों की जो सूची बनती है, उसे ताक पर रख कर मिल प्रबंधन दूसरे जिलों के किसानों का गन्ना खरीद लेता है. कतार में खड़े स्थानीय किसानों की फसल को पुराना या खराब बता कर लौटा दिया जाता है. किसान मंच फैजाबाद के अध्यक्ष विनीत सिंह ने कहा कि मिल प्रबंधन के इस रवैये के कारण किसान कई-कई दिनों अपना गन्ना तौल केंद्र पर रखने के लिए मजबूर हो जाते हैं. समय से तौल नहीं होने के कारण गन्ना सूख जाता है. इसकी शिकायत पर मिल प्रबंधन से लेकर प्रशासन तक कोई ध्यान नहीं देता. किसानों के इस उत्पीड़न के खिलाफ मिल घेरने और गन्ना खरीद की प्रक्रिया को ठप्प कर देने की तैयारी चल रही है.

गेहूं, आलू और धान में भी मारा गया किसान
उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए गेहूं, आलू, धान और अब गन्ना, चारों फसलें भारी नुकसान का जरिया साबित हुईं. गेहूं और आलू की रिकॉर्ड पैदावार ने किसानों को और बर्बाद ही किया है. योगी सरकार ने आलू का समर्थन मूल्य 467 रुपए प्रति क्विंटल कर यूपी के किसानों से एक लाख मिट्रिक टन आलू खरीदने की घोषणा की थी. लेकिन परिणाम यह निकला कि किसानों को अपनी फसल सड़क पर फेंकनी पड़ी या कोल्ड स्टोरेज में आलू छोड़ देना पड़ा. उत्तर प्रदेश में आलू की खेती करने वाले किसान इस बार बर्बाद हो गए. कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के कारण भी किसानों को करोड़ों का नुकसान हुआ. योगी सरकार की आलू खरीद नीति पूरी तरह ढकोसला साबित हुई. आलू उगाने से लेकर उसे मंडी तक पहुंचाने का महंगा भाड़ा देने और कोल्ड स्टोरेज का किराया चुकाने में किसानों की टेंट ढीली हो गई है. जबकि उनका आलू कौड़ियों के भाव बिकने पर आ गया. सरकार ने केवल घोषणा की, किसानों का आलू नहीं खरीदा. सरकार ने आलू खरीदने के मानक ऐसे तय कर दिए कि सारे आलू उस मानक पर रिजेक्ट कर दिए गए. विवश किसानों को अपना आलू फेंक देना पड़ा. इससे आलू किसानों की आर्थिक रीढ़ टूट गई. किसान कहते हैं कि आलू बोने से अच्छा है खेत को खाली छोड़ देना. आलू उत्पादन के गढ़ फर्रुखाबाद में तो आलू किसानों के बुरे दिन हैं. किसान सड़क के किनारे आलू फेंक रहे हैं. जिले के करीब 70 कोल्ड स्टोरेज आलू से भरे पड़े हैं. अब कोई भी कोल्ड स्टोर आलू रखने की स्थिति में नहीं है. किसान भी कोल्ड स्टोरेज में ही आलू छोड़ कर चला गया. फर्रुखाबाद के तकरीबन 34 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की फसल बोई गई थी. आलू के रिकॉर्ड उत्पादन का नतीजा यह निकला कि वह या तो कौड़ियों के मोल बिका या कूड़े की तरह रास्तों पर फेंका सड़ता हुआ नजर आया. यही हाल गेहूं और धान का भी हुआ. योगी सरकार ने राज्य में पांच हजार खरीद केंद्रों के जरिए 80 लाख टन गेहूं खरीदने की घोषणा की थी. लेकिन यह घोषणा भी टांय-टांय-फिस्स साबित हुई. सरकार ने गेहूं की तर्ज पर 3500 क्रय केंद्रों के जरिए 50 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने की घोषणा की लेकिन धान खरीद में भी सरकार फ्लॉप रही और बिचौलियों का बोलबाला बना रहा. स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य अजित सिंह यादव कहते हैं कि यूपी के पूरे धान बेल्ट में धान की खरीद का सरकारी दावा बेमानी साबित हो रहा है. बिचौलियों के जरिए मनमानी कीमत पर धान खरीदा गया और सरकार के नुमाइंदे बिचौलियों को ही अपना सहयोग देते रहे. बदायूं, पीलीभीत और तराई के विस्तृत धान पट्टी क्षेत्र के किसानों में इससे भीषण नाराजगी है.

इस बार किसान मांगेंगे अलग पूर्वांचल
किसान आंदोलन की सुगबुगाहटों में इस बार अलग पूर्वांचल की मांग भी शामिल है. अलग पूर्वांचल की किसानों की मांग राजनीतिक पार्टियों की मांग से अलग है. किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष शिवाजी राय कहते हैं कि आर्थिक तौर पर स्वावलंबी रहे पूर्वांचल को जिस तरह षडयंत्र करके ध्वस्त किया गया, उसका अब एक ही उपाय बचा है, या तो केंद्र सरकार पूर्वांचल के लिए एक लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज अलग से घोषित करे या पूर्वांचल को अलग राज्य के रूप में घोषित करे. पूर्वांचल के किसान राजनीतिक तौर पर नहीं, आर्थिक तौर पर विभाजन चाहते हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों ने पूर्वांचल को दूसरे और तीसरे दर्जे का क्षेत्र बना कर रख दिया है. विभिन्न सरकारों ने पश्चिम में निवेश कराया और पश्चिम के विकास पर ही सारा ध्यान दिया. पूरब के विकास की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया, जबकि पूर्वांचल ने कृषि विकास और लघु उद्योगों के विकास के साथ-साथ शैक्षणिक विकास का भी प्रतिमान स्थापित किया है. काशी हिंदू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पूर्वांचल विश्वविद्यालय, आचार्य नरेंद्र देव विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक प्रतिष्ठान पूरब में ही स्थापित हुए. शिवाजी राय ने कहा कि पूर्वांचल के लोगों और खास तौर पर यहां के किसानों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस रवैये से गहरी निराशा है कि वे सांसद तो वाराणसी के हैं, लेकिन सारा ध्यान गुजरात पर देते हैं. गुजरात की छह करोड़ की आबादी के लिए मोदी लाखों करोड़ रुपए का ऋण लेकर बुलेट ट्रेन चलाने का करार कर सकते हैं लेकिन पूर्वांचल की नौ करोड़ की आबादी के विकास के लिए एक लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज नहीं दे सकते. लिहाजा, पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें उनकी पुरानी समृद्ध विरासत लौटाएं या पूर्वांचल राज्य अलग करें...

सरकार का एक ही फंडा, फहराता रहे मिल मालिकों का झंडा
चीनी मिल मालिकों के हित सर्वोपरि हैं. गन्ना किसानों की जिंदगी के कोई मायने नहीं. किसान मरता है तो सरकार कहती है कि घरेलू कलह से मर गया. पूरा देश नेताओं की कलह और तिकड़म से आक्रांत है. गन्ने की कीमत में 10 रुपए की बढ़ोत्तरी पर एक बुजुर्ग किसान ने कहा कि देश का पेट भरने वाले किसानों की जो उपेक्षा करेगा उसे प्रकृति अभिशाप देगी. फिर वह देखेगा कि किसानों को लूट कर, किसानों को धोखा देकर और किसानों की लाशों पर कमाया हुआ धन उसकी कितनी हिफाजत कर पाता है. उत्तर प्रदेश में किसानों की स्थिति भयावह है. सरकारें आलू, गेहूं और गन्ना उपजाने वाले किसानों को मरने या खेती छोड़ने के लिए विवश कर रही हैं.
किसानों को तबाह कर उनकी जमीनें 'कारपोरेट फार्मिंग के लिए बड़े औद्योगिक घरानों को देने की साजिश चल रही है. इसीलिए 'माल किसी और का, दाम किसी और का' के गैर-कानूनी, गैर-नैतिक और गैर-नैसर्गिक तौर-तरीके से किसानों को मारा जा रहा है. फसलें तैयार करने में लागत चाहे जो आए, उसकी कीमत सरकार तय करेगी पर उसकी डोर किसी और के हाथों से संचालित होगी. गेहूं, धान और गन्ना ही नहीं आलू व अन्य सब्जियों तक के दाम तय करने में उत्पादक किसानों का कोई अधिकार नहीं. अभी हम गन्ना की बात करें. गन्ना मौजू है. अभी भी गन्ने का बकाया हजारों करोड़ रुपए का है. उस पर सरकार गन्ना मूल्य 10 रुपए बढ़ा रही है. किसान कर्ज और ब्याज के बोझ से दबा आत्महत्याएं कर रहा है, लेकिन इन आत्महत्याओं के लिए दोषी कौन है? इस पर उत्तर प्रदेश सरकार मौन है. किसी भी सत्ता के लिए कितनी लानत की बात है कि कौड़ियों में फसल बेचने से अच्छा किसान उसे सड़क पर फेंक देना अधिक मुनासिब समझ रहा है. अपनी ही फसलें इस तरह बर्बाद होती देख कर किसान आत्महत्या कर ले रहा है. किसानों के हित की सरकार होती तो अब तक साढ़े चार सौ रुपए गन्ना मूल्य निर्धारित हो चुका होता. मोदी के वादे के मुताबिक फसल की लागत का डेढ़ गुना अधिक समर्थन मूल्य देने का सिद्धांत तय हो चुका होता. लेकिन किसान प्राथमिकता पर हैं ही नहीं. प्राथमिकता पर कारपोरेट हित है. चीनी मिल मालिकों और उद्योगपतियों का अपना 'सिंडिकेट' है, लेकिन किसानों का अपना कोई ताकतवर संगठन नहीं. किसानों के अलग-अलग संगठन और अलग-अलग राग हैं. सबमें राजनीति की घुसपैठ है. पूंजी सिंडिकेट और सरकारें मिल कर किसानों को उनकी जमीनों से खदेड़ भगाने के लिए सारा षडयंत्र कर रही हैं. खेत से कुछ नहीं मिलेगा तो मजदूरी करके गुजारा होगा. इससे खेतों को कारपोरेट फार्मिंग में बदलने में आसानी होगी. ये स्पेशल इकोनॉमिक जोन (एसईजेड), स्पेशल डेवलपमेंट जोन (एसडीजेड) और कारपोरेट फार्मिंग वगैरह आम लोगों के कितने हित और खास लोगों के कितने हित के हैं, इसे समझने के लिए कोई अतिरिक्त बुद्धि की जरूरत नहीं है. किसानों को राजनीतिक दलों ने बड़े शातिराना तरीके से मारा है. कभी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान खुशहाल थे. गन्ने की फसल और चीनी मिलों से प्रदेश के गन्ना बेल्ट में कई अन्य उद्योग धंधे भी फल-फूल रहे थे. गन्ने की राजनीति करके नेता तो कई बन गए लेकिन उन्हीं नेताओं ने गन्ना किसानों को बर्बाद कर दिया. गन्ना क्षेत्र से लोगों का भयंकर पलायन शुरू हुआ और उन्हें महाराष्ट्र और पंजाब में अपमानित होते हुए भी पेट भरने के लिए रुकना पड़ा. उत्तर प्रदेश में 125 चीनी मिलें थीं, जिनमें 63 मिलें केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश में थीं. इनमें से अधिकतर चीनी मिलें बेच डाली गईं और कुछ को छोड़ कर सभी मिलें बंद हो गईं. सरकार ने चीनी मिलें बेच कर भी पूंजीपतियों को ही फायदा पहुंचाया. चीनी मिलों के परिसर की जमीनें पूंजी-घरानों को कौड़ियों के भाव बेच डाली गईं, जिस पर अब महंगी कॉलोनियां बनाने का कुचक्र हो रहा है. चीनी मिलों को किसानों ने गन्ना समितियों के जरिए अपनी जमीनें लीज़ पर दी थीं. लेकिन उन किसानों के मालिकाना हक की चिंता किए बगैर अवैध तरीके से उन जमीनों को बेचा जा रहा है. सरकारों ने 1989 के बाद से प्रदेश में नकदी फसल का कोई विकल्प नहीं खड़ा किया. गन्ना ही किसानों का अस्तित्व बचाने की एकमात्र नकदी फसल थी. चीनी मिलों के खेल में कोई एक पार्टी शामिल नहीं,  बल्कि जो दल सत्ता में आया, उसने खूब हाथ धोया. भाजपा की सरकार ने हरिशंकर तिवारी की कम्पनी 'गंगोत्री इंटरप्राइजेज' को चार मिलें बेची थीं. 'गंगोत्री इंटरप्राइजेज' ने इन्हें चलाने के बजाए मशीनों को कबाड़ में बेच कर ढांचा सरकार के सुपुर्द कर दिया. फिर समाजवादी पार्टी की सरकार ने प्रदेश की 23 चीनी मिलें अनिल अम्बानी को बेचने का प्रस्ताव रखा. लेकिन तब अम्बानी पर चीनी मिलें चलाने के लिए दबाव था. सपा सरकार ने उन चीनी मिलों को 25-25 करोड़ रुपए देकर उन्हें चलवाया भी, लेकिन मात्र 15 दिन चल कर वे फिर से बंद हो गईं. तब तक चुनाव आ गया और फिर बसपा की सरकार आ गई. मुख्यमंत्री बनी मायावती ने सपा कार्यकाल के उसी प्रस्ताव को उठाया और चीनी मिलों को औने-पौने दाम में बेचना शुरू कर दिया. मायावती ने पौंटी चड्ढा की कम्पनी और उससे जुड़ी अन्य कम्पनियों को 21 चीनी मिलें बेच डालीं. देवरिया की भटनी चीनी मिल महज पौने पांच करोड़ में बेच दी गई. जबकि वह 172 करोड़ की थी. इसके अलावा देवरिया चीनी मिल 13 करोड़ में और बैतालपुर चीनी मिल 13.16 करोड़ में बेच डाली गई. बरेली चीनी मिल 14 करोड़ में बेची गई, बाराबंकी चीनी मिल 12.51 करोड़ में, शाहगंज चीनी मिल 9.75 करोड़ में, हरदोई चीनी मिल 8.20 करोड़ में, रामकोला चीनी मिल 4.55 करोड़ में, घुघली चीनी मिल 3.71 करोड़ में, छितौनी चीनी मिल 3.60 करोड़ में और लक्ष्मीगंज चीनी मिल महज 3.40 करोड़ रुपए में बेच डाली गई. ये तो बंद मिलों का ब्यौरा है. जो मिलें चालू हालत में थीं उन्हें भी ऐसे ही कौड़ियों के मोल बेचा गया. अमरोहा चीनी मिल महज 17 करोड़ में बेच डाली गई. सहारनपुर चीनी मिल 35.85 करोड़ में और सिसवां बाजार चीनी मिल 34.38 करोड़ में बिक गई. बुलंदशहर चीनी मिल 29 करोड़ में, जरवल रोड चीनी मिल 26.95 करोड़ में और खड्डा चीनी मिल महज 22.65 करोड़ में बेच डाली गई. महालेखाकार (कैग) ने इस घोटाले का पर्दाफाश भी किया. लेकिन उसे सरकारों ने लीपपोत दिया. अखिलेश सरकार ने लीपा. अब भाजपा सरकार लीपने-पोतने में सक्रिय है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चीनी मिल बिक्री घोटाले की जांच कराने की घोषणा की तो केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कम्पीटिशन कमीशन ऑफ इंडिया के जरिए पूरे मामले को लीपपोत दिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को बेदाग घोषित कर दिया. दूसरी तरफ आजादी के बाद गठित गाडगिल समिति से लेकर मनमोहन सरकार के कार्यकाल में गठित रंगराजन समिति तक ने चीनी उद्योग पर अपनी सिफारिशें दीं, लेकिन सरकारों ने उन सिफारिशों की तरफ झांका भी नहीं, वे सब ऐसे ही सत्ता के तहखाने में धूल फांक रही हैं. गन्ना किसानों की सुध लेने के लिए सरकारें रुचि नहीं ले रहीं, क्योंकि सरकारों की रुचि और निगाह किसानों की जमीनों पर है.
देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान केंद्र और राज्य सरकार दोनों से ही निराश और हताश हो चुके हैं. चीनी मिलों के मालिक गन्ना किसानों का हक मार कर अकूत लाभ कमा रहे हैं. इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के नाम पर सिंडिकेट बना कर चीनी मिलों के मालिक सरकारों को ब्लैकमेल करते रहते हैं. इस पूंजी सिंडिकेट की पहुंच इतनी है कि गन्ना मूल्य तय करने के सरकार के अधिकार को भी एक बार अदालत ने खारिज कर दिया था. लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद गन्ने का समर्थन मूल्य तय करने के सरकार के अधिकार को बहाल किया जा सका. इसके बावजूद गन्ने पर मक्कारी भरी राजनीति जारी है. गन्ने का समर्थन मूल्य न बढ़े इसके लिए चीनी मिल मालिकों का सिंडिकेट बड़े सुनियोजित तरीके से पेशबंदी करता है. चीनी मिलों को भीषण घाटे में बताया जाता है. जबकि असलियत यह है कि चीनी मिल जबरदस्त फायदे में चल रही हैं. चीनी मिलों के मालिक केवल चीनी की बात बताते हैं, लेकिन गन्ने के प्रति-उत्पादों (बाई प्रोडेक्ट्स) से होने वाले फायदे की बात नहीं करते. एक क्विंटल चीनी से करीब दस किलो चीनी बनती है. इसके आलावा पांच किलो शीरा निकलता है. बैगास तीस किलो निकलती है. पांच किलो मैली निकलती है. खोई से बिजली बनती है और करोड़ों की बिजली बेची जाती है. निजी मिल मालिक अपना लाभ केवल चीनी की बिक्री से होने वाली आय में दिखाते हैं और प्रति-उत्पाद (बाई-प्रोडक्ट्स) से होने वाली करोड़ों की आय को ‘गोल’ कर जाते हैं. चीनी मिलों की अपनी डिस्टिलरी होती है, जहां अल्कोहल एथनॉल बनता है. चीनी मिलों में बिजली बनाई जाती है जो अपने उपयोग के अलावा बाहर बेची जाती है. खोई से गत्ते बनते हैं. मैली भी खाद के रूप में बेच दी जाती है. डिस्टिलरी से ही इतना लाभ होता है कि चीनी मिल मालिक कभी घाटे में नहीं रहते. घाटे का सुनियोजित झूठ सरकारों से ब्लैकमेलिंग का तरीका है. सरकारें भी इस झूठ को जानती हैं, लेकिन इस प्रहसन में नेता भी बराबर का किरदार निभाता है. इस प्रहसन के मंच पर सिंडिकेट (इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन) का कोई अधिकारी आकर कहता है, ‘चीनी उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है, इसलिए गन्ने का दाम नहीं बढ़ाया जाए.’ इस डायलॉग के डेलिवर हो जाने के बाद सत्ता प्रतिनिधि मंच पर अवतरित होता है और ‘चीनी उद्योग के संकट’ पर गुरु-गंभीर मुद्रा बना कर गन्ना मूल्य नहीं बढ़ाने या किसानों को 10 रुपए की भीख देने की घोषणा करने की संजीदगी दिखाने की ऐक्टिंग करता है. फिर नेपथ्य से सत्ता-स्वर गूंजता है और ‘संकटग्रस्त चीनी उद्योग’ को उबारने के लिए अरबों रुपए के ‘राहत-पैकेज’ की घोषणा होती है. कथित तौर पर घाटा झेल रही चीनी मिलों को ‘सांस’ लेने के लिए सरकार ‘ऑक्सीजन’ मुहैया कराती है. केंद्र सरकार ‘घाटे से घिरी’ चीनी मिलों को किसानों के बकाये का भुगतान करने के लिए बिना ब्याज का ऋण उपलब्ध कराती है और बेशकीमती बाई-प्रोडक्ट एथनॉल के उत्पादन पर लगने वाला केंद्रीय उत्पाद शुल्क भी हटा लेती है. इसी तरह के कई प्रदेशीय और केंद्रीय ‘ऑक्सीजन’ (रियायतों) से चीनी मिलें फलती-फूलती रहती हैं. गन्ना किसानों के बैंक खातों में उत्पादन सब्सिडी जमा कर भी सरकार चीनी उद्योगों को राहत देती है. लेकिन इसी तरह से किसानों को राहत देने बारे में सरकारें कभी नहीं सोचतीं. लोकतंत्र का प्रहसन ऐसे ही चलता रहता है और किसान फांसी पर झूलता रहता है.